समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : उसकी गाँठ नहीं है।
दादाश्री : उसकी गाँठ नहीं है, वह माल ही नहीं भरा है न! फिर वह माल निकलेगा कैसे? जो माल भरा है, वही निकलेगा!
प्रश्नकर्ता : इतना सोल्युशन बताया, वह बात तो ठीक है, लेकिन इसमें कमी क्या है? इसमें क्या कमी रह जाती है?
दादाश्री : जो माल भरा है वही निकल रहा है, इसमें कमी कहाँ रही? क्यों मांसाहारी डिश याद नहीं आती? और यह याद आता है, वह क्या है? क्योंकि यह माल भरा हुआ है।
इसलिए अब जब गाँठें फूटे हमें उसमें हर्ज नहीं है। गाँठों से तो कहना कि ‘जितनी फूटनी हो उतनी फूट, तू ज़ेय है और हम ज्ञाता हैं’ ताकि हल आ जाए। जितना फूट चुका है उतना वापस नहीं आएगा। अब जो फूटता है वह नया है, लेकिन उस गाँठ का बढ़ना बंद हो गया। वर्ना वे गाँठें तो इतनी बड़ी, जमीकंद जितनी बड़ी होती हैं। किसी को तो मान की गाँठें घंटे भर में चार जगह फूटती हैं। इस ज्ञान के मिलने के बाद सभी गाँठें टूटने लगती हैं, वर्ना गाँठें टूटती नहीं हैं। यह ज्ञान नहीं मिला हो तब तक गाँठें प्रतिदिन बढ़ती ही जाती हैं! आत्मा प्राप्त हुआ मतलब निर्विषयी हुआ, फिर हमें उन गाँठों का निकाल करते रहना है। आपको हम डांटते क्यों नहीं हैं? हम जानते हैं कि गाँठें हैं, उनका निकाल तो करेगा न! जो गाँठें हैं, वे फूटे बगैर रहेगी क्या? जिन चीज़ों की गाँठें नहीं हैं, वे गाँठें नहीं फूटेंगी। हममें गाँठें नहीं होतीं। हमें अगर शादी में ले जाओ न, तो भी हम इसी रूप में रहते हैं, यहाँ पर बुलाओ तो भी इसी रूप में रहते हैं क्योंकि हम निग्रंथ हो चुके हैं। विचार आते हैं और जाते हैं। कभी कोई विचार आकर खड़ा रह जाए, तब वह गाँठ कहलाती है।
यानी कि ऐसा है यह सब! आखिर में निग्रंथ होना है और
पछतावे सहित प्रतिक्रमण (खं-2-७)
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इस जन्म में निर्ग्रंथ हो सकें, ऐसा है। अपना यह ज्ञान निर्ग्रंथ बनाए, ऐसा है। जो थोड़ी बहुत गाँठें बची होंगी, उनका अगले जन्म में निकाल हो जाएगा, लेकिन सभी ग्रंथियों का निबेड़ा आ जाएगा, ऐसा है!
विषय बीज निर्मूल शुद्ध उपयोग से
विषय के विचार जिसे अच्छे नहीं लगते हों और उनसे छूटना हो वह उन्हें इस सामायिक से, शुद्ध उपयोग से, उन्हें विलय कर सकता है। इस 'ज्ञान' के बाद जिसे जल्दी हल लाना हो उसे ऐसा करना चाहिए। सभी को इसकी जरूरत नहीं है।
प्रश्नकर्ता : फिर भी ऐसा नहीं लगता कि इसे पहुँच पाएँगे।
दादाश्री : ऐसा कुछ भी नहीं है। एक राजीपा (गुरुजनों की कृपा और प्रसन्नता) और दूसरा सिस्मियारिटी, सिर्फ ये दो ही हों तो सबकुछ प्राप्त हो सकता है। बाकी इसमें कोई मेहनत करनी ही नहीं होती।
प्रश्नकर्ता : ये सुबह में सामायिक करते हैं, तो उसमें पचास मिनट बाद तो सुख छलकने लगता है।
दादाश्री : आएका ही न! क्योंकि आप आत्मस्वरूप होकर सामायिक करते हो तो आनंद आएका ही न! आत्मा अचल है।
अब कई यह सामायिक दिन में दो-दो, तीन-तीन बार करते हैं। क्योंकि स्वाद चख लिया है न! यह वीतरागी ज्ञान मिलने के बाद उसका स्वाद भी कुछ और ही होता है, फिर कौन छोड़ेगा? बाहर के लोगों की सामायिक में तो सब हाँकना पड़ता है और इसमें तो किसी को हाँकना करना नहीं होता। सिर्फ देखते ही रहना है, ज्ञाता-दृष्ट। उसमें भी वापस दो फायदे होते हैं! एक तो खुद को सामायिक का फल मिलता है, मतलब क्या? कि जब यह सब अचल हो जाता है तब आत्मा के स्वभाव का पता चलता
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है, इसलिए सुख उत्पन्न होता है। यह जो चंचल भाग है, वह अचल हो जाता है, इसलिए आत्मा का स्वभाविक सुख उत्पन्न होता है। इस चंचलता की वजह से वह सुख प्लस-माइनस हो जाता है। दूसरा यह कि खुद के जो दोष हैं, उन्हें ज्ञाता-दृष्टा के तौर पर देखते रहने से दोष विलीन होते जाते हैं। इस तरह दो लाभ होते हैं।
सामायिक में तो, खुद का जो दोष है, उसी को रख देना! अहंकार हो तो अहंकार रख देना। विषय रस हो तो विषय रस रख देना, लोभ-लालच हो तो उसे रख देना। इन गाँठों को सामायिक में रख दीं और उन गाँठों पर ज्ञाता-दृष्टा रहे तो वे विलय हो जाएँगी। अन्य किसी तरीके से ये गाँठें खत्म हो पाएँ, ऐसी नहीं है। यह सामायिक इतनी आसान, सरल और सबसे ऊँची चीज़ है! यहाँ एक बार सामायिक करके जाए, तो फिर घर पर भी हो सकेगी! यहाँ सब के साथ बैठकर करने से क्या होता है कि सभी का प्रभाव पड़ता है और बिल्कुल पद्धतिपूर्वक अच्छा हो जाता है। इसके बाद आप घर पर करोगे तो चलता रहेगा।
