श्रीमद्भगवद्गीता साधक-संजीवनी (परिशिष्टसहित)
Shrimad Bhagavad Gita Sadhak Sanjeevani
स्वामी रामसुखदास द्वारा
स्रोत: संवर्धित नब्बेवाँ संस्करण (90th Edition), गीता प्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस, गोरखपुर · 2008 (उद्गम)
॥ श्रीहरिः ॥
श्रद्धेय स्वामी
रामसुखदासजी महाराजके महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ एवं शीघ्र
कल्याणकारी पुस्तकें
- १-गीता-साधक-संजीवनी (हिन्दी-टीका) बृहदाकार, ग्रन्थाकार, मराठी, गुजराती, अंग्रेजी एवं बंगला अनुवाद भी
- २-साधक-संजीवनी (परिशिष्ट)
- ३-गीता-दर्पण—(हिन्दी, मराठी, बंगला, गुजराती)
- ४-साधन-सुधा-सिन्धु
- ५-गीता-ज्ञान-प्रवेशिका
- ६-गीता-माधुर्य—(संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, तमिल, कन्नड, मराठी, गुजराती, असमिया, उर्दू, नेपाली, बंगला, उड़िया)
- ७-कल्याण-पथ
- ८-जित देखुं तित तू
- ९-भगवत्प्राप्ति सहज है
- १०-सुन्दर समाजका निर्माण
- ११-मानसमें नाम-वन्दना
- १२-जीवनका कर्तव्य
- १३-कल्याणकारी प्रवचन— (हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती, बंगला)
- १४-नित्ययोगकी प्राप्ति
- १५-भगवत्प्राप्तिकी सुगमता— (हिन्दी, अंग्रेजी, कन्नड)
- १६-भगवान्से अपनापन
- १७-वास्तविक सुख
- १८-साधन और साध्य
- १९-तात्त्विक प्रवचन— (हिन्दी, गुजराती)
- २०-तत्त्वज्ञान कैसे हो?
- २१-किसान और गाय
- २२-जीवनोपयोगी प्रवचन
- २३-जीवनका सत्य— (हिन्दी, अंग्रेजी)
- २४-अमृत बिन्दु
- २५-भगवन्नाम
- २६-साधकोंके प्रति
- २७-सत्संगकी विलक्षणता
- २८-मातृशक्तिका घोर अपमान (तमिल, बंगला)
श्रीमद्भगवद्गीता
सा ध क
सं जी व नी
Code 6
श्रीमद्भगवद्गीता ग्रन्थमें इतनी विलक्षणता है कि अपना वास्तविक कल्याण चाहनेवाला किसी भी वर्ण, आश्रम, देश, सम्प्रदाय, मत आदिका कोई भी मनुष्य क्यों न हो, इस ग्रन्थको पढ़ते ही इसमें आकृष्ट हो जाता है। अगर मनुष्य इस ग्रन्थका थोड़ा-सा भी पठन-पाठन करे तो उसको अपने उद्धारके लिये बहुत ही सन्तोषजनक उपाय मिलते हैं। हरेक दर्शनकेअलग-अलग अधिकारी होते हैं, पर गीताकी यह विलक्षणता है कि अपना उद्धार चाहनेवाले सब-के-सब इसके अधिकारी हैं।
परमश्रद्धेय स्वामीजीने गीताकी यह टीका किसी दार्शनिक विचारकी दृष्टिसे अथवा अपनी विद्वत्ताका प्रदर्शन करनेके लिये नहीं लिखी है, अपितु साधकोंका हित कैसे हो—इसी दृष्टिसे लिखी है। परमशान्तिकी प्राप्ति चाहनेवाले प्रत्येक साधकके लिये, चाहे वह किसी भी देश, वेश, भाषा, मत, सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो, यह टीका संजीवनी बूटीके समान है। इस टीकाका अध्ययन करनेसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई, मुसलमान आदि सभी धर्मोंके अनुयायियोंको अपने-अपने मतके अनुसार ही उद्धारके उपाय मिल जायेंगे। इस टीकामें साधकोंको अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये पूरी सामग्री मिलेगी।
परमशान्तिकी प्राप्तिके इच्छुक सभी भाई-बहनोंसे विनम्र निवेदन है कि वे इस ग्रन्थ-रत्नको अवश्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़ें, समझें और यथासाध्य आचरणमें लानेका प्रयत्न करें।
—प्रकाशक
गीताप्रेस, गोरखपुर — २७३००५
फोन : (०५५१) २३३४७२१, २३३१२५०, २३३३०३०