समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
विचार होते हैं, चित्त का हरण शायद न भी हुआ हो। कई बार चित्त गया हो लेकिन विचार में न भी हो। ऐसा हो सकता है और नहीं भी हो सकता।
मुक्त दशा का शर्मामीटर
तुझे ऐसा अनुभव है कि जब विषय में चित्त जाता है, तब ध्यान ठीक से नहीं रह पाता?
प्रश्नकर्ता : चित्त यदि जरा भी विषय के स्पंदनों को टच करके रहे तो कितने ही समय तक तो खुद की स्थिरता नहीं रहने देता और चित्त उसे छूकर वापस अलग हो गया हो तो खुद की स्थिरता नहीं जाती। वह यदि एक ही बार यों ‘टच’ हुआ हो, वह भी स्थूल में नहीं लेकिन सूक्ष्म में भी हुआ हो, तो भी वह कितने ही समय तक हिलाकर रख देता है।
दादाश्री : हमारा चित्त कैसा होगा?! वह कभी भी जगह से हटा ही नहीं है! हम बोलते हैं तब निरंतर यों मुरली की तरह डोलता रहता है। तब जाकर चित्त की प्रसन्नता उत्पन्न होती है। वर्ना मुँह खिंचा हुआ रहता है, जुबान भी खिंची हुई रहती है। लोग तो आँखें पढ़कर ही बता देते हैं कि ‘यह खराब दृष्टिवाला है।’ जिसकी जहरीली दृष्टि हो उसके लिए भी लोग बता देते हैं कि ‘इसकी आँखों में जहर है।’ उसी तरह यह भी समझ सकते हैं कि आँखों में वीतरागता है। लोग सबकुछ समझ सकते हैं, लेकिन दाल-चावल-रोटी-सब्जी खाकर सोचेंगे तो!! लेकिन खाकर सो जाएँ तो नहीं समझ सकेंगे।
मैं क्या कहना चाहता हूँ कि पूरी दुनिया में घूमो। लेकिन यदि कोई भी चीज आपके चित्त का हरण नहीं कर सके तो आप स्वतंत्र हो। कितने ही सालों से मैंने अपने चित्त को देखा है कि कोई चीज इसे हरण नहीं कर सकती इसलिए फिर मैं अपने आप समझ गया कि, ‘मैं बिल्कुल संपूर्ण स्वतंत्र
स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता (खं-2-८)
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हो चुका हूँ।' मन में भले ही कैसे भी खराब विचार आएँ लेकिन उसमें हर्ज नहीं है, लेकिन चित्त का हरण तो होना ही नहीं चाहिए।
भटकती वृत्तियाँ चित्त की
चित्त वृत्तियाँ जितनी भटकेंगी, उतना ही आत्मा को भटकना पड़ेगा। चित्त वृत्ति जिस जगह जाएगी, उसी जगह आपको भी जाना पड़ेगा। चित्त वृत्ति नक्शा बना देती है। अगले जन्म के लिए आने-जाने का नक्शा बना देती है। फिर उस नक्शे के अनुसार हमें घूमना पड़ता है, तो कहीं-कहीं घूम आती होंगी चित्त वृत्तियाँ?
प्रश्नकर्ता : लेकिन चित्त भटके तो उसमें हर्ज क्या है?
दादाश्री : चित्त जैसी प्लानिंग (योजना) करेगा, उस अनुसार हमें भटकना पड़ेगा। इसलिए जिम्मेदारी अपनी है, जितना भी भटकता रहेगा उसकी!
चित्त चेतन है, वह जहाँ-जहाँ चिपका, वहाँ-वहाँ भटकते, भटकते, भटकते ही रहना पड़ेगा!
प्रश्नकर्ता : चित्त हर कहीं नहीं चिपक जाता, लेकिन अगर एक जगह चिपक जाए तो क्या वह पहले का हिसाब है?
दादाश्री : हाँ, हिसाब है तभी चिपकता है। लेकिन अब हमें क्या करना चाहिए? पुरुषार्थ वह कि जहाँ हिसाब हो वहाँ पर भी नहीं चिपकने दे। चित्त जाए लेकिन धो दिया तो, तब तक वह अब्रह्मचर्य नहीं माना जाता। लेकिन अगर चित्त जाए और धोए नहीं तो वह अब्रह्मचर्य कहलाता है। इसीलिए कहा है न, 'इसलिए सावधान रहना मन-बुद्धि, निर्मल रहना चित्तशुद्धि।' मन-बुद्धि को सावधान करते हैं। अब हमें चित्तवृत्ति निर्मल रखने के लिए क्या करना पड़ेगा? आज्ञा में रहना पड़ेगा। हमारा चित्त संपूर्णतः शुद्ध रहता है, इसलिए फिर कुछ छूता भी नहीं है और बाधा
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भी नहीं डालता। आप जैसे-जैसे आज्ञा में रहते जाओगे, वैसे-वैसे पहले का जो छू चुका होगा, जैसे कि चंद्र ग्रहण लिखा होता है कि आठ बजे से एक बजे तक, मतलब आठ बजे शुरू होता है और फिर एक बजे के बाद फिर से चंद्र ग्रहण नहीं होता। उसी तरह आज्ञा में रहा करो ताकि जो ग्रहण हो गया है, वह छूट जाए और नया जोखिम उड़ जाए तो फिर कोई परेशानी नहीं रहेगी न!
