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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

से उस तरफ मजबूत होने लगा है। तो साथ ही साथ अंदर यह अहंकार भी खड़ा होने लगा है, यह भी परेशान करता है कई बार।

दादाश्री : कैसा अहंकार खड़ा होता है?

प्रश्नकर्ता : ‘मैं कुछ हूँ, मैं कितना अच्छा ब्रह्मचर्य पालन करता हूँ’ ऐसा।

दादाश्री : वह तो निर्जीव अहंकार है।

प्रश्नकर्ता : अंदर इसकी खुमारी भर गई हो, ऐसा हो जाता है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन फिर भी वह सारा तो निर्जीव अहंकार है। मरा हुआ ईसान उठ बैठे तो क्या हमें वहाँ से भाग जाना चाहिए? वना ब्रह्मचर्य का सही अर्थ क्या है कि ब्रह्म में चर्या। शुद्धात्मा में ही रहना, वही ब्रह्मचर्य कहलाता है। लेकिन ये लोग तो ब्रह्मचर्य का क्या मतलब निकालते हैं? नल को डाट लगा दो। लेकिन दूध पीया, उसका क्या होगा? पूरे जगत् ने विषय को विष कह दिया है। लेकिन हम कहते हैं, ‘विषय विष नहीं हैं, लेकिन विषय में निडरता, वह विष है।’ वना महावीर भगवान को बेटी कैसे होती? जगत् बात को समझा ही नहीं। रिलेटिव में ब्रह्मचर्य होना चाहिए, लेकिन यह तो वापस एक ही कोने में पड़े रहते हैं और ब्रह्मचर्य का ही आग्रह रखते हैं और उसी का दुराग्रह रखते हैं। ब्रह्मचर्य के आग्रही होने में हर्ज नहीं है, लेकिन अगर दुराग्रही हो गए तो उसमें हर्ज है। आग्रह, वह अहंकार है और दुराग्रह, वह जबरदस्त अहंकार है। ब्रह्मचर्य का दुराग्रह किया तो भगवान कहते हैं, ‘बेकार है’ फिर भले ही ब्रह्मचर्य पालन कर रहा हो।

प्रश्नकर्ता : सभी चीजों में मुझे किसी के दोष नहीं दिखते, लेकिन ब्रह्मचर्य के बारे में मुझे कोई कुछ उल्टा कहे तो मेरा दिमाग घूम जाता है, तुरंत ही उसके दोष दिखने लगते हैं।

‘विषय’ के सामने विज्ञान से जागृति (खं-2-१५)

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दादाश्री : ऐसा क्यों? कि आत्मा पर प्रीति नहीं है, ब्रह्मचर्य पर प्रीति है। लेकिन ब्रह्मचर्य तो पुद्गल है। आत्मा खुद तो ब्रह्मचारी ही है, निरंतर ब्रह्मचारी है! यह तो हम बाहर का उपाय करते हैं और वह भी कुदरती तरीके से अगर डिस्चार्ज के रूप में आया हो, तभी हो पाएगा। इसलिए ब्रह्मचर्य कोई मुख्य चीज नहीं है। उसे मुख्य मानेंगे तो आत्मा का मुख्यत्व चला जाएगा। मुख्य वस्तु तो आत्मा है, बाकी कुछ भी मुख्य है ही नहीं। बाकी के ये सब तो संयोग हैं और फिर संयोग वियोगी स्वभाव के हैं। आत्मा और संयोग दो ही हैं, और कुछ है ही नहीं जगत् में। अतः मुख्यत्व एक मात्र आत्मा में आ गया, बाकी सब को संयोग कह दिया। संयोग को अच्छा-बुरा करने जाओगे तो बुद्धि इस्तेमाल की और बुद्धि इस्तेमाल की तो आत्मा दूर चला जाएगा। अपना साइन्स कितना अच्छा है!

ब्रह्मचर्य व्यवहार के अधीन है। निश्चय तो ब्रह्मचारी ही है न! आत्मा तो ब्रह्मचारी ही है न!

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[ १६ ]

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं

सिर-माथे पर रखना ज्ञानी को, अंत तक

पंद्रह साल के लिए जेल में डाल दिया हो तो क्या करोगे? 'दादा की जेल में ही हूँ', कहना। कुछ तो शूरवीरता रखो न! शूरवीरता! एक ही जन्म। मोक्ष में जाना है यह तो। अन्य सभी जगह यही झंझट चल रही है न। 'इसमें क्या सुख है?' और अगर एक बाड़ तुम पार कर लोगे मेरे कहे अनुसार, तो फिर मुक्त हो जाओगे। एक ही बाड़ को पार करने की जरूरत है। तुझे दादा हाज़िर रहते हैं या नहीं रहते? तुझे दादा हाज़िर रहते हैं तो फिर क्या दुःख है? अरे, इसमें ऐसे तो कौन से सुख हैं कि इतनी पकड़ में आ गया है! दादा तो ऐसे है कि हर तरह से रक्षा करें, मूलतः इसका यह आड़ाई (अहंकार का टेढ़ापन) का स्वभाव है न, वह नहीं छूटता न! सपने में आ जाऊँ, तब से कल्याण हो गया। सपने में ऐसे ही कोई चीज़ आती है क्या?! इसलिए इस दुनिया का जो होना हो वह हो, लेकिन इन दादा को नहीं छोड़ना है और दादा की इस एक आज्ञा का पालन कर लेना तो वश हो जाएगा सबकुछ। और वनाँ अगर तुझे शादी करनी हो तो बता न, हर्ज नहीं है। कर देंगे फिर रास्ता।

आज्ञा में नहीं रह सके तो क्या किसी को जेल में थोड़े ही डालते हैं? वनाँ ऐसे यदि जेल में डालना पड़े तो हमें कितनों को जेल में डालना पड़े? सभी को डाल देना पड़ेगा।

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं (खं-2-१६)

