समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
१६८
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
तो फिर उस रूप हो जाते हो। इसलिए सावधान रहना। मन तुम्हारे अभिप्राय को खा नहीं जाना चाहिए। अभिप्राय में रहकर वह जो-जो काम करता है, वे हमें एक्सेट हैं। तुम्हारे सिद्धांत को तोड़नेवाला होना ही नहीं चाहिए। क्योंकि 'तुम' स्वतंत्र हो गए हो, ज्ञान लेकर। पहले तो मन के ही अधीन थे 'तुम'। 'मन का चलता तन चले!' ही था न!
प्रश्नकर्ता : अर्थात् ब्रह्मचर्य का सिद्धांत यह बहुत बड़ी और अनिवार्य चीज है।
दादाश्री : इतनी ही चीज है न! सबसे बड़ी चीज यही है न! यही चीज पुरुषार्थ करने योग्य है।
चलो, सिद्धांत के अनुसार
अभी तो तुम्हारा मन तुम्हारी ऐसे हेल्प करता है कि 'शादी करने जैसा नहीं है, शादी में बहुत दुःख है।' सबसे पहले यह सिद्धांत बतानेवाला तुम्हारा मन था। यह सिद्धांत तुम ने ज्ञान से तय नहीं किया था, यह तुम्हारे मन से तय किया है। 'मन' ने तुम्हें सिद्धांत बताया कि 'ऐसे करो'।
प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य पालन करने का सिद्धांत मन बताता है, उसी प्रकार यह विषय से संबंधित बातें भी मन ही बताता है?
दादाश्री : उसका टाइम आएगा, तब छः छः महीने, बारह-बारह महीने तक वह बताता ही रहेगा।
प्रश्नकर्ता : वह भी मन ही?
दादाश्री : हाँ। सभी साइन्टिफिक सरकारमस्टेशियल एविडेन्स इकट्ठे हो जाते हैं, तब। मैं इन सब से कहता हूँ कि 'मन के कहे अनुसार क्यों चलते हो? मन मार डालेगा।'
तुम ने जो ब्रह्मचर्य का नियम लिया, वह भी मन के कहे
नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)
१६९
अनुसार ही किया है। यह सिद्धांत जो है, वह ज्ञान से तय नहीं किया है। 'मन' ने ऐसे कहा कि, इसमें क्या मजा है? ये लोग शादी करके दुःखी हैं। ऐसा है, वैसा है, 'मन' ने ऐसी जो दलीलें की, उन दलीलों को एक्सेप्ट करके तुम ने स्वीकार किया।
प्रश्नकर्ता : तो ज्ञान से यह सिद्धांत नहीं पकड़ा है, अभी तक?
दादाश्री : ज्ञान से कहाँ पकड़ा है? यह तो अभी भी मन की दलील पर चला है। अब तुम्हें ज्ञान मिला है, तो अब ज्ञान से उस दलील को तोड़ दो। उसका चलन ही बंद कर दो। क्योंकि दुनिया में सिर्फ आत्मज्ञान ही ऐसा है कि जो मन को वश कर सकता है। मन को दबाकर नहीं रखना है। मन को वश करना है। वश यानी जीतना है। हम दोनों किच-किच करें, तो उसमें जीतेगा कौन? तुझे समझाकर मैं जीत जाऊँ तो फिर तू परेशान नहीं करेगा न? और बिना समझाए जीत जाऊँ तो?
प्रश्नकर्ता : समाधान हो जाए तो मन कुछ भी नहीं केहेगा।
दादाश्री : हाँ, समाधानवाला व्यवहार होना चाहिए। तुम्हें यह ब्रह्मचर्य का किसने सिखाया? ब्रह्मचर्य को ये लोग क्या समझें? ये तो ऐसा समझा है कि 'घर में झगड़े हैं, इसलिए शादी करने में मजा नहीं। अब अकेले पड़े रहें तो अच्छा है।'
प्रश्नकर्ता : क्या ऐसा है कि मन जितना वैराग्य बताता है, उतना ही वापस एक दिन ऐसा भी बताएगा।
दादाश्री : मन का स्वभाव क्या है? वह विरोधाभासी है, वह दोनों तत्त्व बताता है। इसलिए सावधान रहने को कहता हूँ।
प्रश्नकर्ता : एक बार मन ब्रह्मचर्य का, वैराग्य का बताएगा, वैसे ही राग भी बताएगा, ऐसा है?
दादाश्री : हाँ, बिल्कुल! फिर वह राग का दिखाएगा।
१७०
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : ऐसा फोर्स होता है?
दादाश्री : उससे ज्यादा होता है और कम भी होता है। उसका कोई नियम नहीं है।
सिद्धांत क्या कहता है? गरम नाश्ता खाओ। ठंडा मत लेना। फिर भी रोज दो मटिया खिलाते हैं। मन अगर कहे कि, 'पाँच मटिया खाने हैं'। तब हम कहते हैं कि, 'फिर कभी, अभी नहीं मिलेंगे। इस दिवाली के बाद।' ऐसा भी कहता हूँ।
प्रश्नकर्ता : मतलब पार्शियल (अंशतः) सिद्धांत का माना और पार्शियल मन का माना, तब उसका समाधान हुआ न?
