भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)

Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani

स्वामी रामसुखदास द्वारा

स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)

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श्लोक २० ]

  • साधक-संजीवनी *

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कार्य नहीं कर सकता, ऐसे ही यह शरीरी शरीरके बिना स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता। अतः तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि सब प्रकारकी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं—ऐसा जो अनुभव करता है, वह शरीरीके अकर्तापनका अनुभव करता है (तेरहवें अध्यायका उन्तीसवें श्लोक)। तात्पर्य यह हुआ कि शरीरीमें कर्तापन नहीं है, पर यह शरीरके साथ तादात्म्य करके, सम्बन्ध जोड़कर शरीरसे होनेवाली क्रियाओंमें अपनेको कर्ता मान लेता है। अगर यह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े, तो यह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं है।

‘यश्चैनं मन्यते हतम्’ —जो इसको मरा मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता। जैसे यह शरीरी मारनेवाला नहीं है, ऐसे ही यह मरनेवाला भी नहीं है; क्योंकि इसमें कभी कोई विकृति नहीं आती। जिसमें विकृति आती है, परिवर्तन होता है अर्थात् जो उत्पत्ति-विनाशशील होता है, वही मर

सकता है।

‘उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते’ —वे दोनों ही नहीं जानते अर्थात् जो इस शरीरीको मारनेवाला मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता और जो इसको मरनेवाला मानता है, वह भी ठीक नहीं जानता।

यहाँ प्रश्न होता है कि जो इस शरीरीको मारनेवाला और मरनेवाला दोनों मानता है, क्या वह ठीक जानता है? इसका उत्तर है कि वह भी ठीक नहीं जानता। कारण कि यह शरीरी वास्तवमें ऐसा नहीं है। यह नाश करनेवाला भी नहीं है और नष्ट होनेवाला भी नहीं है। यह निर्विकाररूपसे नित्य-निरन्तर ज्यों-का-त्यों रहनेवाला है। अतः इस शरीरीको लेकर शोक नहीं करना चाहिये।

अर्जुनके सामने युद्धका प्रसंग होनेसे ही यहाँ शरीरीको मरने-मारनेकी क्रियासे रहित बताया गया है। वास्तवमें यह सम्पूर्ण क्रियाओंसे रहित है।

परिशिष्ट भाव —यह शरीरी न तो किसीको मारता है और न किसीसे मारा ही जाता है—इसका तात्पर्य है कि शरीरी किसी क्रियाका कर्ता भी नहीं है तथा कर्म भी नहीं है और इसमें कोई विकार भी नहीं आता। जो मनुष्य शरीरकी तरह शरीरीको भी मारनेवाला तथा मरनेवाला मानते हैं, वे वास्तवमें शरीर और शरीरीके विवेकको महत्त्व नहीं देते, इसमें स्थित नहीं होते, प्रत्युत अविवेकको महत्त्व देते हैं।

सम्बन्ध—यह शरीरी मरनेवाला क्यों नहीं है? इसके उत्तरमें कहते हैं—

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।

अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥

अयम्= यह शरीरीभूत्वा= उत्पन्न होकरशाश्वतः= शाश्वत
= नभूयः= फिर(और)
कदाचित्= कभीभविता= होनेवालापुराणः= अनादि है।
जायते= जन्मता है= नहीं है।शरीरे= शरीरके
वा= औरअयम्= यहहन्यमाने= मारे जानेपर
= नअजः= जन्मरहित,भी (यह)
म्रियते= मरता हैनित्यः= नित्य-निरन्तरहन्यते= नहीं
वा= तथा (यह)रहनेवाला,= मारा जाता।

व्याख्या —[शरीरमें छः विकार होते हैं—उत्पन्न होना, सत्तावाला दीखना, बदलना, बढ़ना, घटना और नष्ट होना]। यह शरीरी इन छहों विकारोंसे रहित है—यही बात भगवान्

इस श्लोकमें बता रहे हैं।]

‘न जायते म्रियते वा कदाचित्’ —जैसे शरीर उत्पन्न होता है, ऐसे यह शरीरी कभी भी, किसी भी समयमें उत्पन्न

१-जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्धतेऽपक्षीयते विनश्यति। (निरुक्त १।१।२)

२-यह शरीरी उत्पन्न नहीं होता—‘न जायते’, ‘अजः’; उत्पन्न होकर विकारी सत्तावाला नहीं होता—‘अयं भूत्वा भविता वा न भूयः’; यह बदलता नहीं—‘शाश्वतः’; यह बढ़ता नहीं—‘पुराणः’; यह क्षीण नहीं होता—‘नित्यः’; और यह मरता नहीं—‘न म्रियते’ ‘न हन्यते हन्यमाने शरीरे’।