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तुम्हें तो ऐसा तय करना है कि 'फिसल नहीं जाना है' और यदि फिसल गए तो फिर मुझे माफ कर देना है। आपका कभी अगर अंदर बिगड़ने लगे तो तुरंत मुझे बताना। ताकि फिर उसका कुछ हल निकले! थोड़े ही कहीं एकदम से सुधरनेवाला है? बिगड़ने की संभावना है! ये नए मकान बनाते हैं, तो उनमें डिफेक्ट निकलता है या नहीं? मेरे जैसे को कुछ काम करना रहा नहीं, तो गलती निकलेगी ही नहीं न? जो लोग काम करते हैं, उन्हीं से गलती होती है। खराब से खराब काम हो गया हो तो 'दादाजी' को बता देना। तो मन समझेगा कि, 'यह तो भोला है, यह सबकुछ बता देता है। इसलिए अब हमें फिर से ऐसा नहीं करना है। इसके साथ अपनी नहीं बनेगी।' इसलिए फिर मन बचाव का रास्ता नहीं ढूँढेगा। मैं तो पहले जो भी होता था वह 'ओपन' कर देता था। तो मन को कैसा लगेगा अंदर? उलझता रहेगा, और तय करेगा कि फिर से हमें ऐसा नहीं करना है।

प्रश्नकर्ता : 'यह तो अपनी ही आबरू खत्म कर रहा है' ऐसा कहकर फिर मन चुप हो जाएगा।

दादाश्री : हाँ, मन समझ जाएगा कि 'यह तो अपनी आबरू खत्म कर रहा है।' बाहर के लोग तो ऐसा समझते हैं कि खुद की आबरू जा रही है। जबकि हम तो जानते हैं कि यह तो मन की आबरू जा रही है! जो करता है, उसकी आबरू जाती है। 'अपनी' आबरू क्यों जाएगी? ऐसा कहने से मन शांत हो जाएगा या नहीं? हमेशा हमारी दी गई आज्ञा में रहना ही अच्छा है। जिसने खुद के लेवल पर लिया, वह स्वच्छंद पर ले जाता है। इस स्वच्छंद ने ही लोगों को गिरा दिया है न! इसीलिए हम ये आज्ञा देते हैं न?! स्वच्छंद सबसे बड़ा रोग कहलाता है कि, 'अब मुझे कुछ भी बाधक नहीं है।' वही विष है।

जानो गुनाह के फल को पहले

प्रश्नकर्ता : 'यह कार्य गलत है, यह करने जैसा नहीं है।'

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

यह हमें पता है, फिर भी वह हो जाता है। तो उसे रोकने के लिए क्या प्रयत्न करना चाहिए? कौन सा पुरुषार्थ करना चाहिए?

दादाश्री : ऐसा है न। जब तक जिस गुनाह का फल नहीं जानते, तब तक वह गुनाह होता रहता है। कुएँ में कोई क्यों नहीं गिरता? ये वकील कम गुनाह करते हैं। ऐसा क्यों? इस गुनाह का यह फल मिलेगा, ऐसा वे जानते हैं। इसलिए गुनाह का फल जानना चाहिए। पहले जाँच कर लेनी चाहिए कि गुनाह का क्या फल मिलेगा? 'यह गलत कर रहा हूँ, इसका क्या फल मिलेगा?' यह जाँच कर लेनी चाहिए।

इस दुनिया का ऐसा नियम है कि जो गुनाह के फल को पूरी तरह से जानते हैं, वे गुनाह करेंगे ही नहीं! कोई गुनाह कर रहा है मतलब वह गुनाह के फल को पूरी तरह से जानता ही नहीं! हम नर्क का फल जानते हैं, इसीलिए तो हम कभी भी नर्क का फल आए, ऐसी बात हो तो, यह शरीर टूट जाए फिर भी नहीं करते। तूने नर्क का स्वरूप सुना तो तुझे कैसा लग रहा है अब? इसलिए यह जान लेना कि कर्म का फल क्या? क्योंकि अगर गुनाह हो रहा है तो अभी तक यह समझ ही नहीं कि 'इसका फल क्या है?' इसलिए प्रकृति कौन सी बात में गलत कर रही है, यह किसी से पूछना चाहिए। ज्ञानीपुरुष हों तो उन्हें पूछना चाहिए कि, 'अब मुझे यहाँ पर क्या करना चाहिए?' और उसके बावजूद प्रकृति से वह हो जाए तो माफी माँगनी चाहिए! जो प्रकृति हमें पछतावा करवाए, उस प्रकृति का विश्वास ही कैसे कर सकते हैं?

प्रश्नकर्ता : प्रगति को रूधनेवाले अंतरायों में से कैसे निकलें?

दादाश्री : वह सब निकल जाएगा, कृपा से सबकुछ निकल जाएगा। कृपा यानी दादाजी को राजी रखना वह। दादा अपने लिए जो माथापच्ची कर रहे हैं, उसका फल अच्छा आएगा, अच्छे प्रतिशत आए तो दादा राजी! दादा को और क्या चाहिए? दादा कहीं पेड़ा

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं (खंड-2-१६)

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खाने नहीं आए हैं। फिर भी पेड़ा प्रसाद के तौर पर रखना। वह भी व्यवहार है न?!

व्यापार में खो गए कि खोए खुदा

यह तो अपने आप झूठ-मूठ का समाधान लेकर दिन निकाल रहा है! और उसका रिजल्ट भी आए बिना नहीं रहता न। भले ही कितना भी कहे, ‘मैं पढ़ रहा हूँ, मैं पढ़ रहा हूँ।’ लेकिन छः महीने के बाद उसका रिजल्ट तो आएगा ही न? तब पोल पता चल जाएगी न! तुझे समझ में आ रहा है यह सब? कॉलेज में जाने के बाद पास तो होना पड़ेगा न? जो व्यापार शुरू किया है, वह पूरी तरह से तो करना चाहिए न? ‘शादी करनी है’ तो ऐसा तय करके रखना और ‘ब्रह्मचर्य पालन करना है’ तो वह तय करके रखना। ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो फिर पूरा-पूरा निश्चय तो होना चाहिए न? ये तो व्यापार में दुकान का करने जाते हैं और वापस फुटबॉल भी खेलने जाते हैं, बोल-बेट भी खेलने जाते हैं, तो उससे कहीं भला होता होगा? भला करना है, तो रास्ता तो निकालना पड़ेगा न? या ऐसा चलेगा? पोलम्पोल चलेगी?!