चित्त की पकड़, छूटती है ऐसे...
जो चित्त को डिंगा दे, वे सभी विषय हैं। ज्ञान से बाहर जिस-जिस चीज़ में चित्त जाता है, वे सभी विषय हैं।
प्रश्नकर्ता : आपने कहा कि भले ही कैसे भी विचार आएँ, उसमें हर्ज नहीं है लेकिन चित्त वहाँ पर जाए, उसमें हर्ज है।
दादाश्री : हाँ, चित्त का ही झंझट है न! चित्त भटकता है, वही झंझट है न! विचार तो चाहे कैसे भी हों, उसमें हर्ज नहीं है लेकिन इस ज्ञान के मिलने के बाद चित्त विचलित नहीं होना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : यदि कभी ऐसा हो जाए तो उसका क्या?
दादाश्री : हमें वहाँ पर फिर ऐसा पुरुषार्थ करना पड़ेगा कि 'अब ऐसा नहीं होगा'। पहले जितना जाता था, उतना ही अभी भी जाता है?
प्रश्नकर्ता : नहीं, उतना स्लिप नहीं होता, फिर भी पूछ रहा हूँ।
दादाश्री : नहीं, लेकिन चित्त तो जाना ही नहीं चाहिए। मन में भले ही कैसे भी विचार आएँ, लेकिन उसमें हर्ज नहीं है। उन्हें हटाते रहो। उसके साथ बातचीत का व्यवहार करो कि फलाना मिलेगा तो वह सब कब करोगे? उसके लिए गाड़ियाँ, मोटरें वगैरह कहाँ
स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता (खं-2-८)
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से लाएँगे? या फिर सत्संग की बात करेंगे तो मन वापस नये विचार दिखाएगा।
पहले जिन पर्यायों का खूब वेदन किया हो, अभी वे अधिक आते हैं तब चित वहीं चिपका रहता है। जैसे-जैसे वह चिपकाव, पकड़ धुलती जाएगी, वैसे-वैसे फिर चित वहाँ पर ज्यादा नहीं रहेगा। चिपकेगा और अलग हो जाएगा। अटकण आए न तो, वहीं चिपका रहता है। तब हमें क्या कहना चाहिए? तुझे जितने नाच करने हों, उतने कर। अब 'तू जेय और मैं ज्ञाता' इतना कहते ही वह मुँह फेर देगा। वह नाचेंगे तो जरूर, लेकिन उनका टाइम होगा उतनी ही देर नाचेंगे। फिर चले जाएँगे। आत्मा के सिवा इस जगत् में और कुछ भी अच्छा नहीं है। यह तो, पहले जिससे परिचय किया हुआ हो, पहले का वह परिचय अभी गड़बड़ करवाता है।
चित अधिक से अधिक किस में फँसता है? विषय में! और जितना चित फँसा, उतना ही ऐश्वर्य टूट गया। ऐश्वर्य टूटा कि जानवर बन गया। अतः विषय ऐसी चीज़ है कि उसी से सारा जानवरपन आया है। मनुष्य में से जानवरपन, विषय के कारण ही आया है। फिर भी हम क्या कहते हैं कि यह तो पहले का भरा हुआ माल है, वह निकलेगा तो सही लेकिन अगर वापस नये सिरे से संग्रह न करो तो वह उत्तम कहलाएगा।
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[ १ ]
‘फाइल’ के सामने सख्ती
विकारी दृष्टि के सामने ढाल
प्रश्नकर्ता : वह यदि मोह का जाल डाले तो उससे कैसे बचें?
दादाश्री : तुम्हें नजर ही नहीं मिलानी है। तुम्हें पता है कि यह जाल खींच लेगा, तो उसके साथ नजर ही नहीं मिलानी है।
प्रश्नकर्ता : लेडीज के साथ नजर से नजर नहीं मिलानी चाहिए?
दादाश्री : हाँ, नजर से नजर नहीं मिलानी चाहिए और जहाँ तुम्हें लगे कि यहाँ तो फँसाव ही है, तो वहाँ पर तो उससे मिलना ही नहीं चाहिए। तुम्हें तुरंत ऐसा पता चल जाएगा न कि यह बुरी है?
प्रश्नकर्ता : व्यवहार में जो अपने जान-पहचानवाले होते हैं, वे आकर हम से बात करें तो उसका हमें समभाव से निकाल करना चाहिए, लेकिन उसमें उसकी दृष्टि खराब हो तो हमें क्या करना चाहिए?
