भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : वह कभी-कभी ही। यानी पहले बहुत आते थे पूरे दिन! वे बंद हो गए।

दादाश्री : और अभी तो कुछ और टाइम बीतने पर तो वह दिशा ही बंद हो जाएगी। जहाँ पर जिस दिशा में हमें जाना था अपनी वह दिशा तय हो जाए, तो उसके बाद पिछली सारी अड़चनें आनी बंद हो जाएँगी और फिर वह दिशा ही बंद हो जाएगी। फिर नहीं आएगा। फिर ऐसा उत्पन्न हो जाएगा कि हमारी तरह रहा जा सकेगा।

प्रश्नकर्ता : आज कल, यह श्री विज्ञन अच्छा रहता है।

दादाश्री : श्री विज्ञन तो बहुत काम निकाल देता है। दादा का निदिध्यासन रहता है न? उस निदिध्यासन से सभी फल मिलते हैं। निदिध्यासन रहे तो इच्छा ही नहीं होगी किसी चीज़ की। भीख ही नहीं रहेगी।

विषय का विचार आए तब भी कहना, 'मैं नहीं हूँ' यह अलग है, उसे डॉटना पड़ेगा। बल्कि तुम्हें चंद्रेश को मार्गदर्शन देना है कि 'ऐसे कर, ऐसे काम कर, ऐसे काम कर।' नहीं कर रहा हो तो जरा कहना पड़ेगा कि 'इन सब के साथ नहीं चलोगे तो, तुम्हारी क्या दशा होगी?' चलानेवाला तो चाहिए या नहीं चाहिए?

प्रश्नकर्ता : चाहिए।

दादाश्री : यानी यह ज्ञान दिया है, तो शुद्धात्मा रहेगा ही। अब इसमें चूकना मत। अब जो कुछ भी आए, वह सबकुछ चंद्रेश का है। इसलिए चंद्रेश के साथ तुझे किच-किच करते रहना। 'तू तो पहले से ही ऐसा है, मुझे कोई लेना-देना नहीं।' तू ऐसा कह देना। 'देख, सीधे चलना, सीधे चलना हो तो चल, वर्ना मैं तो फिर बिल्कुल ही तिरस्कार कर दूँगा' कहना। किंचित्मात्र भी दुःख, वह मेरा स्वरूप नहीं है। किंचित्मात्र भी भीतर उपाधि हो तो वह स्वरूप मेरा नहीं है। दादा ने मुझे जो दिया है,

‘खुद’ अपने आपको को डॉटना (खं-2-६)

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वह निरुपार्थिपद, परमानंदी पद दिया है, वही मेरा स्वरूप है।

थोड़ा-थोड़ा चंद्रेश को भी डॉटता रह। तुझे डॉटनेवाला कोई नहीं है। तुझे कोई डॉटि तो उसे तू काट खाए ऐसा है। तुझे धौल मारने की आदत है न? तो कहना, ‘चंद्रेश, तुझे धौल मारूँगा अब तो! कुछ भी अंदर ऐसा लगे, वह विषय विकारी विचार तो समझ लेना कि यह चंद्रेश है, मैं नहीं। कुछ भी बदलाव हो, वह चंद्रेश है, तुम नहीं। तुम में तो हो ही नहीं सकता न!

प्रश्नकर्ता : खुद के सभी दोष जल्दी निकल जाँ, उसके लिए क्या करना चाहिए?

दादाश्री : भला जल्दी कहीं होता होगा? एक दोष है, जो जल्दी निकाल देने जैसा है। वह तो भ्रांति से यह दोष उत्पन्न होता है, सिर्फ विषय विकार ही। अन्य सभी दोष तो अपने आप टाइम पर ही जाएँगे, एकदम जल्दी नहीं जाएँगे। यह विषय विकार तो सिर्फ एक तरह की भ्रांति है।

प्रश्नकर्ता : ऐसी श्रद्धा बैठ गई है कि इसमें से पार उतर जाएँगे।

दादाश्री : बैठ जाती है। निकल पाओगे ऐसा करते-करते। दस साल बिता दिए न तो फिर ऐसा होने पर अलग ही तरह की हवा आएगी। अभी खाड़ी में हैं इसलिए लगता है ऐसा। खाड़ी में से बाहर निकले तो फिर निश्चित। बीमारी निकली है न, इसलिए घबराहट होगी जरा। लेकिन रौब जमाना, चंद्रेश पर ‘अपने आपको क्या समझता है?’ लेकिन मुझसे पूछकर डॉटना, हाँ! वर्ना ब्लड प्रेशर पर असर हो जाएगा। फिर यहाँ से छूटे कि खुद स्वस्थ। फिर दूसरी उलझनों को उलझन मत मानना। हम इशारा करेंगे तुम्हें, हम जानते हैं कि तुम युवा हो।

साथ मिलकर काम करे तो वहाँ वह भागीदार, जिम्मेदारी से काम करते हैं। भागीदारी में मिलकर वे जो काम करते हैं,

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वह उन दोनों को भुगतना पड़ता है। लेकिन यदि अलग रहकर करें न, तो हर एक की अपनी जिम्मेदारी। इसलिए तुम अलग रहकर करो, ताकि फिर सिर्फ चंद्रेश को ही भुगतना पड़े। तुम्हें नहीं भुगतना पड़ेगा और वह तो तुम्हें और चंद्रेश को दोनों को भुगतना पड़ेगा। है प्रकृति का, जब ऐसा नहीं रहेगा कि आत्मा ने किया है, तब ठिकाने आएगा।