प्रश्नकर्ता : नहीं चलेगी।

दादाश्री : बाकी लोगों की टोली जा रही है, उस तरह टोली में रहते हैं, इस हिसाब से अच्छा है! उसमें फिर हमें कहाँ लक्ष्य रखना पड़ेगा कि, ‘कौन आगे जा रहा है? वह क्यों आगे जा रहा है? मैं क्यों इतना पीछे रह गया?’ बाकी मोक्षमार्ग में तो निरंतर जागृत रहना पड़ता है कि ‘मेरी क्या गलती रह जाती है?’ ऐसा पता तो लगाना ही पड़ेगा न! बाकी संसार की इच्छा तो करने जैसी है ही नहीं। संसार तो सहज स्वभाव से चलता रहे ऐसा है। अब इतने समय से मेहनत की है, उसमें मेरा भी इतना सारा टाइम गया है। तेरा भी कितना टाइम गया है। इसलिए मुझे कुछ संतोष हो, ऐसा कुछ कर। यहाँ ये सारे लड़के हैं, उन सभी को पूरा दिन कितना अच्छा बरतता है! यहाँ तो जो चिपक गया और लिपट गया,

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उसी का चलता रहेगा। जब तक वह चिपका हुआ उखड़े नहीं तब तक तेरा अच्छा चलता रहेगा। अब वापस कब उखड़ जाएगा?

प्रश्नकर्ता : अब नहीं उखड़ूँगा।

दादाश्री : तब ठीक है! ऐसे चिपके रहोगे तभी चल पाएगा। क्योंकि यहाँ जो चिपका रहा, कृपा उस पर काम किए बिना रहेगी नहीं, यह मार्ग ऐसा करूणामय है। कैसा मार्ग है? खुद का बिगाड़कर भी करूणामय मार्ग है। खुद की कमाई भले ही कम हो जाए, लेकिन उसे संभालकर, उसकी कमाई शुरू करवाकर, दुकान फिर से शुरू करवा देते हैं। इस संसार में भी कोई दोस्त हो, जान-पहचानवाला हो, तो उसका नहीं चल रहा हो तो भी कुछ भी करके शुरू करवा देते हैं। व्यवहार में भी रास्ते पर ला देते हैं। ऐसा करवा देते हैं न?

अभी तो तू पढ़ रहा है, कॉलेज पूरा नहीं हुआ है। इसलिए अभी पूरा हिसाब निकालेगा तो चलेगा अगर अभी कर लिया तो उस समय काम आएगा। बाद में कोलेज खत्म हो जाने के बाद तो ऑफिस लेकर बैठेगा और ऑफिस में एक मिनट की भी फुरसत नहीं मिलेगी। हम समझते हैं कि अभी तो बहुत टाइम है और बाद में यह पूरा कर लेंगे! लेकिन इस काल में सभी व्यापार ऐसे हैं कि एक मिनट की भी फुरसत नहीं मिलती और पूरे दिन मगजमारी, भले ही पैसे कमाएगा लेकिन यहाँ का कोई काम नहीं हो पाएगा। अभी किया होगा तो उस समय वहाँ बैठे-बैठे सब ध्यान में रहेगा, तो थोड़ा कुछ हो पाएगा। ये तो सारे ऐसे कामकाज हैं कि दादा भी वापस नहीं मिल पाएँ! अभी यह सब तुम्हारे लक्ष्य में नहीं है न? इसमें से किसी चीज का ध्यान भी नहीं रहता न? यह तो कुदरत चलाए, उसी तरह चल रहा है। खुद की जागृति का एक अंश भी नहीं है। अपने यहाँ कई अफसर दर्शन करके गए हैं। कहते भी हैं कि यही करने जैसा है। लेकिन करें कैसे? व्यापार तो एक प्रकार की जेल है। उस

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जेल में बैठकर पैसा कमाना। तो अब तुझे क्या करना चाहिए? व्यापार शुरू होने के बाद तुझे एक मिनट का भी टाइम नहीं मिलेगा।

प्रश्नकर्ता : पहले काम निकाल लेना चाहिए।

दादाश्री : हाँ, पहले काम निकाल लेना चाहिए, इसलिए यह याद रखना। इसलिए तुझे यह सार निकालकर दिया है। बाद में हम बार-बार कहने नहीं आएँगे। हम तो पूरी तरह से समझा देते हैं ताकि तुम्हारा अहित न हो। यह तो आज मिला और इच्छा भी है, ऐसा हम जानते हैं, लेकिन मोह का मारा वह निश्चय हो ही नहीं पाता न? निश्चय टिकता नहीं है। हमने एक-एक ऐसे निश्चय देखे हैं कि परसेन्ट टु परसेन्ट करेक्ट। जब देखो तब करेक्ट। अतः जितना हो सके उतना कर लेना चाहिए! तुझे पता है न, यह ऑफिस का काम ऐसा है?

प्रश्नकर्ता : काम के बारे में ऐसा कुछ बहुत बड़ा नहीं सोचा है।

दादाश्री : लेकिन वह तो हो ही जाएगा और बड़े ऑफिसों में बड़ा कामकाज नहीं करें तो खर्चा भी नहीं निकलेगा। नौकरी करेगा तो ठीक है, तो भी तुझे कुछ खाली समय मिलेगा। कई तो ऐसे पुण्यशाली होते हैं कि व्यापार से संबंधित कोई बोदेरेशन ही नहीं। अरे! पूरे दिन व्यापार अपने आप ही चलता रहता है, उसे पुण्य कहते हैं। अब तेरा सबकुछ ठीक हो जाएगा न?