दादाश्री : तो तुम्हें नीची नजर रखकर सारा काम करना चाहिए। छोटी उम्र के हो, इसमें और कुछ नहीं समझते, उसके सामने ऐसा कर देना चाहिए कि और उसे ऐसा ही लगे कि यह
‘फाइल’ के सामने सख्ती (खंड-2-९)
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कुछ समझता ही नहीं है, तो फिर फिर वह चली जाएगी। तुझे कोई ऐसी मिल जाए, तो वह ऐसा समझेगी कि यह सब समझ गया है? क्या तू ऐसा बताने जाता है? वह सब बेवकूफी कहलाएगी।
व्यापारी का बेटा व्यापार करने बैठता हो तो सौ रुपये की चीज़ की कीमत सौ रुपये के बदले अठारसी रुपये बोल दे तो फिर वह ग्राहक कहेगा, ‘माल बताओ।’ तब वह लड़का समझ जाता है कि बोलने में मेरी गलती हो गई है, तो फिर वह क्या करेगा? उन्हें कहेगा कि, ‘ऐसा माल छियासी में मिलेगा और दूसरा छियासठवाला भी है और एक सौ पाँच रुपयेवाला भी है’ ऐसा सब बोलने से गलतियाँ सब खत्म हो जाएँगी और वह समझ जाएगा कि यह बात पूरी अलग है। उसी तरह इसमें भी सामनेवाले इंसान को पता चल जाता है कि यह माहिर नहीं है। हम माहिर हैं या नहीं, ऐसा वह एक बार देख लेती है। ऐसा पता चल जाए कि माहिर नहीं है, तो राह पर आ जाएगा, फिर वह छोड़ देगी और बेवकूफ बन जाए तो उसका सब चला जाएगा। वह फँसा देगी। यदि अपना मन परेशान हो जाए तो हमें बुद्धि का इस्तेमाल करना है कि ‘तुझ में अकल नहीं है।’ ऐसा कहेंगे तो वह अपने आप ही भाग जाएगी लेकिन अगर भाग गई, तो फिर दवाई लगानी पड़ेगी। इस तरह भगाने में फायदा नहीं है, लेकिन वह तो अगर और कोई चारा नहीं हो तो। अपना मन परेशान हो जाए, तब ऐसा करना पड़ता है। वनाँ ऐसे के साथ नजर ही नहीं मिलाएँ तो बहुत हो गया। सब से अच्छा नजर ही नहीं मिलानी चाहिए। नीचे देखकर चलना, आगे-पीछे हो जाना, वे सब सरल मार्ग है।
आकर्षण में बह मत जाना, जहाँ आँखें आकृष्ट हों, वहाँ से दूर ही रहना। जहाँ सीधी आखें हों, ऐसी सब जगह व्यवहार करना लेकिन जहाँ आँखें आकर्षित होने लगेँ, वहाँ पर जोखिम है, लाल बत्ती है। किसी के भी साथ नजरें मिलाकर बात मत करना, नजरें नीची रखकर ही बात करनी चाहिए। दृष्टि से ही बिगड़ता है। उस
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दृष्टि में विष होता है और फिर विष चढ़ जाता है। अतः यदि दृष्टि गड़ गई हो और नज़र खींच गई हो तो तुरंत प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। इसमें तो सावधान ही रहना चाहिए। जिसे यह जीवन बिगड़ने नहीं देना है, उसे बिवेयर रहना चाहिए। जान-बूझकर कोई कुएँ में गिरता है क्या?!
विकारी चंचलता
अपने यहाँ कोई चाय पीए, खाए, सबकुछ करे फिर भी बाहर धर्मध्यान रहता है और अंदर शुक्लध्यान रहता है। किसी को ही, निकाचित् कर्मवाला हो, उसी का मन विकारी हो जाता है, तब वह फिसल गया कहलाता है। निकाचित् कर्मवाला कोई हो सकता है, इसमें। उसे विकारी विचार आते हैं। वह चंचलतावाला होता है। चंचल हो चुका होता है। चंचल को आप पहचानते हो या नहीं पहचानते? इधर देखता है, उधर देखता है। उसे कहें कि 'भाई, क्यों ऐसे हो रहे हो।' तो वह इसलिये कि विकारी विचार आया इसलिये चंचल हो गया और इस कारण से धर्मध्यान और शुक्लध्यान दोनों चले जाते हैं। बाकी अपने महात्माओं को धर्मध्यान और शुक्लध्यान दोनों रहते हैं। फिर भले ही खाए-पीए, ओढ़कर सो जाए, लेटकर सो जाए।
ऐसे निकाचित् कर्मवाले को हमसे पूछना चाहिए कि 'हमें क्या करना चाहिए? अब कौन सी दवाई लगाएँ?' बहुत गहरे घाव हो जाते हैं। ऐसे कर्मवाले हों तो हमें पूछने में हर्ज नहीं है। वह अकेले में पूछे तो हम दवाई बता देंगे कि यों दवाई लगाना ताकि घाव भर जाएँ।
फाइल बन गई, वहँ...
प्रश्नकर्ता : एक ही स्त्री से संबंधित विचार बार-बार आएँ तो क्या ऐसा समझना है कि उसके प्रति राग है?
दादाश्री : वह बाँधी हुई फाइल है। अब, अगर विचार आएँ
‘फाइल’ के सामने सख्ती (खंड-2-९)
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वह फिर चले जाएँ और उसके बाद कुछ भी नहीं हो तो इसका मतलब उसे अभी तक फाइल नहीं बनाया है, अभी तक नई फाइल नहीं लाए हो। जबकि जिसके बारे में बार-बार विचार आते रहें, वह तो बाँधी हुई फाइल है, कितने ही केस हैं अंदर।
प्रश्नकर्ता : पहले कभी भी मिले नहीं हों, पहचान नहीं हो, सिर्फ आधे घंटे की ही मुलाकात हो, वैसे।
दादाश्री : उसी को फाइल कहते हैं। फाइल मतलब जो अपने दिमाग में घुस जाए। वे सब फाइल कहलाते हैं।
प्रश्नकर्ता : यह तो भूत की तरह घुस गया है।
दादाश्री : हाँ, भूत की तरह घुस जाता है।
प्रश्नकर्ता : उसके उपाय में प्रतिक्रमण तो चल ही रहे है।
दादाश्री : बस वही। दूसरा कोई उपाय नहीं है और वहाँ पर बहुत ही सावधान रहना पड़ता है, बहुत जागृति रखनी पड़ती है। तेरा ऐसा कुछ तो नहीं है न!
