समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
से उस तरफ मजबूत होने लगा है। तो साथ ही साथ अंदर यह अहंकार भी खड़ा होने लगा है, यह भी परेशान करता है कई बार।
दादाश्री : कैसा अहंकार खड़ा होता है?
प्रश्नकर्ता : ‘मैं कुछ हूँ, मैं कितना अच्छा ब्रह्मचर्य पालन करता हूँ’ ऐसा।
दादाश्री : वह तो निर्जीव अहंकार है।
प्रश्नकर्ता : अंदर इसकी खुमारी भर गई हो, ऐसा हो जाता है।
दादाश्री : हाँ, लेकिन फिर भी वह सारा तो निर्जीव अहंकार है। मरा हुआ ईसान उठ बैठे तो क्या हमें वहाँ से भाग जाना चाहिए? वना ब्रह्मचर्य का सही अर्थ क्या है कि ब्रह्म में चर्या। शुद्धात्मा में ही रहना, वही ब्रह्मचर्य कहलाता है। लेकिन ये लोग तो ब्रह्मचर्य का क्या मतलब निकालते हैं? नल को डाट लगा दो। लेकिन दूध पीया, उसका क्या होगा? पूरे जगत् ने विषय को विष कह दिया है। लेकिन हम कहते हैं, ‘विषय विष नहीं हैं, लेकिन विषय में निडरता, वह विष है।’ वना महावीर भगवान को बेटी कैसे होती? जगत् बात को समझा ही नहीं। रिलेटिव में ब्रह्मचर्य होना चाहिए, लेकिन यह तो वापस एक ही कोने में पड़े रहते हैं और ब्रह्मचर्य का ही आग्रह रखते हैं और उसी का दुराग्रह रखते हैं। ब्रह्मचर्य के आग्रही होने में हर्ज नहीं है, लेकिन अगर दुराग्रही हो गए तो उसमें हर्ज है। आग्रह, वह अहंकार है और दुराग्रह, वह जबरदस्त अहंकार है। ब्रह्मचर्य का दुराग्रह किया तो भगवान कहते हैं, ‘बेकार है’ फिर भले ही ब्रह्मचर्य पालन कर रहा हो।
प्रश्नकर्ता : सभी चीजों में मुझे किसी के दोष नहीं दिखते, लेकिन ब्रह्मचर्य के बारे में मुझे कोई कुछ उल्टा कहे तो मेरा दिमाग घूम जाता है, तुरंत ही उसके दोष दिखने लगते हैं।