भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

जिसे इसी देह में आत्मा का स्मष्टवेदन अनुभव करना हो, उसे विशुद्ध ब्रह्मचर्य के बिना इसकी प्राप्ति संभव ही नहीं है। जब तक ऐसी सूक्ष्मातिसूक्ष्म ‘रोंग बिलीफ’ है कि विषय में सुख है, तब तक विषय के परमाणु संपूर्ण रूप से निर्जरित नहीं होंगे। जब तक वह ‘रोंग बिलीफ’ संपूर्ण सर्वांग रूप से खत्म न हो जाए तब तक अति-अति सूक्ष्म जागृति रखनी चाहिए। जरा सा भी झोंका आ जाए तो वह संपूर्ण निर्जरा (आत्म प्रदेश में से कर्मों का अलग होना) होने में अंतराय डालती है।

विषय होना ही नहीं चाहिए। हममें विषय क्यों रहे ? या फिर जहर पीकर मर जाऊँगा लेकिन विषय के गड़दे में गिरूँगा ही नहीं, ऐसा अहंकार करके भी विषय से दूर रहने जैसा है। यानी किसी भी रास्ते से अंत में अहंकार करके भी इस विषय से मुक्त होने जैसा है। अहंकार से ब्रह्मचर्य पकड़ में आता है, जिसके आधार पर काफी कुछ स्थूल विषय जीता जा सकता है और फिर सूक्ष्मता से ‘समझ’ को समझकर और आत्मज्ञान के सहारे संपूर्ण रूप से, सर्वांग रूप से विषय से मुक्ति पा लेनी है।

जब तक निर्विकारी दृष्टि प्राप्त नहीं हुई, तब तक कहीं भी नजरे मिलाना, वह भयंकर जोखिम है। उसके बावजूद जहाँ-जहाँ दृष्टि बिगड़े, मन बिगड़े, वहाँ-वहाँ उस व्यक्ति के शुद्धात्मा का दर्शन करके, प्रकट ‘ज्ञानीपुरुष’ को साक्षी रखकर मन से, वाणी से या वर्तन से हुए विषय से संबंधित दोषों का बहुत-बहुत पछतावा करना चाहिए, क्षमा प्रार्थना करना और फिर से कभी भी ऐसा दोष नहीं हो, ऐसा दृढ़ निश्चय करना चाहिए। यों यथार्थ रूप से आलोचना, प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान होगा, तब विषय दोष से मुक्ति होगी।

जहाँ ज्यादा बिगड़ रहा हो, वहाँ उसी व्यक्ति के शुद्धात्मा से मन ही मन ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगते रहनी पड़ेगी और जहाँ बहुत ही गाढ़ हो, वहाँ घंटों प्रतिक्रमण करके धोना पड़ेगा, तब जाकर ऐसे विषय दोष से छूटा जा सकेगा।

सामायिक में आज तक पहले जहाँ-जहाँ, जब-जब विषय से संबंधित दोष हुए हैं, उन सभी दोषों को आत्मभाव में रहकर, जागृतिपूर्वक देखकर उसका यथार्थ प्रतिक्रमण करना होता है, तब जाकर उन दोषों से

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मुक्ति मिलती है। पूरे दिन में हुए थोड़े से भी विचार दोष या दृष्टि दोष का प्रतिक्रमण करके तथा उन दोषों का, विषय के स्वरूप का, उसके परिणामों का, उसके प्रति जागृति का, उपायों का पृथक्करण सामायिक में होता है। वास्तव में तो विषय दोषों का प्रतिक्रमण ‘शूट ऑन साईट’ करना ही चाहिए। फिर भी अगर अजागृति से छूट गया हो या फिर जल्दी में अधूरा हुआ हो, तो फिर जब सामायिक में स्थिरतापूर्वक संपूर्णतः गहराई से ‘ऐनैलिसिस’ होता है, तब जाकर वे दोष धुलते हैं।

जब विषय की गॉठें फूटती रहती हो, चित्त विषय में ही खोया रहता हो, बाह्य संयोग भी विकार को उत्तेजित करनेवाले मिलें, ऐसे समय में कई बार श्रुतज्ञान भी काम में नहीं आता, वहाँ पर तो तब ‘ज्ञानीपुरुष’ के पास प्रत्यक्ष में ही उलझनों की आलोचना करें, प्रतिक्रमण करें, प्रत्याख्यान करें तभी हल आता है!

विषय रोग पूरी तरह से कपट के आधार पर ही टिका हुआ है और कपट किसी को बता दिया जाए तो विषय निराधार बन जाता है! निराधार विषय फिर कितना खींच सकेगा? विषय को निर्मूल करने के लिए ‘यह’ सबसे बड़ी, मूल और अति महत्वपूर्ण बात है। विषय से संबंधित भले ही कितना भी भयंकर दोष हो गया हो, लेकिन अगर उसकी ‘ज्ञानीपुरुष’ के पास आलोचना की जाए तो दोष से छूटा जा सकता है! क्योंकि इसमें पिछले गुनाह नहीं देखे जाते, उसका निश्चय देखा जाता है! विषय में से छूटने की जो तमन्ना जागृत होती है, वह अगर ठेठ तक टिके तो वह तमन्ना ही विषय से मुक्त करवाती है।

अखंड ब्रह्मचर्य पालन करने का ध्येय, उसमें ब्रह्मचर्य की आवश्यकता, ब्रह्मचर्य की सिद्धि के परिणाम स्वरूप प्राप्त होनेवाली आत्मसिद्धि की पराकाष्ठा, आत्मा का स्पष्ट अनुभव, आत्म सुख का स्पष्ट वेदन इत्यादि की निरंतर चिंतवना विषय की भ्रांत मान्यताओं से मुक्त करवाकर सही दर्शन फिट करवाता है। ऐसी चिंतवनावाली सामायिक बार-बार करनी चाहिए। उससे हर बार नया-नया दर्शन होता रहेगा और परिणामतः ध्येय स्वरूप हुआ जा सकेगा।

खुद का स्वरूप शुद्धात्मा है कि जो सूक्ष्मतम है और विषय मात्र

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स्थूल है। स्थूल को सूक्ष्म कैसे भोग सकेगा? यह तो अहंकार से विषय भोगता है और आरोपण आत्मा पर जाता है! कैसी प्रांति! ‘आत्मा सूक्ष्मतम है और विषय स्थूल हैं। सूक्ष्मतम आत्मा स्थूल को कैसे भोग सकता है?’ ‘ज्ञानीपुरुष’ के इस वैज्ञानिक वाक्य को, खुद के सूक्ष्मतम स्वरूप में ही निरंतर अनुभवपूर्वक रहनेवाली दशा में पहुँचे बिना उपयोग करने लगे तो सोने की कटार पेट में भोंकने जैसी दशा होगी! इस वाक्य का उपयोग उन्हीं के लिए है जो जागृति की परम सीमा तक पहुँच चुके हों। और ऐसी जागृति तक पहुँचे हुए को स्थूल और सूक्ष्म विषय तो खत्म ही हो चुके होते हैं! विषयों से बाहर निकले बिना यदि इस वाक्य को खुद ‘एडजस्ट’ कर ले, उसका जोखिम तो ‘खुद विषय से जकड़ा हुआ है और उससे छूटना चाहता है’ ऐसा स्वीकार करनेवालों से भी बहुत ही ज्यादा है।