प्रश्नकर्ता : तीन-चार दिन से वही विचार आ रहे हैं भूत की तरह, ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।
दादाश्री : वह तो बल्कि अच्छा है, तीन-चार दिन से, लेकिन हमारी मौजूदगी में आ रहे हैं न? यहाँ हमारे पास हो तब आ रहे हैं न? बहुत अच्छा, निबेड़ा आ जाएगा। निकल जाएगा। जब सत्संग नहीं हो और अकेले हों, तब अगर यह सब आए, तो फिर वे दूसरी कल्पना करेंगे।
प्रश्नकर्ता : बुद्धि वापस ऐसी कल्पना करती है। लेकिन मैं हटा देता हूँ।
दादाश्री : फिर दूसरी कल्पना करती है।
प्रश्नकर्ता : शादी तक की।
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दादाश्री : हाँ। सब करती है, इसलिए सावधान रहना है। अब बिवेयर बोर्ड लगाना, चोर जेब में से लूट ले जाए, उसमें हर्ज नहीं है। वह सब तो फिर से आ जाएगा लेकिन ऐसे लुट गया! एक दिन का क्या फल मिलता है, अगर सचमुच लुट जाए तब? एक दिन में ऐसे लुट जाए तो क्या फल मिलेगा?
प्रश्नकर्ता : पाशवता कहलाएगी, अधोगति।
दादाश्री : है। बिवेयर लिखकर रखना, हर कहीं। बाकी कही पूरी दुनिया के साथ नहीं संभालना है। जहाँ आकर्षण हो रहा हो वहीं ध्यान रखना है। खींचनेवाला कौन? बहुत हुआ तो पाँच, दस या पंद्रह होते हैं। ज्यादा नहीं होते, उतना ही ध्यान रखना है। औरों की तो गोदी में बैठेंगे फिर भी आकर्षण नहीं होगा। इतनी सेफ साइडवाला जगत् है यह। तुम्हारे पाँच, दस या पंद्रह होंगी, बहुत छैल छबीला होगा तो उसकी पचास होंगी।
सामने 'फाइल' आए, तब...
प्रश्नकर्ता : कभी-कभी यह समझ नहीं रह पाती।
दादाश्री : अपना फोर्स टूट जाएगा तो वह समझ चली जाएगी। अपना निश्चय टूट जाएगा तो समझ चली जाएगी। अपने निश्चय से ही रह पाएगी। वर्ना पुद्गल ऐसा नहीं है बेचारा। पुद्गल को अच्छा-बुरा नहीं लगता। वह तो अगर 'बहुत अच्छी चीज, अच्छी चीज, अच्छी चीज है', ऐसा करे तभी वह धक्का मारेगा। 'खराब है, खराब है', ऐसा करें तो फिर वह टूट जाएगा। जहाँ मन खिंच रहा हो, वह फाइल आए, उस समय मन चंचल ही रहता है।
उस समय मन चंचल हो जाता है और मुझे अंदर बहुत दुःख होता है कि इसका मन चंचल हो गया था इसलिए मेरी नजर सख्त हो जाती है।
फाइल आए, उस समय अंदर हिलाकर रख देती है। ऊपर
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जाता है, नीचे जाता है, ऊपर जाता है, नीचे जाता है। उसके विचार आते ही! वह तो अंदर निरी गंदगी भरी है, कचरा माल है। अंदर आत्मा की ही कीमत है!
फाइल गैरहाजिर हो और याद आती रहे तो बहुत जोखिम कहलाता है। फाइल गैरहाजिर हो और याद नहीं आए, लेकिन उसके आते ही तुरंत असर हो जाए, वह सेकन्डरी जोखिम। तुम्हें उसका असर होने ही नहीं देना है। स्वतंत्र बन जाने की जरूरत है। उस समय अपनी लगाम टूट ही जाती है। फिर लगाम रह नहीं पाती न!
लकड़ी की पुतली अच्छी
एक यही गलती नहीं होनी चाहिए। फाइल हो और संडास करने बैठो हो और कहे कि धो दो। तो क्या कहेंगे? धो देते हैं सब?
प्रश्नकर्ता : देखना ही अच्छा नहीं लगता तो धोना कैसे अच्छा लगेगा?
दादाश्री : तू तो धो भी देगा क्या? चाटेगा भी? मुझे लगता है! वह संडास करती हुई दिखे और फिर तुझे धोने को कहे, ‘वर्ना नहीं बोल्गी’ कहे तो?
प्रश्नकर्ता : चलेगा, नहीं बोलेगी तो।
दादाश्री : उस समय छोड़ देगा, तो आज ही छोड़ दे न?
इसलिए कृपालुदेव ऐसा लिखते हैं, ‘लकड़ी की पुतली तो अच्छी है।’ उसमें से संडास नहीं निकलती। निरी गंध है यह तो! उसका मुँह देखो तो वह भी बदबू मारता है। भ्रांति चढ़ जाती है न इसलिए नशा चढ़ जाता है। तब भान नहीं रहता। इसलिए फिर धिन नहीं आती।
प्रश्नकर्ता : सभी को इसका अनुभव है ही!