दादाश्री : नहीं, ऐसा नहीं। वह सिद्धांत को नुकसान नहीं पहुँचाता हो, तो ऐसी बातों में उसे जरा नोबिलिटी चाहिए। वहाँ नोबल रहना चाहिए हमें।
तुम्हें क्या लगता है इसमें? तुम्हारा निश्चय मन से किया हुआ है या समझसहित?
प्रश्नकर्ता : मन से ही किया है।
दादाश्री : ज्ञान है, इसलिए हो सकता है। वर्ना मैं तुम्हें कहता ही नहीं न! कुछ भी नहीं बोलता। ज्ञान नहीं होता तो मैं तुम से इस सिद्धांत की बात ही नहीं करता। हो ही नहीं सकता इंसान से।
निश्चय, ज्ञान और मन के
प्रश्नकर्ता : मन के आधार पर किया हुआ निश्चय और ज्ञान से किया हुआ निश्चय, उसका डिमाकेशन(भेद) कैसे हो सकता है?
दादाश्री : ज्ञान से किए हुए निश्चय में तो बहुत सुंदर हो सकता है। वह तो बहुत अलग चीज है। मन के साथ कैसे व्यवहार
नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)
१७१
करना, वह सारी समझ तो होती ही है। उसे पूछने नहीं जाना पड़ता कि मुझे क्या करना चाहिए?! ज्ञान से किया हुआ निश्चय, उसकी तो बात ही अलग है न! यह तो तुम लोगों का मन से किया हुआ है न? इसलिये तुम्हें जानना चाहिए कि किसी दिन चढ़ बैठेगा। वापस मन ही चढ़ बैठेगा! जिस 'मन' ने इस ट्रेन में बिठाया, वही 'मन' ट्रेन में से गिरा सकता है। मतलब ज्ञान से बैठे हुए होओगे तो नहीं गिरा सकता।
प्रश्नकर्ता : अभी तक मन से किया हुआ निश्चय, वह ज्ञान से हो जाए उसके लिए क्या करना चाहिए?
दादाश्री : अब ज्ञान से आपको उसे फिट कर देना है, मतलब ब्रह्मचर्य की डोर अपने हाथ में आ जानी चाहिए। फिर मन भले ही कितना भी शोर मचाए फिर भी उसका कुछ चलेगा नहीं। दो-पाँच साल तक तू विरोध करे और वह कहे, 'शादी कर, शादी कर'। और सभी संयोग विपरीत हो जाएँ, फिर भी हमें विचलित नहीं होना है। क्योंकि आत्मा अलग है, सभी से। सभी संयोग, वियोगी स्वभाव के हैं।
प्रश्नकर्ता : निश्चय अगर ज्ञान से हुआ हो तो मन उसका विरोध करेगा ही नहीं न, ऐसा?
दादाश्री : नहीं। नहीं होगा। निश्चय अगर ज्ञान से हुआ हो तो उसकी फाउन्डेशन(नींव) ही अलग तरह की होती है न! उसके सभी फाउन्डेशन आर.सी.सी. के होते हैं। और ये तो रोड़े का, अंदर कंक्रोट किया हुआ। फिर दरारें पड़ ही जाएँगी न?
आप्तपुत्रों की पात्रता
प्रश्नकर्ता : आपकी दृष्टि में कैसा है? ये लोग (आप्तपुत्र) किस तरह से तैयार होने चाहिए?
दादाश्री : सेफ साइड! और किसी चीज़ का ज्ञान नहीं हो,
१७२
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
तो उसमें हर्ज नहीं। दूसरे लोगों को उपदेश देना, वगैरह नहीं हो तो उसमें हर्ज नहीं है। उनके जो सिद्धांत हैं, उनकी सेफ साइड में रह सके।
प्रश्नकर्ता : यानी ब्रह्मचर्य का सिद्धांत?
दादाश्री : सिर्फ ब्रह्मचर्य नहीं, हर तरह का सिद्धांत। किसी के साथ कषाय नहीं हो। किसी के साथ कषाय करना, वह गुनाह है। ज्ञान मिलने के बाद कषाय करना शोभा ही नहीं देता न! ब्रह्मचर्य और कषाय का अभाव।
प्रश्नकर्ता : सेफ साइड की बाउन्डी कौन सी?
दादाश्री : सामनेवाला व्यक्ति हमें अलग माने और हम उसे एक मानें। वह हमें अलग मान सकता है, क्योंकि वह बुद्धि के अधीन है, इसलिए। अलग मानते हैं न? हममें बुद्धि नहीं होनी चाहिए ताकि एकता लगे, अभेदता!
प्रश्नकर्ता : सामनेवाला भेद ही डालता रहे तब?
दादाश्री : वह तो बल्कि अच्छा है। उसमें बुद्धि है, इसलिए वह और क्या कर सकता है? उसके पास जो हथियार है, वही इस्तेमाल करेगा न?!
प्रश्नकर्ता : तो हमें कैसे अभेदता रखनी है उसके साथ?
दादाश्री : लेकिन वह जो कुछ कर रहा है, वह तो परवश होकर कर रहा है न बेचारा! और उसमें वह दोषित कहाँ है? वह तो करूणा रखने जैसे हैं।
प्रश्नकर्ता : उस पर थोड़ी देर करूणा रहती है। फिर ऐसा लगता है कि, 'इस पर तो करूणा रखने जैसा भी नहीं है।' ऐसा होता है।
दादाश्री : ओहो! ऐसा तो कह ही नहीं सकते। ऐसा अभिप्राय
नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)
१७३
तो बहुत डाउन ले जाएगा हमें! ऐसा नहीं कह सकते।
प्रश्नकर्ता : करूणा रखने जैसी नहीं है, वह डबल अहंकार कहलाएगा!