‘अक्रम विज्ञान’ से जो जागृति उत्पन्न होती है, उसकी सहायता से विषय संपूर्ण रूप से जीता जा सकता है। इस विज्ञान से, विषय का विचार तक नहीं आए, विषय में चित्त भी न जाए, उस हद तक की शुद्धि हो सकती है। उसमें ‘ज्ञानीपुरुष’ की कृपा तो है ही और उसमें भी विशेष-विशेष कृपा ही बहुत-बहुत बड़ी भूमिका निभाती है। साधक का तो इसमें ऐसा ही दृढ़ निश्चय चाहिए कि विषय से छूटना ही है। बाकी तो ‘ज्ञानीपुरुष’ के वचनबल तथा ‘ज्ञानीपुरुष’ की विशेष कृपा से इस काल में भी अखंड शुद्ध ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है!

अब अंत में, ‘ज्ञानीपुरुष’ की यह शील संबंधित वाणी अलग-अलग निमित्ताधीन, अलग-अलग क्षेत्रों में, संयोगाधीन निकली है। उस सारी वाणी को एक साथ संकलित करके यह ‘समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य’ ग्रंथ बना है। इस दृषमकाल के विकराल महा-महा मोहनीय वातावरण में ‘ब्रह्मचर्य’ से संबंधित अद्भुत विज्ञान जगत् को देना, वह सोने की कटार जैसा साधन है और उसका सदुपयोग अंत में आत्म कल्याणकारी बन सकता है, ऐसा है। पाठक को तो विनम्र निवेदन इतना ही करना है कि संकलन में किसी भी प्रकार की भास्यमान क्षतियों के लिए क्षमा करके इस अद्भुत ग्रंथ का सम्यक आराधन करें!

- डॉ नीरु बहन अमीन के जय सच्चिदानंद

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उपोद्घात

खंड - १

विषय का स्वरूप, ज्ञानी की दृष्टि से

१. विश्लेषण, विषय के स्वरूप का

विषय किसे कहते हैं? जिस चीज में लुब्ध हो जाएँ, उसी को विषय कहते हैं। अन्य सबकुछ जरूरतें कहलाती है। खाना-पीना, वह विषय नहीं है।

विषय के कीचड़ में क्यों पड़ता है, वही समझ में नहीं आता। पाँच इन्द्रियों के कीचड़ में मनुष्य जो कि ऐश्वर्य प्राप्तवाला ईश्वर कहलाता है, वह क्यों पड़ा हुआ है? जानवर भी इसे पसंद नहीं करते।

भगवान महावीर ने इस काल के मनुष्यों को ब्रह्मचर्य नामक यह पाँचवा महाव्रत क्यों दिया? क्योंकि इस काल के लोग विषय का इतना भारी आवरण लेकर आए हैं कि उन्हें इसकी अभानता में से बाहर निकालकर मोक्ष में ले जाने के लिए, यह पाँचवा महाव्रत दिया!

विषय, वह विकृति है! मन को बहलाने का साधन बनाया है! पूरे दिन धूप से तप्त भैंसें गंदे कीचड़ में क्यों पड़ी रहती हैं? ठंडक की लालच में दुर्गंध को भूल जाती हैं! उसी तरह आज के मनुष्य दिन भर की भागदौड़ की थकान से तंग आकर, नौकरी-व्यापार या घर के टेन्शन में, अत्यंत मानसिक तनाव भुगतते हुए, अंतरदाह में से डाइवर्ट होने के लिए विषय के कीचड़ में कूद जाते हैं और उसके परिणाम भूल जाते हैं! विषय भोगने के बाद अच्छे से अच्छा शूरवीर मुर्दे जैसा हो जाता है। क्या पाया उसमें से?

विषय जहर है, ऐसा जानने के बाद फिर क्या कोई उसे छूएगा? जगत् में भय रखने जैसा यदि कुछ हो तो वह, यह विषय ही है! इन सौंप, बिच्छू, बाघ और शेर से कैसे घबराते हैं? विषय तो उनसे भी अधिक विषमय है। जिसका भय रखना है उसी को लोग परम सुख मानकर भोगते हैं! विपरीत मति की परिधि क्या?

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अनंत जन्मों की कमाई का उच्च उपादान लेकर आता है, मोक्ष के लिए, और विषय के पीछे उसे क्षणभर में ही खो देता है!! अरे! हे मानव! तेरी समझ कैसे आवृत हो गई?!

मनुष्य निरालंब नहीं रह सकता। निरालंब तो सिर्फ ज्ञानीपुरुष ही रह सकते हैं! उनके अलावा बाकी लोग बुद्धि के आशय में स्त्री, पुत्रादि के टेन्डर भरकर ही लाते हैं, जिससे उनके बिना उन्हें नहीं चलता। माँगी थी सिर्फ स्त्री, लेकिन साथ-साथ आ गए सास, ससुर, साला, साली, ममेरे ससुर, चचेरे ससुर। बड़ा लंगर लग गया! 'अरे, मैंने तो एक स्त्री ही माँगी थी और यह लशकर कहाँ से आ गया?!' 'अरे, स्त्री कहीं ऊपर से टपककर आती है। वह आएगी तो साथ-साथ यह लशकर आएगा ही न! तुझे क्या पता नहीं था?' इसी को कहते हैं अभानता! परिणाम का विचार ही नहीं आता कि एक विषय के पीछे कितने लंबे लशकर की लाइन लग जाती है!! अरे, घानी के बैल की तरह पूरी जिंदगी बीत जाती है उसके पीछे!

किसी ने सही बात सिखाई ही नहीं। बचपन से ही माँ-बाप या बुजुर्ग दिमाग में डालते रहते हैं कि बहू तो ऐसी लाएँगे और शादी किए बिना तो चलेगा ही नहीं और वंश तो चलता ही रहना चाहिए।

आत्मसुख खचने के बाद विषयसुख फीके लगते हैं, जलेबी खाने के बाद चाय कैसी लगती है? जीभ का विषय 'ओ के' कर सकते हैं, लेकिन बाकी सब में तो कुछ बरकत है ही नहीं। मात्र कल्पनाएँ ही हैं सारी! घृणा उपजाए, ऐसी चीज़ है विषय!