प्रश्नकर्ता : हाँ।

दादाश्री : बहुत सीढ़ियाँ लुढ़क जाएं तो फिर कौन पकड़कर रखेगा? पहले तो एक सीढ़ी गिरता है, फिर दो हो जाते हैं, चार हो जाते हैं, बारह हो जाते हैं, ऐसे बढ़ते जाते हैं! अब यह गाड़ी कहाँ रुकेगी? फिर उसे कौन खड़ा रखेगा और कौन पकड़ेगा? इतनी ऊँचाई पर था, ऊँची दशा में था तब सीधा नहीं रहा, तो अब गिरने के बाद क्या रहेगा? फिसला वह फिसला! अंदर भरपूर

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सुख पड़ा है। याद करते ही मिले अंदर ऐसा निरा सुख ही है! जहाँ चैन खींचोगे वहाँ गाड़ी खड़ी रहेगी, खुद की इतनी शक्तियाँ हैं! लेकिन जहाँ ढीला पड़ जाए वहाँ क्या हो सकता है? तुझे दादा का निदिध्यासन रहता है क्या?

प्रश्नकर्ता : इन दो दिनों से तो रह रहा है।

दादाश्री : जिसे दादा का निदिध्यासन रहता है, उसके तो सभी ताले खुल जाते हैं। दादा के साथ अभेदता, वही निदिध्यासन है! बहुत पुण्य होता है, तब ऐसा उदय आता है और 'ज्ञानी' के निदिध्यासन का साक्षात् फल मिलता है। वह निदिध्यासन, खुद की शक्ति को भी वैसी ही बना देता है, उसी रूप बना देता है। क्योंकि 'ज्ञानी' का स्वरूप अचिंत्य चिंतामणी है, इसलिए उसी रूप बना देता है। 'ज्ञानी' का निदिध्यासन निरालंब बनाता है। फिर 'आज सत्संग नहीं हुआ, आज दर्शन नहीं हुआ।' उसे ऐसा कुछ भी नहीं रहता। ज्ञान स्वयं निरालंब है, वैसा स्वयं निरालंब हो जाना पड़ेगा, 'ज्ञानी' के निदिध्यासन से।

एक ध्येय, एक ही भाव

हमने आंगन में पेड़ लगाया हो, हर रोज खाद-पानी डालें और अब कन्स्ट्रक्शनवाले का ऑर्डर मिले कि इस पेड़ को काट दो और वहाँ नींव खोदना शुरू कर दो, तो? अरे, तो फिर यह पेड़ लगाया ही क्यों था? यदि पेड़ लगाना हो तो काटना मत, तो उनसे कह दे कि कन्स्ट्रक्शनवाले को मकान की जगह बदलनी चाहिए। जिसकी हमने खुदने परवरिश की हो और उसे फिर हम काट दें तो क्या हुआ कहलाएगा? खुद के बच्चे की हिंसा करने के बराबर है। लेकिन लोग कुछ समझते नहीं और कहेंगे, 'काट दो न!' मैंने कभी भी यह गलती नहीं की। हमें तो तुरंत विचार आ जाता है कि यदि लगाया है तो काटना मत और काटना हो तो लगाना मत।

जिसने जगत् कल्याण का निमित्त बनने का बीड़ा उठाया है,

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उसे दुनिया में कौन रोक सकता है? कोई भी शक्ति नहीं है कि जो उसे रोक सके। पूरे ब्रह्मांड के सभी देव लोग उस पर फूल बरसा रहे हैं। अतः एक ध्येय तय करो न! जब से यह तय करोगे, तभी से इस शरीर के ज़रूरतों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। जब तक संसारी भाव है, तब तक ज़रूरतों की चिंता करनी पड़ती है। देखो न, 'दादा' का कैसा ऐश्वर्य है! यह एक ही प्रकार की इच्छा रहेगी तो फिर उसका हल आ गया। और देवसत्ता आपके साथ है। ये देव तो सत्ताधारी हैं, वे निरंतर हेल्प करें! ऐसी उनकी सत्ता है। एक ही ध्येयवाले ऐसे पाँच लोगों की ही ज़रूरत है! अन्य कोई ध्येय नहीं, डांवाडोल नहीं। अडुचन में भी एक ही ध्येय और नौंद में भी एक ही ध्येय!

जिस राह पर चले, बताई वही राह

'दादा' जिस रास्ते से गए है, वही रास्ता आपको बताया है। उसी रास्ते पर 'दादा' आपसे आगे हैं। रास्ता मिलेगा या नहीं मिलेगा?

प्रश्नकर्ता : मिलेगा।

दादाश्री : शत प्रतिशत? पक्का?

प्रश्नकर्ता : हाँ, शत प्रतिशत पक्का!

दादाश्री : 'दादा' तो सभी रोग निकालने आए हैं। क्योंकि 'दादा' संपूर्ण निरोगी पुरुष हैं। उनकी मदद से जो रोग निकालने हों, वे निकल जाएँगे। उनमें कोई भी रोग नहीं है, संसार का एक भी रोग उनमें नहीं है। इसलिए तुम्हें जो जो रोग निकालने हों, वे निकल जाएँगे।

इसलिए हम तुम्हें कहते हैं कि फिर अपने आप तुम पोल मारोगे तो तुम्हें मार पड़ेगी। हम तुम्हें चेतावनी दे देते हैं। अभी रोग निकल सकेगा, बाद में नहीं निकल सकेगा। यदि मुझ में जरा सी भी पोल होती तो तुम्हारा रोग नहीं निकल सकता। हिम्मत आ रही है थोड़ी?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : हाँ, पूरी तरह से हिम्मत आ रही है।