पूरा करो प्रकृति को पटाकर

प्रश्नकर्ता : हर एक को खुद की फाइल देखकर करना चाहिए। हर एक की फाइल को अलग-अलग दवाई माफिक आती है। एक सी दवाई माफिक नहीं आती। मेरी फाइल को डॉटने की ऐसी कड़ी दवाई माफिक नहीं आती।

दादाश्री : हाँ, किसी को प्रेशर बढ़ जाता है, किसी को कुछ ऐसा हो जाता है।

प्रश्नकर्ता : तो ये सब एक दूसरे का देख-देखकर करने जाते हैं।

दादाश्री : नहीं! देख-देखकर मत करना। 'मुझसे पूछना वह।' ऐसा मैंने कहा है। अरे, कोई मत करना। गेटआउट-गेटआउट, कहोगे तो ब्लडप्रेशर बढ़ जाएगा। इसलिए तुम्हें तो अरीसे (दर्पण) में देखकर कहना है कि 'भाई, मैं हूँ तेरे साथ। तू घबराना मत', कहना। उससे प्रेशर नहीं बढ़ेगा। निश्चय चाहिए इसमें, निश्चय।

प्रश्नकर्ता : आप जो प्रयोग बताते हैं न, अरीसे (दर्पण) में सामायिक करने का। फिर प्रकृति के साथ बातचीत करना, वे सभी प्रयोग बहुत अच्छे लगते हैं। फिर दो-तीन दिन अच्छे से होता है, उसके बाद उसमें कमी आ जाती है।

दादाश्री : कमी आ जाए तो फिर वापस नए सिर से करना। पुराना हो जाए तो कमी आ ही जाती है। पुद्गल का

‘खुद’ अपने आपको को डॉटना (खं-2-६)

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स्वभाव है कि पुराना हो जाए तो बिगड़ता जाता है। फिर वापस नई सेटिंग करके रख देनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : अर्थात् उस प्रयोग द्वारा ही कार्य सिद्ध हो जाना चाहिए। ऐसा नहीं होता और बीच में ही बंद हो जाता है प्रयोग।

दादाश्री : ऐसा करते-करते सिद्ध होगा, एकदम से नहीं होगा।

प्रश्नकर्ता : वह प्रयोग अधूरा हो और फिर दूसरा प्रयोग करते हैं। वह अधूरा छोड़ देते हैं। कोई तीसरा प्रयोग बताया। वह भी अधूरा! मतलब सभी अधूरे रहते हैं।

दादाश्री : वह तुम वापस पूरा कर लेना, धीरे-धीरे एक-एक को लेकर। अरिसे का प्रयोग पूरी तरह से नहीं किया?

प्रश्नकर्ता : नहीं! जब भी करते हैं, उतना लाभ होता है। लेकिन उसके बाद जुदापन रहना ही चाहिए, इन भाई को जैसा अलग देखता हूँ, वैसा परमानेन्ट फिर नहीं देख पाता। प्रकृति को जानते जरूर हैं कि अलग है।

दादाश्री : कितना डॉटा था उसने। रोना आ गया तब तक डॉटता रहा। तो बोलो अब कितना अलग हो गया?! तूने डॉटा है, ऐसा कभी? रो दिया हो वैसे?

प्रश्नकर्ता : रोया नहीं था, लेकिन ढीला पड़ गया था।

दादाश्री : ढीला पड़ गया था। तू डॉटता है तो सीधा हो जाता है क्या! तो फिर वह प्रयोग कितना कीमती प्रयोग है। लोगों को आता नहीं है। देखो न, यह भाई बैठा रहता है घर पर, लेकिन ऐसा प्रयोग नहीं करता।

प्रश्नकर्ता : हम भी बैठे रहते हैं, तो इसमें कमी है या फिर प्रयोग का महत्त्व नहीं समझे? इसमें हकीकत क्या है?

दादाश्री : उतना उल्लास कम है।

❖ ❖ ❖ ❖ ❖

[ ७ ]

पछतावे सहित प्रतिक्रमण

प्रत्यक्ष आलोचना से, नकद मुक्ति!

श्री विज्ञन से तो सबकुछ ठीक हो ही जाता है न!

प्रश्नकर्ता : कभी अगर मेरी दृष्टि पड़ जाती है न, तब मुझे लगता है कि ‘अरेरे! यह दृष्टि क्यों पड़ी?! प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। चीढ़ मचती है।

दादाश्री : लेकिन चीढ़ मचती है न, वह तो ऐसा है कि दृष्टि पड़ जाती है। तुम्हें डालनी नहीं है फिर भी पड़ जाती है। इसलिए पुरुषार्थ करना है और प्रतिक्रमण करने की भी जरूरत है।

प्रश्नकर्ता : कुछ चीजों पर इतना गुस्सा आता है कि, ऐसा लगता है कि ऐसा क्यों हो रहा है? समझ में नहीं आता।

दादाश्री : पिछली बार प्रतिक्रमण नहीं किए थे, इसलिए इस बार वापस दृष्टि जाती है। अब प्रतिक्रमण करोगे तो, अगले जन्म में फिर से नहीं जाएगी।

प्रश्नकर्ता : कभी-कभी तो प्रतिक्रमण करने में चिढ़ मचती है। एकदम से इतने सारे करने पड़ते हैं।

दादाश्री : हाँ, यह अप्रतिक्रमण का दोष है। उस समय प्रतिक्रमण नहीं किए, इसलिए आज यह हुआ। अब प्रतिक्रमण करने से वापस दोष खड़ा नहीं होगा।

पछतावे सहित प्रतिक्रमण (खं-2-७)

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प्रश्नकर्ता : लेकिन कई बार तो बहुत सारे प्रतिक्रमण करते हैं और फिर से प्रतिक्रमण करना पड़े तो बहुत गुस्सा आता है कि ऐसा क्यों हो जाता है?

