समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
विचार होते हैं, चित्त का हरण शायद न भी हुआ हो। कई बार चित्त गया हो लेकिन विचार में न भी हो। ऐसा हो सकता है और नहीं भी हो सकता।
मुक्त दशा का शर्मामीटर
तुझे ऐसा अनुभव है कि जब विषय में चित्त जाता है, तब ध्यान ठीक से नहीं रह पाता?
प्रश्नकर्ता : चित्त यदि जरा भी विषय के स्पंदनों को टच करके रहे तो कितने ही समय तक तो खुद की स्थिरता नहीं रहने देता और चित्त उसे छूकर वापस अलग हो गया हो तो खुद की स्थिरता नहीं जाती। वह यदि एक ही बार यों ‘टच’ हुआ हो, वह भी स्थूल में नहीं लेकिन सूक्ष्म में भी हुआ हो, तो भी वह कितने ही समय तक हिलाकर रख देता है।
दादाश्री : हमारा चित्त कैसा होगा?! वह कभी भी जगह से हटा ही नहीं है! हम बोलते हैं तब निरंतर यों मुरली की तरह डोलता रहता है। तब जाकर चित्त की प्रसन्नता उत्पन्न होती है। वर्ना मुँह खिंचा हुआ रहता है, जुबान भी खिंची हुई रहती है। लोग तो आँखें पढ़कर ही बता देते हैं कि ‘यह खराब दृष्टिवाला है।’ जिसकी जहरीली दृष्टि हो उसके लिए भी लोग बता देते हैं कि ‘इसकी आँखों में जहर है।’ उसी तरह यह भी समझ सकते हैं कि आँखों में वीतरागता है। लोग सबकुछ समझ सकते हैं, लेकिन दाल-चावल-रोटी-सब्जी खाकर सोचेंगे तो!! लेकिन खाकर सो जाएँ तो नहीं समझ सकेंगे।
मैं क्या कहना चाहता हूँ कि पूरी दुनिया में घूमो। लेकिन यदि कोई भी चीज आपके चित्त का हरण नहीं कर सके तो आप स्वतंत्र हो। कितने ही सालों से मैंने अपने चित्त को देखा है कि कोई चीज इसे हरण नहीं कर सकती इसलिए फिर मैं अपने आप समझ गया कि, ‘मैं बिल्कुल संपूर्ण स्वतंत्र