समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
किस समझ से विषय में... (खं-2-1)
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दादाश्री : देखते ही रहना है, देखने के बाद चंद्रेश से कहना है कि इनके प्रतिक्रमण करो। मन-वचन-काया से विकारी दोष, इच्छाएँ, चेष्टाएँ, वे सभी दोष जो हुए हैं, उनका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। विषय के विचार आएँ लेकिन फिर भी खुद उनसे मुक्त रहे तो कितना आनंद होगा? तो अगर विषय से हमेशा के लिए छूट जाएगा तो कितना आनंद होगा?
मोक्ष जाने के चार स्तंभ हैं। ज्ञान-दर्शन-चारित्र और तप। अब तप कब करना होता है? मन में विषय के विचार आ रहे हों और खुद का स्ट्रॉंग निश्चय हो कि मुझे विषय भोगना ही नहीं है, तो इसे भगवान ने तप कहा है। खुद की किंचित्मात्र भी इच्छा नहीं हो, फिर भी विचार आते रहें तो वहाँ तप करना है।
अब्रह्मचर्य के विचार आएँ लेकिन ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगता रहे तो वह बहुत बड़ी बात है। ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगते रहने से किसी को दो साल में, किसी को पाँच साल में, लेकिन वैसा उदय आ जाता है। जिसने अब्रह्मचर्य जीत लिया, उसने पूरा जगत् जीत लिया। ब्रह्मचर्यवाले पर तो शासन देवी-देवता बहुत खुश रहते हैं।
लोकदृष्टि से उल्टा ही चलता रहता है न? लेकिन जब ज्ञानीपुरुष की मौजूदगी होती है, तब ब्रह्मचर्य पालन किया जा सकता है, वर्ना नहीं कर सकते। एक भी विचार बिगड़ना नहीं चाहिए। विचार बदला कि सबकुछ बिगड़ा। किसी भी तरह एक भी विचार नहीं बदलना चाहिए। यह ज्ञान है इसलिए जागृति तो है ही हमें! जागृति है इसलिए अगर विचार नहीं बदलेगा तो कुछ भी नहीं होगा। फिर भी विचार बदल जाए तो प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। क्योंकि वह पिछला हिसाब है। वह एक जन्म में जो बिगड़ गया है, उसे चुका दो।
यदि सावधान रहने जैसा हो तो वह सिर्फ विषय से। सिर्फ विषय को जीत ले तो बहुत हो गया। उसका विचार आने से पहले ही उखाड़ देना पड़ेगा। अंदर विचार उगा कि तुरंत ही उखाड़
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देना पड़ेगा। दूसरा, यों अगर नजर मिल गई किसी से तो तुरंत हटा देनी पड़ेगी। वर्ना वह पौधा जरा भी बड़ा हुआ कि तुरंत उसमें से वापस बीज डलेंगे। इसलिए उस पौधे को तो उगते ही निकाल देना पड़ेगा। तुम्हें पता चले कि यह गुलाब का पौधा नहीं है, यह कुछ और है, तो तुरंत उखाड़कर फेंक देना।
जिस संग में ऐसा लगे कि हम फँस जाएँगे तो उस संग से बहुत ही दूर रहना, वर्ना एक बार फँस गए तो बार-बार फँसते ही जाओगे, इसलिए वहाँ से भाग जाना। फिसलनवाली जगह हो और वहाँ से भाग जाओगे तो फिसलोगे नहीं। सत्संग में तो दूसरी ‘फाइलें’ नहीं मिलेंगी न? सभी एक जैसे विचारवाले मिलते हैं न?
अंकुर फूटते ही उसे उखाड़ देना
मन में विषय का विचार आया कि तुरंत उसे उखाड़ देना चाहिए और कहीं आकर्षण हुआ कि तुरंत ही प्रतिक्रमण करना चाहिए। जो इन दो शब्दों को पकड़ ले, उसका ब्रह्मचर्य हमेशा रहेगा। हमें ऐसा लगता है कि यह विषय-विकार का आकर्षण हुआ कि तुरंत प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए और कोई विषय-विकार का विचार अंदर से उगा तो वह पौधा तुरंत ही उखाड़कर बाहर फेंक देना। बस, जो ये दो चीजें करे, उसे फिर दिक्कत नहीं होगी।
प्रश्नकर्ता : लेकिन जागृति और यह, दोनों एक साथ रह सकते हैं ?
दादाश्री : नहीं, जागृति होगी तभी यह हो पाएगा, वर्ना नहीं हो पाएगा न!