दादाश्री : 'दादा' की आज्ञा का पालन तुम से ठीक से नहीं हो पाता? अपना धर्म आज्ञा पालन करने का है। फिर जो माल निकले, उससे हमें क्या लेनादेना? कॉलेज के आखिरी साल में पढ़ रहा हो और किसी मौज-शौक में पड़ गया और फेल हो गया तो उसके बाद पूरे साल उदास रहे तो क्या फायदा होगा? अगले साल क्या होगा? पहले नंबर से पास होगा? ऐसा डिप्रेशन आ जाए तो सात साल तक भी पास नहीं हो सकेगा। इसलिए यह भूल जाना कि मैं फेल हो गया और नये सिरे से और नई तरह से दोबारा तैयारी करना। जो कर्म हो चुके हैं, उन्हें छोड़ो न! एकलौता बेटा मर जाए तो क्या हमेशा रोएगा? भले ईसान, दो दिन रोना हो तो रो और फिर बाज़ार में कुल्फी खा। यानी कि अगर फेल हो गए तो नये सिरे से पढ़ना शुरू कर देना, पुराना सब भूल जाना। मतलब नये सिरे से आज्ञा में रहो ठीक से! हमें कहना है, 'चंद्रेश, यह तो बहुत गलत किया।' इतना हमें कह देना है, बस। बाद में फिर से हमें आज्ञा में ही रहना है। उसके बाद हम क्यों चूकें? और 'चंद्रेश' तो अपना पड़ोसी है न? फर्स्ट नेबर, फाइल नंबर वन है न? और दिवाला भी चंद्रेश का निकला न? 'तेरा' दिवाला तो नहीं निकला न? या दोनों ने साथ में दिवाला निकाला है? चंद्रेश दिवालिया हो जाए, तो उससे तुम्हें क्या लेना देना? लेकिन हम यह जो कह रहे हैं, वह तुम्हारे वापस पलटने के लिए। फिर उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए कि दादाजी ऐसा कह रहे थे कि दिवाला निकले तो हर्ज नहीं है। यह तो, यहाँ से बचाने जाईं तो वहाँ फिसल पड़ता है, तो इसका कब अंत आएगा? तुम कह देना कि 'चंद्रेश दिवालिया हो गया है, अब फिर से दिवालिया मत होना!' तुम लोगों से कहा है न, फाइल नंबर वन, फर्स्ट नेबर है। तो आज्ञा में रहना वही अपना धर्म है।

फ़िफ़सलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं (खं-2-१६)

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‘दादा’ बोलते ही दादा हाज़िर

प्रश्नकर्ता : आपकी मौजूदगी में यह सब बिल्कुल साफ हो जाए, सभी को ऐसे आशीर्वाद दीजिएगा।

दादाश्री : हम तो ऐसे आशीर्वाद देते हैं। लेकिन यह तो साफ करोगे तब न !

प्रश्नकर्ता : साफ कर देंगे।

दादाश्री : तुम्हें तो अपना काम निकाल लेना है। इसी की पूर्णाहुति के लिए शरीर घिस देना है। यदि ये कर्म खपा दिए होते और उसके बाद यह ज्ञान मिला होता तो एक घंटे में ही उसका काम पूर्ण हो जाता लेकिन ये कर्म तो खपाए नहीं हैं और राह चलते को ज्ञान दे दिया है इसलिए अंदर जब कर्म के उदय बदलते हैं, तब बुद्धि के प्रकाश को पलट देते हैं, उस समय उलझ जाता है। अब उलझ जाए, तब ‘दादा’ ‘दादा’ करते रहना और कहना, ‘यह लश्कर उलझाने आया है।’ क्योंकि अभी भी ऐसे उलझानेवाले अंदर बैठे हैं, इसलिए सावधान रहना। और उस समय ‘ज्ञानीपुरुष’ का जबरदस्त आसरा रखना। मुश्किलें तो न जाने कब आ जाएँ, वह कहा नहीं जा सकता। लेकिन उस समय ‘दादा’ से सहायता माँगना। जजीर खींचोगे तो ‘दादा’ हाज़िर हो जाएँगे।

अब तो एक क्षण भी गँवाने जैसा नहीं है। ऐसा अवसर बार-बार नहीं आएगा, इसलिए काम निकाल लेना चाहिए। इसलिए यदि यहाँ पर जागृति रखी तो सभी कर्म भस्मीभूत हो जाएँगे और एक अवतारी होकर मोक्ष में चले जाओगे। मोक्ष तो सरल है, सहज है, सुगम है।

ध्येयी का हाथ थामें, दादा हमेशा

मैं आपकी हेल्प करता हूँ, बाकी डिसीजन आपको लेना है। आप सभी को, फादर-मदर और बच्चों को समाधान सहित डिसीजन

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लेना है। आप ऐसा डिसीजन लेते हो कि आप सभी को समाधान रहे। उसके बाद हम हेल्प करते हैं। आप जिस लाइन में हो, उस लाइन में हेल्प करते हैं। एक से शादी की होगी, फिर भी हमें हर्ज नहीं और शादी नहीं करोगे फिर भी हर्ज नहीं है। लेकिन आप सभी का डिसीजन समाधानपूर्वक होना चाहिए। नहीं तो फिर हमारे लिए सभी की शिकायत आएगी, और हमारे लिए जिस इंसान की शिकायत आएगी, तो उस इंसान को हमारे लिए अभाव हो जाएगा तो उसका बिगड़ेगा। इसलिए मैं इन सब चीजों में नहीं पड़ता। सामनेवाले का बिगड़ेगा तो उसकी जिम्मेदारी मेरी है। लेकिन अगर मुझ पर जरा भी अभाव आए तो उसका क्या होगा? इसलिए हम कुछ नियमसहित ही रहते हैं। हम नियम से बाहर नहीं जाते। नियम से बाहर हम नहीं चलते। उसके जो लॉ हैं, वही लॉ हैं, उसी में रहना पड़ता है।