दादाश्री : अहंकार का सवाल नहीं है। 'करूणा रखने जैसी नहीं है।' ऐसा नहीं कहना चाहिए। वह हमें ऐसे नहीं कहता कि आप मुझ पर करूणा रखो। बल्कि वह तो कहेंगे कि, 'ओहोहो! बड़े आए करूणा रखनेवाले आए!' इसलिए सबकुछ गलत।
प्रश्नकर्ता : करूणा रखने का प्रयत्न ही नहीं होना चाहिए न?
दादाश्री : करूणा तो सहज स्वभाव है।
प्रश्नकर्ता : ऐसे जो प्रयत्न करने लगा, उसके रिएक्शन में 'नहीं रखने जैसा' हो गया न?
दादाश्री : वह तो गलत है। वह बात ही गलत है। करूणा कह ही नहीं सकते, हम। उसे अनुकंपा कहते हैं। करूणा तो, जब बुद्धि से आगे जाए, तब करूणा कहलाती है।
❖ ❖ ❖ ❖ ❖
[ ६ ]
‘खुद’ अपने आपको को डाँटना
खुद को डाँटकर सुधारे
प्रश्नकर्ता : आप से आज्ञा ली थी लेकिन फिर घर जाने के बाद जरा बिगड़ गया।
दादाश्री : अब क्या होगा? ऐसा हो गया फिर अलीखान क्या करे?!
प्रश्नकर्ता : ऐसा क्यों होता है? ऐसा होने का कारण क्या है?
दादाश्री : नासमझी है तुम्हारी। यहाँ से तय करके जाते हो कि मुझे घर जाकर दवाई पी लेनी है, लेकिन न पीए तो फिर अपनी नासमझी ही कहलाएगी न! देखो न, इस भाई ने डाँटा था अपने आपको, धमका दिया था। यह रो भी रहा था, और वह डाँट रहा था, दोनों देखने जैसी चीज थी।
प्रश्नकर्ता : एक बार दो-तीन बार चंद्रेश को डाँटा था, तब वह बहुत रोया भी था। लेकिन मुझे ऐसा भी कह रहा था कि ‘अब ऐसा नहीं होगा,’ फिर भी वापस हो ही जाता है।
दादाश्री : हाँ। वैसा होगा तो सही, लेकिन वह तो बार-बार कहते रहना है। हमें कहते रहना है और वह होता रहेगा। कहने से अपना जुदापन रहेगा। तन्मयाकार नहीं होंगे। जैसे पड़ोसी को डाँट रहे हों, उस तरह चलता रहेगा। ऐसे करते-करते खत्म हो जाएगा और सभी फाइलों खत्म हो जाएँगी न!
‘खुद’ अपने आपको को डॉटना (खं-2-६)
१७५
विचारों को देखते रहना है। तुम्हें ऐसा कहना है कि ‘ओह तो तुम सब अंदर बैठे हुए हो?’ इतना सख्त कर्पूर लगाया है, फिर भी घुस गए हो?’ कहना! इसलिए ‘भागो, वर्ना यह कर्पूर है’ कहना, ‘अब आ बनेगी, समझो।’
ब्रह्मचर्य ठीक से पालन होने लगे तो धीरे-धीरे असर होने लगता है। चेहरे पर कुछ तेज आने लगता है। लेकिन अभी भी, चेहरे पर कुछ खास तेज नहीं दिखता। घाटा नहीं दिखता लेकिन तेज भी नहीं दिखता ठीक से!
प्रश्नकर्ता : उसका क्या कारण होगा?
दादाश्री : नीयत! नीयत तेरी खराब है। तेज कहाँ से दिखेगा? वह तो, देखने से पहले ही तेरी नीयत बिगड़ जाती है। कहीं विषय-विकार होने चाहिए? ब्रह्मचारी होने के बाद!
प्रश्नकर्ता : उसके लिए क्या करना चाहिए? यह नीयत ऐसी है तो नीयत सुधारने के लिए क्या करना चाहिए? उसका उपाय क्या है?
दादाश्री : ये जो विचार आ रहे हैं, वह मैं नहीं हूँ। हमें उसे डॉटना चाहिए। क्या तू डॉटता था? चंद्रेश को डॉटता था न? तूने कभी डॉटा है? फिर पुचकारता ही रहेगा तो क्या होगा? उसे डॉटना और, ‘दो थप्पड़ मार दूँगा,’ ऐसे कहना। रोएगा तो चंद्रेश रोएगा। तू डॉट रहा हो और चंद्रेश रोए! ऐसा होगा तब ठिकाने आएगा। वर्ना अणहक्क के विषय-विकार तो नर्कगति में ले जाएँगे। उससे अच्छा तो शादी कर लेना, वह हक्क का तो है! विषय-विकार की इच्छाएँ नहीं होतीं?
प्रश्नकर्ता : कभी-कभी ऐसे विचार आते हैं!
दादाश्री : लेकिन वह कभी-कभी न? यानी कि जैसे रोज खाने का विचार आता है, ऐसा नहीं है न? वह कभी-कभी हाज़िर हो जाता है। किसी दिन बारिश होती है, वैसे?
