समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
पृष्ठ 54, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
(पूर्वार्ध)
खंड : १
विषय का स्वरूप, ज्ञानी की दृष्टि से
[ १ ]
विश्लेषण, विषय के स्वरूप का
कीचड़ में ठंडक का मजा
मनुष्य होकर भी इस पाँच इन्द्रियों के कीचड़ में क्यों पड़ा है, वही आश्चर्य है! भयंकर कीचड़ है यह तो! लेकिन इतना नहीं समझने से, जगत् अभानता में चल रहा है। यदि थोड़ा सा सोचे तब भी, ऐसा समझ में आ सकता है कि कीचड़ है लेकिन लोग सोचते ही नहीं हैं न?! निरा कीचड़ है। तो मनुष्य क्यों ऐसे कीचड़ में पड़े हुए हैं? तो इसलिए कि ‘और किसी जगह पर साफ-सुथरा नहीं मिलता। इसलिए ऐसे कीचड़ में सो गया है।’
प्रश्नकर्ता : यानी कीचड़ के प्रति अज्ञानता ही है न?
दादाश्री : हाँ, उसके प्रति अज्ञानता है। इसीलिए कीचड़ में पड़ा है। फिर यदि इसे समझने का प्रयत्न करे तो समझ में आए ऐसा है, लेकिन खुद समझने का प्रयत्न ही नहीं करता न!
कोई पूछे कि क्या जानवरों को ये विषय प्रिय हैं? तो मैं