मन-वचन-काया, भावकर्म-द्रव्यकर्म-नोकर्म, सबकुछ दादा को अर्पण करके, 'मैं अनंत शक्तिवाला हूँ, मैं अनंत ब्रह्मचर्य शक्तिवाला हूँ' ऐसा सब बोल सकते हो। क्योंकि इस विषय में से पार निकलना, यह उग्र गुजारना, यह सब बहुत मुश्किल है। दादा तो, अगर तुम्हें इस तरफ जाना हो तो उसमें मदद करेंगे और शादी करनी हो तो शादी में मदद करेंगे। दादा को इसमें कुछ लेना देना नहीं है। तुम अपना तय करो! तुम में क्या माल भरा हुआ है? मैं कहाँ गहराई में उतरूँ और मेरे पास इतना टाइम भी नहीं है। इसलिए तेरी दुकान का माल तुझे पहचानना है। यानी कि सभी को अपने आप समझ लेना है। मैं क्या कहता हूँ कि शादी करने पर भी तुम्हारा मोक्ष चला नहीं जाएगा। शादी नहीं करनी हो तो यह निश्चय मजबूत करो और इसमें स्ट्रॉंग रहो। दो में से एक ओर की एक्जेक्टनेस पर आ जाना चाहिए। वर्ना बाकी सब में तो टकराव होगा।

जो भी विचार आएँ, उन सभी विचारों को देखना। अच्छे-बुरे विचार तो आते ही हैं! जो भरे हैं, वही आते हैं, और जितने

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आते हैं उतने चले जाते हैं, साफ करके जाते हैं। इसलिए अगर खराब विचार आएँ तो घबराना मत। पहले तो ब्रह्मचर्य नहीं था, ज्ञान नहीं था तब हर एक बुरे विचार के साथ तन्मयाकार होकर उसी तरह करता था न? अब तन्मयाकार नहीं होते और बस इतना ही है कि बुरे विचार आते हैं। लेकिन उन्हें देखना और जानना है। खराब और अच्छा-गलत भगवान के वहाँ नहीं है। वह सब डिस्चार्ज होता रहता है। वह सारा मन का स्वभाव है। तुम सभी को तो रोज़ इकट्ठे होकर एकाध घंटा ब्रह्मचर्य संबंधित सत्संग रखना चाहिए। हमें तो मोक्ष से काम है न? और तुम्हें हम ऐसी जबरदस्ती भी नहीं करते कि शादी करनी है। हमारा किसी तरह का आग्रह नहीं होता। क्योंकि तुम्हारा पिछले जन्म का ब्रह्मचर्य का भाव भरा होगा तो 'शादी करो' हम ऐसा दबाव भी नहीं डाल सकते न! इसलिए हम तो ऐसा कुछ नहीं कह सकते कि 'ऐसा ही करो'। आपकी मजबूती चाहिए। हम बार-बार आपको विधि कर देंगे और हमारा वचनबल काम करेगा, हेल्प करेगा! इसलिए इस तरफ जाना हो तो इस तरफ, वह तुम्हीं को तय करना है।

प्रश्नकर्ता : वह तय तो कर ही लिया है।

दादाश्री : हाँ, तय किया है और व्रत भी लिया है। लेकिन व्रत में भंग हुआ हो तो पश्चाताप लेना पड़ेगा। अपने यहाँ एक-एक घंटा प्रतिक्रमण करते हैं। मन में जरा भी बदलाव हुआ हो, मुँह पर नहीं लेकिन विचार से, और दूसरा कुछ भी नहीं किया हो लेकिन वर्तन में जरा सा भी 'टच' हो गया हो, और यों 'टच' होने से आनंद हुआ हो, यों हाथ लगाने से वैसा हो जाए, तो आपको एक घंटा उसका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। यानी ऐसा सब करोगे तो आगे जमेगा और यदि इसमें से पार उतर गए और ३५-३७ साल के हो गए तो तुम्हारा काम हो जाएगा। मतलब अकाल के ये दस-पंद्रह साल निकालने हैं! और अपना यह ज्ञान है, इसीलिए यह सब कह रहा हूँ न! वर्ना ब्रह्मचर्य पालन के

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लिए किसी को नहीं कहता। इस कलियुग में ब्रह्मचर्य तो करने जैसी चीज ही नहीं है। इस कलियुग में सर्वत्र जहाँ-तहाँ विचार ही मैले हैं और तुम्हारी तो टोली ही अलग है, इसलिए चल सकता है। तुम सभी तो एक विचार के और तुम सभी साथ में रहो तो तुम सभी को ऐसा ही लगेगा कि अपनी दुनिया बस इतनी ही है, दूसरी अपनी दुनिया नहीं है, शादीवाली दुनिया अपनी नहीं है। अगर दो-तीन शराबी हों तो वे साथ बैठकर पीते हैं और फिर ऐसा समझते हैं कि हम तो तीन ही है, अब कोई है ही नहीं! जैसे-जैसे उन्हें चढ़ती जाती है, वैसे-वैसे फिर क्या बोलता है? मैं, तू और तू! हम तीन ही लोग, बस। इस दुनिया के मालिक हम सब ही हैं।

ज्ञानी मिटाए अनंतकाल के रोग

तुम पवित्र (प्योर, साफ) हो तो कोई नाम देनेवाला नहीं है! पूरी दुनिया विरोध करे, फिर भी मैं अकेला (तुम्हारे साथ) हूँ। मुझे पता है कि तुम साफ हो, तो मैं किसी से भी निपट लूँगा, ऐसा हूँ। मुझे शत प्रतिशत भरोसा होना चाहिए। तुम तो दुनिया से नहीं निपट सकोगे, इसलिए मुझे तुम्हारा रक्षण करना पड़ता है। इसलिए मन में घबराना मत, जरा भी मत घबराना। हम साफ हैं, तो दुनिया में कोई नाम देनेवाला नहीं है! इस दादा की बात दुनिया में कोई भी करे तो दादा दुनिया से निपट लेंगे। क्योंकि बिल्कुल साफ इंसान हैं, जिनका मन जरा भी नहीं बिगड़ा है। तुम्हें साफ रहना है। तुम साफ हो तो तुम्हारे लिए ये दादा दुनिया से निपट लेंगे। लेकिन अगर भीतर से तुम मैले हो, तो मैं कैसे निपटूँगा? वना फिर शादी कर लो। दो में से एक डिसीजन अपने आप ले लो। मैं इसमें हेल्प करूँगा और शादी करोगे तो उसमें भी तुम्हें हेल्प करूँगा। हेल्प करना वह मेरा फर्ज है। बाद में यदि तुम्हारा निश्चय नहीं डिंगेगा तो मैं तुम्हें वाणी का वचनबल दूँगा। इस सत्संग में रहोगे तो तुम यह कर सकोगे, इसकी शत प्रतिशत गारन्टी!