यह पौधा उगने लगे तभी से समझ जाना कि यह पौधा कट्टेदार है। इसलिए उसे उगते ही उखाड़कर फेंक देना। वर्ना अगर चिपक जाएगा तो उसके कांटों से पूरे शरीर पर जलन होगी। इसलिए फिर से नहीं उगे उस तरह से फेंक देना। उसी तरह जब इस
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मिश्रचेतन के विचार आएँ तो उगने ही मत देना। उन्हें तो उखाड़ ही देना, तो एक दिन इससे हल आएगा। वर्ना यदि एक भी उगा तो कितने ही जन्म बिगाड़ देगा। भगवान ने विषय के पौधे को ही उखाड़ देने को कहा है। अन्य पौधे तो भले ही उगें, वे जोखिमवाले नहीं हैं लेकिन मिश्रचेतन जोखिमवाला है। अनादिकाल का अभ्यास है, इसलिए मन वापस यही चिंतवन करता रहता है। उससे वापस विषय का पौधा उगता है। मूंग में पानी डालें तो उग जाता है, वह नीचे जड़ डालेगा। तभी से हम समझ जाते हैं कि यह तो पौधा बनेगा। उसी तरह इसमें विचार आते ही उसे उखाड़कर फेंक देना। सिर्फ यह विषय ही ऐसा है कि छोट सा पौधा बनने के बाद फिर वह जाता नहीं है। इसीलिए उसे जड़ से ही उखाड़कर खींच निकालना चाहिए।
अब यदि ऐसी जागृति रहे तो इंसान आरपार जा सकेगा, वर्ना यह तो अभानता है। यह तो चादर में लिपटा हुआ मांस है। पूरी दुनिया का सारा कचरा इस शरीर में हैं, फिर भी इस चादर की वजह से कितना मोह होता है! वह मोह किस से उत्पन्न होता है? अजागृति से! फिर बाद में पछताना भी पड़ता है न? पछताना यानी क्या? पश्चाताप। पश्चाताप यानी अंदर चुभता रहे। उसके बजाय तो जागृति रहे तो कितना अच्छा! जागृति यदि नहीं रह पाए तो फिर शादी कर। हमें उसमें हर्ज नहीं है। शादी यानी निकाली चीज़ । नहीं तो फिर जागृति रखनी पड़ेगी। अभी तक निरी अजागृति ही थी। यह तो उसमें से यह जागृति रखना बाकी रहा। एक सौ आठ दीये हों, उनमें से बारह दीये तो जलाए। बाद में तेरहवाँ, चौदहवाँ ऐसे जलाते जाना।
प्रश्नकर्ता : जागृतिपूर्वक भान में होने के बावजूद आकृष्ट हो गए, और अपना वहाँ कुछ चला नहीं, तो क्या करना चाहिए? उसका कितना दोष लगता है?
दादाश्री : दोष तो है ही न! वैद्य ने कहा हो कि मिर्च
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मत खाना और हम मिर्च खा लें, तो क्या होगा? लेकिन फूलिशा बहुत नहीं होते, कुछ ही होते हैं और यदि उसने मिर्च खाई तो फिर उसका रोग बढ़ेगा।
प्रश्नकर्ता : लेकिन अब उसे क्या करना चाहिए? उपाय तो होना चाहिए न?
दादाश्री : प्रतिक्रमण करना है। और क्या?
प्रश्नकर्ता : लेकिन क्या ज्ञानी को नहीं बताना चाहिए? जिन्होंने आज्ञा दी हो, उन्हें बताना तो पड़ेगा न?
दादाश्री : हाँ, बता दिया, फिर भी प्रतिक्रमण करने हैं। बाकी, अगर वह मिर्च खा ले तो, उसमें ज्ञानी थोड़े ही जहर खा लेंगे?
कभी अंदर खराब विचार उगे और उसे निकाल देने में देर हो जाए तो जरा बड़ा प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। वर्ना विचार उगते ही तुरंत निकाल देना चाहिए। उखाड़कर तुरंत फेंक देना चाहिए। बाकी, यह विषय-विकार ऐसा है कि जिसे एक सेकन्ड के लिए भी, जरा सा भी नहीं रहने देना चाहिए। वर्ना पेड़ बनते देर नहीं लगेगी। इसलिए उगते ही तुरंत उखाड़कर फेंक देना। जैसे कि अगर हमें गेहूँ बोने हों और तंबाकू का पौधा उग जाए तो उसे तुरंत निकाल देते हैं, उसी तरह इसमें भी विषय को उखाड़ देना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : विषय का अज्ञान, वह क्या है?
दादाश्री : बगीचे में क्या बोया है, वह जब उगे तब पता चलता है कि यह तो धनिया उगा है, यह तो मेथी उगी है, उसके पत्तों से पता चलता है न? वैसा ही विषय के बीज का है, उगते ही उसे वहाँ से खींच लेना चाहिए।
जो पड़े हुए बीज उखाड़ देता है, उन्हें उखाड़ देने के बाद जो विषय रहे, वह विषय है ही नहीं। पेड़ है तो भले ही रहा, बारिश हो तो भले ही हो। ऐसा मान लेना कि अगर यहाँ पर
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बेरी हो तो उसका बीज तो एक फर्लाँग की दूरी पर जाकर भी उग सकता है। उस बीज को हवा कहीं पर भी खींचकर ले जा सकती है, इसलिए हमें बेरी के नीचे ही नहीं, लेकिन आसपास की सभी जगह पर उगे हुए बीजों को उखाड़ देना चाहिए। बीज किसे कहते हैं? जब अन्य संयोग मिल जाएँ, तब पड़ा हुआ बीज उग निकलता है, उगते ही उसे उखाड़ देना चाहिए।
दो प्रकार के विषय हैं, एक चार्ज और दूसरा डिस्चार्ज। चार्ज बीज को धो देना चाहिए। वास्तव में तो विचार आना ही नहीं चाहिए। ज्ञानीपुरुष को लक्ष्मी के और विषय के विचार ही नहीं आते, तो फिर बीज गिरने की और उगने की बात ही कहाँ रही? यदि आपको विचार आएँ तो आप उन्हें उखाड़ देना, तो फिर विचार नहीं उगेगे। एक-एक को ऐसे उखाड़ देना। यह तो अक्रम ज्ञान है, उससे अज्ञान चला गया, लेकिन पिछला माल है, इसलिए चेतावनी देनी पड़ती है। इन बीजों का स्वभाव कैसा है कि गिरते ही रहते हैं। आखें तो तरह तरह का देखती हैं, उससे अंदर बीज गिरते हैं तो फिर उन्हें उखाड़ देना चाहिए। होटल को देखने से खाने की इच्छा होती है न? उसके जैसा है। हमें तो मोक्ष में जाना है इसलिए सावधान रहना है। आखों से देखने पर अगर जरा सा भी आकर्षण होता है तो वह भयंकर रोग है, ऐसा समझना। जब तक बीज के रूप में है, तब तक उपाय है, बाद में कुछ नहीं हो सकता।
चित्त आकृष्ट होता है, रास्ते चलते...