१७६
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
प्रश्नकर्ता : वह कभी-कभी ही। यानी पहले बहुत आते थे पूरे दिन! वे बंद हो गए।
दादाश्री : और अभी तो कुछ और टाइम बीतने पर तो वह दिशा ही बंद हो जाएगी। जहाँ पर जिस दिशा में हमें जाना था अपनी वह दिशा तय हो जाए, तो उसके बाद पिछली सारी अड़चनें आनी बंद हो जाएँगी और फिर वह दिशा ही बंद हो जाएगी। फिर नहीं आएगा। फिर ऐसा उत्पन्न हो जाएगा कि हमारी तरह रहा जा सकेगा।
प्रश्नकर्ता : आज कल, यह श्री विज्ञन अच्छा रहता है।
दादाश्री : श्री विज्ञन तो बहुत काम निकाल देता है। दादा का निदिध्यासन रहता है न? उस निदिध्यासन से सभी फल मिलते हैं। निदिध्यासन रहे तो इच्छा ही नहीं होगी किसी चीज़ की। भीख ही नहीं रहेगी।
विषय का विचार आए तब भी कहना, 'मैं नहीं हूँ' यह अलग है, उसे डॉटना पड़ेगा। बल्कि तुम्हें चंद्रेश को मार्गदर्शन देना है कि 'ऐसे कर, ऐसे काम कर, ऐसे काम कर।' नहीं कर रहा हो तो जरा कहना पड़ेगा कि 'इन सब के साथ नहीं चलोगे तो, तुम्हारी क्या दशा होगी?' चलानेवाला तो चाहिए या नहीं चाहिए?
प्रश्नकर्ता : चाहिए।
दादाश्री : यानी यह ज्ञान दिया है, तो शुद्धात्मा रहेगा ही। अब इसमें चूकना मत। अब जो कुछ भी आए, वह सबकुछ चंद्रेश का है। इसलिए चंद्रेश के साथ तुझे किच-किच करते रहना। 'तू तो पहले से ही ऐसा है, मुझे कोई लेना-देना नहीं।' तू ऐसा कह देना। 'देख, सीधे चलना, सीधे चलना हो तो चल, वर्ना मैं तो फिर बिल्कुल ही तिरस्कार कर दूँगा' कहना। किंचित्मात्र भी दुःख, वह मेरा स्वरूप नहीं है। किंचित्मात्र भी भीतर उपाधि हो तो वह स्वरूप मेरा नहीं है। दादा ने मुझे जो दिया है,
‘खुद’ अपने आपको को डॉटना (खं-2-६)
१७७
वह निरुपार्थिपद, परमानंदी पद दिया है, वही मेरा स्वरूप है।
थोड़ा-थोड़ा चंद्रेश को भी डॉटता रह। तुझे डॉटनेवाला कोई नहीं है। तुझे कोई डॉटि तो उसे तू काट खाए ऐसा है। तुझे धौल मारने की आदत है न? तो कहना, ‘चंद्रेश, तुझे धौल मारूँगा अब तो! कुछ भी अंदर ऐसा लगे, वह विषय विकारी विचार तो समझ लेना कि यह चंद्रेश है, मैं नहीं। कुछ भी बदलाव हो, वह चंद्रेश है, तुम नहीं। तुम में तो हो ही नहीं सकता न!
प्रश्नकर्ता : खुद के सभी दोष जल्दी निकल जाँ, उसके लिए क्या करना चाहिए?
दादाश्री : भला जल्दी कहीं होता होगा? एक दोष है, जो जल्दी निकाल देने जैसा है। वह तो भ्रांति से यह दोष उत्पन्न होता है, सिर्फ विषय विकार ही। अन्य सभी दोष तो अपने आप टाइम पर ही जाएँगे, एकदम जल्दी नहीं जाएँगे। यह विषय विकार तो सिर्फ एक तरह की भ्रांति है।
प्रश्नकर्ता : ऐसी श्रद्धा बैठ गई है कि इसमें से पार उतर जाएँगे।
दादाश्री : बैठ जाती है। निकल पाओगे ऐसा करते-करते। दस साल बिता दिए न तो फिर ऐसा होने पर अलग ही तरह की हवा आएगी। अभी खाड़ी में हैं इसलिए लगता है ऐसा। खाड़ी में से बाहर निकले तो फिर निश्चित। बीमारी निकली है न, इसलिए घबराहट होगी जरा। लेकिन रौब जमाना, चंद्रेश पर ‘अपने आपको क्या समझता है?’ लेकिन मुझसे पूछकर डॉटना, हाँ! वर्ना ब्लड प्रेशर पर असर हो जाएगा। फिर यहाँ से छूटे कि खुद स्वस्थ। फिर दूसरी उलझनों को उलझन मत मानना। हम इशारा करेंगे तुम्हें, हम जानते हैं कि तुम युवा हो।
