समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : हाँ, पुद्गल तो है, लेकिन कैसा पुद्गल? यदि सिर्फ़ सोने से बना होता तो दुर्गंध नहीं आती, हाथ नहीं बिगड़ते, कुछ भी नहीं, लेकिन यह तो सुंदर चादर से पोटली बाँधी हुई है, इसलिए कितना फँसाव हो गया है। उसी का नाम मोह है न! जो है वह दिखता नहीं है और जो नहीं है, वह दिखता है! निर्माही कौन? ज्ञानीपुरुष। उन्हें जैसा है वही दिखता है! आरपार अंदर, हड़िड़यों-वड़िड़यों, आंतें-वांतें सबकुछ दिखता है, यों ही सहज स्वभाव से सबकुछ दिखता है।
प्रश्नकर्ता : उस तरह की दृष्टि होगी तो फिर आकर्षण रहेगा ही नहीं न?
दादाश्री : इस संडास को देखते हैं, तब वहाँ पर क्या कभी आकर्षण होता है? देखते ही मूर्छित हो जाएं तो, वह इसलिए कि पिछले जन्म का मोह छप गया है। यह चमड़ी से ढका हुआ मांस ही है। लेकिन ऐसा रहता नहीं है न! जिन्हें मूर्च्छा नहीं होती, उन्हें वह जागृति रहती है। जैसा है वही दिखे, उसी को जागृति कहते हैं! केवल शुद्धात्मा के दर्शन करने जैसा है, बाकी का सब तो रेशमी चादर से लपेटा हुआ मांस ही है!
हमारी आज्ञा का पालन करोगे तो तुम्हारा मोह जाएगा। मोह को तुम खुद निकालने जाओगे तो वही तुम्हें निकाल दे, ऐसा है! इसलिए उसे निकालने की बजाय उससे कहना, 'बैठिए साहब, हम आपकी पूजा करेंगे।' फिर अलग होकर तुमने उस पर उपयोग रखा और दादा की आज्ञा में आ गए तो मोह को तुरंत अपने आप जाना ही पड़ेगा। फिर मोह खुद ही कहेगा कि, 'अपना तो इधर कुछ भी नहीं चलेगा, इधर दादा का साम्राज्य हो गया है, अब अपना कुछ नहीं चलेगा।' तो मोह सभी बोरिया-बिस्तर समेटकर चला जाएगा। बाकी और किसी भी तरीके से मोह को कोई निकाल नहीं सका है। वह तो मोहराजा कहलाता है!