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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

सुबह-सुबह तय कर लेना कि 'इस जगत् की कोई भी विनाशी चीज मुझे नहीं चाहिए', फिर उसके प्रति सिन्सियर रहना है। अंदर तो बहुत से लबाड़ हैं कि जो सिन्सियर नहीं रहने देते, लेकिन यदि निश्चय के प्रति सिन्सियर रहे तो फिर उसे कोई चीज बाधक नहीं रहेगी।

जितना तू सिन्सियर, उतनी ही तेरी जागृति। यह हम तुझे सूत्र के रूप में दे रहे हैं और छोटा बच्चा भी समझ जाए, इतने विवरण सहित दे रहे हैं। लेकिन जो जितना सिन्सियर, उतनी उसकी जागृति। यह तो साइंस है। जितनी इसमें सिन्सियारिटी उतना ही खुद का (काम) होता है और यह सिन्सियारिटी तो ठेठ मोक्ष की ओर ले जाती है। सिन्सियारिटी का फल, मोरालिटी आ जाती है। जो थोड़ा-थोड़ा सिन्सियर हो और यदि वह सिन्सियारिटी के पथ पर चले, उस रोड पर चले, तो वह मोरल हो जाता है। संपूर्ण मोरल हो गया, मतलब परमात्मा प्राप्त होने की तैयारी हो गई, इसलिए पहले सिन्सियारिटी की ज़रूरत है। मोरालिटी तो बाद में आएगी।

एक बार तू सिन्सियर हो जा। जितनी चीजों के प्रति तू सिन्सियर है, उतना ही उन चीजों को जीत लिया और जितनी चीजों के प्रति अनसिन्सियर, उतनी नहीं जीत पाए। इसलिए सभी जगह सिन्सियर हो जाओगे तो तुम जीत जाओगे। इस जगत् को जीतना है। जगत् को जीत लोगे तो मोक्ष मिलेगा। जगत् को जीते बगैर कोई मोक्ष में नहीं जाने देगा।

‘रिज पॉइन्ट’ पर रहे जोखिम तो देखो

प्रश्नकर्ता : उस दिन आप कुछ कह रहे थे कि जवानी में भी ‘रिज पॉइन्ट’ होता है, तो वह ‘रिज पॉइन्ट’ क्या है?

दादाश्री : ‘रिज पॉइन्ट’ मतलब यह जो छप्पर होता है, तो उसमें ‘रिज पॉइन्ट’ कहाँ होता है? सबसे ऊपर।

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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हर एक चीज का उदयास्त होता है, उदय और अस्त। कर्मों का भी और सभी का, उदय और अस्त होता है। सूर्यनारायण का भी उदय और अस्त होता है या नहीं होता? सूर्यनारायण जब सेन्टर में होते हैं, उस स्थिति की तुलना में उदय के समय वे नीचे होते हैं और जब अस्त होते हैं तब भी नीचे होते हैं और बीच में जब बहुत टॉप पर जाते हैं, तब वह 'रिज पॉइन्ट' कहलाता है। उसी तरह हर एक कर्म 'रिज पॉइन्ट' पर पहुँचने के बाद फिर उतर जाता है। वैसे ही जवानी का उदय और जवानी का अस्त होता है। जवानी जब 'रिज पॉइन्ट' पर पहुँचती है, उसी समय सबकुछ गिरा देती है। उसमें से अगर वह पास हो गया, गुजर गया तो जीत गया। हम तो सबकुछ सँभाल लेते हैं, लेकिन यदि उसका खुद का मन बदल जाए तो फिर उपाय नहीं है। इसलिए हम उसे अभी, उदय होने से पहले सिखाते हैं कि भाई, नीचे देखकर चलना। स्त्री को मत देखना, बाकी सब, जलेबी-पकोड़े देखना। तुम्हारे लिए गारन्टी नहीं दे सकते। क्योंकि जवानी है। जवानी 'रिज पॉइन्ट' पर चढ़े, तब फिर क्या परिणाम आएँगे, वह कैसे कह सकते हैं? हालाँकि हमारे प्रोटेक्शन में कुछ बिगड़ेगा नहीं, लेकिन सौ में से पाँच प्रतिशत बिगड़ भी सकता है। ऐसे निकलते हैं या नहीं?

प्रश्नकर्ता : यानी जब तक हम हमारा 'रिज पॉइन्ट' क्रोस न कर लें, तब तक एकदम जागृति रखनी है?