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दादाश्री : उस घड़ी जब संडास करने बैठी हो, तब देखे तो चंचल रहेगा या नहीं?
प्रश्नकर्ता : नहीं रहेगा। प्रेम टूट जाएगा।
दादाश्री : प्रेम है ही कहाँ यह? केवल साइकलॉजिकल इफेक्ट है। उस समय हमें लपेटते रहना पड़ेगा। ये सीधा लपेटा था, उसे उल्टा लपेटने से निकल जाएगा, खत्म हो जाएगा। 'मेरा, मेरा' करके चिपका था। अब 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करेगा तो चला जाएगा।
अग्नि और 'फाइल' एक से
जहाँ आकर्षण होता है, वहाँ जागृत रहो। आकर्षण नहीं हो रहा हो तो हर्ज नहीं है। बार-बार आकर्षण हो रहा हो तो समझना कि यह फाइल है।
प्रश्नकर्ता : कुछ फाइलों के प्रति आकर्षण होता है।
दादाश्री : सावधान रहकर चलना। अपना यह ज्ञान है तो ब्रह्मचर्यव्रत रह सकता है क्योंकि शुद्धात्मा को अलग कर दिया है इसलिए रह सकता है। वर्ना और कहीं नहीं रह सकता। दादा द्वारा दिया गया, 'मैं शुद्धात्मा हूँ' ऐसा कहते ही वह कम्प्लीट अलग हो जाता है। वह शंका रहित है। बाकी सब जगह शंकावाला।
प्रश्नकर्ता : 'खुद' अलग रहता है इसीलिए यह सब पता चल पाता है कि यह कोई फाइल आई और चंचलता हुई।
दादाश्री : हाँ, पता चलेगा ही न। वह अलग नहीं हुआ होता तो पता नहीं चल पाता, तन्मयाकार ही रहता। पता चलता है, हिल उठा है, ऐसा समझ में आता है। अब सब कैसे करना है, वह भी जानता है, सभी संयोग उसे (समझ में) आते हैं।
‘फाइल’ के सामने सख्ती (खंड-2-९)
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तेरा ठीक रहता है या फिर सब यों ही? अभी भी चंचल हो जाता है न?
प्रश्नकर्ता : मेरे साथ ऐसा कुछ हुआ ही नहीं।
दादाश्री : ऐसा हुआ है। मैं तो चंचलता को देखता हूँ न! तुझे पता नहीं चलता। देह चंचल हो जाए, वह तुझे पता नहीं चलता। मैं पहचान जाता हूँ न चंचलता को!
प्रश्नकर्ता : मन बिगड़ जाए, तब खुद को पता चलता है न?
दादाश्री : मन बिगड़े, विचार बिगड़े तो तुझे पता चल जाता है। लेकिन देह चंचल हो जाए तो वह पता नहीं चलता। देह चंचल हो जाती है। उसके सामने देखने की शक्ति होनी चाहिए। संडास में उसका रूप देख लेना चाहिए। सख्त ही रहना चाहिए। यह तो अच्छा लगता है। बिल्कुल सख्त, अग्नि समझकर अलग रहना पड़ेगा।
प्रश्नकर्ता : दादा कभी-कभार उल्टी साइड का कॉन्फिडेन्स बढ़ जाता है।
दादाश्री : उसमें चोर नीयत होती है। सख्त नहीं हुआ तो समझना कि यहाँ कमी है अभी। जिससे खुद को नुकसान होता है, उससे यदि दूर नहीं रहे न तो मूर्ख ही कहलाएगा न? और यह तो अधोगति कहलाती है। इस गलती को नहीं चला सकते। विषय-विकार और मृत्यु दोनों एक समान ही हैं।
काटो सख्ती से ‘उसे’
जिसकी फाइल बन ही चुकी हो, उसके लिए बहुत जोखिम है। उसके प्रति सख्त रहना चाहिए। सामने आ जाए तो आँखें दिखाना, तो वह फाइल डरती रहेगी। फाइल बन जाने के बाद तो बल्कि लोग चप्पल मारते हैं, तो वह फिर से मुँह दिखाना ही भूल जाता
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है। कई लोग एकदम सतर्क रहते हैं। जिसे सतर्क रहना है, उसे। बर्ना ढीला पड़ जाता है।
नज़र सख्त कर दें न तो फ़ाइल बनेगी ही नहीं। उसे बुग लगे ऐसा व्यवहार करेंगे तो फ़ाइल नहीं बनेगी। मीठा व्यवहार करोगे तो चिपकेगी और खरगब व्यवहार किया तो वह गुनाह दूसरे दिन माफ़ हो सकता है। हमें इस तरह बात करनी चाहिए कि वह हम से चिपके नहीं। वह गुनाह माफ़ होने का रास्ता है लेकिन यह चिपका, उसका गुनाह माफ़ होने का रास्ता नहीं है। उसी से यह संसार खड़ा है सारा।
प्रश्नकर्ता : फ़ाइल हो, उस पर हमें तिरस्कार नहीं हो रहा हो तो क्या जान-बूझकर तिरस्कार खड़ा करना चाहिए?