विषय की गाँठ बड़ी होती है उसके निकाल की बहुत ही ज़रूरत है, वह कुदरती रूप से अपने यहाँ सामायिक में शुरू हो गया है! सामायिक करो, सामायिक से काफी कुछ विलय हो जाता है। कुछ करना तो पड़ेगा न? जब तक दादा हैं, तब तक सारा रोग निकालना पड़ेगा न? एकाध गाँठ ही भारी होती है, लेकिन जो भी रोग है तो उसे निकालना तो पड़ेगा न? उसी रोग की वजह से अनंत जन्मों से भटके हैं न? यह सामायिक तो किस हेतु से है कि अभी तक विषय भाव का बीज खत्म नहीं हुआ है और उसी बीज में से चार्ज होता है और उस विषय भाव के बीज को खत्म करने के लिए यह सामायिक है।
आपको विषय नहीं चाहिए, लेकिन विषय छोड़ते नहीं हैं न? हमें गड़दे में नहीं गिरना हो फिर भी गिर जाएँ तो क्या
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करना चाहिए? तुरंत ही एक घंटे तक दादा से माँग करना कि, 'दादा, मुझे ब्रह्मचर्य की शक्ति दीजिए।' ताकि शक्ति मिल जाए और प्रतिक्रमण भी हो जाएँ। फिर दिमाग में उसकी 'वरीज' (चिंता) मत रखना। गड़ढे में गिरे तो तुरंत ही सामायिक करके धो देना। सामायिक यानी हाथ-पैर धोकर, कपड़े धो-कर, सूखाकर और समेटकर साफ-सुथरे हो जाना। तुरंत सामायिक नहीं हो सके तो दो-चार घंटों बाद भी कर लेना, लेकिन लक्ष्य में रखना है कि सामायिक करनी बाकी है।
भगवान ने ऐसा नहीं कहा है कि, 'तू गड़ढे में मत गिरना।' भगवान ने तो ऐसा कहा है कि, 'गड़ढे में गिरने जैसा नहीं है, सीधे रास्ते पर चलने जैसा है।' ऐसा अभिप्राय दिया था। फिर कोई कहेगा कि, 'आपने मना किया है और मैं गिर गया तो क्या करूँ?' तब भगवान कहते हैं, 'गिर गए तो उसमें हर्ज नहीं है, अगर गिर जाए तो तू धो देना और अभी इस्त्रीवाले कपड़े पहन ले।' एक घंटा सामायिक कर ली तो फिर कोई रूकावट नहीं रहेगी। किंचितमात्र भी रूकावट रहे तो मेरी जिम्मेदारी, फिर इतने छोटे गड़ढे में गिरे या बड़े गड़ढे में गिरे, लेकिन ढूबेगा नहीं!!! पूरा जगत् बिना गड़ढे के ढूब रहा है, ढक्कन तक में ढूब जाते हैं!
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स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता
देखते ही जुगप्सा
लोग विषय की गंदगी में पड़े हुए हैं। विषय के समय उजाला कर दे तो उसे अच्छा नहीं लगता। उजाला हो जाए तो घबरा जाता है। इसलिए अंधेरा रखता है। उजाला हो जाए तो भोगने की जगह को देखना तक अच्छा नहीं लगे। इसलिए कृपालुदेव ने भोगने के स्थान के लिए क्या कहा है?
प्रश्नकर्ता : 'यह चीज़ वमन करने योग्य भी नहीं है।'
दादाश्री : उल्टी करनी हो, तो उस जगह पर करोगे या दूसरी किसी अच्छी जगह पर करोगे?
प्रश्नकर्ता : कितना कुछ देखा होगा उन्हींने?
दादाश्री : देखा है न, ज्ञानियों ने। एक तो आँख को अच्छा नहीं लगता। कान को भी अच्छा नहीं लगता। नाक में तो दुर्गंध आती है। यदि उस जगह को छूआ हुआ हाथ सूँघ ले तो मरी हुई मछली हो न, ऐसी दुर्गंध आती है, और अगर चखने को कहा हो तो? एक भी इन्द्रिय को अच्छा नहीं लगता सिर्फ स्पर्श को अच्छा लगता है, वह भी सिर्फ रात को ही। दिन में करने को कहें न वहाँ पर, तो अच्छा नहीं लगेगा।
एक बनिया मेरे साथ बैठने आता था। उस समय मेरी उम्र ६०-६२ साल की थी। उसकी उम्र भी ६०-६२ की। उसने मेरे
स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता (खं-2-८)
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सामने शर्त रखी, 'एक आधा घंटा बैठने आऊँगा तो आप निभा लोगे?' मैंने कहा, 'हाँ, निभा लूँगा।' बाहर मेरे साथ घूमने से लोगों में रौब बढ़ता था। फिर मेरे साथ बैठता था। यों उसकी बुद्धि अच्छी थी। मैंने उस भाई से पूछा, 'ये सभी पुरुष नेकेड जा रहे हों तो आपको उन्हें देखना अच्छा लगेगा?' तब वे बोले, 'नहीं लगेगा। मैं तो मुँह फेर लूँगा।' अरे, पुरुष नेकेड जा रहे हों तो क्या तू नेकेड नहीं है? यह तो ढका हुआ है इसलिए सुंदर है! उसके बाद उसे पूछा, 'यदि स्त्री और पुरुष नेकेड जा रहे हो तो उनमें से किसे देखना पसंद करोगे? तब उन्होंने कहा, 'पुरुष को देख सकते हैं लेकिन स्त्री को देखना अच्छा नहीं लगेगा। उल्टी हो जाएगी' इस प्रकार मैं उस बनिए की बुद्धि देख रहा था। उस भाई ने कहा कि, 'मेरी वाइफ नहा रही थी, तब उसे देख लिया था। तब से मुझे अंदर घिन आती है।'
रोंग बिलीफें, रूट कॉञ्च में
अंधेरे में जाकर ऐसा करते हैं कि पाँचों इन्द्रियों को अच्छा नहीं लगे। बच्चे देखें तो शर्मा जाएँ। कोई विषय विकार कर रहा हो, और उसकी फोटो लें तो कैसा दिखेगा?