साथ मिलकर काम करे तो वहाँ वह भागीदार, जिम्मेदारी से काम करते हैं। भागीदारी में मिलकर वे जो काम करते हैं,
१७८
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
वह उन दोनों को भुगतना पड़ता है। लेकिन यदि अलग रहकर करें न, तो हर एक की अपनी जिम्मेदारी। इसलिए तुम अलग रहकर करो, ताकि फिर सिर्फ चंद्रेश को ही भुगतना पड़े। तुम्हें नहीं भुगतना पड़ेगा और वह तो तुम्हें और चंद्रेश को दोनों को भुगतना पड़ेगा। है प्रकृति का, जब ऐसा नहीं रहेगा कि आत्मा ने किया है, तब ठिकाने आएगा।
पूरा करो प्रकृति को पटाकर
प्रश्नकर्ता : हर एक को खुद की फाइल देखकर करना चाहिए। हर एक की फाइल को अलग-अलग दवाई माफिक आती है। एक सी दवाई माफिक नहीं आती। मेरी फाइल को डॉटने की ऐसी कड़ी दवाई माफिक नहीं आती।
दादाश्री : हाँ, किसी को प्रेशर बढ़ जाता है, किसी को कुछ ऐसा हो जाता है।
प्रश्नकर्ता : तो ये सब एक दूसरे का देख-देखकर करने जाते हैं।
दादाश्री : नहीं! देख-देखकर मत करना। 'मुझसे पूछना वह।' ऐसा मैंने कहा है। अरे, कोई मत करना। गेटआउट-गेटआउट, कहोगे तो ब्लडप्रेशर बढ़ जाएगा। इसलिए तुम्हें तो अरीसे (दर्पण) में देखकर कहना है कि 'भाई, मैं हूँ तेरे साथ। तू घबराना मत', कहना। उससे प्रेशर नहीं बढ़ेगा। निश्चय चाहिए इसमें, निश्चय।
प्रश्नकर्ता : आप जो प्रयोग बताते हैं न, अरीसे (दर्पण) में सामायिक करने का। फिर प्रकृति के साथ बातचीत करना, वे सभी प्रयोग बहुत अच्छे लगते हैं। फिर दो-तीन दिन अच्छे से होता है, उसके बाद उसमें कमी आ जाती है।
दादाश्री : कमी आ जाए तो फिर वापस नए सिर से करना। पुराना हो जाए तो कमी आ ही जाती है। पुद्गल का
‘खुद’ अपने आपको को डॉटना (खं-2-६)
१७९
स्वभाव है कि पुराना हो जाए तो बिगड़ता जाता है। फिर वापस नई सेटिंग करके रख देनी चाहिए।
प्रश्नकर्ता : अर्थात् उस प्रयोग द्वारा ही कार्य सिद्ध हो जाना चाहिए। ऐसा नहीं होता और बीच में ही बंद हो जाता है प्रयोग।
दादाश्री : ऐसा करते-करते सिद्ध होगा, एकदम से नहीं होगा।
प्रश्नकर्ता : वह प्रयोग अधूरा हो और फिर दूसरा प्रयोग करते हैं। वह अधूरा छोड़ देते हैं। कोई तीसरा प्रयोग बताया। वह भी अधूरा! मतलब सभी अधूरे रहते हैं।
दादाश्री : वह तुम वापस पूरा कर लेना, धीरे-धीरे एक-एक को लेकर। अरिसे का प्रयोग पूरी तरह से नहीं किया?
प्रश्नकर्ता : नहीं! जब भी करते हैं, उतना लाभ होता है। लेकिन उसके बाद जुदापन रहना ही चाहिए, इन भाई को जैसा अलग देखता हूँ, वैसा परमानेन्ट फिर नहीं देख पाता। प्रकृति को जानते जरूर हैं कि अलग है।
दादाश्री : कितना डॉटा था उसने। रोना आ गया तब तक डॉटता रहा। तो बोलो अब कितना अलग हो गया?! तूने डॉटा है, ऐसा कभी? रो दिया हो वैसे?
प्रश्नकर्ता : रोया नहीं था, लेकिन ढीला पड़ गया था।
दादाश्री : ढीला पड़ गया था। तू डॉटता है तो सीधा हो जाता है क्या! तो फिर वह प्रयोग कितना कीमती प्रयोग है। लोगों को आता नहीं है। देखो न, यह भाई बैठा रहता है घर पर, लेकिन ऐसा प्रयोग नहीं करता।
प्रश्नकर्ता : हम भी बैठे रहते हैं, तो इसमें कमी है या फिर प्रयोग का महत्त्व नहीं समझे? इसमें हकीकत क्या है?
दादाश्री : उतना उल्लास कम है।
❖ ❖ ❖ ❖ ❖
[ ७ ]
पछतावे सहित प्रतिक्रमण
प्रत्यक्ष आलोचना से, नकद मुक्ति!
श्री विज्ञन से तो सबकुछ ठीक हो ही जाता है न!
