समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : वह कभी-कभी ही। यानी पहले बहुत आते थे पूरे दिन! वे बंद हो गए।
दादाश्री : और अभी तो कुछ और टाइम बीतने पर तो वह दिशा ही बंद हो जाएगी। जहाँ पर जिस दिशा में हमें जाना था अपनी वह दिशा तय हो जाए, तो उसके बाद पिछली सारी अड़चनें आनी बंद हो जाएँगी और फिर वह दिशा ही बंद हो जाएगी। फिर नहीं आएगा। फिर ऐसा उत्पन्न हो जाएगा कि हमारी तरह रहा जा सकेगा।
प्रश्नकर्ता : आज कल, यह श्री विज्ञन अच्छा रहता है।
दादाश्री : श्री विज्ञन तो बहुत काम निकाल देता है। दादा का निदिध्यासन रहता है न? उस निदिध्यासन से सभी फल मिलते हैं। निदिध्यासन रहे तो इच्छा ही नहीं होगी किसी चीज़ की। भीख ही नहीं रहेगी।
विषय का विचार आए तब भी कहना, 'मैं नहीं हूँ' यह अलग है, उसे डॉटना पड़ेगा। बल्कि तुम्हें चंद्रेश को मार्गदर्शन देना है कि 'ऐसे कर, ऐसे काम कर, ऐसे काम कर।' नहीं कर रहा हो तो जरा कहना पड़ेगा कि 'इन सब के साथ नहीं चलोगे तो, तुम्हारी क्या दशा होगी?' चलानेवाला तो चाहिए या नहीं चाहिए?
प्रश्नकर्ता : चाहिए।
दादाश्री : यानी यह ज्ञान दिया है, तो शुद्धात्मा रहेगा ही। अब इसमें चूकना मत। अब जो कुछ भी आए, वह सबकुछ चंद्रेश का है। इसलिए चंद्रेश के साथ तुझे किच-किच करते रहना। 'तू तो पहले से ही ऐसा है, मुझे कोई लेना-देना नहीं।' तू ऐसा कह देना। 'देख, सीधे चलना, सीधे चलना हो तो चल, वर्ना मैं तो फिर बिल्कुल ही तिरस्कार कर दूँगा' कहना। किंचित्मात्र भी दुःख, वह मेरा स्वरूप नहीं है। किंचित्मात्र भी भीतर उपाधि हो तो वह स्वरूप मेरा नहीं है। दादा ने मुझे जो दिया है,