समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदृष्टि उखड़े, 'श्री विजन' से (खं-2-२)
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मोह राजा का अंतिम व्यूह
मोहबाजार चौदह साल की उम्र में शुरू होता है और चालीस साल के बाद खत्म होता है, तब वह पेड़ सूख जाता है! ये तो तरह-तरह के मोह हैं! वर्ना हिन्दुस्तान के एक-एक मनुष्य में तो ऐसी शक्तियाँ हैं कि काम निकाल दें!
प्रश्नकर्ता : सबसे ज्यादा शक्तियाँ कहाँ खर्च होती है? शक्तियाँ ज्यादातर कहाँ व्यर्थ हो जाती हैं?
दादाश्री : इस मोह में ही, मोह और अजागृति में। बाकी जितना मोह कम उतनी ही शक्ति ज्यादा।
मोहराजा ने अंतिम पांसा फेंका है। अभी सर्वत्र विषय का ही मोह व्याप्त हो गया है। पहले तो मान का मोह, कीर्ति का मोह, लक्ष्मी का मोह, मोह सर्वत्र बिखरा हुआ था। आज सभी मोह सिर्फ विषय में ही व्याप्त हो गया है और भयंकर जलन में ही जीवन जी रहे हैं। सिर्फ ये साधु-महाराज ही विषय से अलग हुए हैं, इसलिए उन्हें थोड़ी-बहुत शांति है।
जिसमें ज्ञानशक्ति जबरदस्त हो और विषय का तो विचार तक नहीं आता हो, तो वह भले ही शादी न करे। लेकिन जब तक रूप पर मोह है, तब तक शादी कर लेनी चाहिए। शादी करना आवश्यक है और शादी करना बहुत बड़ा जोखिम है और जोखिम उठाए (में उतरे/पड़े) बिना पार आए ऐसा भी नहीं है। जिसे मोह है, उसे शादी कर ही लेनी चाहिए। वर्ना हरहाया पशु बन जाएगा। किसी के खेत में घुसा कि मारा जाएगा और भयंकर अधोगति को न्यौता देगा। शादी यानी क्या कि हक का भोगना, और उसमें तो अणहक्क का विचार आए तो अधोगति में जाएगा! शरीर पर राग ही क्यों होना चाहिए? शरीर किसका बना हुआ है?
प्रश्नकर्ता : पुद्गल का।