प्रश्नकर्ता : कभी अगर मेरी दृष्टि पड़ जाती है न, तब मुझे लगता है कि ‘अरेरे! यह दृष्टि क्यों पड़ी?! प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। चीढ़ मचती है।
दादाश्री : लेकिन चीढ़ मचती है न, वह तो ऐसा है कि दृष्टि पड़ जाती है। तुम्हें डालनी नहीं है फिर भी पड़ जाती है। इसलिए पुरुषार्थ करना है और प्रतिक्रमण करने की भी जरूरत है।
प्रश्नकर्ता : कुछ चीजों पर इतना गुस्सा आता है कि, ऐसा लगता है कि ऐसा क्यों हो रहा है? समझ में नहीं आता।
दादाश्री : पिछली बार प्रतिक्रमण नहीं किए थे, इसलिए इस बार वापस दृष्टि जाती है। अब प्रतिक्रमण करोगे तो, अगले जन्म में फिर से नहीं जाएगी।
प्रश्नकर्ता : कभी-कभी तो प्रतिक्रमण करने में चिढ़ मचती है। एकदम से इतने सारे करने पड़ते हैं।
दादाश्री : हाँ, यह अप्रतिक्रमण का दोष है। उस समय प्रतिक्रमण नहीं किए, इसलिए आज यह हुआ। अब प्रतिक्रमण करने से वापस दोष खड़ा नहीं होगा।
पछतावे सहित प्रतिक्रमण (खं-2-७)
१८१
प्रश्नकर्ता : लेकिन कई बार तो बहुत सारे प्रतिक्रमण करते हैं और फिर से प्रतिक्रमण करना पड़े तो बहुत गुस्सा आता है कि ऐसा क्यों हो जाता है?
दादाश्री : जब अंदर बिगड़ जाए, उस समय तो प्रतिक्रमण करके धो देना चाहिए और फिर रूबरू आकर दादा से कह देना चाहिए कि 'इस तरह हमारा मन बहुत बिगड़ गया था। दादा, आपसे कुछ छिपाकर नहीं रखना है।' ताकि सब खत्म हो जाए। यहीं के यहीं दवाई दे देंगे। अन्य किसी के प्रति दोष हुआ होगा न तो हम धो देंगे।
जहाँ इन्टरेस्ट, वहाँ करो प्रतिक्रमण
प्रश्नकर्ता : बार-बार दृष्टि आकृष्ट हो जाती है, एक ही जगह पर दृष्टि आकृष्ट होती है, वह तो इन्टरेस्ट(रुचि) हो तभी न! क्या ऐसा नहीं कह सकते?
दादाश्री : इन्टरेस्ट ही है न? इन्टरेस्ट के बिना तो दृष्टि आकृष्ट होगी ही नहीं न!
प्रश्नकर्ता : अंदर रुचि है तो सही। दृष्टि आकृष्ट हो जाए तो उसके लिए प्रतिक्रमण होता है। फिर रात होते ही वापस दृष्टि उधर ही जाती है। रुचि हो जाए, तो उसका प्रतिक्रमण हो जाता है, वह चेप्टर(प्रकरण) खत्म हो जाता है। वापस पाँच-दस मिनट तक असर रहता है। तब लगता है कि यह क्या गड़बड़ है?
दादाश्री : उसे वापस धो देना चाहिए। इतना ही, बस।
प्रश्नकर्ता : बस इतना ही? बाकी मन में कुछ नहीं रखना है?
दादाश्री : यह माल हमने भरा है और जिम्मेदारी अपनी है। इसलिए हमें देखते रहना है, धोने में कमी नहीं रह जानी चाहिए।
१८२
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
प्रश्नकर्ता : कपड़ा धुल चुका है, ऐसा किसे कहेंगे?
दादाश्री : हमें खुद को ही पता चल जाएगा कि मैंने धो दिया। प्रतिक्रमण करते हैं, उस पर से।
प्रश्नकर्ता : क्या अंदर खेद रहना चाहिए?
दादाश्री : खेद तो रहना ही चाहिए न? खेद तो, जब तक इसका निबेड़ा नहीं आ जाए, तब तक खेद तो रहना ही चाहिए। हमें तो देखते रहना है। खेद रखता है या नहीं, ऐसा हमें अपना काम करना है, वह अपना काम करेगा।
प्रश्नकर्ता : यह सब बहुत गाढ़ है। उसमें कुछ-कुछ फर्क पड़ता जा रहा है।
दादाश्री : जैसा दोष भरा है वैसा निकलेगा। लेकिन वह बारह साल में या दस साल-पाँच साल में सब खाली हो जाएगा। सभी टंकियाँ साफ कर देगा। फिर शुद्ध! फिर मजे करना!
प्रश्नकर्ता : अगर एक बार बीज डल चुका हो तो वह रूपक में तो आएगा ही न?
दादाश्री : बीज डल ही जाता है न! वह रूपक में आएगा, लेकिन जब तक वह जम नहीं गया है, तब तक कम-ज्यादा हो सकता है। मतलब मरने से पहले वह साफ हो सकता है।
इसलिए हम विषय के दोषवाले से कहते हैं न कि विषय के दोष हुए हों, अन्य दोष हुए हों, तो उसे कहते हैं कि, 'रविवार को तू उपवास करना और पूरे दिन वही सोचकर, सोच-सोच करके उसे धोते रहना। आज्ञापूर्वक इस तरह करे न तो कम हो जाएगा!
विषय से संबंधित सामाजिक-प्रतिक्रमण...
प्रश्नकर्ता : विषय-विकार से संबंधित सामाजिक-प्रतिक्रमण किस तरह करने हैं?
पछतावे सहित प्रतिक्रमण (खं-2-७)
१८३
दादाश्री : अभी तक जो गलतियाँ हो चुकी हैं, उनके प्रतिक्रमण करने हैं। भविष्य में ऐसी गलतियाँ नहीं हों, ऐसा निश्चय करना है।
प्रश्नकर्ता : जो कुछ गलतियाँ हो गई हैं, वे हमें बार-बार सामायिक में दिखती रहें तो?