पाँचों इन्द्रिय में से किसी को भी विषय भोगना अच्छा नहीं लगता। आँखों को देखना अच्छा नहीं लगता, इसलिए अंधेरा कर देते हैं। नाक को भी बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। जीभ की तो बात ही क्या करनी? बल्कि उल्टी हो जाए, ऐसा होता है। स्पर्श करना भी अच्छा नहीं लगता, फिर भी स्पर्श सुख मानते हैं! किसी को भी अच्छा नहीं लगता फिर भी किस आधार पर विषय भोगते हैं, वही आश्चर्य है न? लोकसंज्ञा से ही इसमें पड़े हैं!

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विषय, वह तो संडास है, गलन (डिस्चार्ज होना, खाली होना) है! इसमें भी तन्मयाकार हो जाता है इसलिए उसमें से नए कॉजेज डलते हैं! यदि विषय का पृथक्करण करे तो वह दाद को खुजलाने जैसा है!

अरे रे! अनंत जन्मों से यही किया ??! इस गटर को कैसे खोला जा सकता है? निरी दुर्गंध, दुर्गंध और दुर्गंध!! श्रीमद् राजचंद्र ने विषय को, 'वमन करने योग्य जगह भी नहीं है,' ऐसा कहा है! 'थूकने जैसा भी नहीं है वहाँ!'

विषय बुद्धि की वजह से नहीं है, मन की एंटन की वजह से है, इसलिए बुद्धि से उसे दूर किया जा सकता है।

प्याज की गंध किसे आती है? जो नहीं खाता हो, उसे! जिस तरह आहारी आहार करता है, उसी तरह विषयी विषय करता है! लेकिन वह लक्ष्य में रहना चाहिए न? लेकिन अज्ञानता के आवरण की वजह से लक्ष्य में नहीं रह पाता। चार दिन का भूखा बासी गंदी रोटी भी खा जाता है! आजकल के लोग तो इतने बदबूदार होते हैं कि यदि जरा भी नजदीक आ जाईं तो अपना सिर फट जाए। तभी तो ये सब परफ्यूम्स छिड़कते रहते हैं, चौबीसों घंटे!

विषय में सुख होता तो चक्रवर्ती राजा इतनी सारी रानियाँ होने के बावजूद सबकुछ छोड़कर सच्चे सुख की तलाश में निकल नहीं पड़ते!

जीवन किसलिए है? संसार बसाकर मरने के लिए? सुख के लिए या जिम्मेदारियाँ खड़ी करके बीमारियों को न्यौता देने के लिए? इतने पढ़े-लिखे लेकिन पढ़ाई का उपयोग क्या है? मेन्टेनन्स के लिए ही न? इस इन्जन से कौन सा काम करवा लेना है? कुछ हेतु तो होना चाहिए न? इस मनुष्य जन्म का हेतु क्या है? मोक्ष! लेकिन अपनी दिशा कौन सी और चल रहे हैं कहाँ??!

चोट लगी हो और खून बह रहा हो तो हम उसे बंद क्यों करते हैं? बंद नहीं करेंगे तो? तब तो वीकनेस आ जाएगी! उसी तरह यह विषय बंद नहीं होने से शरीर में बहुत वीकनेस आ जाती है! ब्रह्मचर्य को पुद्गलसार (जो पूर्ण और गलन होता है) कहा गया है! इसलिए उसे

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संभालो! इसलिए बचत करो, वीर्य और लक्ष्मी की! भोजन खाकर उसका अर्क बनकर उससे वीर्य बनता है, जो अब्रह्मचर्य से खत्म हो जाता है। इसलिए ब्रह्मचर्य का सेवन करो!

जिस ब्रह्मचर्य से मोक्ष हो, वह काम का।

यह अक्रम विज्ञान विवाहित लोगों को भी मोक्ष में ले जा सकता है, ऐसा है!

जिसे पहले से ही ब्रह्मचर्य पालन करने की भावना हो, उसे दादा से शक्ति माँगनी चाहिए, 'हे दादा भगवान, मुझे ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति दीजिए।' विषय का विचार आते ही, तत्क्षण ही उसे उखाड़कर फेंक देना चाहिए। किसी भी स्त्री के प्रति दृष्टि नहीं गड़ना। दृष्टि आकृष्ट हो जाए तो तुरंत ही हट लेनी चाहिए और शूट ऑन साइट प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। विषय चाहिए ही नहीं, निरंतर ऐसा निश्चय रहना चाहिए और प्रखर आत्मस्थ ज्ञानीपुरुष की निश्रा में रहकर उसमें से छूट जा सकता है!

हरहाए पशु की तरह जीने के बजाय तो एक कीले से बंधना अच्छा। जगह-जगह दृष्टि नहीं बिगड़नी चाहिए। स्त्री, वह पुरुष का संडास है और पुरुष, वह स्त्री का संडास है। संडास में क्या मोह रखना? ब्रह्मचर्य का निश्चय करते-करते अपने आपको खूब परखकर देखना पड़ता है। कसौटी पर रखना पड़ता है। यदि नहीं हो पाए, ऐसा हो तो शादी करना उत्तम है, लेकिन बाद में भी कंट्रोलपूर्वक होना चाहिए।

ब्रह्मचर्य आत्मसुख प्राप्ति में कैसे मदद करता है? बहुत मदद करता है। अब्रह्मचर्य से तो देहबल, मनोबल, बुद्धिबल, अहंकारबल सभी कुछ खत्म हो जाता है! जबकि ब्रह्मचर्य से पूरा अंतःकरण सुदृढ़ हो जाता है!

ब्रह्मचर्य पालन हो सके तो उत्तम है और नहीं हो सके तो अगर सिर्फ इतना जान ले कि अब्रह्मचर्य गलत है, तो भी बहुत हो गया।

ब्रह्मचर्य महाव्रत बरता उसे कहते हैं कि जब विषय याद तक नहीं आए, ब्रह्मचर्य या अब्रह्मचर्य का अभिप्राय नहीं रहे, तब वह व्रत बरता कहा जाता है।

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बाकी, आत्मा तो सदा ब्रह्मचर्यवाला ही है। आत्मा ने विषय कभी भोगा ही नहीं। आत्मा सूक्ष्मतम है और विषय स्थूल है। इसलिए स्थूल को सूक्ष्म भोग ही नहीं सकता!

परम पूज्य दादाश्री कहते हैं कि, 'इस ज्ञान के बाद मुझे कभी विषय का विचार तक नहीं आया।' तभी तो ऐसी विषय रोग को उखाड़कर खत्म कर देनेवाली वाणी निकली है!