प्रश्नकर्ता : घिन आए ऐसा दिखेगा, जानवर जैसा दिखेगा।
दादाश्री : जानवर ही कहलाएगा। पूरी तरह से पाशवी इच्छा कहलाएगी।
प्रश्नकर्ता : स्त्री के अंगों के प्रति आकर्षण होने का क्या कारण है?
दादाश्री : मान्यता अपनी, रोंग बिलीफें हैं इसलिए। गाय के अंगों के प्रति आकर्षण क्यों नहीं होता?! सिर्फ मान्यताएँ। कुछ नहीं होता। सिर्फ बिलीफें हैं, बिलीफें तोड़ दो तो कुछ भी नहीं है।
प्रश्नकर्ता : वह जो मान्यता खड़ी होती है, ऐसा संयोग मिलने की वजह से होता है?
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दादाश्री : लोगों के कहने से हमें हो जाता है। हमारे कहने से मान्यता खड़ी होती है। क्योंकि आत्मा की हाजिरी में मान्यता खड़ी होती है इसलिए दृढ़ हो जाती है और इसमें ऐसा है ही क्या? मांस के लोथड़े हैं!
प्रश्नकर्ता : एक बार मैं स्तन का ऑपरेशन देखने गया था। शुरू में देखे तो इतने सुंदर दिख रहे थे लेकिन ऑपरेशन करने के लिए चीरा तो कैंपकंपी आ गई।
दादाश्री : कुछ भी सुंदरता होती ही नहीं है, मांस के लोथड़े ही हैं।
प्रश्नकर्ता : यह रोंग बिलीफ कैसे खत्म करें?
दादाश्री : मैंने अभी कैसे खत्म की!
प्रश्नकर्ता : राइट बिलीफ से। बनिए की वह बात फिट हो गई मांस के लोथड़ेवाली।
दादाश्री : बनिए को कहा जाए तो उसे स्त्री को नेकेड देखना अच्छा नहीं लगेगा। उसकी बुद्धि बहुत अच्छी कही जाएगी। मुझे तुरंत समझ में आ जाता है कि इसकी दृष्टि कितनी उच्च है। वाइफ के बारे में मांस के लोथड़े दिखते थे और हमेशा घिन आती थी उसे! साठ साल की उम्र में भी उसे घिन आती थी, वह अच्छा है न?! वर्ना घिन नहीं आती।
वह आवाज़, मन की ही
प्रश्नकर्ता : अंदर से जो शोर मचाते हैं कि 'देख लो। देख लो।' वह कौन है? कोई स्त्री बाथरूम में नहा रही हो या कोई विषय भोग रहा हो, तब?
दादाश्री : वह तो रोंग बिलीफवाला मन ही कहता है। बाद में प्राप्त हुआ ज्ञान, उस समय आकर रोक देता है कि ऐसा नहीं
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होना चाहिए। ये सब रोंग बिलीफें हैं। जगत् को पता ही नहीं है कि यह क्या है! बिलीफें ही रोंग हैं। सौ बार रोंग बिलीफ को सही मानी हों तो सौ बार उन्हें तोड़ना पड़ेगा, आठ सौ बार किया हो तो आठसौ बार और दस बार किया हो तो दस बार। दोस्तों के साथ घूम रहे हों और वे कहें कि ‘ओहोहो कैसे हैं, कैसे हैं!’ तब हम भी अंदर बोल उठते हैं कि ‘कैसे हैं!’ ऐसे करते करते स्त्री को भोग लिया।
मन में जो विचार आते हैं, वे विचार अपने आप ही आते रहते हैं, तो उन्हें हमें प्रतिक्रमण से धो देना है। फिर वाणी में ऐसा नहीं बोलना है कि, विषयों का सेवन करना बहुत अच्छा है और वर्तन में भी ऐसा नहीं रखना है। स्त्रियों के सामने आँखें नहीं गड़ानी हैं। स्त्रियों को देखना मत, छूना मत। स्त्रियों को छू लिया हो तो भी मन में प्रतिक्रमण हो जाना चाहिए, कि ‘अरेरे, इसे कहाँ छू लिया!’ क्योंकि स्पर्श से विषय के सभी तरह के असर होते हैं।
प्रश्नकर्ता : उसे तिरस्कार करना नहीं कहा जाएगा?
