श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१२
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
लोहेसे बने हुए अस्त्र-शस्त्रोंमें लोहा, मिट्टीसे बने हुए बर्तनोंमें मिट्टी और जलसे बनी हुई बर्फमें जल ही व्याप्त (परिपूर्ण) है, ऐसे ही संसारमें वह सत्-तत्त्व ही व्याप्त है। अतः वास्तवमें इस संसारमें वह सत्-तत्त्व ही जाननेयोग्य है।
‘विनाशमव्यवस्थाय न कश्चिचक्रतुर्मर्हति’ —यह शरीरी अव्यय* अर्थात् अविनाशी है। इस अविनाशीका कोई विनाश कर ही नहीं सकता। परन्तु शरीर विनाशी है— क्योंकि वह नित्य-निरन्तर विनाशकी तरफ जा रहा है। अतः इस विनाशीके विनाशको कोई रोक ही नहीं
परिशिष्ट भाव —व्यवहारमें हम कहते हैं कि ‘यह मनुष्य है, यह पशु है, यह वृक्ष है, यह मकान है’ आदि, तो इसमें ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो पहले भी नहीं थे, पीछे भी नहीं रहेंगे तथा वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहे हैं। परन्तु इनमें ‘है’ रूपसे जो सत्ता है, वह सदा ज्यों-की-त्यों है। तात्पर्य है कि ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो संसार (असत्) है और ‘है’ अविनाशी आत्मतत्त्व (सत्) है। इसलिये ‘मनुष्य, पशु, वृक्ष, मकान’ आदि तो अलग-अलग हुए, पर इन सबमें ‘है’ एक ही रहा। इसी तरह मैं मनुष्य हूँ, मैं पशु हूँ, मैं देवता हूँ आदिमें शरीर तो अलग-अलग हुए पर ‘हूँ’ अथवा ‘है’ एक ही रहा।
‘येन सर्वमिदं ततम्’ —ये पद यहाँ जीवात्माके लिये आये हैं और आठवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें तथा अठारहवें अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें यही पद परमात्माके लिये आये हैं। इसका तात्पर्य है कि जीवात्माका सर्वव्यापक परमात्माके साथ साधर्म्य है। अतः जैसे परमात्मा संसारसे असंग हैं, ऐसे ही जीवात्मा भी शरीर-संसारसे स्वतः-स्वाभाविक असंग है—‘असङ्गो ह्ययं पुरुषः’ (बृहदा० ४।३।१५), ‘देहेऽस्मिन्पुरुषः परः’ (गीता १३।२२)। जीवात्माकी स्थिति किसी एक शरीरमें नहीं है। वह किसी शरीरसे चिपका हुआ नहीं है। परन्तु इस असंगताका अनुभव न होनेसे ही जन्म-मरण हो रहा है।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनीऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥
| अनाशिनः | = अविनाशी, | शरीरिणः | = इस शरीरीके | उक्ताः | = कहे गये हैं। |
|---|---|---|---|---|---|
| अप्रमेयस्य | = जाननेमें न आनेवाले (और) | इमे | = ये | तस्मात् | = इसलिये |
| नित्यस्य | = नित्य रहनेवाले | देहाः | = देह | भारत | = हे अर्जुन! (तुम) |
| अन्तवन्तः | = अन्तवाले | युध्यस्व | = युद्ध करो। |
व्याख्या —‘अनाशिनः’—किसी कालमें, किसी कारणसे कभी किंचिन्मात्र भी जिसमें परिवर्तन नहीं होता, जिसकी क्षति नहीं होती, जिसका अभाव नहीं होता, उसका नाम ‘अनाशी’ अर्थात् अविनाशी है।
‘अप्रमेयस्य’ —जो प्रमा-(प्रमाण-)का विषय नहीं है अर्थात् जो अन्तःकरण और इन्द्रियोंका विषय नहीं है,
सकता। तू सोचता है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा तो ये नहीं मरेंगे, पर वास्तवमें तेरे युद्ध करनेसे अथवा न करनेसे इस अविनाशी और विनाशी तत्त्वमें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा अर्थात् अविनाशी तो रहेगा ही और विनाशीका नाश होगा ही।
यहाँ ‘अस्य’ पदसे सत्-तत्त्वको इदंतासे कहनेका तात्पर्य है कि प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरोंमें जो सत्ता दीखती है, वह इसी सत्-तत्त्वकी ही है। ‘मेरा शरीर है और मैं शरीरधारी हूँ’—ऐसा जो अपनी सत्ताका ज्ञान है, उसीको लक्ष्य करके भगवान्ने यहाँ ‘अस्य’ पद दिया है।
उसको ‘अप्रमेय’ कहते हैं।
जिसमें अन्तःकरण और इन्द्रियाँ प्रमाण नहीं होतीं, उसमें शास्त्र और सन्त-महापुरुष ही प्रमाण होते हैं, शास्त्र और सन्त-महापुरुष उन्हींके लिये प्रमाण होते हैं, जो श्रद्धालु हैं। जिसकी जिस शास्त्र और सन्तमें श्रद्धा होती है, वह उसी शास्त्र और सन्तके वचनोंको मानता है। इसलिये यह तत्त्व
- भगवान्ने गीतामें जगह-जगह शरीरीको भी अव्यय कहा है और अपनेको भी अव्यय कहा है। स्वरूपसे दोनों अव्यय होनेपर भी भगवान् तो प्रकृतिको अपने वशमें करके (स्वतन्त्रतापूर्वक) प्रकट और अन्तर्धान होते हैं और यह शरीरी प्रकृतिके पर्वश होकर जन्मता और मरता रहता है; क्योंकि इसने शरीरको अपना मान रखा है।