प्रश्नकर्ता : यहाँ घर में बैठे हुए हों तो चित्त इधर-उधर नहीं होता, लेकिन बाहर रास्ते पर जरा निकलें तो रास्ते तो स्त्री रहित होते नहीं और इस तरफ विषय की गाँठ फूटे बिना रहतीं नहीं।
दादाश्री : और आपको बाहर निकले बिना चलेगा नहीं! बाहर कुछ लेने जाना पड़ता है, नौकरी-व्यापार के लिए जाना पड़ता
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है और विषय खड़े हुए बिना रहता नहीं और इसलिए उसका प्रतिक्रमण किए बिना चलता नहीं। प्रतिक्रमण करेंगे तो हल जाएगा, वर्ना जो आकर्षण हुआ था वह तो फिर चिपक ही जाएगा। बाहर आना-जाना पड़ता है, उसके बिना चलेगा नहीं, घर बैठे रहे तो दुनिया में चलेगा नहीं। 'व्यवस्थित' के हिसाब से जाना पड़ता है और वह चिपके बिना नहीं रहता। जागृति तो होती है, फिर भी पिछले जन्म के सारे मेल हैं न, इसलिए आकर्षण होता है और वापस से झंझट हुए बिना नहीं रहता। अतः अगर घर आकर प्रतिक्रमण करें तो वह उखड़ जाएगा।
प्रश्नकर्ता : प्रतिक्रमण ठीक से नहीं हो पाते।
दादाश्री : प्रतिक्रमण करने का निश्चय करोगे तो होगा। प्रतिक्रमण तो अवश्य करने ही चाहिए। प्रतिक्रमण करने के बाद मन साफ हो जाता है।
यह फिसलनवाला काल कहलाता है। सत्युग में से द्वापर, त्रेता ऐसे फिसलते फिसलते यह आखिरी काल आ रहा है। इसमें ब्रह्मचर्य का महत्व कम हो गया है, इसीलिए यह दशा हो गई है। ब्रह्मचर्य का यदि महत्व रहा होता तो यह दशा होती ही नहीं! संसारी स्थान में हर्ज नहीं, लेकिन लोगों ने ब्रह्मचर्य का महत्व ही उड़ा दिया। इससे फिर खुद की सारी जागृति मंद हो जाती है। हमने यह ज्ञान दिया है, फिर भी कितनों को जैसी होनी चाहिए वैसी जागृति रह नहीं पाती। वर्ना हमारा ज्ञान मिलने के बाद तो कैसी जागृति रहती है? भगवान जैसी जागृति रहती है। तुझे बहुत जागृति रहती है या मंद हो जाती है?
प्रश्नकर्ता : लिमिट का कुछ पता नहीं चलता।
दादाश्री : जागृति ज्यादा हो तो ठोकर नहीं लगेगी? गलती होती है तुझसे? गलती हो जाने के बाद पता चलता है न?
प्रश्नकर्ता : हाँ, बाद में पता चलता है।
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दादाश्री : यदि जागृति ज्यादा हो तो, गलती हो जाने के बाद भी पता नहीं चले, ऐसा नहीं होता बल्कि गलती होने से पहले ही पता चल जाता है और वह चीज़ वापस हो भी सकती है, लेकिन खुद को पहले ही पता चल जाता है और उसके बाद गलती होती है। मतलब कि चीज़ें नहीं रुकतीं लेकिन जागृति ज्यादा हो तो पहले से पता चल जाता है।
प्रश्नकर्ता : यदि हमें निरंतर ब्रह्मचर्य में रहना हो तो जागृति बहुत ज्यादा होनी चाहिए न?
दादाश्री : जागृति, वही आत्मा है और खुद यदि सो जाए तो दूसरे काम हो जाते हैं। अतः जागृति में कोई भी गलत काम नहीं होता और दूसरी गड़बड़ नहीं है न ज्यादा, लेकिन गड़बड़ नासमझी से खड़ी हो गई हैं तो मार खानी पड़ती है न?
प्रश्नकर्ता : यदि खुद विषय में सहमत नहीं होगा तो बचा जा सकता है, उस दिन ऐसी बात हुई थी। तो उसमें खुद की स्थिरता कैसे आ सकती है?
दादाश्री : हाँ लेकिन सहमत यानी कि निश्चय में से कभी भी सहमति न छूटे। ऐसी सहमति हो तो फिर कुछ नहीं होगा, लेकिन वह छूटे बिना रहता नहीं है न! क्योंकि कर्म के उदय से जब ऐसा होना होता है, तब निश्चय छूट जाता है और ऐसा हो जाता है। इसलिए तुझे क्या करना है? कि तुझे तो सिर्फ जागृति ही रखनी है कि 'इसमें कभी भी नहीं!' सहमति नहीं छूटे, उसके लिए 'केयरफुल' रहना पड़ेगा, फिर भी अगर उसके बाद गिर गए तो उसमें हर्ज नहीं है। हमें गाड़ी में से नहीं गिरना है, फिर भी गिर गए तो उसे हम 'व्यवस्थित' कहते हैं न? लेकिन क्या जान-बूझकर कोई गिरता है?