दादाश्री : उसे तिरस्कार नहीं कहेंगे? प्रतिक्रमण में तो हम उनके आत्मा से कहते हैं कि ‘हमारी गलती हो गई, फिर से ऐसी गलती नहीं हो ऐसी शक्ति दीजिए। उसी के आत्मा से ऐसा कहना कि मुझे शक्तियाँ दीजिए। जहाँ अपनी गलती हुई हो, वहाँ पर शक्ति माँगना तो वह शक्ति मिलती रहेगी।’
प्रश्नकर्ता : कोई स्त्री हमारे पास आकर बैठे तो उससे हम कह सकते हैं कि ‘बहन, आप यहाँ से उठकर वहाँ बैठो?’
दादाश्री : नहीं, हम ऐसा क्यों कहें? अपने पास बैठे तो क्या अपनी गोद में बैठ जाती है?
प्रश्नकर्ता : नहीं, नहीं, यहाँ अपने पास।
दादाश्री : पास में बैठे तो हमें क्या? अपनी दृष्टि अलग,
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हमें कुछ लेना देना नहीं है। वह तो गाड़ी में भी बैठते ही हैं न? गाड़ी में क्या करते हैं? यहाँ तो हम खिसका दें कि वहाँ बैठो, लेकिन गाड़ी में क्या करोगे? अरे, भीड़ में भी बैठना पड़ता है। यदि थक गए होओगे तो क्या करोगे?
प्रश्नकर्ता : तो स्पर्श का असर होगा न?
दादाश्री : उस समय हमें मन संकुचित कर लेना चाहिए। मैं इस देह से अलग हूँ, मैं 'चंद्रेश' हूँ ही नहीं, यह उपयोग रहना चाहिए, शुद्ध उपयोग रहना चाहिए। कभी जब ऐसा हो जाए तब शुद्ध उपयोग में ही रहना चाहिए कि 'मैं चंद्रेश हूँ ही नहीं।'
स्पर्श सुख के जोखिम
स्पर्श सुख भोगने का विचार आए तो उसके आने से पहले ही उखाड़कर फेंक देना। यदि तुरंत ही उखाड़कर फेंक नहीं दिया जाए तो पहले सेकन्ड में ही पेड़ बन जाता है, दूसरे सेकन्ड में वह हमें पकड़ में ले लेगा और तीसरे सेकन्ड में फिर फाँसी पर चढ़ने का वक्त आएगा।
हिसाब नहीं होगा तो टच भी नहीं हो सकता। स्त्री-पुरुष एक रूप में हों, फिर भी विचार तक नहीं आ सकता।
प्रश्नकर्ता : आपने कहा कि 'हिसाब है, इसलिए आकर्षण होता है।' तो उस हिसाब को पहले से ही कैसे उखाड़ सकते हैं?
दादाश्री : वह तो उसी समय, आँन द मोमन्ट करेंगे तभी हो पाएगा। पहले से नहीं हो सकेगा। मन में विचार आए न कि 'स्त्री के लिए पास में जगह रखें।' तो तुरंत ही उस विचार को उखाड़ देना। 'हेतु क्या है' वह देख लेना। अपने सिद्धांत के अनुरूप है या सिद्धांत के विरुद्ध है। सिद्धांत के विरुद्ध हो तो तुरंत ही उखाड़कर फेंक देना चाहिए। स्त्री पास में बैठे उससे पहले ही तुम्हें यह सुविधा कर लेनी चाहिए। वह विचार आए, तभी उसे
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उखाड़कर फेंक देना। फिर स्त्री के बैठने तक तो उस विचार को हम पेड़ जितना कर देते हैं। उसके बाद वे (विचार) वापस नहीं पलट सकते।
प्रश्नकर्ता : यह तय तो है कि मुझे विषय नहीं भोगना है, लेकिन कोई लड़की या कोई लड़का मुझ पर विषय भोगे, मुझे स्पर्श करे, बस मैं चढ़ते-उतरते, बैठते, कहीं पर भी, तो उसमें मुझे हर्ज नहीं। मुझे विषय नहीं भोगना है। ऐसे विचार आते हैं।
दादाश्री : तब तो अच्छा ही है न (!)
प्रश्नकर्ता : उस समय मेरी तो सेफ साइड है न, मैं तो विषय भोग ही नहीं रहा हूँ। मुझे तो स्पर्श करना ही नहीं है। लेकिन वह सामने से स्पर्श करे, तो फिर मैं क्या करूँ?
दादाश्री : ठीक है। सॉप जान बूझकर छू जाए, तो उसमें हम क्या करें?(!) छूना कैसे अच्छा लगता है, पुरुष या स्त्री को? जहाँ निरी दुर्गंध ही है, वहाँ छूना कैसे अच्छा लगता है?
स्त्री का स्पर्श लगे विष समान
प्रश्नकर्ता : लेकिन स्पर्श करते समय इसमें से कुछ भी याद नहीं आता।
दादाश्री : हाँ, वह याद कैसे आएगा लेकिन? उस समय तो स्पर्श करते वक्त, इतना अधिक पोज़ीशनस होता है वह स्पर्श, इतना अधिक पोज़ीशनस होता है, कि मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार, सभी पर आवरण आ जाता है। मनुष्य मूर्छित हो जाता है। जानवर ही देख लो न, उस समय!