दादाश्री : जब अंदर बिगड़ जाए, उस समय तो प्रतिक्रमण करके धो देना चाहिए और फिर रूबरू आकर दादा से कह देना चाहिए कि 'इस तरह हमारा मन बहुत बिगड़ गया था। दादा, आपसे कुछ छिपाकर नहीं रखना है।' ताकि सब खत्म हो जाए। यहीं के यहीं दवाई दे देंगे। अन्य किसी के प्रति दोष हुआ होगा न तो हम धो देंगे।

जहाँ इन्टरेस्ट, वहाँ करो प्रतिक्रमण

प्रश्नकर्ता : बार-बार दृष्टि आकृष्ट हो जाती है, एक ही जगह पर दृष्टि आकृष्ट होती है, वह तो इन्टरेस्ट(रुचि) हो तभी न! क्या ऐसा नहीं कह सकते?

दादाश्री : इन्टरेस्ट ही है न? इन्टरेस्ट के बिना तो दृष्टि आकृष्ट होगी ही नहीं न!

प्रश्नकर्ता : अंदर रुचि है तो सही। दृष्टि आकृष्ट हो जाए तो उसके लिए प्रतिक्रमण होता है। फिर रात होते ही वापस दृष्टि उधर ही जाती है। रुचि हो जाए, तो उसका प्रतिक्रमण हो जाता है, वह चेप्टर(प्रकरण) खत्म हो जाता है। वापस पाँच-दस मिनट तक असर रहता है। तब लगता है कि यह क्या गड़बड़ है?

दादाश्री : उसे वापस धो देना चाहिए। इतना ही, बस।

प्रश्नकर्ता : बस इतना ही? बाकी मन में कुछ नहीं रखना है?

दादाश्री : यह माल हमने भरा है और जिम्मेदारी अपनी है। इसलिए हमें देखते रहना है, धोने में कमी नहीं रह जानी चाहिए।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

प्रश्नकर्ता : कपड़ा धुल चुका है, ऐसा किसे कहेंगे?

दादाश्री : हमें खुद को ही पता चल जाएगा कि मैंने धो दिया। प्रतिक्रमण करते हैं, उस पर से।

प्रश्नकर्ता : क्या अंदर खेद रहना चाहिए?

दादाश्री : खेद तो रहना ही चाहिए न? खेद तो, जब तक इसका निबेड़ा नहीं आ जाए, तब तक खेद तो रहना ही चाहिए। हमें तो देखते रहना है। खेद रखता है या नहीं, ऐसा हमें अपना काम करना है, वह अपना काम करेगा।

प्रश्नकर्ता : यह सब बहुत गाढ़ है। उसमें कुछ-कुछ फर्क पड़ता जा रहा है।

दादाश्री : जैसा दोष भरा है वैसा निकलेगा। लेकिन वह बारह साल में या दस साल-पाँच साल में सब खाली हो जाएगा। सभी टंकियाँ साफ कर देगा। फिर शुद्ध! फिर मजे करना!

प्रश्नकर्ता : अगर एक बार बीज डल चुका हो तो वह रूपक में तो आएगा ही न?

दादाश्री : बीज डल ही जाता है न! वह रूपक में आएगा, लेकिन जब तक वह जम नहीं गया है, तब तक कम-ज्यादा हो सकता है। मतलब मरने से पहले वह साफ हो सकता है।

इसलिए हम विषय के दोषवाले से कहते हैं न कि विषय के दोष हुए हों, अन्य दोष हुए हों, तो उसे कहते हैं कि, 'रविवार को तू उपवास करना और पूरे दिन वही सोचकर, सोच-सोच करके उसे धोते रहना। आज्ञापूर्वक इस तरह करे न तो कम हो जाएगा!

विषय से संबंधित सामाजिक-प्रतिक्रमण...

प्रश्नकर्ता : विषय-विकार से संबंधित सामाजिक-प्रतिक्रमण किस तरह करने हैं?

पछतावे सहित प्रतिक्रमण (खं-2-७)

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दादाश्री : अभी तक जो गलतियाँ हो चुकी हैं, उनके प्रतिक्रमण करने हैं। भविष्य में ऐसी गलतियाँ नहीं हों, ऐसा निश्चय करना है।

प्रश्नकर्ता : जो कुछ गलतियाँ हो गई हैं, वे हमें बार-बार सामायिक में दिखती रहें तो?

दादाश्री : जब तक दिखते रहें, तब तक उनके लिए क्षमा माँगनी चाहिए, क्षमापना लेनी चाहिए। उस पर 'वह' पछतावा करना चाहिए, प्रतिक्रमण करना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : अभी सामायिक में बैठे और वह दिखा, फिर भी बार-बार क्यों आते हैं?

दादाश्री : वे तो आएँगे न! अंदर परमाणु होंगे तो आएँगे न! उसमें हमें क्या हर्ज है?