आँखें गड़ाएँगे तो दृष्टि बिगड़ेगी न
किसी भी एक तरफ हृदय तो लगा ही रहता है, या तो
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इस तरफ लगा रहता है या उस तरफ रहता है। यहाँ से छूट जाए तो वहाँ लग जाता है, उसके लिए हमें बैठे नहीं रहना चाहिए। इसलिए बहुत सावधान रहने जैसा है। हम यहाँ से छोड़ेंगे, तभी वहाँ लगेगा न? और वहाँ चिपकने लगे उससे पहले ही सावधान हो जाना। आँखें तो गड़ानी ही नहीं चाहिए, नीचे देखकर ही चलना। तू किसी के सामने आँखें नहीं गड़ाना न?
प्रश्नकर्ता : नहीं।
दादाश्री : तब तो बहुत समझदार है, तू जीत गया। आँखें तो कभी भी मत गड़ाना, बहुत शोर मचाए फिर भी। वर्ना यहाँ इस सत्संग में जितना दिल लगा हुआ होगा तो वह भी हट जाएगा।
दूषमकाल में नजर को संभालना। यह दूषमकाल है, इसलिए सावधान रहो, अभी भी सावधान हो जाओ। दृष्टि तो बिल्कुल शुद्ध रहनी चाहिए। पहले के जमाने के सखा लोग तो आँखें फोड़ देते थे। हमें आँखें नहीं फोड़ देनी है, वह तो मूर्खता है। हमें आँखें फेर लेनी है, उसके बावजूद भी अगर देख लिया तो प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। यह प्रतिक्रमण तो एक मिनिट के लिए भी मत चूकना। खाने-पीने में गलती हो जाए तो चलेगा, लेकिन आँखें गड़ाकर देख ही कैसे सकते हैं? संसार में सबसे बड़ा रोग यही है, इसी की वजह से संसार खड़ा है। विषय की नींव पर संसार खड़ा है, मूल में विषय ही है।
विषय तो किसी को भी अच्छा नहीं लगता, लेकिन ये पहले के हिसाब हो चुके हैं, और आँखें गड़ाई तभी से हिसाब शुरू हो गया। वह फिर छोड़ता नहीं है। ये सभी स्त्रियाँ कहीं हमें आकर्षित नहीं करती। जो आकर्षित करती हैं, वह अपना पिछला हिसाब है। इसलिए वहाँ से उखाड़कर फेंक दो, साफ कर दो। अपने ज्ञान के बाद कोई परेशानी नहीं आती, मात्र एक विषय के लिए ही हम सावधान करते हैं। आँखें गड़ाना ही गुनाह है
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और यह समझने के बाद जोखिमदारी बहुत बढ़ जाती है, इसलिए किसी के सामने आँखें मत गड़ाना। आँखें गड़ाने से ही सबकुछ बिगड़ता है। दृष्टि बिगड़ती है, वह भी एकदम से नहीं बिगड़ती। पहले का हिसाब हो तभी आकर्षण होता है। मूल दृष्टि नहीं बिगड़ती, बिगड़ी हुई दृष्टि ही बिगड़ती है।
प्रतिक्रमण के बाद, दंड का उपाय
पिछले जन्म में जो गलती हुई थी, उसी वजह से इस जन्म में नजर पड़ जाती है। हमें नजर नहीं डालनी हो फिर भी नजर पड़ जाती है। नजर पड़ने के बाद हमें आकर्षित नहीं होना हो, फिर भी वापस मन आकर्षित हो जाता है। यानी कि पिछला हिसाब है, इसलिए ऐसा सब हो रहा है। वहाँ पर हमें प्रतिक्रमण करके छूट जाना चाहिए, इसके बावजूद भी अगर वापस नजर पड़ जाए तो फिर से प्रतिक्रमण करना चाहिए, इस तरह सौं-सौ बार प्रतिक्रमण करेंगे तब छूटा जा सकेगा। कुछ पाँच प्रतिक्रमण से छूट जाती हैं। कुछ एक प्रतिक्रमण से छूट जाती हैं।
प्रश्नकर्ता : प्रतिक्रमण करने के बावजूद वहाँ चला जाए, तो वह कमजोरी ही है न? या फिर नीयत चोर हो जाती है? या फिर अंदर, मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार खुद को ठगने लगे है?
दादाश्री : प्रतिक्रमण करने के बावजूद भी कार्य हो जाए, तब तो फिर वह 'व्यवस्थित' है। वह 'व्यवस्थित' के हाथ में आ गया ऐसा कहा जाएगा, वह व्यवस्थित की गलती है। फिर भी यदि ऐसा बहुत ज्यादा हो रहा हो, तब उसके लिए खास उपवास वगैरह दंड लेना चाहिए, इसे बौधना कहते हैं। जिस तरह गोली चलाई और एक्जेक्ट जगह पर लगे, उसी तरह इसे भी बौधना कहा जाता है। इससे कर्म नहीं बंधते। अतः वापस से यह गलती हो जाए तो वहाँ हमें प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए, साथ-साथ दूसरा
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कोई दंड लेना चाहिए। मन को जो भाता हो, उस दिन वह चीज कम खाना। ऐसा कोई दंड देना चाहिए।
देखना, सामान्य भाव से
स्त्री की तरफ तो सबसे पहले दृष्टि बिगड़ती है। दृष्टि बिगड़ने के बाद आगे बढ़ता है। जिसकी दृष्टि नहीं बिगड़ती उसे कुछ भी नहीं होता। अब अगर तुझे सेफ साइड करनी हो तो दृष्टि मत बिगड़ने देना और दृष्टि बिगड़ जाए तो प्रतिक्रमण करना।
प्रश्नकर्ता : इस विषय-विकारी दृष्टि के परिणाम क्या हैं?