प्रश्नकर्ता : उस समय उसका फोर्स इतना जोरदार होता है कि उस वजह से वह मूर्छित हो जाता है।
दादाश्री : हं! ऐसा है न कि यह शराब तो पीने के बाद
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चढ़ती है, और यह तो हाथ लगाते ही चढ़ जाता है। शराब तो, पीने के आधे घंटे बाद अंदर मन में असर होता है जबकि इसमें तो हाथ लगाया कि तुरंत ही अंदर चढ़ जाता है। तुरंत! देर ही नहीं लगती इसलिए हमें तो बचपन से ही, यह अनुभव देखते ही घबराहट हो गई थी कि ‘अरेरे, यह क्या हो जाता है? यह तो इंसानियत मिटकर हैवानियत हो जाती है!’ इंसान-इंसान से मिटकर हैवान बन जाता है। थोड़ी देर बाद यदि इंसानियत रहती तो हर्ज नहीं था। यानी कि थोड़ा बहुत भी अगर अपना कुछ रहता, मजा-मर्यादा में, तो हर्ज नहीं था, लेकिन यह तो मर्यादा ही नहीं रहती और हम तो अनंत जन्मों से ब्रह्मचर्य के रागी, इसलिए हमें यह अच्छा नहीं लगता था लेकिन मजबूरन यह सब हुआ था। थोड़ा बहुत संसार भोगा होगा, वह भी मजबूरन। अरुचिपूर्वक, प्रारब्ध में लिखा हुआ! शोभा नहीं देता यह तो! इसलिए तुम महापुण्यशाली हो कि तुम्हें दादा से ब्रह्मचर्यव्रत मिला।
दादा का आधार और ऊपर से यह ज्ञान। यदि यह ज्ञान नहीं होता न, तो ब्रह्मचर्य टिक नहीं सकता था। यह ज्ञान, ‘मैं शुद्धात्मा हूँ’ यह भान हुआ है, इसलिए ब्रह्मचर्य टिक सकता है और वास्तव में ब्रह्मचर्य कब टिकेगा, जब वहाँ रहने की अलग व्यवस्था हो जाएगी, तब। उसके बाद फिर थोड़े समय में उनके रहने की अलग व्यवस्था हो ही जाएगी और तभी खरा ब्रह्मचर्य और तभी चेहरे पर नूर आएगा। तब तक तो यह आबो-हवा, वातावरण असर करता रहेगा।
प्रश्नकर्ता : वह जो स्पर्श की बात की है न, तो वैसा ही बर्तता है, तो फिर क्या करना चाहिए? उसका उपाय क्या है? यानी इस स्पर्श में सुख नहीं है, ये सभी बातें खुद जानता है, फिर भी वर्तन में जब स्पर्श होता है, तब उसमें सुख आता है।
दादाश्री : वह आएगा लेकिन उसे तो तुरंत निकाल देना है न, तुम्हें क्या? वह सुख आया, वह तो इसलिए कि अपनी
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बिलीफ है, वर्ना दूसरे को तो यों स्पर्श होते ही जहर जैसा लगेगा। कई लोग तो इसे छूते तक नहीं है। स्त्री को छूते तक नहीं हैं। जहर जैसा लगता है क्योंकि उसने ऐसा भाव किया है। पहलेवाले में ऐसा माल भरा हुआ है कि स्पर्श को सुख माना है। इन दोनों के अलग-अलग माल भरे हुए हैं, इसलिए उसे इस जन्म में ऐसा लगता है। जहर भी नहीं लगना चाहिए और सुख भी नहीं लगना चाहिए। हमारे जैसा सहज, यों जैसे पुरुषों की तरह हम छूते हैं दूसरों को, उस तरह से रहना चाहिए। विषय में स्त्री दोषित नहीं है। वह अपना दोष है। स्त्री का दोष नहीं है।
प्रश्नकर्ता : 'स्त्री को स्पर्श करने में सुख है' यह जो बिलीफ है, उसे कैसे हटाएँ?
दादाश्री : वह बिलीफ तो जब दस लोगों ने कहा तो बिलीफ बैठ गई। वहाँ अगर त्यागी बोले होते न तो बिलीफ होती तो भी चली जाती क्योंकि बिलीफ बैठ गई है। सही जगह पर बैठी है या गलत जगह पर? जलेबी तो स्वादिष्ट लगती है, उसमें भी अगर ताजा जलेबी हो, स्वादिष्ट लगेगी या नहीं लगेगी? घी की होगी तो!
प्रश्नकर्ता : लगेगी।
दादाश्री : ज्ञानीपुरुष से समझ लेना चाहिए। जबकि इन लोगों से सीखे हो! कवि लोग तो सभी ऐसे तारीफ करते हैं। पैर तो केले के तने जैसे, पैर और फलाने अंग के लिए ऐसा कहते हैं लेकिन ऐसा नहीं सोचता कि अरे! संडास जाए उस समय क्यों साथ में नहीं बैठता? यह तो सभी अपना-अपना गाते हैं। ज्ञानीपुरुष दिखाएँ न, तब अरुचि होती है भीतर।
प्रश्नकर्ता : आपकी ये सारी बातें सही हैं। यह श्रद्धा में भी बैठता है लेकिन फिर भी वर्तन में स्पर्श कर लेते हैं।
दादाश्री : वर्तन में तो यह मान्यता है न रोंग, मान्यता फल दिए बिना जाएगी नहीं न! वह डिस्चार्ज मान्यता है। एक बार मानी हुई
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चीजें बिल्कुल विरुद्ध, खराब हों फिर भी मान्यता जाती नहीं है न! अतः हमें निकालनी पड़ेगी कि ‘ऐसे नहीं’ लेकिन यह गलत है।
प्रश्नकर्ता : तो ऐसा कह सकते हैं कि अभी भी रुचि है।
दादाश्री : नहीं, ऐसा नहीं है। ये रंग बिलीफें रह गई हैं अभी भी अंदर इसलिए निकाल कर देना है। लोगों के कहने से ‘इसमें सुख है’ ऐसी रंग बिलीफ जो बैठ गई है, वह इसमें रह गई है, वह जैसे-जैसे आएगी, वैसे-वैसे निकाल कर देंगे।
प्रश्नकर्ता : इस बिलीफ का निकाल कैसे करना है ?