२. विकारों से विमुक्त की राह

अक्रम मार्ग में विकारी पद हैं ही नहीं। जैसे पुलिसवाला पकड़कर करवाए, उस तरह का होता है। स्वतंत्र मर्जी से नहीं होता। जहाँ विषय है, वहाँ पर धर्म नहीं है। निर्विकार रहे, वहाँ पर धर्म है! किसी भी धर्म ने विकार को स्वीकार नहीं किया है। हाँ, कोई वाम मार्गी हो सकता है।

ब्रह्मचर्य, वह तो पिछले जन्म की भावना के परिणाम स्वरूप किसी महा-महा पुण्यशाली महात्मा को प्राप्त होता है। बाकी सामान्यतः तो जगह-जगह अब्रह्मचर्य ही देखने मिलता है! जिसे भौतिक सुखों की वांछना है, उसे तो शादी कर ही लेनी चाहिए और जिसे भौतिक नहीं लेकिन सनातन सुख ही चाहिए, उसे शादी नहीं करनी चाहिए। उसे मन-वचन-काया से ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए।

भगवान को प्राप्त करने के लिए विकारमुक्त होना पड़ेगा और विकारमुक्त होने के लिए क्या संसारमुक्त होना पड़ेगा? नहीं। मन तो, अगर जंगल में जाएँ तो भी साथ में ही जाएगा! क्या वह छोड़नेवाला है? यदि ज्ञानीपुरुष मिल जाएँ तो आसानी से निर्विकार रहा जा सकता है।

तृष्णा, उसे कहते हैं कि जो भोगने से बढ़ती ही जाए और नहीं भोगने से मिट जाए! इसीलिए ब्रह्मचर्य की खोज हुई है न, विकारों से मुक्त होने के लिए!

विषयी कौन है? इन्द्रियाँ या अंतःकरण? भैंस कौन और चरवाहा कौन? सामान्यतः इन्द्रियों का दोष माना जाता है! नसबंदी करवाने से कहीं विषय छूटता है? तेरी नीयत कैसी है विषय में? चोर नीयत की

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वजह से ही विषय टिका हुआ है। ज्ञान से सबकुछ चला जाएगा! विषय का विचार तक नहीं रहेगा!

मन का स्वभाव कैसा है? साल, दो साल किसी चीज से अलग रहे कि वह चीज विस्मृत हो जाती है, हमेशा के लिए!

वाम मार्गी क्या सिखाते हैं कि जिस चीज को एक बार जी भरकर भोग लेने पर ही उससे छूटा जा सकता है। विषय के बारे में तो बल्कि और ज्यादा सुलगता जाता है। शराब से संतुष्ट होकर क्या उससे छूटा जा सकता है?

विषय के बारे में अगर कंट्रोल करने जाए तो वह और ज्यादा उछलता है। मन को खुद कंट्रोल करने जाएगा तो नहीं हो सकता। कंट्रोलर ज्ञानी होने चाहिए। सचमुच तो मन को रोकना नहीं है। मन के कारणों को रोकना है। मन तो खुद ही एक परिणाम है। उसे बदला नहीं जा सकता। कारण बदले जा सकते हैं। कौन से कारण से मन विषय में चिपका है, उसे ढूँढ़कर उससे छूटा जा सकता है।

ज्ञानी चीजों को वासना नहीं कहते, रस(रुचि) को वासना कहते हैं। आत्मज्ञान के बाद वासनाएँ चली जाती हैं।

स्त्री से संबंधित वासनाएँ क्यों नहीं जातीं? जब तक 'मैं पुरुष हूँ' और 'वह स्त्री है', ऐसी मान्यता है, तब तक वासनाएँ हैं। वह मान्यता अगर निकल जाए तो वासना को जाना ही पड़ेगा! वह मान्यता जाएगी कैसे? जिसे वासनाएँ हैं, उससे आप खुद अलग ही हो, खुद कौन है, जब यह ज्ञान हो जाएगा, भान हो जाएगा, तभी वह छूट सकेगा। और ज्ञानी की कृपा से ज्ञान हो सकता है!

३. माहात्म्य ब्रह्मचर्य का

ब्रह्मचर्य पालन नहीं किया जा सके तो कोई बात नहीं, लेकिन उसके विरोधी तो बनना ही नहीं चाहिए। अध्यात्म मार्ग में ब्रह्मचर्य, वह सबसे बड़ा एवं सबसे पवित्र साधन है! नासमझी से अब्रह्मचर्य टिका हुआ है। ज्ञानी की समझ से समझ लेने पर वह रुक जाता है। व्यवहार में भी मन-वाणी और देह नॉर्मैलिटी में रहें, उसके लिए ब्रह्मचर्य को

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आवश्यक कहा गया है। आयुर्वेद भी ऐसा ही सूचित करता है! छः महीने ही यदि मन-वचन और काया से ब्रह्मचर्य पालन करे तो मनोबल, वचनबल एवं देह में भी जबरदस्त बदलाव हो जाते हैं!

अब्रह्मचर्य से बहुत सारे रोग उत्पन्न होते हैं। उसमें तो मन और चित फ्रैक्चर हो जाते हैं!

कई मानसशास्त्री कहते हैं कि विषय बंद हो ही नहीं सकता। अंत तक! लेकिन दादाश्री क्या कहते हैं, कि विषय के अभिप्राय बदल जाएँ तो फिर विषय रहता ही नहीं। जब तक अभिप्राय नहीं बदल जाते, तब तक वीर्य का ऊर्ध्वगमन होता ही नहीं है। अक्रममार्ग में तो डायरेक्ट आत्मज्ञान प्राप्त होता है, वही ऊर्ध्वगमन है!

ज्ञानीपुरुष संपूर्ण निर्विषयी हो चुके होते हैं, इसलिए उनमें जबरदस्त वचनबल प्रकट हो चुका होता है, जो विषय का विरेचन करवा देता है। जो विषय का विरेचन नहीं करवाएँ, तो वह 'ज्ञानीपुरुष' है ही नहीं। सामनेवाले की इच्छा होनी चाहिए।

खंड - २

'शादी नहीं करने' के निश्चयवालों के लिए राह

१. किस समझ से विषय में से छूटा जा सकता है?

अक्रम विज्ञान थोड़े ही समय में ब्रह्मचर्य में सेफ साइड करवा देता है। कौन से जन्म में अब्रह्मचर्य का अनुभव नहीं किया है? कुत्ता, बिल्ली, पशु, पक्षी, मनुष्य, सभी ने कब नहीं किया? सिर्फ इस एक जन्म में ब्रह्मचर्य का अनुभव तो करके देखो! उसकी खुमारी, उसकी मुक्तता, निर्बौद्धता महसूस तो करके देखो!

ब्रह्मचर्य का निश्चय होना, वही बहुत बड़ी चीज है! ब्रह्मचर्य के दृढ़ निश्चयी का दुनिया में कोई नाम देनेवाला नहीं है!

ब्रह्मचर्य का निश्चय देखा देखी, जोश में आकर या डर के मारे होगा तो उसमें दम नहीं होगा! वह कभी भी फिसलाकर गिरा सकता है। समझ से और मोक्ष के ध्येय के लिए करना है और उस निश्चय को

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बार-बार मजबूत करना है और ज्ञानी के पास जाकर निश्चय मजबूत करवा लेना चाहिए और बार-बार बोलना, 'हे दादा भगवान, मैं ब्रह्मचर्य पालन करने का निश्चय मजबूत कर रहा हूँ मुझे निश्चय मजबूत करने की शक्ति दीजिए'। तो वह मिलेगी ही। जिसका निश्चय नहीं डिगता, उसका निश्चय सफल होता ही है और निश्चय डगमगाया कि सभी भूत घुस जाते हैं!