दादाश्री : अधोगति। यह तो पूरे दिन 'चाय' याद आती है। 'चाय' देखते ही दृष्टि बिगड़े तो फिर वह चाय पीए बिना रहेगा क्या? दृष्टि का नहीं बिगड़ना, वह सबसे बड़ा गुण कहलाता है।
भगवान ने कहा है कि दुनिया में सभी चीजें खाना, लेकिन मनुष्य जाति की आँखों में मत देखना और उसके चेहरे को एकटक मत देखना। अगर देखो तो सामान्य भाव से देखना, विषय भाव से मत देखना। आँखों को देखकर पास में रखोगे तो पड़े रहेंगे। वह एक तरफा है, लेकिन यह जीता-जागता जीव तो चिपक जाएगा, उसके बाद एक तरफ रख दोगे तो दावा करेगी। शादी के समारोह में जब स्वागत द्वार पर खड़े रहते हो तो क्या हर एक आनेवाले को एकटक देखते हो? नहीं। वहाँ तो एक आता है और एक जाता है, यों सामान्य भाव से देखते हो। उसी तरह से देखना है। मैंने ज्ञान होने से पहले ही तय किया हुआ था कि सामान्य भाव से देखना है।
ये सभी लोग नहीं होते तो अच्छा होता न? अपने भाव ही नहीं बिगड़ते न?
प्रश्नकर्ता : नहीं, वह तो अपने अंदर भाव ही ऐसे हैं,
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इसीलिए सामने ऐसे निमित्त मिले हैं न? अतः हमें अपने भाव ही तोड़ देने चाहिए, तो फिर निमित्त गले नहीं पड़ेगा न!
दादाश्री : सच कहा है। इसीलिए हम कहते हैं कि भावनिद्रा टालो। ये ऐसे लोग हैं कि सभी तरह के भाव आएँ। उसमें भावनिद्रा नहीं आनी चाहिए, देहनिद्रा आएगी तो चलेगा।
प्रश्नकर्ता : लेकिन भावनिद्रा ही आती है न?
दादाश्री : ऐसा कैसे चलेगा? यदि ट्रेन सामने से आ रही हो तो भावनिद्रा नहीं रखते। ट्रेन से तो एक ही जन्म की मृत्यु है, लेकिन यह तो अनंत जन्मों का जोखिम है। जहाँ चित्र-विचित्र भाव उत्पन्न हों, ऐसा यह जगत् है। उसमें तुझे खुद ही समझ लेना है। भावनिद्रा आती है या नहीं? भावनिद्रा आएगी तो संसार तुझे बाँध लेगा। अब अगर भावनिद्रा आ जाए तो वही, उसी दुकान के शुद्धात्मा से ब्रह्मचर्य के लिए शक्तियाँ माँगना कि, 'हे शुद्धात्मा भगवान, मुझे पूरी दुनिया के साथ ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्तियाँ दीजिए।' यदि हमसे शक्तियाँ माँगांगे तो उत्तम ही है, लेकिन वह तो डायरेक्ट, जिस दुकान से व्यवहार हुआ है, वही माँग लेना सबसे अच्छा।
सुंदर फूल हों तो वहाँ देखने का मन होता है न? वैसे ही इन सुंदर लोगों को देखने का मन हो जाता है और वहाँ पर थप्पड़ पड़ जाती है। इन फूलों को सूंधना, खाना-पीना, लेकिन 'इस' एक ही जगह पर देखने की जरूरत नहीं है, कहीं भी नजर मत मिलाना।
प्रश्नकर्ता : नहीं देखना हो फिर भी यदि सुंदर स्त्री दिख जाए, तब वहाँ क्या करना चाहिए?
दादाश्री : उस समय नजरें मत मिलाना।
प्रश्नकर्ता : नजरें मिल जाएँ तो क्या करना चाहिए?
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दादाश्री : अपने पास प्रतिक्रमण का साधन है, उससे थो देना। नज़रें मिल जाईं, तब तो तुरंत ही प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। इसीलिए तो कहा है न कि मनोहर स्त्री के फोटो या मूर्ति मत रखना।
उस मिठास का पृथक्करण करके तो देखो
अब कहीं भी मीठा लगता है क्या?
प्रश्नकर्ता : मीठा तो लग जाता है, लेकिन वह जोखिमदारी है, ऐसा समझ में आता है।
दादाश्री : जहाँ तक मीठा लग रहा है न, जोखिमदारी भले ही लग रही हो, लेकिन जब मीठा लगने लगे वहाँ पर वह कभी न कभी जोखिमदारी भुला देगा। कर्म के उदय ऐसे-ऐसे आते हैं कि जोखिमदारी भुला देता है। और यह मीठा किस हिसाब से लगता है, वही मुझे समझ में नहीं आता। इसमें कौन सा भाग मीठा है?!
प्रश्नकर्ता : वह क्या भ्रांति से मीठा लगता है?
दादाश्री : भ्रांति से मीठा लग रहा होता, तो भी अच्छा था। यह तो भ्रांति भी नहीं है। इसे कौन मीठा कहेगा?