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं (खं-2-१६)

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दादा हैं, तब तक सभी रोग निकल जाएँगे! क्योंकि दादा में कोई रोग नहीं है! इसलिए जिसे जो रोग निकालने हों, वे निकल जाएँगे। मुझमें पोल होती तो तुम सबका काम नहीं हो पाता! विषय दोष होना, वह सबसे बड़ा जोखिम है! सभी अणुव्रत, सभी महाव्रत टूट जाते हैं!! करोड़ों जन्मों के बाद भी विषय छूटे ऐसा नहीं है। यह तो सिर्फ ज्ञानीपुरुष के पास उनकी आज्ञा में रहने से छूट सकता है। और हमें यदि विषय के जरा से भी विचार आ रहे होते तो भी आपका विषय नहीं छूटता। लेकिन ज्ञानीपुरुष को कभी विषय का विचार तक नहीं आता। इसलिए जैसा ब्रह्मचर्य पालन करना हो वैसा कर सकोगे। सच्चा भाव है न! सच्चा निमित्त और सच्चा भाव, ये दो यदि मिल जाएँ तो इस दुनिया में उसे कोई नहीं तोड़ सकता।

जबरदस्त कृपा पात्र हो सकते हो, ऐसा है।। तुम तुम्हारे घर रहो और दादा उनके घर रहें, फिर भी तुम पर कृपा रह सकती है, लेकिन तार जोड़ने आने चाहिए! एक तार में भी जरा सी गलती होगी, तो पंखे को दबाते रहोगे फिर भी पंखा नहीं घूमेगा। इसलिए फ्यूज़ बदल लो! तार में तो ज्यादा कुछ नहीं बिगड़नेवाला, शायद कभी सड़ जाए, लेकिन फ्यूज़ बदलना पड़ता है। यह तो काम निकाल लेने जैसा अवसर आया है।

इस पतंग की डोर तुम्हारे हाथ में सौंप दी! अब पतंग उलट जाए तो ऐसे डोर खींचना। यह तो जब तक पतंग की डोर हाथ में नहीं थी, तब तक अगर पतंग उलट भी जाए तो हम क्या कर सकते थे? अब तो पतंग की डोर हाथ में आ गई है तो फिर दिक्कत नहीं है।

[ १७ ]

अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यक

बिना निराई किए हुए खेत

ब्रह्मचर्य को तो पूरी दुनिया ने 'एक्सेप्ट' किया है। ब्रह्मचर्य के बिना तो कभी भी आत्मा प्राप्त हो ही नहीं सकता। जो ईंसान ब्रह्मचर्य के विरुद्ध होता है, उसे आत्मा कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। विषय के सामने तो निरंतर जागृत रहना पड़ता है। एक क्षण भर की भी अजागृति नहीं चलेगी।

प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य और मोक्ष का संबंध-साझेदारी कितनी ?

दादाश्री : बहुत लेना-देना है। ब्रह्मचर्य के बिना तो आत्मा का अनुभव पता ही नहीं चल सकता न! 'आत्मा में सुख है या विषय में सुख है' यह पता ही नहीं चलेगा न?!

प्रश्नकर्ता : तो फिर जो अब्रह्मचारी मोक्ष में गए हैं, वह कैसे? जो जो मोक्ष में गए, वे सभी ब्रह्मचारी नहीं थे।

दादाश्री : ऐसा कोई नियम नहीं है। ब्रह्मचर्य खुद को रहना चाहिए। और 'वह जरूरी है,' इसमें ऐसे पॉजिटिव रहना चाहिए। ब्रह्मचर्य के लिए कभी नेगेटिव रहे और आत्मा प्राप्त हो, यह बात ही गलत है। उसे विषय बिल्कुल भी पसंद नहीं हो, फिर भी करना पड़ता हो तो आत्मा प्राप्त हो सकेगा। बाकी जो विषय के तरफदार होते हैं, उन्हें आत्मा प्राप्त हो ही नहीं सकता। विषय के सामने तो निरंतर जागृत रहना पड़ता है और आत्मा प्राप्त हुए बिना जागृति आ ही नहीं सकती। जैन साधुओं को जागृति रखनी

अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यक (खंड-2-१७)

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नहीं पड़ती फिर भी ब्रह्मचर्य रहता है क्योंकि सिर्फ वे ही गेहूँ साफ करके लाए थे। वैसे गेहूँ खेत में बोने के बाद उनके लिए खेत में निराई के लिए कुछ बचता ही नहीं है न! जबकि इन सभी लड़कों ने तो सभी तरह के अनाज इकट्ठे करके डाल दिए थे। इसलिए इन्हें अब सिर्फ गेहूँ रहने देना है और बाकी सब की निराई कर देनी है। तो अब निराई करते-करते दम निकल रहा है। और इन्हें तो रोज निराई करनी पड़ती है, वर्ना फिर गेहूँ के साथ बाकी सभी उग आता है। कोदो उगता है, एरंड उगता है, सबकुछ होता है। इन्होंने आत्मा प्राप्त किया है इसलिए जागृति खड़ी हो गई। इसलिए अब निरंतर जागृत रह सकते हैं।

प्रश्नकर्ता : हमारे जैसे जल्दी निराई नहीं कर सकते। क्योंकि हम घास लेकर आए हैं।

दादाश्री : तुम्हें निराई करने की जरूरत ही नहीं है। तुम्हें कहीं बौम्बे सेन्ट्रल नहीं जाना है। तुम्हें तो माउन्ट आबू घूमने जाना है न? जिसे बौम्बे सेन्ट्रल जाना है, उसकी बात अलग है। जिसे माउन्ट आबू घूमने जाना हो उसे किसी भी चीज की निराई करने की जरूरत नहीं है।

प्रश्नकर्ता : कुछ पौधे तो ऐसे होते हैं कि उनके लिए सख्त परिश्रम करना पड़ता है। तब क्या करना चाहिए?