प्रश्नकर्ता : ये आते हैं, इसका मतलब यह कि अभी तक धुला नहीं है।

दादाश्री : नहीं, वह माल तो अभी बहुत समय तक रहेगा। अभी तो दस-दस साल तक रहेगा, लेकिन तुम्हें सारा निकलना है।

प्रश्नकर्ता : यह जो दृष्टि चली जाती है, उसके लिए क्या करना चाहिए? मतलब यों तो पता चल जाता है कि हम यहाँ उपयोग चूक गए, हमें 'यह 'स्त्री' है,' वह 'स्त्री' दिखनी ही नहीं चाहिए न?

दादाश्री : स्त्री दिखे, अंदर विचार आएँ, तब भी उन सब के लिए प्रतिक्रमण करने हैं। तुझे चंद्रेश से कहना है कि प्रतिक्रमण कर! वह कोई बड़ी बात नहीं है।

विषयों में सुखबुद्धि किसे?

प्रश्नकर्ता : जब तक पाँच इन्द्रियों के विषयों में सुखबुद्धि है, तब तक निकाल नहीं होगा न?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : मैंने आप सब को जो आत्मा दिया है, उसमें जरा सी भी सुखबुद्धि नहीं है। यह सुख उसने कभी चखा ही नहीं है। वह जो सुखबुद्धि है, वह तो अहंकार को है।

सुखबुद्धि रहे, उसमें कोई हर्ज नहीं है। सुखबुद्धि आत्मा की चीज नहीं है, वह पुद्गल की चीज है। तुम्हें कोई भी चीज दी जाए, तब उसमें आपको सुखबुद्धि उत्पन्न होती है। फिर से वही चीज और अधिक दी जाए, तब उसमें दुःखबुद्धि भी उत्पन्न हो सकती है। ऐसा आपको पता चलता है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : हाँ, ऊब जाते हैं फिर।

दादाश्री : अतः वह पुद्गल है। पूरण-गलनवाली चीज है। यानी वह चीज हमेशा के लिए नहीं है, टेम्परेरी एडजस्टमेंट है। सुखबुद्धि अर्थात् यह आम अच्छा हो और उसे फिर से माँगें, तो उससे ऐसा नहीं माना जा सकता कि उसमें सुखबुद्धि है। वह तो देह का आकर्षण है।

प्रश्नकर्ता : देह का और जीभ का आकर्षण बहुत रहा करता है।

दादाश्री : वह जो आकर्षण रहा करता है, उसमें सिर्फ जागृति रखनी है। हमने आपको जो वाक्य दिया है न कि 'मन-वचन-काया की तमाम संगी क्रियाओं से मैं बिल्कुल असंग ही हूँ।' वह जागृति रहनी चाहिए, और वास्तव में एकजेक्टली ऐसा ही है। वह सब पूरण-गलन है। आप अगर यह जागृति रखोगे तो आपको कर्म बंधन नहीं होगा।

प्रश्नकर्ता : अगर वही नहीं रह सके तो वह हमारे चारित्र का दोष है ऐसा मानें?

दादाश्री : वैसा क्रमिक मार्ग में होता है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन उस चारित्रमोह के कारण ढीलापन रहता है?

पछतावे सहित प्रतिक्रमण (खं-2-७)

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दादाश्री : क्रमिक मार्ग में वह ढीलापन कहलाता है। उसके लिए तुम्हें उपाय करना पड़ता है। इसमें (अक्रम में) तुम्हारे लिए यह ढीलापन नहीं कहलाता। इसमें तुम्हें जागृति ही रखनी है। हमने जो आत्मा दिया है, वह जागृति ही है।

प्रश्नकर्ता : जागृति नहीं रहे, तभी राग होता है न?

दादाश्री : नहीं ऐसा नहीं है। अब तुम्हें राग होता ही नहीं है। यह जो होता है, वह आकर्षण है।

प्रश्नकर्ता : वह कमजोरी नहीं मानी जाएगी?

दादाश्री : नहीं, कमजोरी नहीं मानी जाएगी। उसका और आत्मा का कोई लेना-देना नहीं है। सिर्फ इतना ही है कि वह तुम्हें खुद का सुख नहीं आने देगा। इसलिए एक-दो जन्म अधिक करवाएगा। उसका भी उपाय है। अपने यहाँ ये सब लोग जो सामायिक करते हैं, उस सामायिक में उस विषय को रखकर खुद ध्यान करे तो वह विषय विलीन होता जाता है, खत्म हो जाता है। जो-जो आपको विलीन कर देना हो, उसे यहाँ पर विलीन किया जा सकता है।

प्रश्नकर्ता : ऐसा कुछ हो, तब वह काम का है न!

दादाश्री : है। यहाँ सभी कुछ है। यहाँ (सामायिक में) तुम्हें सभी कुछ बताएगा। तुम्हें किसी जगह पर जीभ का स्वाद बाधक हो, तो उसी को सामायिक में रखो। और जैसा बताएँ उस अनुसार उसे देखते रहो। सिर्फ देखने से ही वे सब गॉटें विलय हो जाएँगी।

हे गॉटों! हम नहीं या तुम नहीं

विचार मन में से आते हैं और मन गॉटों से बना हुआ है। जिसके विचार अधिक आते हैं, वे गॉटें बड़ी होती हैं! वस्तुस्थिति में विषय की जो गॉट है, वह जैसे पिन को लोहचुंबक आकर्षित करता है, वैसे ही इसमें आकर्षण खड़ा होता है। लेकिन हमें यदि

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आत्मा बहुत अधिक ध्यान में रहे तो नहीं छूएगा। लेकिन इंसान को इतनी जागृति ठीक से रह नहीं पाती न?