दादाश्री : ‘नहीं है मेरी’ ऐसा कहकर ही। वह अपनी नहीं है। उस बिलीफ का निकाल हो ही जाएगा उससे।
दोनों स्पर्शों के असर में भिन्नता
प्रश्नकर्ता : जब स्त्री का स्पर्श होता है, तब उसके परमाणु एकदम असर डालते हैं। जबकि ज्ञानीपुरुष को भी स्पर्श करते हैं, तब ज्ञानीपुरुष के जो परमाणु हैं, वे असर तो डालते ही हैं, लेकिन इतने फोर्सवाले नहीं लगते, इसका क्या कारण है ?
दादाश्री : वह तो परमाणुओं का असर है, इसी कारण से न! जैसे परमाणु होते हैं, वैसे ही असर होता है। किसी चिंतातुर को यदि स्पर्श कर लें तो चिंतातुर कर देता है, वैसे परमाणु खड़े हो जाते हैं। जैसे परमाणु होते हैं, वैसे ही असर होता है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन उसमें हमें अनुभव होता है। इसमें इतना स्पष्ट पता नहीं चलता, इसका क्या कारण है ?
दादाश्री : हाँ, वह तो हर एक तरह के परमाणुओं के परिणाम हैं। परमाणुओं का असर हुए बगैर नहीं रहता। अंगारों को स्पर्श करे तो अंगारा और इस बर्फ को स्पर्श करे तो बर्फ, जैसे उनमें परमाणु होते हैं, तुरंत ही उनका असर होता है। उसे स्पर्श करते
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समय उपयोग नहीं रहे तो बात अलग है, हर कोई अपने-अपने परमाणुओं का स्वभाव बताए बिना नहीं रहता।
प्रश्नकर्ता : उसमें तुरंत पता चल जाता है, पूरा अंतःकरण डाँवाडोल हो जाता है।
दादाश्री : वह तो डाँवाडोल हो ही जाता है सबकुछ!
प्रश्नकर्ता : जबकि इसमें तुरंत पता नहीं चलता, इसका क्या कारण है?
दादाश्री : इनका कैसे पता चलेगा, इन हाइ लेवल के परमाणुओं का कैसे पता चलेगा जल्दी। डाँवाडोल हो जाएँ तो तुरंत पता चल जाता है।
प्रश्नकर्ता : वह जो नेगेटिव असर होता है परमाणुओं का, उसका पता चलता है।
दादाश्री : दस्त की दवाई लेते हैं, उस तरह से।
प्रश्नकर्ता : इसमें ऐसा नहीं है?
दादाश्री : इसमें नहीं होता। यह तो बहुत धीरे असर करता है। धीरे असर करे, ऊँचे मार्ग पर ले जानेवाला है न! जबकि वहवाला तो उसे गिरा देगा नीचे, स्पीडी असर, स्लिपिंग कहलाता है। स्लोप, फिसलनेवाला और यह ऊँचे जाना, ऊँचे जाने के लिए तो बहुत जोर लगाएँ तब जाकर एक इंच खिसकता है, जबकि वह माल तो फिसलनेवाला है ही, हो सके तब तक छूना मत, उपयोग हो, भले ही कितना भी मजबूत उपयोग हो फिर भी छूना मत।
प्रश्नकर्ता : यह तो उसकी बात है, जब स्पर्श हो जाता है। स्पर्श करने का तो किंचित्मात्र भी भाव नहीं होता, लेकिन स्पर्श हो जाता है।
दादाश्री : स्पर्श हो जाए तो फिर हमें प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए तुरंत।
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प्रश्नकर्ता : जबकि ज्ञानीपुरुष को स्पर्श करने से?
दादाश्री : वह तो बहुत, वह कितने हुई लेवल का और असर होते-होते तो कितना समय बीत जाता है।
प्रश्नकर्ता : या फिर मुझ में भी गलती हो सकती है न कि ये परमाणु तो एकदम आ रहे हैं। हमारे लिए लाभदायक हैं, यह बात शत प्रतिशत नक्की है।
दादाश्री : वे लाभदायक ही हैं लेकिन इसका पता नहीं चलता!
प्रश्नकर्ता : मुझे यह प्रश्न है कि इसका पता क्यों नहीं चलता?
दादाश्री : उसका इतना स्थूल असर नहीं होता कि जो आपको पता चल जाए। क्या कहा? यह तो बहुत सूक्ष्म असर है और वह वाला तो स्थूल असर, आपको पता चल जाए ऐसा। इस बर्फ का तो छोटे बच्चे को भी पता चल जाता है। उसी तरह आप पर वैसे दूसरे असर हो जाते हैं। इस असर का पता नहीं चलता। लेकिन अंत में कुल मिलाकर यों अंदर निराकुलता रहती है।
प्रश्नकर्ता : जैसा इस स्पर्श का है, वैसे ही जब दृष्टि मिलती है तब भी ऐसा होता है।
दादाश्री : दृष्टि मिलती है तब भी ऐसा असर होता है। ऐसा है न, एक ही टेबल पर स्त्री-पुरुष सभी खाना खाते जरूर हैं। एक ही तरह का खाना खाते हैं, लेकिन स्त्री में स्त्री के परमाणुओं के रूप में तुर्त बदल ही जाते हैं। पुरुषों में पुरुष के हिसाब से परमाणु तुर्त बदल जाते हैं। बीज के स्वभाव के अनुसार होता है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन वे साथ में भोजन के लिए बैठते हैं, आहार एक ही तरह का लेते हैं, तो अंदर जाकर उन परमाणुओं के बदल जाने का कारण क्या है?
