श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोक १७]
- साधक-संजीवनी *
११
असत्की सत्ता विद्यमान न रहनेसे उसका अभाव और सत्का अभाव विद्यमान न रहनेसे उसका भाव सिद्ध हुआ। निष्कर्ष यह निकला कि असत् है ही नहीं, प्रत्युत सत्-ही-सत् है। उस सत्-तत्त्वमें देह और देहीका विभाग नहीं है। जबतक असत्की सत्ता है, तबतक विवेक है। असत्की सत्ता मिटनेपर विवेक ही तत्त्वज्ञानमें परिणत हो जाता है। 'उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदृशिभिः'—'इसमें उभयोरपि' में विवेक है, 'अन्तः' में तत्त्वज्ञान है और 'दृष्टः' में अनुभव है अर्थात् विवेक तत्त्वज्ञानमें परिणत हो गया और सत्तामात्र ही शेष रह गयी। एक सत्ताके सिवाय कुछ नहीं है—यह ज्ञानमार्गकी सर्वोपरि बात है।
असत्की सत्ता नहीं है—यह भी सत्य है और सत्का अभाव नहीं है—यह भी सत्य है। सत्यको स्वीकार करना साधकका काम है। साधकको अनुभव हो अथवा न हो, उसको तो सत्यको स्वीकार करना है। 'है' को स्वीकार करना है और 'नहीं' को अस्वीकार करना है—यही वेदान्त है, वेदोंका खास निष्कर्ष है।
संसारमें भाव और अभाव—दोनों दीखते हुए भी 'अभाव' मुख्य रहता है। परमात्मामें भाव और अभाव—दोनों दीखते हुए भी 'भाव' मुख्य रहता है। संसारमें 'अभाव' के अन्तर्गत भाव-अभाव हैं और परमात्मामें 'भाव' के अन्तर्गत भाव-अभाव हैं। दूसरे शब्दोंमें, संसारमें 'नित्यवियोग' के अन्तर्गत संयोग-वियोग हैं और परमात्मामें 'नित्ययोग' के अन्तर्गत योग-वियोग (मिलन-विरह) हैं। अतः संसारमें अभाव ही रहा और परमात्मामें भाव ही रहा।
सम्बन्ध-सत् और असत् क्या हैं—इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ॥ १७ ॥
| अविनाशि | = अविनाशी | इदम् | = यह | विनाशम् | = विनाश |
|---|---|---|---|---|---|
| तु | = तो | सर्वम् | = सम्पूर्ण (संसार) | कश्चित् | = कोई भी |
| तत् | = उसको | ततम् | = व्याप्त है। | न | = नहीं |
| विद्धि | = जान, | अस्य | = इस | कर्तुम् | = कर |
| येन | = जिससे | अव्ययस्य | = अविनाशीका | अर्हति | = सकता। |
व्याख्या—'अविनाशि तु तद्विद्धि'—पूर्वश्लोकमें जो सत्-असत्की बात कही थी, उसमेंसे पहले 'सत्' की व्याख्या करनेके लिये यहाँ 'तु' पद आया है।
'उस अविनाशी तत्त्वको त् समझ'—ऐसा कहकर भगवान्ने उस तत्त्वको परोक्ष बताया है। परोक्ष बतानेमें तात्पर्य है कि इदंतासे दीखनेवाले इस सम्पूर्ण संसारमें वह परोक्ष तत्त्व ही व्याप्त है, परिपूर्ण है। वास्तवमें जो परिपूर्ण है, वही 'है' और जो सामने संसार दीख रहा है,
यह 'नहीं' है।
यहाँ 'तत्' पदसे सत्-तत्त्वको परोक्ष रीतिसे कहनेका तात्पर्य यह नहीं है कि वह तत्त्व बहुत दूर है; किन्तु वह इन्द्रियों और अन्तःकरणका विषय नहीं है, इसलिये उसको परोक्ष रीतिसे कहा गया है।
'येन सर्वमिदं ततम्'—'जिसको परोक्ष कहा है, उसीका वर्णन करते हैं कि यह सब-का-सब संसार उस नित्य-तत्त्वसे व्याप्त है। जैसे सोनेसे बने हुए गहनोंमें सोना,
- 'येन सर्वमिदं ततम्'—ये पद गीतामें तीन बार आये हैं। उनमेंसे यहाँ (२।१७ में) ये पद शरीरीके लिये आये हैं कि इस शरीरीसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। यह बात सांख्ययोगकी दृष्टिसे कही गयी है। दूसरी बार ये पद आठवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें आये हैं। वहाँ कहा गया है कि जिस ईश्वरसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह अनन्यभक्तिके मिलता है। अतः भक्तिका वर्णन होनेसे उपर्युक्त पद ईश्वरके विषयमें आये हैं। तीसरी बार ये पद अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें आये हैं। वहाँ कहा गया है कि जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उसका चारों वर्ण अपने-अपने कर्मद्वारा पूजन करें। यह वर्णन भी भक्तिकी दृष्टिसे हुआ है।
नवें अध्यायके चौथे श्लोकमें राजविद्याका वर्णन करते हुए भगवान्ने 'मया ततमिदं सर्वम्' पदोंसे कहा है कि यह सम्पूर्ण संसार मेरेसे व्याप्त है। इस प्रकार तीन जगह तो 'येन' पद देकर उस तत्त्वको परोक्षरूपसे कहा है, और एक जगह 'अस्मत्' शब्द—'मया' देकर स्वयं भगवान्ने अपरोक्षरूपसे अपनी बात कही है।