प्रश्नकर्ता : यह जो दो पत्तियों की अवस्था में ही उखाड़ने का विज्ञान है, कि ‘विषय की गाँठ फूटे, तब दो पत्तियों से ही उखाड़ दो।’ तो जीत सकते हैं न?

दादाश्री : हाँ, लेकिन विषय ऐसी चीज़ है कि यदि उसमें एकाग्रता हो जाए तो आत्मा को भूल जाए। इसलिए यह गाँठ इस प्रकार से हानिकारक है, वह सिर्फ़ इसीलिए कि जब वह गाँठ फूटती है तब एकाग्रता हो जाती है। एकाग्रता हो जाए तब विषय कहलाता है। एकाग्रता हुए बगैर विषय कहलाएगा ही नहीं न! वह गाँठ फूटे, तब इतनी अधिक जागृति रहनी चाहिए कि विचार आते ही उखाड़कर फेंक दे, तो उसे वहाँ पर एकाग्रता नहीं होगी। यदि एकाग्रता नहीं है तो वहाँ पर विषय है ही नहीं, तो वह गाँठ कहलाएगी जब वह गाँठ पिघलेगी तब काम होगा।

प्रश्नकर्ता : मतलब अगर वह गाँठ विलय हो जाए तो फिर वह आकर्षण का व्यवहार ही नहीं रहेगा न?

दादाश्री : वह व्यवहार ही बंद हो जाएगा। पिन और लोहचुंबक का संबंध ही बंद हो जाएगा। वह संबंध ही नहीं रहेगा। उस गाँठ की वजह से यह व्यवहार जारी है न! अब, ऐसा ध्यान में रहना बहुत मुश्किल है कि विषय स्थूल स्वभावी है और आत्मा सूक्ष्म स्वभावी है, इसलिए एकाग्रता हुए बगैर रहेगी ही नहीं न! वह तो ज्ञानीपुरुष का काम है, अन्य किसी का काम ही नहीं! बाकी इसमें हाथ डालना ही मत, बना वह जल जाएगा। ज्ञानीपुरुष तो भय टालने के लिए आपसे कहते हैं। पूरा जगत् जैसा समझता है, आत्मा वैसा नहीं है। आत्मा तो जैसा महावीर भगवान ने जाना है वैसा है, ये दादा जैसा बताते हैं, आत्मा वैसा है।

ये गाँठें, वे तो आवरण हैं! जब तक ये गाँठें हैं तब तक

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आत्मा का स्वाद नहीं आने देंगी। इस ज्ञान के बाद अब गॉटें धीरे-धीरे विलय होती जाएँगी, बहेंगी नहीं अब। फिर भी कौन सी गॉटें परेशान करती है, कौन सी दुःख देती हैं, उतनी ही देखनी हैं। सभी गॉटें नहीं देखनी हैं। वह तो, जैसे इस मार्केट में सभी सब्जियाँ पड़ी रहती हैं, लेकिन उनमें से कौन सी सब्जी पर अपनी दृष्टि जाती रहती है, उसी का झंझट है, अंदर वह गॉठ बड़ी है! तेरी कौन-कौन सी गॉठ बड़ी है?

प्रश्नकर्ता : विषय की एक बड़ी है, फिर लोभ की आती है, फिर मान-अपमान की आती है। फिर कपट में तो, खुद का बचाव, स्व रक्षण करने के लिए कपट खड़ा होता है।

दादाश्री : अन्य किसी के लिए कपट नहीं है न?

प्रश्नकर्ता : अपमान का भय हो या खुद की गलती हो तब।

दादाश्री : हाँ, लेकिन इसके अलावा अन्य किसी चीज़ के लिए कपट नहीं है न? ये सभी गॉटें कपटवाली ही होती हैं, कपट करे तभी इनका फल मिलता है! सभी गॉटें कपटवाली होती हैं।

प्रश्नकर्ता : वह कैसे?

दादाश्री : मान भी कपट करने से मिलता है, अपमान भी कपट करने से मिलता है, विषय भी कपट के बिना नहीं मिलता।

विकारी विचार आते हैं क्या?

प्रश्नकर्ता : ऐसा होता है अभी भी। वे परिणाम खड़े होते हैं, लेकिन खुद की पकड़ नहीं होती है उसमें। लेकिन अभी भी जो ऐसे परिणाम आ जाते हैं, वे क्या हैं?

दादाश्री : क्यों मांसाहार के विचार नहीं आते? ऐसा क्यों?

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प्रश्नकर्ता : उसकी गाँठ नहीं है।

दादाश्री : उसकी गाँठ नहीं है, वह माल ही नहीं भरा है न! फिर वह माल निकलेगा कैसे? जो माल भरा है, वही निकलेगा!

प्रश्नकर्ता : इतना सोल्युशन बताया, वह बात तो ठीक है, लेकिन इसमें कमी क्या है? इसमें क्या कमी रह जाती है?