दादाश्री : 'रिज पॉइन्ट' आने में तो बहुत टाइम लगता है। 'रिज पॉइन्ट' आ जाए तब तो बहुत हो गया। फिर भी इसका डर तो ठेठ तक रखने जैसा है। बाद में अपने आप पता चल जाएगा कि सेफ साइड हो गई, हमें ऐसा।

प्रश्नकर्ता : क्रोध-मान-माया-लोभ को तीन साल तक आहार नहीं मिले तो वे भूगर्भ में चले जाएँगे, ऐसा इन विषयों में भी है या नहीं?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : इसमें तो ऐसा होता ही नहीं। इसमें 'नो' अपवाद! बाकी सभी में अपवाद, लेकिन इसमें तो अपवाद है ही नहीं।

ब्रह्मचर्य के लिए हमारी तरफ से आपके लिए पूरा बल है, आपकी प्रतिज्ञा मजबूत, सुंदर होनी चाहिए। आपकी प्रतिज्ञा, जोड़तोड़ रहित, लालच रहित और दुश्मनी रहित होनी चाहिए।

दृढ़ निश्चयी पहुँच सकते हैं

प्रश्नकर्ता : आप जब यह बताते हैं न, हमें खुद को नहीं दिख रहा हो तो हमें बल्कि कहना चाहिए कि, 'तुझमें ऐसा है, तभी दादा कह रहे हैं न।' तब फिर दिखने लगेगा।

दादाश्री : ऐसा जो कहते हो, तो वह बीज डाल रहे हो।

प्रश्नकर्ता : फिर भी जब से मैंने आलोचना दी है न, तब से निश्चय बहुत स्ट्रोंग हो गया है।

दादाश्री : वह निश्चय स्ट्रोंग नहीं कहलाता। निश्चय तो, जब मजबूत हो जाए, तब मैं (उसे) निश्चय कहता हूँ। सिर्फ मन से किया हुआ निश्चय नहीं चलेगा, निश्चय... व्यवहार में भी निश्चय होना चाहिए।

ब्रह्मचर्य का कोर्स पूरा करेगा?

प्रश्नकर्ता : जरूर। वह तो चाहिए ही नहीं अब। विषय का विचार तक अच्छा नहीं लगता, लेकिन जो अच्छा लगनेवाली बिलीफ है न, वह अभी भी रहा करती है। उसके प्रति जो रुचि है, वह अभी भी रहा करता है अंदर।

दादाश्री : और अरुचि भी है न?

प्रश्नकर्ता : जितनी रुचि रहती है, उससे अधिक अरुचि रहा करती है।

दादाश्री : लेकिन तूने तय क्या किया है?

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य का निश्चय बरते, ऐसा, लेकिन पुरुषार्थ में कमी रह जाती है, तो उसके लिए क्या करना चाहिए?

दादाश्री : वह पुरुषार्थ में कमी नहीं है। निश्चय, वही पुरुषार्थ है।

प्रश्नकर्ता : निश्चय हो तो फिर वह चीज़ रहेगी ही।

दादाश्री : वह कमी डिस्चार्ज में है। जो कमी है, वह डिस्चार्ज में है, चार्ज में नहीं है और जो डिस्चार्ज में है, उसकी कीमत नहीं है।

प्रश्नकर्ता : विषय के बारे में तो पहले से ही स्ट्रॉंग रखा हुआ है और अभी भी उस बारे में बहुत जागृति रखी हुई है ठेठ तक, लेकिन ये जो, संसार में दूसरी जो घटनाएँ होती हैं...

दादाश्री : उनका कुछ नहीं, उनकी कीमत ही नहीं है। कीमत इसी की है, ब्रह्मचर्य की। बाकी के सभी लोग मनुष्य देह में पशु हैं! पाशवता का दोष है। अन्य किसी चीज़ की कीमत है ही नहीं।

प्रश्नकर्ता : बाकी, विषय में तो इतना तक नक्की है कि अब यदि ऐसा कुछ हो जाए तो चंद्रेश को खत्म कर दूँ, लेकिन अब तो यह चाहिए ही नहीं।

दादाश्री : तो ब्रह्मचर्य के बारे में अच्छा कहा जाएगा। ऐसी समझ की जरूरत है। बाकी जिसमें हैवानियत हो, वह तो रकेगा ही नहीं न!

अधूरी समझ, वहाँ निश्चय कच्चा

प्रश्नकर्ता : आपने निश्चय पर अधिक जोर दिया है। तो निश्चय के लिए क्या होना चाहिए, ब्रह्मचारियों में?