दादाश्री : हाँ। तिरस्कार क्यों नहीं होता? जो अपना इतना अहित कर रही है, उस पर तिरस्कार नहीं होता? मतलब अभी पोल है! चोर नीयत है! अपना अहित करे, अपना घर जला दिया हो फिर भी क्या हमें उसके प्रति तिरस्कार नहीं होना चाहिए? यह तो भीतर चोर नीयत है, ऐसा हम समझ जाते हैं।
प्रश्नकर्ता : भीतर तिरस्कार होता है, लेकिन बाद में बुद्धि पलट देती है।
दादाश्री : पलट देती है, उसका कारण यह है कि चोर नीयत है।
प्रश्नकर्ता : बहुत परिचय हो चुका हो तो उसका अपरिचय कैसे करें? तिरस्कार करके?
दादाश्री : 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करके कई प्रतिक्रमण करना। 'नहीं है मेरा, नहीं है मेरा' करके फिर सब निकाल देना, फिर आमने-सामने मिल जाए तो उस समय सुना देना चाहिए, 'क्या मुँह लेकर घूम रही है, जानवर जैसी, यूज़लेस।' बाद में फिर वह मुँह नहीं दिखाएगी।
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वहाँ है चोर नीयत
प्रश्नकर्ता : जबरदस्त अहंकार करके भी इस विषय को निकाल देना है।
दादाश्री : हाँ। बाद में इस अहंकार का इलाज कर सकते हैं लेकिन वह रोग कि जहाँ बलवा होनेवाला हो, वहाँ दबा देना पड़ता है। यह तो नीयत चोर है, इसलिए मीठे रहते हैं। मैं समझ जाता हूँ।
प्रश्नकर्ता : जहाँ नीयत चोर है तो उसे सुधारने के लिए क्या करना चाहिए? उसका उपाय क्या है? निश्चय को स्ट्रॉंग करना, वही न?
दादाश्री : अपना नुकसान करे तो उस पर द्वेष ही रहना चाहिए, खराब दृष्टि ही रहनी चाहिए। हमें मिलते ही वह घबरा जाए। सख्त हो गया है, पता चल जाएगा। ऐसा सख्त हो जाए तो फिर असर नहीं करेगा। फिर दूसरा दूँढ लेगी वह।
प्रश्नकर्ता : आपके ज्ञान के बाद पता चलता है कि इसके साथ इतना सख्त हूँ और इतना नरम हूँ।
दादाश्री : हाँ। लेकिन नरम रहना वह पोल है। मैं तो जानता हूँ न सब कि यह पोल है।
प्रश्नकर्ता : जहाँ नरम रहते हैं, वहाँ कभी भी गुस्सेवाली वाणी निकली ही नहीं है। बाकी जगह पर तो बहुत गुस्सा हो जाता है। आपकी बात बिल्कुल सही है।
दादाश्री : नीयत चोर है। हम तुरंत ही समझ जाते हैं न! बाहर तो एकदम नरम!
प्रश्नकर्ता : आप जो कह रहे हैं, हमें अभी भी वह समझ में नहीं आ रहा है।
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दादाश्री : वह भी हम जानते हैं न! हम जमा नहीं करते! भले ही कितना भी आप प्रॉमिस दो फिर भी जमा नहीं करते। हम जमा कब करते हैं? वैसा वर्तन देखते हैं, तब।
प्रश्नकर्ता : यह एक बहुत बड़ा रोग हो गया है। खुद पर ज़रूरत से ज्यादा विश्वास हो गया है, बेकार ही।
दादाश्री : भान ही नहीं है न, किसी भी तरह का। खुद पर और पराए पर भान ही नहीं है।
प्रश्नकर्ता : हम फाइल का तिरस्कार करें तो अंदर से ऐसा बताता है कि 'वह हमें गलत समझेंगी।'
दादाश्री : गलत ही समझना चाहिए। उसे ऐसा लगना चाहिए कि हम पागल हैं। हमें किसी भी तरीके से तोड़ देना है और बाद में उसका इलाज हो जाएगा। यह बैर बंधा होगा, उसका इलाज हो जाएगा।
प्रश्नकर्ता : जब तक एक जगह पर भी फँसा हुआ रहे, तब तक दूसरी शक्ति प्रकट नहीं होती।
दादाश्री : यह तो मीठा पोइजन है, पोइजन और वह भी मीठा!
और 'फाइल' आए, उस समय तो सख्त हो ही जाना चाहिए तभी 'फाइल' कॉपेगी! 'यूज़लेस फेलो' ऐसा भी कह देना अकेले में, ताकि वह बैर रखे। चिढ़ जाए तो भी हर्ज नहीं। चिढ़ जाए तो राग खत्म हो जाएगा, आसक्ति खत्म हो जाएगी सारी और वह समझ भी जाएगी कि अब यह फिर से मेरे हाथ में नहीं आएगा। वर्ना फिर वह मौका ढूँढ़ती रहेगी। अब यह सब सँभालना।
फाइल तो अपने नजदीक आए न, तभी से मन में कड़वा जहर जैसा हो जाना चाहिए, अभी ये कहाँ से? यह तो चोर नीयत
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है! इतना ही सावधान रहने जैसा है। बाकी सभी कुछ खाना-पीना न, मैं कहा मना कर रहा हूँ?
सख्त, इस तरह हो सकते हैं
प्रश्नकर्ता : सामनेवाली फाइल, वह हमारे लिए फाइल नहीं है, लेकिन उसके लिए हम फाइल हैं, ऐसा हमें पता चले तो हमें क्या करना चाहिए?