दादाश्री : जो माल भरा है वही निकल रहा है, इसमें कमी कहाँ रही? क्यों मांसाहारी डिश याद नहीं आती? और यह याद आता है, वह क्या है? क्योंकि यह माल भरा हुआ है।

इसलिए अब जब गाँठें फूटे हमें उसमें हर्ज नहीं है। गाँठों से तो कहना कि ‘जितनी फूटनी हो उतनी फूट, तू ज़ेय है और हम ज्ञाता हैं’ ताकि हल आ जाए। जितना फूट चुका है उतना वापस नहीं आएगा। अब जो फूटता है वह नया है, लेकिन उस गाँठ का बढ़ना बंद हो गया। वर्ना वे गाँठें तो इतनी बड़ी, जमीकंद जितनी बड़ी होती हैं। किसी को तो मान की गाँठें घंटे भर में चार जगह फूटती हैं। इस ज्ञान के मिलने के बाद सभी गाँठें टूटने लगती हैं, वर्ना गाँठें टूटती नहीं हैं। यह ज्ञान नहीं मिला हो तब तक गाँठें प्रतिदिन बढ़ती ही जाती हैं! आत्मा प्राप्त हुआ मतलब निर्विषयी हुआ, फिर हमें उन गाँठों का निकाल करते रहना है। आपको हम डांटते क्यों नहीं हैं? हम जानते हैं कि गाँठें हैं, उनका निकाल तो करेगा न! जो गाँठें हैं, वे फूटे बगैर रहेगी क्या? जिन चीज़ों की गाँठें नहीं हैं, वे गाँठें नहीं फूटेंगी। हममें गाँठें नहीं होतीं। हमें अगर शादी में ले जाओ न, तो भी हम इसी रूप में रहते हैं, यहाँ पर बुलाओ तो भी इसी रूप में रहते हैं क्योंकि हम निग्रंथ हो चुके हैं। विचार आते हैं और जाते हैं। कभी कोई विचार आकर खड़ा रह जाए, तब वह गाँठ कहलाती है।

यानी कि ऐसा है यह सब! आखिर में निग्रंथ होना है और

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इस जन्म में निर्ग्रंथ हो सकें, ऐसा है। अपना यह ज्ञान निर्ग्रंथ बनाए, ऐसा है। जो थोड़ी बहुत गाँठें बची होंगी, उनका अगले जन्म में निकाल हो जाएगा, लेकिन सभी ग्रंथियों का निबेड़ा आ जाएगा, ऐसा है!

विषय बीज निर्मूल शुद्ध उपयोग से

विषय के विचार जिसे अच्छे नहीं लगते हों और उनसे छूटना हो वह उन्हें इस सामायिक से, शुद्ध उपयोग से, उन्हें विलय कर सकता है। इस 'ज्ञान' के बाद जिसे जल्दी हल लाना हो उसे ऐसा करना चाहिए। सभी को इसकी जरूरत नहीं है।

प्रश्नकर्ता : फिर भी ऐसा नहीं लगता कि इसे पहुँच पाएँगे।

दादाश्री : ऐसा कुछ भी नहीं है। एक राजीपा (गुरुजनों की कृपा और प्रसन्नता) और दूसरा सिस्मियारिटी, सिर्फ ये दो ही हों तो सबकुछ प्राप्त हो सकता है। बाकी इसमें कोई मेहनत करनी ही नहीं होती।

प्रश्नकर्ता : ये सुबह में सामायिक करते हैं, तो उसमें पचास मिनट बाद तो सुख छलकने लगता है।

दादाश्री : आएका ही न! क्योंकि आप आत्मस्वरूप होकर सामायिक करते हो तो आनंद आएका ही न! आत्मा अचल है।

अब कई यह सामायिक दिन में दो-दो, तीन-तीन बार करते हैं। क्योंकि स्वाद चख लिया है न! यह वीतरागी ज्ञान मिलने के बाद उसका स्वाद भी कुछ और ही होता है, फिर कौन छोड़ेगा? बाहर के लोगों की सामायिक में तो सब हाँकना पड़ता है और इसमें तो किसी को हाँकना करना नहीं होता। सिर्फ देखते ही रहना है, ज्ञाता-दृष्ट। उसमें भी वापस दो फायदे होते हैं! एक तो खुद को सामायिक का फल मिलता है, मतलब क्या? कि जब यह सब अचल हो जाता है तब आत्मा के स्वभाव का पता चलता

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है, इसलिए सुख उत्पन्न होता है। यह जो चंचल भाग है, वह अचल हो जाता है, इसलिए आत्मा का स्वभाविक सुख उत्पन्न होता है। इस चंचलता की वजह से वह सुख प्लस-माइनस हो जाता है। दूसरा यह कि खुद के जो दोष हैं, उन्हें ज्ञाता-दृष्टा के तौर पर देखते रहने से दोष विलीन होते जाते हैं। इस तरह दो लाभ होते हैं।

सामायिक में तो, खुद का जो दोष है, उसी को रख देना! अहंकार हो तो अहंकार रख देना। विषय रस हो तो विषय रस रख देना, लोभ-लालच हो तो उसे रख देना। इन गाँठों को सामायिक में रख दीं और उन गाँठों पर ज्ञाता-दृष्टा रहे तो वे विलय हो जाएँगी। अन्य किसी तरीके से ये गाँठें खत्म हो पाएँ, ऐसी नहीं है। यह सामायिक इतनी आसान, सरल और सबसे ऊँची चीज़ है! यहाँ एक बार सामायिक करके जाए, तो फिर घर पर भी हो सकेगी! यहाँ सब के साथ बैठकर करने से क्या होता है कि सभी का प्रभाव पड़ता है और बिल्कुल पद्धतिपूर्वक अच्छा हो जाता है। इसके बाद आप घर पर करोगे तो चलता रहेगा।