यहाँ मुंबई में अगर पानी इतना कम हो जाए कि नहाने का भी ठिकाना नहीं पड़े तो इन लोगों की क्या दशा होगी? घर में सभी से एक रूप में बैठ भी नहीं जा सकेगा, इतने बदबूदार हो जाएँगे! यह तो, हररोज़ नहाते हैं फिर भी बदबू आती है न? और यदि नहीं नहाएँगे तब तो सिर फट जाए इतनी बदबू आएगी। ये नहाते हैं फिर भी दोपहर दो बजे कपड़ा घिसकर यदि पानी में निचोड़ें तो पानी खारा हो जाएगा। फिर भी देह को कीमती क्यों माना है? क्योंकि अंदर भगवान प्रकट हुए हैं, व्यक्त हुए हैं। इसलिए अन्य सभी प्रकार की देह की अपेक्षा इसे कीमती माना
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गया है, जबकि लोगों ने इसे किसी और ही तरह से कीमती माना है।
प्रश्नकर्ता : विषय में सबसे ज्यादा मिठास मानी है, तो किस आधार पर मानी है?
दादाश्री : वह मिठास जो उसे महसूस हुई और अन्य किसी जगह पर मिठास देखी नहीं है, इसलिए उसे विषय में बहुत मिठास लगती है। अगर देखने जाएँ तो सबसे ज्यादा गंदगी वहीं पर है, लेकिन मिठास की वजह से उसे अभानता आ जाती है। इसलिए उसे पता नहीं चलता। यदि इस विषय को गंदगी समझे तो उसकी सारी मिठास गायब हो जाएगी।
गलगलिया (वृत्तियों को गुदगुदी होना, मन में मीठा लगना) से ही जगत् फँसा हुआ है। गलगलिया होने लगे तो तुरंत ही ज्ञान हाज़िर कर देना, ताकि उससे सब अलग अलग दिखे और उससे छूटा जा सके।
फिर भी आकर्षण क्यों?
प्रश्नकर्ता : चित्त किसी एक ही जगह पर ज्यादा आकर्षित होता है।
दादाश्री : उस जगह को खोद देना, खोदकर निकाल देना। वह जगह कहाँ है?
प्रश्नकर्ता : एक जगह यानी कुछ अवयवों की तरफ ही दृष्टि ज्यादा जाती है।
दादाश्री : जिसे ऐसा ज्यादा होता हो, उसे शादी कर लेनी चाहिए। सभी जगह दृष्टि बिगाड़ने के बजाय एक कुएँ में पड़ना अच्छा। बाद में, पचास की उम्र में कोई भी नहीं मिलेगी।
चोरी करना अच्छा लगता है? झूठ बोलना, मरना अच्छा लगता
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हैं? तो फिर क्या परिग्रह अच्छा लगता है? तो सिर्फ विषय में ही ऐसा क्या पड़ा हुआ है कि अच्छा लगता है?
प्रश्नकर्ता : बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता, फिर भी आकर्षण हो जाता है। उसका बहुत खेद रहता है।
दादाश्री : ऐसे खेद रहेगा, तो वह चला जाएगा। सिर्फ आत्मा ही चाहिए। तो फिर विषय(का भाव) कैसे हो सकता है? अन्य कुछ चाहिए, तभी विषय होगा न? तुझे विषय का पृथक्करण करना आता है?
प्रश्नकर्ता : आप बताइए।
दादाश्री : पृथक्करण यानी क्या कि विषय क्या ऐसे होते हैं कि इन आँखों को अच्छे लेंगे? कान सुनें तो अच्छा लगता है? और जीभ से चाटने पर मीठा लगता है? एक भी इन्द्रिय को अच्छा नहीं लगता। इस नाक को तो वास्तव में अच्छा लगता है न? अरे, बहुत खुशबू आती है न? इत्र लगाया हुआ होता है न? यदि इस तरह पृथक्करण करेंगे, तब पता चलेगा। पूरा नर्क ही वहाँ पर पड़ा हुआ है, लेकिन इस तरह पृथक्करण नहीं करने की वजह से लोग उलझ गए हैं। वहाँ पर मोह होता है, वह भी आश्चर्य ही है न!
प्रश्नकर्ता : तो वह आकर्षण किस वजह से रहता है?
दादाश्री : नासमझी की वजह से। जिस तरह नासमझी की वजह से तार जोड़न्त रह गया हो तो उसका आकर्षण होता रहता है लेकिन अब समझ में आ गया कि यह तो ऐसा है। पहले तो हम सही बात नहीं जानते थे और ऐसा पृथक्करण किया ही नहीं था न! लोगों ने जो माना, उसी को हमने सच माना कि यही सही रास्ता है, लेकिन अब जब से जाना तब से हम समझ गए कि इसमें तो पोलवाला खाता है। इसमें तो ओहोहोहो..... इतने सारे जोखिम हैं कि इसी वजह से तो पूरा संसार खड़ा है और
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पूरे दिन मार भी इसी की वजह से पड़ती है। उसमें भी यदि इन्द्रियों को अच्छा लगे वैसा हो तो ठीक है, लेकिन यह तो एक भी इन्द्रिय को अच्छा नहीं लगता।
प्रश्नकर्ता : चित्त अभी भी खिंच जाता है, दृष्टि बिगड़ जाती है।
दादाश्री : अपनी बहन हो, वहाँ किस तरह देखते हो?
प्रश्नकर्ता : वहाँ तो कुछ नहीं होता।
दादाश्री : क्यों? वह भी स्त्री ही है न? वहाँ पर क्यों विकार नहीं होता? उसके प्रति विचार क्यों नहीं बिगड़ते होंगे? क्या बहन स्त्री नहीं है?
प्रश्नकर्ता : परमाणुओं का असर रहता होगा, इसलिए?