दादाश्री : जब तक दिखते रहें, तब तक उनके लिए क्षमा माँगनी चाहिए, क्षमापना लेनी चाहिए। उस पर 'वह' पछतावा करना चाहिए, प्रतिक्रमण करना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : अभी सामायिक में बैठे और वह दिखा, फिर भी बार-बार क्यों आते हैं?
दादाश्री : वे तो आएँगे न! अंदर परमाणु होंगे तो आएँगे न! उसमें हमें क्या हर्ज है?
प्रश्नकर्ता : ये आते हैं, इसका मतलब यह कि अभी तक धुला नहीं है।
दादाश्री : नहीं, वह माल तो अभी बहुत समय तक रहेगा। अभी तो दस-दस साल तक रहेगा, लेकिन तुम्हें सारा निकलना है।
प्रश्नकर्ता : यह जो दृष्टि चली जाती है, उसके लिए क्या करना चाहिए? मतलब यों तो पता चल जाता है कि हम यहाँ उपयोग चूक गए, हमें 'यह 'स्त्री' है,' वह 'स्त्री' दिखनी ही नहीं चाहिए न?
दादाश्री : स्त्री दिखे, अंदर विचार आएँ, तब भी उन सब के लिए प्रतिक्रमण करने हैं। तुझे चंद्रेश से कहना है कि प्रतिक्रमण कर! वह कोई बड़ी बात नहीं है।
विषयों में सुखबुद्धि किसे?
प्रश्नकर्ता : जब तक पाँच इन्द्रियों के विषयों में सुखबुद्धि है, तब तक निकाल नहीं होगा न?
१८४
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : मैंने आप सब को जो आत्मा दिया है, उसमें जरा सी भी सुखबुद्धि नहीं है। यह सुख उसने कभी चखा ही नहीं है। वह जो सुखबुद्धि है, वह तो अहंकार को है।
सुखबुद्धि रहे, उसमें कोई हर्ज नहीं है। सुखबुद्धि आत्मा की चीज नहीं है, वह पुद्गल की चीज है। तुम्हें कोई भी चीज दी जाए, तब उसमें आपको सुखबुद्धि उत्पन्न होती है। फिर से वही चीज और अधिक दी जाए, तब उसमें दुःखबुद्धि भी उत्पन्न हो सकती है। ऐसा आपको पता चलता है या नहीं?
प्रश्नकर्ता : हाँ, ऊब जाते हैं फिर।
दादाश्री : अतः वह पुद्गल है। पूरण-गलनवाली चीज है। यानी वह चीज हमेशा के लिए नहीं है, टेम्परेरी एडजस्टमेंट है। सुखबुद्धि अर्थात् यह आम अच्छा हो और उसे फिर से माँगें, तो उससे ऐसा नहीं माना जा सकता कि उसमें सुखबुद्धि है। वह तो देह का आकर्षण है।
प्रश्नकर्ता : देह का और जीभ का आकर्षण बहुत रहा करता है।
दादाश्री : वह जो आकर्षण रहा करता है, उसमें सिर्फ जागृति रखनी है। हमने आपको जो वाक्य दिया है न कि 'मन-वचन-काया की तमाम संगी क्रियाओं से मैं बिल्कुल असंग ही हूँ।' वह जागृति रहनी चाहिए, और वास्तव में एकजेक्टली ऐसा ही है। वह सब पूरण-गलन है। आप अगर यह जागृति रखोगे तो आपको कर्म बंधन नहीं होगा।
प्रश्नकर्ता : अगर वही नहीं रह सके तो वह हमारे चारित्र का दोष है ऐसा मानें?
दादाश्री : वैसा क्रमिक मार्ग में होता है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन उस चारित्रमोह के कारण ढीलापन रहता है?
पछतावे सहित प्रतिक्रमण (खं-2-७)
१८५
दादाश्री : क्रमिक मार्ग में वह ढीलापन कहलाता है। उसके लिए तुम्हें उपाय करना पड़ता है। इसमें (अक्रम में) तुम्हारे लिए यह ढीलापन नहीं कहलाता। इसमें तुम्हें जागृति ही रखनी है। हमने जो आत्मा दिया है, वह जागृति ही है।
प्रश्नकर्ता : जागृति नहीं रहे, तभी राग होता है न?
दादाश्री : नहीं ऐसा नहीं है। अब तुम्हें राग होता ही नहीं है। यह जो होता है, वह आकर्षण है।
प्रश्नकर्ता : वह कमजोरी नहीं मानी जाएगी?
दादाश्री : नहीं, कमजोरी नहीं मानी जाएगी। उसका और आत्मा का कोई लेना-देना नहीं है। सिर्फ इतना ही है कि वह तुम्हें खुद का सुख नहीं आने देगा। इसलिए एक-दो जन्म अधिक करवाएगा। उसका भी उपाय है। अपने यहाँ ये सब लोग जो सामायिक करते हैं, उस सामायिक में उस विषय को रखकर खुद ध्यान करे तो वह विषय विलीन होता जाता है, खत्म हो जाता है। जो-जो आपको विलीन कर देना हो, उसे यहाँ पर विलीन किया जा सकता है।
प्रश्नकर्ता : ऐसा कुछ हो, तब वह काम का है न!