विषय की गाँठ बड़ी होती है उसके निकाल की बहुत ही ज़रूरत है, वह कुदरती रूप से अपने यहाँ सामायिक में शुरू हो गया है! सामायिक करो, सामायिक से काफी कुछ विलय हो जाता है। कुछ करना तो पड़ेगा न? जब तक दादा हैं, तब तक सारा रोग निकालना पड़ेगा न? एकाध गाँठ ही भारी होती है, लेकिन जो भी रोग है तो उसे निकालना तो पड़ेगा न? उसी रोग की वजह से अनंत जन्मों से भटके हैं न? यह सामायिक तो किस हेतु से है कि अभी तक विषय भाव का बीज खत्म नहीं हुआ है और उसी बीज में से चार्ज होता है और उस विषय भाव के बीज को खत्म करने के लिए यह सामायिक है।

आपको विषय नहीं चाहिए, लेकिन विषय छोड़ते नहीं हैं न? हमें गड़दे में नहीं गिरना हो फिर भी गिर जाएँ तो क्या

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करना चाहिए? तुरंत ही एक घंटे तक दादा से माँग करना कि, 'दादा, मुझे ब्रह्मचर्य की शक्ति दीजिए।' ताकि शक्ति मिल जाए और प्रतिक्रमण भी हो जाएँ। फिर दिमाग में उसकी 'वरीज' (चिंता) मत रखना। गड़ढे में गिरे तो तुरंत ही सामायिक करके धो देना। सामायिक यानी हाथ-पैर धोकर, कपड़े धो-कर, सूखाकर और समेटकर साफ-सुथरे हो जाना। तुरंत सामायिक नहीं हो सके तो दो-चार घंटों बाद भी कर लेना, लेकिन लक्ष्य में रखना है कि सामायिक करनी बाकी है।

भगवान ने ऐसा नहीं कहा है कि, 'तू गड़ढे में मत गिरना।' भगवान ने तो ऐसा कहा है कि, 'गड़ढे में गिरने जैसा नहीं है, सीधे रास्ते पर चलने जैसा है।' ऐसा अभिप्राय दिया था। फिर कोई कहेगा कि, 'आपने मना किया है और मैं गिर गया तो क्या करूँ?' तब भगवान कहते हैं, 'गिर गए तो उसमें हर्ज नहीं है, अगर गिर जाए तो तू धो देना और अभी इस्त्रीवाले कपड़े पहन ले।' एक घंटा सामायिक कर ली तो फिर कोई रूकावट नहीं रहेगी। किंचितमात्र भी रूकावट रहे तो मेरी जिम्मेदारी, फिर इतने छोटे गड़ढे में गिरे या बड़े गड़ढे में गिरे, लेकिन ढूबेगा नहीं!!! पूरा जगत् बिना गड़ढे के ढूब रहा है, ढक्कन तक में ढूब जाते हैं!

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स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता

देखते ही जुगप्सा

लोग विषय की गंदगी में पड़े हुए हैं। विषय के समय उजाला कर दे तो उसे अच्छा नहीं लगता। उजाला हो जाए तो घबरा जाता है। इसलिए अंधेरा रखता है। उजाला हो जाए तो भोगने की जगह को देखना तक अच्छा नहीं लगे। इसलिए कृपालुदेव ने भोगने के स्थान के लिए क्या कहा है?

प्रश्नकर्ता : 'यह चीज़ वमन करने योग्य भी नहीं है।'

दादाश्री : उल्टी करनी हो, तो उस जगह पर करोगे या दूसरी किसी अच्छी जगह पर करोगे?

प्रश्नकर्ता : कितना कुछ देखा होगा उन्हींने?

दादाश्री : देखा है न, ज्ञानियों ने। एक तो आँख को अच्छा नहीं लगता। कान को भी अच्छा नहीं लगता। नाक में तो दुर्गंध आती है। यदि उस जगह को छूआ हुआ हाथ सूँघ ले तो मरी हुई मछली हो न, ऐसी दुर्गंध आती है, और अगर चखने को कहा हो तो? एक भी इन्द्रिय को अच्छा नहीं लगता सिर्फ स्पर्श को अच्छा लगता है, वह भी सिर्फ रात को ही। दिन में करने को कहें न वहाँ पर, तो अच्छा नहीं लगेगा।

एक बनिया मेरे साथ बैठने आता था। उस समय मेरी उम्र ६०-६२ साल की थी। उसकी उम्र भी ६०-६२ की। उसने मेरे

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सामने शर्त रखी, 'एक आधा घंटा बैठने आऊँगा तो आप निभा लोगे?' मैंने कहा, 'हाँ, निभा लूँगा।' बाहर मेरे साथ घूमने से लोगों में रौब बढ़ता था। फिर मेरे साथ बैठता था। यों उसकी बुद्धि अच्छी थी। मैंने उस भाई से पूछा, 'ये सभी पुरुष नेकेड जा रहे हों तो आपको उन्हें देखना अच्छा लगेगा?' तब वे बोले, 'नहीं लगेगा। मैं तो मुँह फेर लूँगा।' अरे, पुरुष नेकेड जा रहे हों तो क्या तू नेकेड नहीं है? यह तो ढका हुआ है इसलिए सुंदर है! उसके बाद उसे पूछा, 'यदि स्त्री और पुरुष नेकेड जा रहे हो तो उनमें से किसे देखना पसंद करोगे? तब उन्होंने कहा, 'पुरुष को देख सकते हैं लेकिन स्त्री को देखना अच्छा नहीं लगेगा। उल्टी हो जाएगी' इस प्रकार मैं उस बनिए की बुद्धि देख रहा था। उस भाई ने कहा कि, 'मेरी वाइफ नहा रही थी, तब उसे देख लिया था। तब से मुझे अंदर घिन आती है।'

रोंग बिलीफें, रूट कॉञ्च में

अंधेरे में जाकर ऐसा करते हैं कि पाँचों इन्द्रियों को अच्छा नहीं लगे। बच्चे देखें तो शर्मा जाएँ। कोई विषय विकार कर रहा हो, और उसकी फोटो लें तो कैसा दिखेगा?