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दादाश्री : बदल जाते हैं तुरंत, बीज के अनुसार। जैसा भीतर बीज होता है न, उसके अनुसार। यह आहार तो एक ही तरह का, लेकिन बीज के अनुसार बदल जाता है। ये पानी पीते हैं, लेकिन भिंडी का बीज होगा तो भिंडी ही उगेगी और अरहर का बीज होगा तो अरहर उगेगी, पानी वही का वही, जमीन भी वही की वही। अतः पुरुषों को मासिक धर्म नहीं आया, वर्ना आया होता तो पता चलता कि यह क्या है? मासिक धर्म तो कितनी मुश्किलोंवाला है! और उसमें से कितनी अशुचि निकलती है। उस अशुचि के बारे में सुने तो भी इंसान पागल हो जाए। लेकिन स्त्री बताती नहीं है कभी भी, कि क्या अशुचि निकलती है? इसलिए पति बेचारा समझता है कि कुछ भी नहीं है।
मोह व कपट के परमाणु अलग हैं अंदर। स्त्री के हिसाब से वे उत्पन्न होकर परिणामित होते हैं। वह खीर हो या जलेबी हो, वह स्त्री के बीज के अनुसार वह परिणामित होता है। पुरुष बीज हो तो पुरुष के बीज अनुसार परिणामित होता है। उसकी हृद होती है। कुछ हृद तक पुरुष के बीज का मोह रहता है, उस हृद से बाहर नहीं होता।
प्रश्नकर्ता : ये जो परमाणु हैं, उनका साइन्स क्या है वास्तव में?
दादाश्री : साइन्स यानी ये जो परमाणु हैं तो नेगेटिव परमाणु दुःखदायी होते हैं और पॉजिटिव हों तो सुखदायी होते हैं। नेगेटिव सेन्स के सभी परमाणु दुःखदायी होते हैं, उन्हें अशुद्ध कहते हैं और पॉजिटिव शुद्ध कहलाते हैं। सुख ही देते हैं, पॉजिटिव।
आकर्षण, वह है मोह
प्रश्नकर्ता : कोई स्त्री पास में बैठी हो और ऐसे ज्यादा कुछ हो जाए तो डर लगता है कि हम कुछ गलत कर रहे हैं, अंदर ऐसा लगता है लेकिन फिर भी अभी भी आकृष्ट हो जाता है।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
दादाश्री : वह तो कर्म के उदय आपको खींचते हैं न! अभी तो आपको देखना पड़ेगा कि कर्म के उदय यहाँ खींच रहे हैं। सभी की ओर नहीं खींचते। चार बैठी हों तो एक के प्रति आकृष्ट होता है बाकी पर नहीं। यानी हिसाब है, पहले का, पिछला।
प्रश्नकर्ता : ऑफिस में काम कर रहे हों तब, जब वह व्यक्ति गुज़रे तभी अपनी नज़र ऊपर उठती है।
दादाश्री : हाँ, यानी वहाँ पर हिसाब है। इसलिए वहाँ पर प्रतिक्रमण करते रहना है। अतिक्रमण से वहाँ लिपटा हुआ है और प्रतिक्रमण से तोड़ दो। अतिक्रमण यानी पहले जो दृष्टियाँ की हैं, उनके प्रतिक्रमण करेंगे तो खत्म हो जाएगा।
जब तक दृष्टि में किसी भी चीज़ पर आकर्षण है, तब तक उसे मोह है। वह मोह गया। दर्शनमोह गया, चारित्रमोह रहा। वह तो कुछ देखते ही यदि बदलाव हो जाता हो तो दीवार को देखकर क्यों नहीं होता? बीच में कोई जानवर है, जो ऐसे बदलाव करवाता है। कौन सा जानवर? मोह नामक!
प्रश्नकर्ता : वह तो जितनी खुद की जागृति हो, तब पता चलता है कि अंदर कुछ बदलाव हुआ है, वर्ना कितना कुछ हो जाता है फिर भी पता नहीं चलता कि यह बदलाव हुआ है। पता ही नहीं चलता।
दादाश्री : जिसे भान ही नहीं है, उसे पता कैसे चलेगा? यह क्या हो रहा है? उसका भी भान नहीं है।
आकर्षण और मोह नहीं होने चाहिए। फिर बाकी गुनाह माफ कर देते हैं, आँवर फलो हुआ हो या ऐसा वैसा कुछ हुआ हो तो उसे माफ कर देते हैं हम। हमें ऐसा कुछ नहीं है कि आपको गुनहगार ही बनाना है। हम समझते हैं कि घर में रहकर इस तरह रहना मुश्किल है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन रहा जा सकता है।
स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता (खं-2-८)
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दादाश्री : रहा जा सकता है लेकिन उनकी अलग टोली हो, उसकी बात ही अलग है!
प्रश्नकर्ता : इस वातावरण में हो, तब तक सतर्कता रखना ताकि परीक्षा तो हो जाए न?