ब्रह्मचर्य का दृढ़ निश्चय धारण होने के बाद साधक को बार-बार एक प्रश्न सताता रहता है कि अंदर विषय के विचार तो आ रहे हैं। उसके लिए दादाश्री मार्ग बताते हैं कि विषय के विचार आएँ, उसमें हर्ज नहीं है लेकिन जो विचार आते हैं, उन्हें देखते रहो लेकिन 'तुम' उनके अमल में एकाकार मत हो जाना। वह कहे 'हस्ताक्षर करो!' तो भी तुम स्ट्रॉंगली मना कर देना! और उसे देखते ही रहना। यह है मोक्ष का चौथा स्तंभ, तप और फिर उसके प्रतिक्रमण करवाना। मन-वचन-काया से जो जो विकारी दोषों, इच्छाएँ, चेष्टाएँ, वगैरह, उन सभी दोषों का प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। अगर विषय के विचार से मुक्त हो जाए तो कैसा आनंद-आनंद हो जाता है। तो फिर यदि उससे हमेशा के लिए मुक्त हो जाएगा तो कितना आनंद रहेगा?

अब्रह्मचर्य के विचारों के सामने ज्ञानी से ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगते रहने से दो-पाँच साल में वैसे उदय आ जाएँगे। जिसने अब्रह्मचर्य जीत लिया उसने पूरी दुनिया जीत ली! उस पर सभी देवी-देवता बहुत खुश रहते हैं!

विषय के विचार आएँ तो, उन्हें दो पत्तियाँ निकलने से पहले ही उखाड़कर फेंक दो! फूटने के बाद विचार कॉपल से आगे, दो पत्तियों तक खिल नहीं जाने चाहिए। वहीं पर तुरंत ही उखाड़कर फेंक देने पड़ेंगे, तभी छूटा जा सकेगा! और यदि वह उग गया तो वह अपना असर दिखाए बगैर जाएगा ही नहीं!

विषय की दो स्टेज। एक चार्ज और दूसरा डिस्चार्ज। चार्ज बीज को थो देना है।

रास्ते पर निकले और 'सीन सीनरी' आए कि दृष्टि आकृष्ट हुए बिना नहीं रहती। वहाँ दृष्टि गढ़ाएँगे तभी दृष्टि बिगड़ेगी न? इसलिए नीचा

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देखकर ही चलना। इसके बावजूद यदि दृष्टि गड़ जाए तो तुरंत ही दृष्टि फेर लेनी चाहिए और तुरंत ही प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए, वह मत चूकना।

सभी स्त्रियाँ कहीं आकर्षित नहीं करतीं। जिसके साथ हिसाब बंधा हुआ हो, वही आकर्षित करती है। इसलिए उसे उखाड़कर फेंक दो। कुछ से तो, जब सौ-सौ बार प्रतिक्रमण किए जाएँ, तब छूट पाएँगे।

प्रतिक्रमण करने के बावजूद भी यदि दृष्टि ज्यादा बिगड़े तो फिर उपवास या ऐसा कोई दंड लेना चाहिए। जिससे कर्म न बंधें। सामान्य भाव से ही देखना चाहिए। चेहरे को एकटक नहीं देखना चाहिए। तभी तो शास्त्रों में ब्रह्मचर्य पालन करनेवाले को स्त्री की फोटो या मूर्ति तक भी देखने से मना किया गया है!

देहनिद्रा आ जाएगी तो चलेगा लेकिन भावनिद्रा नहीं आनी चाहिए। अगर ट्रेन सामने से आ रही हो तो वहाँ पर क्या कोई सोता रहेगा? ट्रेन तो मारेगी एक ही जन्म, लेकिन भावनिद्रा मार देगी अनंत जन्मों तक! जहाँ भावनिद्रा आएगी, वहाँ वह चिपकेगा। जहाँ भावनिद्रा आए, तब उसी व्यक्ति के शुद्धात्मा से ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति माँगना कि, 'हे शुद्धात्मा भगवान, मुझे पूरे जगत् के प्रति ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति दीजिए।' जहाँ मीठा लगता है, वहाँ भले ही कितनी भी जागृति रखने जाए, लेकिन जब कर्म का धक्का आता है, तो वहाँ सबकुछ भुला देता है! जहाँ गलगलिया (वृत्तियों को गुदगुदी होना, मन में मीठा लगना) हुआ कि तुरंत ही समझ जाना कि यहाँ फँसाव होगा।

जिसे सिर्फ आत्मा ही चाहिए, उसे फिर विषय कैसे हो सकता है?

अपनी माँ पर, बहन पर दृष्टि क्यों नहीं बिगड़ती? वह भी स्त्री ही है न? लेकिन वहाँ भाव नहीं किया है, इसलिए।

श्रीमद् राजचंद्र जी ने ब्रह्मचर्य के बारे में बहुत ही सुंदर खुलासा किया है, पद्य में। स्त्री को काष्ठ की पुतली मानो। विषय जीतने से पूरे जगत् का साम्राज्य जीता जा सकता है। ब्रह्मचर्य ही आत्मज्ञान के लिए पात्रता लाता है।

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इस जन्म में अक्रमज्ञान द्वारा विषयबीज से बिल्कुल निर्ग्रंथ हुआ जा सकता है? दादाश्री कहते हैं कि ‘हाँ, हो सकता है।’ विषय का जरा सा भी ध्यान किया कि पूरा ज्ञान भ्रष्ट हो जाता है।

मन-वचन-काया से जो ब्रह्मचर्य पालन करता है, वह शीलवान कहलाता है। उसके कषाय भी बहुत ही क्षीण हो चुके होते हैं। हमें ब्रह्मचर्य का बल रखना है। विषय की गाँठ का छेदन अपने आप ही होता रहेगा।

२. दृष्टि उखड़े, ‘श्री विज्ञन’ से

चटनी देखना अच्छा लगता है? खून, मांस देखना अच्छा लगता है? चटनी हरे खून की और मांस वगैरह लाल खून का! ढका हुआ मांस गलती से खा लें, ऐसा हो भी सकता है, लेकिन खुला?! उसी तरह यह देह जो है, वह रेशमी चादर से लपेटा हुआ हाड-मांस ही है न? बुद्धि बाहर की सुंदरता ही दिखाती है जबकि ज्ञान आरपार, सीधा ही देखता है। इस आरपार दृष्टि को विकसित करने के लिए पूज्य दादाश्री ने श्री विज्ञन का अद्भुत हथियार दिया है।

पहले विज्ञन में सुंदर स्त्री नेकेड दिखती है। दूसरे विज्ञन में स्त्री बगैर चमड़ी की दिखती है। तीसरे विज्ञन में पेट चौरा हुआ हो और उसमें आँतें, मल, मांस वगैरह सब दिखता है। सारी गंदगी दिखती है। फिर विषय उत्पन्न होगा ही नहीं न? अंत में आत्मा दिखता है। जिस रास्ते द्वारा दादाश्री पार निकल गए, विषय जीतने का वही रास्ता वे हमें दिखाते हैं!

