भारतकोश
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : उसकी गाँठ नहीं है।

दादाश्री : उसकी गाँठ नहीं है, वह माल ही नहीं भरा है न! फिर वह माल निकलेगा कैसे? जो माल भरा है, वही निकलेगा!

प्रश्नकर्ता : इतना सोल्युशन बताया, वह बात तो ठीक है, लेकिन इसमें कमी क्या है? इसमें क्या कमी रह जाती है?

दादाश्री : जो माल भरा है वही निकल रहा है, इसमें कमी कहाँ रही? क्यों मांसाहारी डिश याद नहीं आती? और यह याद आता है, वह क्या है? क्योंकि यह माल भरा हुआ है।

इसलिए अब जब गाँठें फूटे हमें उसमें हर्ज नहीं है। गाँठों से तो कहना कि ‘जितनी फूटनी हो उतनी फूट, तू ज़ेय है और हम ज्ञाता हैं’ ताकि हल आ जाए। जितना फूट चुका है उतना वापस नहीं आएगा। अब जो फूटता है वह नया है, लेकिन उस गाँठ का बढ़ना बंद हो गया। वर्ना वे गाँठें तो इतनी बड़ी, जमीकंद जितनी बड़ी होती हैं। किसी को तो मान की गाँठें घंटे भर में चार जगह फूटती हैं। इस ज्ञान के मिलने के बाद सभी गाँठें टूटने लगती हैं, वर्ना गाँठें टूटती नहीं हैं। यह ज्ञान नहीं मिला हो तब तक गाँठें प्रतिदिन बढ़ती ही जाती हैं! आत्मा प्राप्त हुआ मतलब निर्विषयी हुआ, फिर हमें उन गाँठों का निकाल करते रहना है। आपको हम डांटते क्यों नहीं हैं? हम जानते हैं कि गाँठें हैं, उनका निकाल तो करेगा न! जो गाँठें हैं, वे फूटे बगैर रहेगी क्या? जिन चीज़ों की गाँठें नहीं हैं, वे गाँठें नहीं फूटेंगी। हममें गाँठें नहीं होतीं। हमें अगर शादी में ले जाओ न, तो भी हम इसी रूप में रहते हैं, यहाँ पर बुलाओ तो भी इसी रूप में रहते हैं क्योंकि हम निग्रंथ हो चुके हैं। विचार आते हैं और जाते हैं। कभी कोई विचार आकर खड़ा रह जाए, तब वह गाँठ कहलाती है।

यानी कि ऐसा है यह सब! आखिर में निग्रंथ होना है और