दादाश्री : सचमुच का टेस्ट होगा लेकिन अपना ज्ञान ऐसा है कि जरा सा आकर्षण हो जाए तो यों बीज पड़ा कि उखाड़कर फेंक देता है, तुरंत! फिर प्रतिक्रमण कर देता है, तुरंत ही। अपना विज्ञान इतना सुंदर है।
जहाँ आकर्षण है, वहाँ जोखिम समझ
स्त्री या विषय में रमणता की जाए, ध्यान किया जाए, निदिध्यासन किया जाए तो वह गाँठ पड़ जाएगी, विषय की। फिर कैसे खत्म होगी वह? तो वह यह कि, विषय विरुद्ध विचारों से खत्म हो जाएगी। इंसान केवल एक इतना ही संभाल ले तो कोई भी विषय-आकर्षण हो जाए तो अगर वहाँ पर तुरंत ही प्रतिक्रमण कर ले तो आगे उसका खाता बिल्कुल साफ रहेगा। जरा दो मिनट भी देर कर दे तो फिर उग निकलेगा। अतः यह तो प्रतिक्रमण से बंद होगा वरना यह तो बंद ही नहीं होगा न! फिर भी अगर पतन हो जाए तो जोखिमदारी नहीं रहेगी। लेकिन जहाँ पर भान ही नहीं रहे, वहाँ पर फिर आकर्षण हुआ तो फिर वहाँ सबकुछ ज्यों का त्यों पड़ा रहेगा। अतः देखते ही आकर्षण हो जाए, उसी के साथ उसका आलोचना-प्रतिक्रमण-प्रत्याख्यान और खराब विचारों को काटे तो बच सकेंगे, वरना कोई बचेगा ही नहीं इससे। यानी बहुत गहरा गड़ड़ा है यह तो।
यह आकर्षण क्यों होता है कि पहले की अज्ञानता से। हमें समझ नहीं थी इसलिए उसके साथ रमणता की थी, इसलिए फिर से आकर्षण खड़ा हो जाता है। अतः हमें समझ जाना चाहिए कि अब इसका कुछ हिसाब है।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : वह पता तो चलता है लेकिन फिर भी बार-बार विचार आते रहते हैं।
दादाश्री : हाँ। लेकिन विचार आएँ तो फिर से उन्हें, वे जो विचार आएँ, उन सबको तोड़ना पड़ेगा। जैसे-जैसे आते जाएँ, वैसे-वैसे तोड़ते जाना है, आते जाएँ वैसे-वैसे तोड़ते जाना है। हर एक को देखकर प्रतिक्रमण करना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता : वह समझ में तो आता है कि कितनी बड़ी गलती की थी!
दादाश्री : लेकिन गलती तो की, थी तभी तो अंदर आया न! एक विचार तक भी आए तो उसे कैसे तोड़ना, उतना आना चाहिए! उसे उसमें पूरा दिन गुज़ारना पड़ेगा, दो-दो घंटे। तब छेदन होगा वर्ना नहीं। उन्हें(कर्म) बाँधते समय कुछ सोचा ही नहीं था न! पूरी रात उल्टा लेटकर फिर पूरी रात विचार करता रहा।
प्रश्नकर्ता : ‘उल्टे लेटकर विचार करते हैं’ इसका मतलब समझ में नहीं आया।
दादाश्री : उसे कुछ अट्रैक्टिव लगा इसलिए फिर वहाँ वह उल्टा लेटकर सोचता ही रहता है। बाद में वह रमणता करता रहता है। अब वह तो चली गई तो अब क्यों रमणता कर रहा है? भाई उल्टा लेटकर रमणता करता है, अंदर वह टेस्ट आता है न एक तरह का। अब यदि रमणता ब्रह्मचर्य में रहे, उससे फिर कार्य ब्रह्मचर्य होगा। पतन कब होता है? रमणता अब्रह्मचर्य रहे, तब से होता है।
तेरी इस तरह की कोई दखल नहीं है न, श्री विज्ञन रहता है न?
प्रश्नकर्ता : फिर भी कभी कभार कच्चा पड़ जाता है।
दादाश्री : ऐसा! उस समय बायें हाथ से दाहिने गाल पर
स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता (खं-2-८)
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थप्पड़ मार देता है? ! तब क्या करता है? 'क्या समझता है?' कहकर एक लगा देना।
विषय रमणता की हो तो प्रतिक्रमण करके उसे धो देना। बाद में दांत-बांत तोड़ दें तो क्या दिखेगा, ऐसा सब देखना चाहिए। श्री विजन तो कहलाएगा न।
प्रश्नकर्ता : लेकिन श्री विजन देखने के बावजूद भी वह बार-बार याद आता है।
दादाश्री : यह याद, वह तो मन का काम है, तेरा क्या जाता है? तुझे 'देखते' ही रहना है।
प्रश्नकर्ता : तो इस पर से ऐसा लगता है कि अभी तक वह टूटा नहीं है।
दादाश्री : टूटेगा कैसे लेकिन? वह तो उसका सारा जोर निकल जाएगा, तब अलग होगा। तब तक जितना जोर भरा हुआ है, उसे हमें देखते ही रहना है।
प्रश्नकर्ता : लंबे समय तक विचार आईं तो उनमें तन्मयाकार हो जाते हैं।
दादाश्री : विचार तो आईंगे, वह तो, जितना लंबा है उतने विचार आते ही रहेंगे। उनका हिसाब खत्म हो जाएगा तो मन बंद हो जाएगा, वह फिर दूसरा पकड़ लेगा।
प्रश्नकर्ता : लेकिन वह हिसाब कब पूरा होगा?
दादाश्री : अभी तो बहुत सारा है। बेहिसाब। अभी तो कोई हिसाब ही नहीं है। अभी तो इस पहाड़ का पहला पत्थर हटा है। लेकिन जो यहाँ से तुरंत काट दे, उसके लिए फिर कुछ खास नहीं रहेगा। दिखाई दे, तभी से प्रतिक्रमण करे और फिर किसी रमणता में नहीं पड़े, रात को, कहीं भी। जरा सा भी उसका विचार