दादाश्री : तब तो और भी जल्दी खत्म कर देना। ज्यादा सख्त हो जाना चाहिए। वह कल्पना करना ही बंद कर देगी न। न हो तो बेतुका बोलना। उससे कहना कि, ‘चार थप्पड़ लगा दूँगा, यदि तू मेरे सामने आई तो! मेरे जैसा सिरफिरा नहीं मिलेगा कोई।’ ऐसा कहोगे तो फिर वापस नहीं आएगी। वह तो इसी तरह खिसकेगी।
प्रश्नकर्ता : ऐसा क्रैक बोलना तो मुझे अच्छे से आता है।
दादाश्री : हाँ। तुझे ऐसा सख्त बोलना अच्छे से आता है और इन सभी को सिखाना पड़ता है। तुझे सहज आता है।
ढीला पड़ना, वह तो सब रोग ही है। यह तो तुम्हें भान ही नहीं है कि उल्टा बोलकर छूट सकते हैं। अपमान किसी को भी अच्छा नहीं लगता। जो फाइल हो, उसे भी अच्छा नहीं लगता। वह भी बेशर्म नहीं होती। अपमान करने पर क्या वह फाइल खड़ी रहेगी?! फिर कल्पनाएँ करना ही बंद कर देगी न? और जब तक यह ढीला रहेगा न, तब तक कल्पनाएँ करती रहेगी। उसके कल्पना करने से अपना मन ढीला पड़ जाता है। इफेक्ट है सारा। भले ही तेरी दृष्टि उस पर नहीं हो, लेकिन अगर वह कल्पना करे तो तेरे अंदर बहुत इफेक्ट होता है, इसलिए फिर गिरता है। इसलिए ऐसा कर देना चाहिए कि वह कल्पनाएँ करना ही बंद कर दे, बल्कि जब-तब गालियाँ दे। तब फिर अपने बारे में कहेगी,
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्व)
‘छोड़ो न उसकी बात, वह तो बहुत खराब है।’ अतः यदि उल्टा सोचेगी तो हमें छोड़ देगी!
प्रश्नकर्ता : मतलब यदि हमें किसी के प्रति ऐसा बुरा विचार आए तो उसे भी आएगा ही, ऐसा?
दादाश्री : कई दिनों तक विचार आते रहें तो सामनेवाले पर उसका असर पड़े बिना नहीं रहता। ऐसा है यह जगत्। इसलिए ऐसा सख्त बोलकर काट दो कि फिर से अपना नाम लेना ही बंद कर दे। दूसरे कई लड़के हैं, वहाँ जा न! यहाँ क्यों आ रही है? उसे ऐसा भी कह सकते हैं कि मेरे जैसा क्रैक हेडेड दूसरा कोई नहीं मिलेगा तो वह भी कहना शुरू कर देगी कि क्रैक हेडेड है। किसी भी रास्ते से छूटना है न हमें! अन्य सभी जगह सयाने बनना न!
तोड़ा जा सकता है लफड़ा कला से
अब्रह्मचर्य से तो यह सब ऐसा गड़बड़ है ही।
प्रश्नकर्ता : फिर खुद की दृष्टि से बाहर ही चले जाते हैं।
दादाश्री : विमुख ही हो जाता है! टच ही नहीं रहना चाहिए न! एक लड़की उसे छोड़ ही नहीं रही थी तो फिर किसी दूसरी लड़की को बुलाकर यों ही उसके साथ चलने लगा तो वह झगड़ने लगी! टैकल करना आना चाहिए। इसे कलाई आती हैं सभी। छूट गया मेरा भाई! इसे नहीं आती और तरह-तरह की गठरियाँ ही बाँधता रहता है।
प्रश्नकर्ता : कला सिखाईएगा।
दादाश्री : ये सिखाई तो हैं कितनी सारी! जो अकेले में कहने की होती हैं, वे भी! बंधा हुआ हो न उनमें से, फिर कोई एक जन खुद का तोड़ देने की कोशिश करे लेकिन टूटता नहीं
‘फाइल’ के सामने सख्ती (खं-2-९)
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है। अगर वह तोड़ नहीं सके तो उसका फ्रैक्चर कर देना पड़ता है, वहाँ वहेम डाल देना पड़ता है।
प्रश्नकर्ता : कोई एक जन फ्रैक्चर करे, लेकिन सामनेवाला नहीं करने देता उसे।
दादाश्री : सामनेवाले का ही फ्रैक्चर करना है। खुद का फ्रैक्चर नहीं करना है। सामनेवाला ही चिढ़ जाए कि बल्कि यह तो खराब निकला, बनावटी।
प्रश्नकर्ता : सामनेवाले को ऐसा लगना चाहिए कि इसने बनावट की।
दादाश्री : अगर ऐसा रह कि ‘यह टेढ़ा ही है’ तो दिनोंदिन उसके अभिप्राय टूटते ही जाएँगे। बाद में कुछ और ऐसी-वैसी सुना दे, तब तुम्हें छूटना हो तो छूटा जा सकेगा।
प्रश्नकर्ता : यदि खुद का ही पूरी तरह से फ्रैक्चर नहीं हुआ हो तो? खुद का मन पूरी तरह फ्रैक्चर नहीं हुआ हो तो?