दादाश्री : यह तो जहाँ पर भाव किए हों, वही अपनी दृष्टि बिगड़ती है। बहन पर कभी भी भाव नहीं किया था, इसलिए दृष्टि भी नहीं बिगड़ती और कुछ लोगों ने बहन पर भी भाव किए हों तो वहाँ पर भी दृष्टि बिगड़ती है!
प्रश्नकर्ता : फिर भी, यों व्यवहार में जब स्त्री के संयोग मिलते हैं, तब यों नजर पड़ ही जाती है।
दादाश्री : नजर पड़ जाना तो स्वाभाविक है। उसमें पिछले जन्म का दोष है लेकिन अब हमें क्या करना चाहिए? नजर पड़ जाए, उसमें तो किसी का कुछ नहीं चलता। तुम भले ही कितना भी पकड़कर रखो, फिर भी आँखों का स्वभाव है देखना, वह देखे बिना रहेगी ही नहीं। हिसाब है, इसलिए देखे बिना रहेगी नहीं।
प्रश्नकर्ता : ऐसा दिन में दो-चार बार हो जाता है। दो-चार बार। तब ऐसा लगता है कि यह कुछ ठीक नहीं हो रहा है।
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दादाश्री : वह और तुम दोनों अलग ही हो न? और वह तो बदलेगा नहीं। जो बदलनेवाला नहीं है, अगर उसे हम बदलने जाएँ तो क्या होगा? लेकिन प्रतिक्रमण से दिन ब दिन बदलाव होता जा रहा है न?
प्रश्नकर्ता : हाँ। उस ओर की स्थिरता यों बढ़ रही है।
राजा जीतने से, जीतेंगे पूरा राज
कृपालुदेव ने तो क्या कहा है कि,
“नीरखीने नवयौवना, लेश न विषय निदान, गणे काष्ठनी पूतड़ी, ते भगवान समान ”
- श्रीमद् राजचंद्र
अक्रम मार्ग में हमें स्त्री को काष्ठ की पुतली नहीं मानना है। हमें आत्मा देखना है। यह तो क्रमिकमार्गवाले काष्ठ की पुतली कहते हैं, लेकिन ऐसा कब तक रह पाएगा? जरा फिर से विचार आ जाए तो उस समय वापस गायब हो जाएगा लेकिन अगर हम शुद्धात्मा देखें तो? यानी नवयौवना को देखकर भीतर चित्त आकर्षित हो गया हो तो वहाँ पर शुद्धात्मा को देखते रहने से सब चला जाएगा, चित्त फिर छूट जाएगा। विषय को जीतने के लिए यदि शुद्धात्मा को देखेंगे, तब निबेड़ा आएगा। वर्ना निबेड़ा नहीं आएगा।
“आ सघव्या संसारनी, रमणी नायकरूप, ए त्यागी त्याग्युं बधुं, केवल शोक स्वरूप ”
- श्रीमद् राजचंद्र
सारा शोक उसी से खड़ा हुआ है। स्त्री का त्याग हुआ, उससे अलग हुए कि पूरा निबेड़ा आ जाएगा। जो निरंतर शोक का ही स्वरूप है। पूरे दिन शोक, शोक और शोक ही रहता
किस समझ से विषय में... (खं-2-1)
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है। यदि शोक ही मिलता रहेगा, तो फिर वह चला जाएगा। वना जो चिपक गया है तो फिर वह छूटेगा ही नहीं न?
“एक विषय ने जीतता, जीत्यो सहु संसार, नृपति जीतता जीतिए, दल, पूर ने अधिकार ”
— श्रीमद् राजचंद्र
एक सिर्फ राजा को जीत लिया तो दल, नगर और अधिकार सबकुछ हमें मिल जाता है। उसकी पूरी सेना वगैरह सबकुछ मिल जाता है। सेना जीतने जाओगे तो राजा को नहीं जीत पाओगे। उसी तरह इस राजा (विषयरूपी) को जीत लिया कि सबकुछ अपने अधिकार में आ जाएगा। तभी तो हम मुक्त रहते हैं न! सिर्फ यह विषय ही ऐसा है कि जिसे जीतने पर सारा राज्य हाथ में आ जाएगा। हमें विषय का विचार तक नहीं आता।
टले ज्ञान और ध्यान...
“विषयरूप अंकुरथी, टले ज्ञान अने ध्यान, लेश मदिरापानथी, छाके ज्यम अज्ञान ”
— श्रीमद् राजचंद्र
एक ही बार यदि विषय भोगा तो सबकुछ बिगड़ जाता है। बाद में अनंत जन्मों का नुकसान होता है और नर्कगति का अधिकारी बनता है। कौन सा ऐसा विषय है कि जो नर्कगति नहीं दिलवाता? जो लोकमान्य है। कोई शादीशुदा ईंसान, उसकी स्त्री को लेकर जा रहा हो तो लोग आपत्ति उठाएँगे?
प्रश्नकर्ता : नहीं उठाएँगे।
दादाश्री : और शादीशुदा नहीं हो और जा रहा हो तो?
प्रश्नकर्ता : तो आपत्ति उठाएँगे।
दादाश्री : वह लोकमान्य नहीं कहलाएगा। वह नर्कगति का
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
अधिकारी बनेगा। दोनों को नर्क में जाना पड़ेगा, दोनों को नर्क में साथ में रहना पड़ेगा, वापस।
प्रश्नकर्ता : 'विषयरूप अंकुरथी....' मतलब?