दादाश्री : है। यहाँ सभी कुछ है। यहाँ (सामायिक में) तुम्हें सभी कुछ बताएगा। तुम्हें किसी जगह पर जीभ का स्वाद बाधक हो, तो उसी को सामायिक में रखो। और जैसा बताएँ उस अनुसार उसे देखते रहो। सिर्फ देखने से ही वे सब गॉटें विलय हो जाएँगी।
हे गॉटों! हम नहीं या तुम नहीं
विचार मन में से आते हैं और मन गॉटों से बना हुआ है। जिसके विचार अधिक आते हैं, वे गॉटें बड़ी होती हैं! वस्तुस्थिति में विषय की जो गॉट है, वह जैसे पिन को लोहचुंबक आकर्षित करता है, वैसे ही इसमें आकर्षण खड़ा होता है। लेकिन हमें यदि
१८६
समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
आत्मा बहुत अधिक ध्यान में रहे तो नहीं छूएगा। लेकिन इंसान को इतनी जागृति ठीक से रह नहीं पाती न?
प्रश्नकर्ता : यह जो दो पत्तियों की अवस्था में ही उखाड़ने का विज्ञान है, कि ‘विषय की गाँठ फूटे, तब दो पत्तियों से ही उखाड़ दो।’ तो जीत सकते हैं न?
दादाश्री : हाँ, लेकिन विषय ऐसी चीज़ है कि यदि उसमें एकाग्रता हो जाए तो आत्मा को भूल जाए। इसलिए यह गाँठ इस प्रकार से हानिकारक है, वह सिर्फ़ इसीलिए कि जब वह गाँठ फूटती है तब एकाग्रता हो जाती है। एकाग्रता हो जाए तब विषय कहलाता है। एकाग्रता हुए बगैर विषय कहलाएगा ही नहीं न! वह गाँठ फूटे, तब इतनी अधिक जागृति रहनी चाहिए कि विचार आते ही उखाड़कर फेंक दे, तो उसे वहाँ पर एकाग्रता नहीं होगी। यदि एकाग्रता नहीं है तो वहाँ पर विषय है ही नहीं, तो वह गाँठ कहलाएगी जब वह गाँठ पिघलेगी तब काम होगा।
प्रश्नकर्ता : मतलब अगर वह गाँठ विलय हो जाए तो फिर वह आकर्षण का व्यवहार ही नहीं रहेगा न?
दादाश्री : वह व्यवहार ही बंद हो जाएगा। पिन और लोहचुंबक का संबंध ही बंद हो जाएगा। वह संबंध ही नहीं रहेगा। उस गाँठ की वजह से यह व्यवहार जारी है न! अब, ऐसा ध्यान में रहना बहुत मुश्किल है कि विषय स्थूल स्वभावी है और आत्मा सूक्ष्म स्वभावी है, इसलिए एकाग्रता हुए बगैर रहेगी ही नहीं न! वह तो ज्ञानीपुरुष का काम है, अन्य किसी का काम ही नहीं! बाकी इसमें हाथ डालना ही मत, बना वह जल जाएगा। ज्ञानीपुरुष तो भय टालने के लिए आपसे कहते हैं। पूरा जगत् जैसा समझता है, आत्मा वैसा नहीं है। आत्मा तो जैसा महावीर भगवान ने जाना है वैसा है, ये दादा जैसा बताते हैं, आत्मा वैसा है।
ये गाँठें, वे तो आवरण हैं! जब तक ये गाँठें हैं तब तक
पछतावे सहित प्रतिक्रमण (खं-2-७)
१८७
आत्मा का स्वाद नहीं आने देंगी। इस ज्ञान के बाद अब गॉटें धीरे-धीरे विलय होती जाएँगी, बहेंगी नहीं अब। फिर भी कौन सी गॉटें परेशान करती है, कौन सी दुःख देती हैं, उतनी ही देखनी हैं। सभी गॉटें नहीं देखनी हैं। वह तो, जैसे इस मार्केट में सभी सब्जियाँ पड़ी रहती हैं, लेकिन उनमें से कौन सी सब्जी पर अपनी दृष्टि जाती रहती है, उसी का झंझट है, अंदर वह गॉठ बड़ी है! तेरी कौन-कौन सी गॉठ बड़ी है?
प्रश्नकर्ता : विषय की एक बड़ी है, फिर लोभ की आती है, फिर मान-अपमान की आती है। फिर कपट में तो, खुद का बचाव, स्व रक्षण करने के लिए कपट खड़ा होता है।
दादाश्री : अन्य किसी के लिए कपट नहीं है न?
प्रश्नकर्ता : अपमान का भय हो या खुद की गलती हो तब।
दादाश्री : हाँ, लेकिन इसके अलावा अन्य किसी चीज़ के लिए कपट नहीं है न? ये सभी गॉटें कपटवाली ही होती हैं, कपट करे तभी इनका फल मिलता है! सभी गॉटें कपटवाली होती हैं।
प्रश्नकर्ता : वह कैसे?
दादाश्री : मान भी कपट करने से मिलता है, अपमान भी कपट करने से मिलता है, विषय भी कपट के बिना नहीं मिलता।
विकारी विचार आते हैं क्या?
प्रश्नकर्ता : ऐसा होता है अभी भी। वे परिणाम खड़े होते हैं, लेकिन खुद की पकड़ नहीं होती है उसमें। लेकिन अभी भी जो ऐसे परिणाम आ जाते हैं, वे क्या हैं?
दादाश्री : क्यों मांसाहार के विचार नहीं आते? ऐसा क्यों?