दादाश्री : तो फिर कौन मना कर रहा है? तो फिर यह समुद्र नहीं है? डूब जाएगा।
प्रश्नकर्ता : पहले खुद का फ्रैक्चर हो जाना चाहिए न?
दादाश्री : खुद का करने की जरूरत नहीं है। पहले सामनेवाले का फ्रैक्चर कर देना, पूरा। बाद में जब तुम्हें खुद का करना होगा, तब हो सकेगा! जिसे यह करना है, उसका! पहले खुद का तो होगा ही नहीं न!
प्रश्नकर्ता : जब तक सामनेवाले का आकर्षण है, तब तक खुद का पहले नहीं हो सकता, ऐसा है?
दादाश्री : कभी भी नहीं हो सकता। यदि सामनेवाला गाली देना शुरू कर दे तो हमें जब छोड़ना हो तब छूट सकेंगे।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्व)
प्रश्नकर्ता : तो सामनेवाले का फ्रैक्चर कैसे कर सकते हैं?
दादाश्री : हजार रास्ते हैं! नहीं तो एक दिन तो उसे मुँह पर कह देना कि 'क्या करूँ, मेरा मन दुविधा में है! तेरे जैसी दो-तीन हैं। सभी को वचन दिए हैं' कहना। यह तो यहाँ से चिट्ठी लिखता है कि, 'मुझे अच्छा नहीं लगता तेरे बिना।' तब छूटेगा कैसे? फिर और ज्यादा चिपकेगी वह। अब तुझे आ जाएगा न?
अपना बनाया कहकर डियर, तोड़ो देकर फियर
अपना विज्ञान इतना सुंदर है कि हर तरह से आपको एडजस्ट हो जाए। बाहर का एक्सेस हो जाए तो आत्मा खो देता है। बहुत जोरदार हो गया हो तो आत्मा का वेदक चला जाता है। ज्ञाता-दृष्टापन चला जाए और भ्रांति में डाल दे, वह है मोहनीय कर्म।
प्रश्नकर्ता : बाहर का एक्सेस हो जाता है, ऐसा आपने कहा न, ऐसा कैसे है वह?
दादाश्री : किसी को स्त्री के साथ एकता हो गई। अब खुद छोड़ना चाहे लेकिन अगर वह छोड़े तब न? तू उसे मिला नहीं न, फिर भी वह तुम्हारे ही बारे में सोचती रहेगी। तुम्हारे विचार करती रहे, तो तुम बंधे हुए कहलाओगे। विचारों से ही बंधे हुए। वे विचार बंद होते नहीं और अपना छुटकारा हो नहीं पाता। इसलिए पहले समझ लेना चाहिए। और उसके विचार तोड़ने के लिए क्या करना पड़ेगा? उसके साथ झगड़े करने पड़ेंगे, ऐसा करना चाहिए, उसे सब उल्टा-उल्टा बताना चाहिए। दूसरी लड़की को यों ही कहना, तुम तो मेरी बहन हो, कहकर चलो जरा मेरे साथ घूमने, ऐसा उसे दिखाना, मतलब उसका मन फैंक्चर कर देना, धीरे से।
प्रश्नकर्ता : दूसरीवाली चिपक जाए तो?
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दादाश्री : दूसरी चिपक जाए तो दूसरी से छूटना। जिसे छूटना है, उसे सबकुछ आता है।
प्रश्नकर्ता : इसके अलावा, व्यवहार में जरूरत से ज्यादा ढूब जाएँ, धंधे-व्यापार में तो अपना ज्ञाता-दृष्टापन कम हो जाता है, ऐसा नहीं है न?
दादाश्री : व्यापार ऐसी फाइल नहीं है। यह तो दावा करे ऐसी फाइल है। वह दिन-रात तुम्हारे लिए सोचती रहेगी और तुम्हें दिन-रात बाँधती रहेगी। हम अपने घर हों तो भी व्यापार नहीं बाँधता या फिर जलेबी भी नहीं बाँधती, आम भी नहीं बाँधता। यह जो जीवित है, वह बाँधती है, इसमें क्लेम है न? तुम जो सुख दूँढ रहे हो उस तरफ का, तो कोई माँगेंगा मतलब यह क्लेमवाला है। सुख तो जलेबी खाई और अच्छी नहीं लगी तो फेंक दी। उसके अलावा क्या है? कोई दावा भी नहीं है जलेबी का, कोई हर्ज नहीं। ये सारी हमारी सूक्ष्म खोज हैं। वर्ना छूटेंगे कैसे?
तुझे ये बातें बहुत काम आएगी। कितने दिनों से मुझसे पूछता जा रहा है, ‘कैसे छूटना?’ लेकिन यों ही तो मुझसे कहा नहीं जा सकता, कभी ऐसा कुछ कहूँ तब समझ जाना। यह भी, अगर समझोगे तो हल आएगा, नहीं समझोगे तो फिर...
प्रश्नकर्ता : अब जल्दी हल लाने की जरूरत है।
दादाश्री : घर का बिगड़ेगा, घर में खड़ा नहीं रहने देंगे।
प्रश्नकर्ता : बाहर भी अगर बिगड़ गया तो सब जगह बिगड़ जाएगा।
दादाश्री : और घर पर भी फ्रैक्चर हो जाएगा। यहाँ पर भी सब फ्रैक्चर हो जाएगा।
पूरी रात मेरे लिए किसी को कुछ भी विचार आए कि