कृपालुदेव ने कहा है कि, ‘देखत भूली टले तो सभी दुःखों का क्षय होगा।’

सुंदर स्त्री को देखकर किसी पुरुष को खराब भाव हो जाएँ तो उसमें दोष किसका? क्या स्त्री का दोष कहलाएगा? नहीं, इसमें स्त्री का जरा सा भी दोष नहीं है। भगवान महावीर का लावण्य देखकर कई स्त्रियों को मोह उत्पन्न होता था। लेकिन भगवान को कुछ नहीं छूता था! स्त्रियों के उपयोग पर बहुत निर्भर करता है। स्त्रियों को ऐसे कपड़े, गहने या मेक-अप नहीं करने चाहिए कि जिसे देखने से पुरुषों को मोह उत्पन्न

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हो। अपना भाव चोखा होना चाहिए तो कुछ बिगड़ सके, ऐसा नहीं है। भगवान को कैश लुचन क्यों करना पड़ा? इसी वजह से कि स्त्रियाँ उनके रूप को देखकर मोहित न हो जाएँ!

पहले के जमाने में मान में, कीर्ति में, पैसे में, सभी में मोह बिखरा हुआ था। अभी तो सारा मोह विषय में ही रहता है! फिर क्या कहा जा सकता है? एकावतारी बनना ही तो विषयमुक्त होना ही पड़ेगा। शूट ऑन साइट प्रतिक्रमण करके छूटा जा सकता है। अंदर रुचि का बीज पड़ा हुआ है, वह धीरे-धीरे पकड़ में आता है और उससे छूटा जा सकता है। रुचि की गाँठ अनंत जन्मों से अंदर पड़ी हुई है, जो कि कुसंग मिलते ही फूट निकलती है। इसलिए ब्रह्मचारियों का संग अति-अति आवश्यक है।

ब्रह्मचर्य के लिए संगबल की आवश्यकता है। कितना भी स्ट्रोंग निश्चय हो लेकिन कुसंग उसे तोड़ देता है! कुसंग या सत्संग मनुष्य में परिवर्तन ला सकता है!

३. दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार

निश्चय किसे कहते हैं कि भले ही कैसा भी लशकर आए फिर भी उस पर ध्यान न दें। निश्चय डगमगाए ही नहीं। भाव और निश्चय में फर्क है। भाव में से अभाव हो सकता है लेकिन निश्चय नहीं बदल सकता। अभी जो ब्रह्मचर्य पालन कर रहे हैं, वह पूर्व जन्म में किए हुए निश्चय ओपन हो रहे हैं। जिस-जिस चीज़ का निश्चय किया है, वह प्राप्त होगा ही। निश्चय अगर ढीला हो तो टाइमिंग बदल जाता है।

निश्चय का स्कू दिन-रात टाइट करते ही रहना है। एक बार यदि निश्चय टूट गया तो फिर ख़त्म हो जाता है। अपने निश्चय को तोड़ता कौन है? अपना ही अहंकार। मूर्छित अहंकार। एक ही स्ट्रोंग अभिप्राय रहना चाहिए। उसमें छूट नहीं चलेगी।

निश्चय स्ट्रोंग रखने के लिए इतना सँभाल लो। एक तो किसी के सामने दृष्टि नहीं गड़ानी चाहिए, श्री विज्ञान का तुरंत इस्तेमाल होना चाहिए और स्त्री का स्पर्श नहीं होना चाहिए। स्त्री स्पर्श जहरीला होता है। अगर

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छू लिया हो तो वे परमाणु पूरी रात सोने नहीं देते। जब पुण्य ढलने लगे तो ब्रह्मचर्य को डिंगा सकते हैं, वहाँ अगर निश्चय स्ट्रोंग रहेगा तो सिर्फ वही बचा सकेगा।

जिसे पूर्व में स्ट्रोंग भावना हुई हो उसका इस जन्म में स्ट्रोंग निश्चय रहता है और जो डगमगाए उसने, पूर्व में भावना की ही नहीं थी। यह तो देखा देखी से हुआ है। उसमें बहुत बरकत नहीं आती। उससे तो शादी कर लेना अच्छा। डगमग निश्चयवाले से ब्रह्मचर्य पालन नहीं हो सकता। व्रत भी नहीं लेना चाहिए। वह फिर टिकता नहीं है। ब्रह्मचर्य में अपवाद नहीं रखा जा सकता। स्टीमर में अपवाद के रूप में छेद रख सकते हैं? पोल मारनेवाले (गड़बड़ करनेवाले, इन्सन्सियर) मन को कैसे रोका जा सकता है? निश्चय से। हर एक कार्य में निश्चय ही मुख्य है। आत्मा प्राप्त होने के बाद एकाकार होकर अहंकार से निश्चय नहीं करना है लेकिन अलग रहकर मिश्रचेतन से निश्चय करवाना है! कभी कभार ही स्लिप हो गए तो? एक ही बार नदी में डूब जाए तो?!

शास्त्रकारों ने एक बार के अब्रह्मचर्य को मरण कहा है। मरना बेहतर है लेकिन अब्रह्मचर्य मरण तुल्य माना जाता है।

जब कर्मों का फोर्स आए, तब आत्मा के गुणों के वाक्य जोर से बोलकर जागृति में आ जाना, वह पराक्रम कहलाता है। स्ववीर्य को स्फुरायमान करना, उसे पराक्रम कहते हैं। पराक्रम से पहुँचनेवाले को वापस मोड़ने की ताकत किसी में नहीं है।

निश्चय के प्रति सिन्सियर रहे तो पार उत्तर सकते हैं। हर रोज सुबह में तय कर लेना कि 'इस जगत् की कोई भी विनाशी चीज़ मुझे नहीं चाहिए।' फिर उसके प्रति सिन्सियर रहना है। जितना सिन्सियर, उतनी ही जागृति! इसे सूत्र के रूप में पकड़ लेना। सिन्सियारिटी तो ठेठ मोक्ष ले जाती है। सिन्सियारिटी का फल मोरालिटी में आ जाता है। जो संपूर्ण रूप से मोरल हो गया, वह परमात्मा बनेगा।

'रिज पॉइन्ट' मतलब (झोंपड़ी के) छप्पर का सब से ऊँचा पॉइन्ट! जवानी का 'रिज पॉइन्ट' होता है, वह गुजर गया तो जीत गया। उतना ही पॉइन्ट संभाल लेना चाहिए।