प्रश्नकर्ता : घिन आए ऐसा दिखेगा, जानवर जैसा दिखेगा।

दादाश्री : जानवर ही कहलाएगा। पूरी तरह से पाशवी इच्छा कहलाएगी।

प्रश्नकर्ता : स्त्री के अंगों के प्रति आकर्षण होने का क्या कारण है?

दादाश्री : मान्यता अपनी, रोंग बिलीफें हैं इसलिए। गाय के अंगों के प्रति आकर्षण क्यों नहीं होता?! सिर्फ मान्यताएँ। कुछ नहीं होता। सिर्फ बिलीफें हैं, बिलीफें तोड़ दो तो कुछ भी नहीं है।

प्रश्नकर्ता : वह जो मान्यता खड़ी होती है, ऐसा संयोग मिलने की वजह से होता है?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : लोगों के कहने से हमें हो जाता है। हमारे कहने से मान्यता खड़ी होती है। क्योंकि आत्मा की हाजिरी में मान्यता खड़ी होती है इसलिए दृढ़ हो जाती है और इसमें ऐसा है ही क्या? मांस के लोथड़े हैं!

प्रश्नकर्ता : एक बार मैं स्तन का ऑपरेशन देखने गया था। शुरू में देखे तो इतने सुंदर दिख रहे थे लेकिन ऑपरेशन करने के लिए चीरा तो कैंपकंपी आ गई।

दादाश्री : कुछ भी सुंदरता होती ही नहीं है, मांस के लोथड़े ही हैं।

प्रश्नकर्ता : यह रोंग बिलीफ कैसे खत्म करें?

दादाश्री : मैंने अभी कैसे खत्म की!

प्रश्नकर्ता : राइट बिलीफ से। बनिए की वह बात फिट हो गई मांस के लोथड़ेवाली।

दादाश्री : बनिए को कहा जाए तो उसे स्त्री को नेकेड देखना अच्छा नहीं लगेगा। उसकी बुद्धि बहुत अच्छी कही जाएगी। मुझे तुरंत समझ में आ जाता है कि इसकी दृष्टि कितनी उच्च है। वाइफ के बारे में मांस के लोथड़े दिखते थे और हमेशा घिन आती थी उसे! साठ साल की उम्र में भी उसे घिन आती थी, वह अच्छा है न?! वर्ना घिन नहीं आती।

वह आवाज़, मन की ही

प्रश्नकर्ता : अंदर से जो शोर मचाते हैं कि 'देख लो। देख लो।' वह कौन है? कोई स्त्री बाथरूम में नहा रही हो या कोई विषय भोग रहा हो, तब?

दादाश्री : वह तो रोंग बिलीफवाला मन ही कहता है। बाद में प्राप्त हुआ ज्ञान, उस समय आकर रोक देता है कि ऐसा नहीं

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होना चाहिए। ये सब रोंग बिलीफें हैं। जगत् को पता ही नहीं है कि यह क्या है! बिलीफें ही रोंग हैं। सौ बार रोंग बिलीफ को सही मानी हों तो सौ बार उन्हें तोड़ना पड़ेगा, आठ सौ बार किया हो तो आठसौ बार और दस बार किया हो तो दस बार। दोस्तों के साथ घूम रहे हों और वे कहें कि ‘ओहोहो कैसे हैं, कैसे हैं!’ तब हम भी अंदर बोल उठते हैं कि ‘कैसे हैं!’ ऐसे करते करते स्त्री को भोग लिया।

मन में जो विचार आते हैं, वे विचार अपने आप ही आते रहते हैं, तो उन्हें हमें प्रतिक्रमण से धो देना है। फिर वाणी में ऐसा नहीं बोलना है कि, विषयों का सेवन करना बहुत अच्छा है और वर्तन में भी ऐसा नहीं रखना है। स्त्रियों के सामने आँखें नहीं गड़ानी हैं। स्त्रियों को देखना मत, छूना मत। स्त्रियों को छू लिया हो तो भी मन में प्रतिक्रमण हो जाना चाहिए, कि ‘अरेरे, इसे कहाँ छू लिया!’ क्योंकि स्पर्श से विषय के सभी तरह के असर होते हैं।

प्रश्नकर्ता : उसे तिरस्कार करना नहीं कहा जाएगा?

दादाश्री : उसे तिरस्कार नहीं कहेंगे? प्रतिक्रमण में तो हम उनके आत्मा से कहते हैं कि ‘हमारी गलती हो गई, फिर से ऐसी गलती नहीं हो ऐसी शक्ति दीजिए। उसी के आत्मा से ऐसा कहना कि मुझे शक्तियाँ दीजिए। जहाँ अपनी गलती हुई हो, वहाँ पर शक्ति माँगना तो वह शक्ति मिलती रहेगी।’

प्रश्नकर्ता : कोई स्त्री हमारे पास आकर बैठे तो उससे हम कह सकते हैं कि ‘बहन, आप यहाँ से उठकर वहाँ बैठो?’

दादाश्री : नहीं, हम ऐसा क्यों कहें? अपने पास बैठे तो क्या अपनी गोद में बैठ जाती है?

प्रश्नकर्ता : नहीं, नहीं, यहाँ अपने पास।

दादाश्री : पास में बैठे तो हमें क्या? अपनी दृष्टि अलग,