दादाश्री : उससे अच्छा तो निराई रहने देना और अंदर जो उगा वही सही। बहुत निराई करनी हो तो कहाँ माथा पच्ची करेंगे? निराई करने की भी हद होनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : फिर भी निराई करनी हो तो क्या करना चाहिए?

दादाश्री : जोत देना, उखाड़ देना। बाद में फिर धान के पौधे लगा देना।

ये जो त्यागी ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, वे पहले साफ करके

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

लाए हैं। इसलिए उन्हें निराई नहीं करनी पड़ती। नींद में भी ब्रह्मचर्य चलता रहता है।

नूर झलकता है ब्रह्मचर्य का

सचमुच में ब्रह्मचर्य तो वह है कि मुँह पर जबरदस्त नूर हो। ब्रह्मचारी पुरुष तो कैसा होता है? इन लड़कों में कहाँ तेज दिखता है? क्योंकि ये सभी ‘ऑवरड्राफ्टवाले’ हैं। इसलिए जितनी बैंकों ने उधार दिया, उतना सभी कुछ लेकर आए है। तो अभी जो ब्रह्मचर्य पालन कर रहे हैं, बल्कि वह सारा तो बैंकों में भर-भरकर थक गए है। अभी तक बैंकों में ‘पार वैल्यू’ नहीं आई है। ‘पार वैल्यू’ होने के बाद चेहरे पर लाइट आएगी। उस लाइट को आते-आते तो बहुत टाइम लगेगा। फिर भी इन्हें चौबीसो घंटे जागृति रहती है। क्योंकि आत्मा प्राप्त हुआ है, इसलिए आत्मा की जागृतिवाले हैं। और इस ब्रह्मचर्य के लिए भी जागृति चाहिए। शायद आत्मा की जागृति नहीं हो और जरा सा झोंका आ जाए तो चलेगा, लेकिन ब्रह्मचर्य के लिए तो जरा सा भी झोंका खाए तो चलेगा ही नहीं न! चारों तरफ से साँप घुस गए, जिन्होंने ऐसा देखा तो उन्हें नींद नहीं आती। जिन्होंने नहीं देखा, वे सो जाते हैं। साँप देख लेने के बाद कैसे सो सकते हैं?

ये लड़के दीक्षा लेने की भावनावाले हैं। अंदर खुद का मोक्ष तो हो ही गया है। इसलिए उसे ढूँढने की तो इच्छा होती ही नहीं न! खुद का मोक्ष हुआ हो तो जगत् कल्याण करने की भावना होती है, नहीं तो अगर खुद का ही कल्याण नहीं हुआ हो, वहाँ जगत् कल्याण करने की भावना कैसे होगी? ये ब्रह्मचारी क्या कहते हैं कि, ‘हमारा तो कल्याण हो गया, अब हमें जगत् का कल्याण करना है, तो हमें क्या करना चाहिए?’ तब मैंने उनसे कहा, ‘अब शादी कर लो।’ तब वे कहते हैं कि ‘नहीं, हमें शादी तो करनी ही नहीं है। शादी करने से जगत् का कल्याण करने में दिक्कत आएगी, ऐसा है।’ तब मैंने उनसे

अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यक (खं-2-१७)

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कहा कि, 'तो तुम ब्रह्मचर्य पालन करो तो तुम जगत् का कल्याण कर सकोगे।'

दोनों में से उच्च कौन सा?

प्रश्नकर्ता : इतने-इतने से लड़के ब्रह्मचर्य में क्या समझ सकते हैं? ब्रह्मचर्य तो एक उम्र के बाद ही आ सकता है न?

दादाश्री : नहीं, ये लोग तो ब्रह्मचर्य के बारे में सही तौर पर समझ गए हैं! ऐसा है न, कि यह तो हमें ऐसा लगता है, लेकिन तेरह साल के बाद वह ब्रह्मचर्य के बारे में समझने लगता है। क्योंकि जब तेरह साल का होता है, तभी से इमोशनल हुए बिना रह ही नहीं सकता। फिर वह मोशन में नहीं रह सकता।

प्रश्नकर्ता : अब, दो तरह के ब्रह्मचर्य है। एक अपरिणित ब्रह्मचर्य दशा और दूसरा शादी करने के बाद पालन करे, वह। इनमें से उच्च कौन सा?

दादाश्री : शादी करके पालन करना उच्च कहलाता है। लेकिन शादी करके पालन करना मुश्किल है। अपने यहाँ कई शादी करके ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, लेकिन वे चालीस की उम्र से ज्यादावाले हैं।

प्रश्नकर्ता : तो फिर शादी किए बिना जो ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, वह 'अनटेस्टेड' कहलाएगा न?

दादाश्री : नहीं। वह 'अनटेस्टेड' नहीं है। उसे खुद को ही शादी करने में रुचि नहीं होती। उसका कोई क्या कर सकता है? जिसे शादी करने में रुचि ही नहीं हो, उसके साथ हम जबरदस्ती कैसे कर सकते हैं? जबरदस्ती करनी चाहिए? मैं तो सभी से क्या कहता हूँ कि आप दो शादियाँ करो, आपको मोक्ष में दिक्कत नहीं आएगी। मेरे द्वारा जो ज्ञान दिया गया है, वह ज्ञान ही आपको मोक्ष में ले जाएगा, ऐसा है, लेकिन सिर्फ हमारी आज्ञा का पालन करना।