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ब्रह्मचर्य के लिए आपकी दृढ़ प्रतिज्ञा होनी चाहिए। इतना ही नहीं लेकिन प्रतिज्ञा प्योर, बिना लालच की, बिना घड़भांज (बार-बार प्रतिज्ञा करना और तोड़ना, जोड़ना और तोड़ना) वाली होनी चाहिए। जिसकी नीयत चोर है, उसका निश्चय है ही नहीं। जहाँ क्षत्रियपना होता है, वहाँ नीयत चोर नहीं होती।

जैसे विष की परख नहीं करते हैं, वैसे ही विषय की भी परख नहीं करनी चाहिए। उसे तो उगते ही दबा देना चाहिए।

उदय किसे कहते हैं? संडास लगी हो तो कोई चारा है? वैसा ही उदय में होता है। स्ट्रोंग निश्चय हो कि मुझे विषय में फिसलना ही नहीं है, उसके बावजूद भी अगर फिसल जाए तो उसे उदय कहते हैं। सावधानीपूर्वक रहना है, फिर दिक्कत नहीं होगी। जो पानी में डूबने लगे, वह बचने के लिए क्या कुछ नहीं करेगा? वैसा ही ब्रह्मचर्य के लिए होना चाहिए। दृढ़ निश्चय के सामने सभी अंतराय झुक जाते हैं!

ब्रह्मचर्य पालन करने का निश्चय होने के बावजूद विषय के विचार परेशान करें तब साधक को क्या सावधानी रखनी चाहिए? एक तो इन विचारों को अलग रखना चाहिए और उसमें तन्मयाकार नहीं होना चाहिए, हस्ताक्षर नहीं करना चाहिए। यह पिछला भरा हुआ माल है, जो कि फूट रहा है, ऐसा समझकर परेशान मत होना। उसमें तन्मयाकार मत होना। बड़ा प्रतिक्रमण कर लेना। विचार घेर लें तो क्या दिक्कत है? जो होली में हाथ नहीं डालता वह क्या जलेगा? कितने भी मच्छर मंडराएँ, लेकिन उन्हें उड़ाने में देर कितनी? सिर्फ जागते रहना पड़ेगा! जितनी जुदापना की जागृति रहेगी, उतना ही विषय को जीता जा सकेगा!

ब्रह्मचर्य की पुस्तक बहुत ही हेल्पफुल रहेगी और उसे रोज पढ़ना।

४. विषय विचार परेशान करें तब...

मन तो पोल मारने में एक्सपर्ट। वहाँ बहुत जागृति रखकर जीत जाना है!

जब ब्रह्मचर्य की सुंदर परिणितियाँ रहने लगेँ, तब भीतर बुद्धि वकालत किए बिना रहती ही नहीं कि विषय में क्या परेशानी है? उसे

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तो तुरंत उखाड़कर फेंक देना। नहीं तो वह पोल आराम से शादी करवा देगी!

मन जड़ हैं। उसके साथ कुशलता से काम निकाल (निपटारा) लेना चाहिए। जिस तरह छोटे बच्चे को लॉली पॉप देकर पटाकर मन चाहा करवा लेते हैं, उसी तरह मन को बार-बार समझा-पटाकर विषय में से ब्रह्मचर्य की ओर मोड़ लेना चाहिए।

५. नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार

दो रोटी खाने का नियम रखा हो और फिर मन के कहे अनुसार चलें तो नियम टूट जाता है। मन तो बहुत कहेगा, 'खाओ, खाओ' लेकिन नहीं। अगर उसका मान लें तो फिर मन ढीला पड़ जाएगा। जो मन के कहे अनुसार चलता है, उसका ब्रह्मचर्य टिकता ही नहीं। तभी तो कबीर साहब ने कहा है, 'मन का चलता तन चले ताका सर्वस्व जाए।' मन के कहे अनुसार चलनेवाले का भरोसा नहीं कर सकते। उसकी लॉ-बुक ही अलग होती है। स्वच्छंद होता है।

मन सामाजिक और प्रतिक्रमण नहीं करने देता। पोल मारता है। ध्येय के अनुसार चलना है, मन के कहे अनुसार नहीं! मन का और ध्येय का क्या लेना-देना। स्ट्रोंग निश्चयवाला मन की नहीं सुनता।

ब्रह्मचर्य का निश्चय हो लेकिन शादी का कर्म पीछे पड़े तो? शादी ही करवा देगा न! वहाँ ज्ञान से ही समाधान होगा। ज्ञान तो अच्छे-अच्छे कर्मों को मित्य दे!

ब्रह्मचर्य पालन करनेवाले का माइन्ड वेवरींग हो तो भी उसमें बरकत नहीं आएगी। मन का मानना ही नहीं चाहिए। अपने अभिप्राय के अनुसार चलना चाहिए। ब्रह्मचर्य में तो छोटे से छोटे अवरोधों में भी जागृति रखनी चाहिए। वहाँ स्ट्रोंग रहना चाहिए। वहाँ एक भी पोल नहीं चलेगी। वर्ना ध्येय को उड़ा देगी! मन-बुद्धि-चित्त और अहंकार सभी ध्येय के विरोधी हो जाएँ, फिर भी अगर स्ट्रोंग रहे तो सभी को ठंडा होना पड़ेगा। लेकिन सिद्धांत को पकड़े रहने के लिए पहले से ही सजग रहना जरूरी है। हम चेतन हैं और मन जड़, तो मन का कभी सुनना चाहिए?

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मन समाधान दूँढता है, इसलिए समाधानी व्यवहार रखना। शादी करने में क्या नुकसान है, बार-बार वह बताना। मन का स्वभाव विरोधाभासी है। वह ब्रह्मचर्य के सुख भी एकस्ट्रीम बताता है और विषय का सुख भी एकस्ट्रीम बताता है। उसका कोई नियम नहीं है। वहाँ हमें अपने सिद्धांत के अनुसार मन को मोड़ना चाहिए। और फिर मन जिद्दी भी नहीं है। जैसे मोड़ोगे, वैसे मुड़ जाए, ऐसा है।

मन के आधार पर किया हुआ निश्चय और ज्ञान के आधार पर किए हुए निश्चय में क्या फ़र्क है? ज्ञान से किया हुआ निश्चय बहुत सुंदर होता है, मन को जीतने की तमाम चाबियाँ होती हैं, नींव बहुत मजबूत होती है। वहाँ पर मन का नहीं चलता।

ब्रह्मचारी आप्तपुत्र कैसे होने चाहिए? उपदेश दे सकें या न भी दे सकें, उसमें दिक्कत नहीं है। लेकिन सिद्धांत को पकड़े रखना पड़ेगा। दूसरा, आप्तपुत्रों द्वारा किसी के साथ कषाय नहीं होने चाहिए। सभी के साथ अभेदता रहनी चाहिए। सामनेवाला भेद डालता रहे, तब भी वह अभेदता ही रखे।