दादाश्री : अंकुर मतलब अंदर बीज हो, वह विचार आए और उसमें तन्मयाकार हो जाए तो वह अंकुर कहलाता है। वह अंकुर फूटा कि गया... इसलिए हम तय करते हैं न कि विचार आने से पहले खींचकर बाहर फेंक देना। वह अंकुर फूटा कि फिर ज्ञान और ध्यान सबकुछ टूट जाता है, खत्म हो जाता है।
प्रश्नकर्ता : इस अक्रम विज्ञान में भी ऐसा ही होता है?
दादाश्री : ज्ञान और ध्यान मिट जाता है। विचार आए न तो सिर्फ ज्ञान और ध्यान ही नहीं, लेकिन आत्मा भी चला जाता है। क्रमिक में तो ज्ञान और ध्यान चला जाता है और अक्रम में तो, जो आत्मा दिया हुआ है, वह चला जाता है। अतः अंकुर तक नहीं ले जाना चाहिए।
लिंग जारी, उसका जोखिम
इसमें है कुछ भी नहीं। ज्ञान प्राप्त हो जाने पर समझ में आ जाता है कि विषय में है कुछ भी नहीं।
प्रश्नकर्ता : आप के ज्ञान के बाद हम इसी जन्म में विषय बीज से एकदम निर्ग्रंथ हो सकते हैं?
दादाश्री : सभी कुछ हो सकता है। अगले जन्म के लिए बीज नहीं डलेंगे। ये जो भी पुराने बीज हों, उन्हें आप धो देना, नए बीज नहीं डलेंगे।
प्रश्नकर्ता : यानी अगले जन्म में विषय का एक भी विचार नहीं आएगा?
दादाश्री : नहीं आएगा। थोड़ा बहुत कच्चा रह गया होगा
किस समझ से विषय में... (खं-2-1)
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तो पहले के थोड़े बहुत विचार आएँगे लेकिन वे विचार बहुत स्पर्श नहीं करेंगे। जहाँ पर हिसाब नहीं है, उसका जोखिम नहीं है। वह तो अगर लिंक जारी रहे तो उसका जोखिम आता है। ईसान को तो कभी यों ही खुद की माँ के प्रति भी विषय का विचार आ जाता है लेकिन लिंक नहीं होती, इसलिए फिर गायब हो जाता है।
विषय का जरा सा भी ध्यान करे तो ज्ञान भ्रष्ट हो जाता है। 'हतो भ्रष्ट, ततो भ्रष्ट' हो जाता है। जलेबी का ध्यान करने से वैसा नहीं होता। इस योनी के विषय का ध्यान करने से वैसा हो जाता है।
हार-जीत, विषय की या खुद की?
हमने तो कई जन्मों से भाव किए थे। इसलिए हमें तो विषय के प्रति बहुत ही चिढ़। ऐसा करते-करते वे छूट गए। विषय हमें मूलतः अच्छा ही नहीं लगता था लेकिन क्या करें? कैसे छूटें? लेकिन हमारी दृष्टि बहुत गहरी, बहुत विचारशील, यों कैसे भी कपड़े पहने हों, फिर भी सबकुछ आरपार दिखता था, दृष्टि की वजह से यों ही चारों ओर का बहुत कुछ दिखता था। इसलिए राग नहीं होता न? हमें और क्या हुआ कि आत्मसुख प्राप्त हुआ। जलेबी खाने के बाद चाय फीकी लगती है। उसी तरह जिसे आत्मा का सुख प्राप्त हो गया, उसे सभी विषयसुख फीके लगते हैं। तुझे फीका नहीं लगता? जैसा पहले लगता था, वैसा अब नहीं लगता न?
प्रश्नकर्ता : फीका तो लगता है, लेकिन वापस मोह उत्पन्न हो जाता है।
दादाश्री : मोह तो उत्पन्न हो सकता है। वह तो कर्म का उदय होता है। कर्म बंधे हुए हैं, वे मोह उत्पन्न करवाते हैं लेकिन आपको क्या ऐसा लगता है कि खरा सुख तो आत्मा में ही है?
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)
प्रश्नकर्ता : हाँ, ऐसा तो ठीक से लगता है। इस विषय में सुख नहीं है, यह तो पक्का समझ में आ गया है।
दादाश्री : अन्य किसी स्त्री को देखे तो तुझे विचार नहीं आता न ?
प्रश्नकर्ता : आता है कभी-कभार।
दादाश्री : ऐसा होता है, इसका मतलब अभी भी कमी है।
प्रश्नकर्ता : सिर्फ यों साधारण मोह ही होता है, और कुछ नहीं।
दादाश्री : मोह तो फिर घसीट ही ले जाएगा न! इस विषय को जीतना तो बहुत कठिन चीज है। इसे हमारे ज्ञान से जीता जा सकता है। यह ज्ञान निरंतर सुखदायी है न, इसलिए जीत सकते हैं।
उसके सेवन से पात्रता
फिर कृपालुदेव तो क्या कहते हैं, कि
“ पात्र विना वस्तु ना रहे, पात्रे आत्मिक ज्ञान, पात्र थवा सेवो सदा, ब्रह्मचर्य मति मान ”
- श्रीमद् राजचंद्र
ब्रह्मचर्य के सेवन से तो पात्र बनेगा, कृपालुदेव ऐसा कहते हैं। उन्होंने ऐसा नहीं कहा है कि आम मत खाना। जड़ को ही पकड़ा है पूरा। यदि सामनेवाला निर्जीव होता और दावा नहीं करता तो ब्रह्मचर्य सेवन नहीं करते जबकि ये तो दावा करते हैं।
“ जे नववाड विशुद्धथी, धरे शियळ सुखदाय ”
- श्रीमद् राजचंद्र