श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
पृष्ठ 95, कुल 1299 में से
संदर्भ में पढ़ें१४
- श्रीमद्भगवद्गीता *
[ अध्याय २ ]
फिर किसी प्रकारका किंचिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। इस प्रकार सत्का अनुभव करके निःसंदिध होकर कर्तव्यका पालन करना चाहिये। इस विवेचनसे यह बात सिद्ध होती है कि सांख्ययोग एवं कर्मयोगमें किसी विशेष वर्ण और आश्रमकी आवश्यकता नहीं है। अपने कल्याणके लिये चाहे सांख्ययोगका अनुष्ठान करे, चाहे कर्मयोगका अनुष्ठान करे, इसमें मनुष्यकी पूर्ण स्वतन्त्रता है। परन्तु व्यावहारिक काम करनेमें वर्ण और आश्रमके अनुसार शास्त्रीय विधानकी परम आवश्यकता है, तभी तो यहाँ सांख्ययोगके अनुसार सत्-असत्का विवेचन करते हुए भगवान् युद्ध करनेकी अर्थात् कर्तव्य-कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।
परिशिष्ट भाव —भगवान्ने अपने उपदेशके आरम्भमें ‘गतासूनू ’ (मृत) और ‘अगतासूनू ’ (जीवित)—दोनों प्राणियोंको अशोच्य बताया। फिर बारहवें-तेरहवें श्लोकोंमें ‘गतासूनू ’ को अशोच्य बतानेके लिये ‘सत्’ (नित्य) का वर्णन किया और चौदहवें-पन्द्रहवें श्लोकोंमें ‘अगतासूनू ’ को अशोच्य बतानेके लिये ‘असत्’ (अनित्य) का वर्णन किया। फिर सत् और असत्—दोनोंका वर्णन सोलहवें श्लोकमें किया। इसके बाद सत्के भाव और असत्के अभावका विवेचन मुख्यरूपसे सत्रहवें-अठारहवें श्लोकोंमें करके एक प्रकरण पूरा करते हैं।
यद्यपि भाव (होनापन) आत्माका ही है, शरीरका नहीं, तथापि मनुष्यसे भूल यह होती है कि वह पहले शरीरको देखकर फिर उसमें आत्माको देखता है, पहले आकृतिको देखकर फिर भावको देखता है। ऊपर लगायी हुई पालिश कबतक टिकेगी ? साधकको विचार करना चाहिये कि आत्मा पहले थी या शरीर पहले था ? विचार करनेपर सिद्ध होता है कि आत्मा पहले है, शरीर पीछे है; भाव पहले है, आकृति पीछे है। इसलिये साधकको दृष्टि पहले भावरूप आत्मा या स्वयंकी तरफ जानी चाहिये, शरीरकी तरफ नहीं।
सम्बन्ध—पूर्वश्लोकतक शरीरीको अविनाशी जाननेवालोंकी बात कही। अब उसी बातको अन्वय और व्यतिरेकरीतिसे दृढ़ करनेके लिये, जो शरीरीको अविनाशी नहीं जानते, उनकी बात आगेके श्लोकमें कहते हैं।
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
| यः | = जो मनुष्य | एनम् | = इसको | विजानीतः | = जानते; |
|---|---|---|---|---|---|
| एनम् | = इस (अविनाशी शरीरी)-को | हतम् | = मरा | (क्योंकि) | |
| हन्तारम् | = मारनेवाला | मन्यते | = मानता है, | अयम् | = यह |
| वेत्ति | = मानता है | तौ | = वे | न | = न |
| च | = और | उभौ | = दोनों ही | हन्ति | = मारता है (और) |
| यः | = जो मनुष्य | (इसको) | न | = न | |
| न | = नहीं | हन्यते | = मारा जाता है। |
व्याख्या—‘य एनं’ वेत्ति हन्तारम् —जो इस कारण कि शरीरमें कर्तापन नहीं है। जैसे कोई भी कारीगर शरीरीको मारनेवाला मानता है; वह ठीक नहीं जानता। कैसा ही चतुर क्यों न हो, पर किसी औजारके बिना वह
- यहाँ ‘एनम्’ पद अन्वादेशमें आया है। जिसका पहले वर्णन हो चुका है, उसको दुबारा कहना ‘अन्वादेश’ कहलाता है। पहले सत्रहवें श्लोकमें एक विषयको लेकर जिसका ‘अस्य’ पदसे वर्णन हुआ है, अब यहाँ दूसरे विषयको लेकर उसी तत्त्वको दुबारा कह रहे हैं। इसलिये यहाँ ‘एनम्’ पदका प्रयोग किया गया है।