६. 'खुद' खुद को डॉटना

'हम' अपने आपको हमेशा ही पुचकारते रहे हैं। बड़े से बड़ी गलतियाँ करें, तो भी ढकते रहते हैं उसे! फिर क्या दशा होगी?! कभी 'हमने' अपने आपको डॉटा है? प्रकृति की अटकण (जो बंधनरूप हो जाए, आगे नहीं बढ़ने दे)के रूप में हुए विषय दोषों को निकालना हो तो उसे कितना ही उलाहना देना पड़ता है! रूलाना पड़ता है। अलग रहकर खुद ही खुद को डॉटे तो उसका राह पर आ जाएगा न?! 'हम' अपने आप के साथ एक रहकर यानी एक होकर काम करेंगे तो हमें भी भुगतना पड़ेगा और अलग रहकर काम लेंगे तो भुगतना नहीं पड़ेगा।

परम पूज्य दादाश्री ने खुद से अलग रहने के लिए बहुत ही सुंदर अलग अलग प्रयोग बताए हैं। उसमें भी अरीसा (दर्पण) सामायिक यानी कि अरीसे में देखकर अपने आप से बातचीत करने का प्रयोग, प्रकृति को डॉटना आदि।

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७. पछतावे सहित प्रतिक्रमण

एक बार बीज पड़ जाए तो वह रूपक में आया ही। लेकिन उसके जाम होने से पहले, मरने से पहले कम ज्यादा या साफ हो सकता है। इसलिए दादाश्री विषयदोषवाले को रिवार को उपवास करके, पूरे दिन प्रतिक्रमण करके दोष को धोते रहने की आज्ञा देते थे, ताकि कम हो जाए!

विषय विकार संबंधित दोषों के सामायिक, प्रतिक्रमण कैसे करने हैं? सामायिक में बैठकर, अभी तक जो जो दोष हुए हैं, उन्हें देखना है, उनका प्रतिक्रमण करना है और भविष्य में गलती नहीं हो ऐसा निश्चय करना है!

सामायिक में बार-बार वही के वही दोष दिखते रहें तो क्या करना चाहिए? जब तक दोष दिखते रहें, तब तक प्रतिक्रमण करते रहना है। उसके लिए क्षमा माँगना, उसके लिए पश्चाताप करना, बहुत बार ऐसा करते रहने से विषय की गाँठ विलीन होती जाएगी। जो जो गाँठें विलय करनी हों, वे इस तरह विलय हो सकती हैं! यहाँ पर जो सामायिक होती हैं, उसमें गाँठें विलय होती हैं।

विषय में सुख बुद्धि किसे महसूस होती है? अहंकार को। बार-बार वही की वही चीज़ दी जाए तो वापस उसी में से दुःख बुद्धि खड़ी होती है! इसलिए वह पुद्गल है, पूरण (चार्य होना, भरना)-गलन है।

विषय का साइन्स क्या है? जिस तरह पिन लोहचुंबक की ओर आकर्षित होती है, उसी तरह भीतर विषय के परमाणुओं का आकर्षण सामनेवाले व्यक्ति के विषय के परमाणुओं के प्रति होता है। यह सिर्फ परमाणुओं का ही आकर्षण है और खुद तो इससे अलग, शुद्धात्मा ही है, यदि ऐसा लक्ष्य में रहे तो कुछ भी नहीं छू सकता। लेकिन एक्जेक्ट ऐसी जागृति किसे रह सकती है?

विषय की गाँठ फूटे और उसमें एकाग्रता हो जाए, तो उसी को विषय कहा गया है। यदि एकाग्रता नहीं हो तो उसे विषय नहीं कहते। जिसकी यह गाँठ विलय हो गई, उसे फिर पिन और लोहचुंबक का संबंध

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ही नहीं रहा। विषय स्थूल स्वभावी है और आत्मा सूक्ष्म स्वभावी है, ऐसी जागृति रहती नहीं है न! उसमें तो ज्ञानी का ही काम है। ये गॉँठें, ये तो आवरण हैं। जब तक ये गॉँठें हैं, तब तक आत्मा का स्वाद चखने को नहीं मिलता। जिसके ज्यादा विचार आएँ, जहाँ दृष्टि अधिक आकृष्ट हो जाए, वहाँ पर गॉँठ बढ़ी है। दादाश्री ने अक्रम मार्ग में सामायिक को बहुत महत्व दिया है। यहाँ पर तो आत्मस्वरूप होकर दोषों को देखते रहना है। उससे दोष विलय होते हैं, यह एक फायदा और दूसरा खुद ज्ञाता-दृष्टा पद में रहा, उतना आत्मा में रहने का फल भी मिलता है! आनंद-आनंद हो जाता है! सामायिक में तमाम प्रकार के दोषों को रखकर उनसे मुक्त हुआ जा सकता है। इसके बिना इतनी सारी गॉँठें विलय हो सकें, ऐसा नहीं है। अक्रम की यह सामायिक आसान, सीधी और नकद फल देनेवाली है! समूह में की हुई सामायिक बहुत ही प्रभावशाली होती है! पूज्य दादाश्री सामायिक करने पर बहुत जोर देते थे।

अब विषय नहीं चाहिए, लेकिन क्या विषय आपको छोड़ देंगे? खड़ड़े में गिरना किसे पसंद है? फिर भी खड़ड़ा सामने आ जाए तो क्या वह छोड़ देगा? खड़ड़े से बचने के लिए क्या करना चाहिए? हर रोज एक घंटा दादाश्री से माँगना कि, 'हे दादा, मुझे ब्रह्मचर्य की शक्ति दीजिए।' तो शक्ति मिल जाएगी और साथ ही साथ प्रतिक्रमण भी हो जाएगा। फिर उसकी चिंता या बोझ दिमाग पर नहीं रखना है। खड़ड़े में गिरा कि तुरंत सामायिक करके धो देना।

खड़ड़े में गिर जाए, उसमें ज्ञानी को कोई हर्ज नहीं है लेकिन तुम उसका उपाय करना। सामायिक! वही एकमात्र उपाय है!

८. स्पर्श सुख की भ्रामक मान्यता

स्त्री के अंगों को देखने में सुख है, यह मान्यता बिल्कुल गलत है। निरी गंदगी ही है। लेकिन यह तो जो रोग बिलीफवाला मन है, वह उस तरफ खींच ले जाता है। लेकिन आज का ज्ञान रोकता है, उसमें से। अगर सौ बार रोग बिलीफ को सच माना तो सौ बार उसे तोड़ना पड़ेगा। स्त्री के स्पर्श के समय जागृति नहीं रहती और सुख भोग लेता है और स्त्री स्पर्श भी उतना ही पोज़नस होता है। वह इतना अधिक पोज़नस

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