दादाश्री : निश्चय यानी क्या? कि सभी विचारों को बंद

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करके सिर्फ एक ही विचार पर आ जाना, कि हमें यहाँ से स्टेशन जाना ही है। स्टेशन से गाड़ी में ही बैठना है। हमें बस में नहीं जाना है। तब फिर सभी संयोग वैसे ही मिलते हैं, अगर आपका निश्चय हो तो।

निश्चय कच्चा हो तो संयोग नहीं मिलते।

प्रश्नकर्ता : हाँ, वह निश्चय कच्चा पड़ जाता है तो फिर एकनुअल निश्चय के लिए क्या होना चाहिए? क्योंकि यह काल ही ऐसा है कि निश्चय को बदल दे।

दादाश्री : वह बदल जाए, तो उसे हमें वापस बदल देना है। वह बदल जाए तो हमें वापस बदल देना है। लेकिन काल वगैरह, वे हम से नहीं जीत सकते, क्योंकि हम पुरुष जाति हैं। बाकी सारी जातियाँ अलग हैं। अतः ये हम पुरुष जाति को नहीं जीत सकते।

प्रश्नकर्ता : लेकिन हम यों बदलते रहें, उससे अच्छा तो अगर एक्जेक्ट समझ लें तो फिर बदलेगा ही नहीं न, निश्चय।

दादाश्री : नहीं। समझ लेने की तो बात ही अलग है। बिना समझे कुछ करना ही नहीं होता न? लेकिन इतनी सारी समझ आनी मुश्किल है, उससे बजाय तो निश्चय लेकर चलना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : आपने ऐसा कहा है कि यह अन्नब्रह्मचर्य ऐसी चीज है कि सिर्फ समझ से ही खत्म हो सकता है। अन्य किसी चीज से खत्म नहीं हो सकता।

दादाश्री : अगर समझकर हो तो उसे सोचते ही घिन आए ऐसा है। लेकिन घिन नहीं आती और क्यों रग होता है, भाव होता है, उस तरफ का? क्योंकि अभी भी समझा नहीं है, ठीक से।

प्रश्नकर्ता : यानी वह समझ नहीं है, इसलिए उसका निश्चय भी उतना ठीक नहीं है।

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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दादाश्री : हाँ, लेकिन समझ में आने में जरा देर लगे, ऐसा है। समझने जाए, तो समझ में आए ऐसा है। समझ सकता है। समझ में आ जाए तब तो निश्चय-विश्चय कुछ भी करने को नहीं रहेगा।

क्यों गाड़ियों से नहीं टकराता ?

विषय का स्वभाव क्या है? जितना स्ट्रोंग उतना विषय कम। इसमें जितना कमजोर, उतने ही विषय बढ़ेंगे। जो बिल्कुल कमजोर होता है, उसमें बहुत विषय होते हैं। इसलिए कमजोर को फिर से इसमें से बाहर निकलने ही नहीं देते, इतने सारे विषय चपके होते हैं जबकि मजबूत को छू ही नहीं सकते।

प्रश्नकर्ता : वह कमजोरी किस आधार पर टिकी हुई है?

दादाश्री : खुद की उसमें प्रतिज्ञा नहीं होती, कभी भी खुद की स्थिरता नहीं होती इसलिए वह फिसलता जाता है। फिसलते, फिसलते खत्म हो जाता है। 'ब्रह्मचर्य टूटे तो जहर खाकर भी उसे संभालना, कहते हैं। 'लेकिन ब्रह्मचर्य मत तोड़ना', वह क्रमिक ज्ञान में आता है।

प्रश्नकर्ता : ध्येय तक पहुँचना हो तो अक्रम मार्ग में भी निश्चय तो ऐसा ही रखना पड़ेगा न?

दादाश्री : निश्चय मजबूत रखना, निश्चय अत्यंत मजबूत होना चाहिए।

तेरा कुछ राह पर आएगा, लिखकर देनेवाला है? ऐसा। तो स्ट्रोंग रह। क्यों इतनी सारी गाड़ियों से नहीं टकराता? सामनेवाला टकराने आए फिर भी नहीं टकराना है, ऐसा निश्चय किया है न, तो कैसे निकल जाता है। टकराता नहीं है न?

प्रश्नकर्ता : नहीं...

दादाश्री : इतने से के लिए टकराता नहीं है न! चार अंगुल

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की दूरी की वजह से टकराव होने से रह जाता है न? रास्ते पर गाड़ी-वाड़ियों वगैरह के साथ!

प्रश्नकर्ता : वह तो अगर ऐसे होनेवाली हो, तो खुद जल्दी से खिसक जाता है। गाड़ी टकरानेवाली हो, तो खुद जल्दी से खिसक जाता है।

दादाश्री : अतः यदि ऐसा सब, तुम्हारा ऐसा निश्चय होगा न तो कुछ भी नहीं होगा।

जहाँ चोर नीयत, वहाँ नहीं है निश्चय...

प्रश्नकर्ता : चोर नीयत होना, वह निश्चय की कमी कहलाएगी?

दादाश्री : कमी नहीं कहते, इसमें तो निश्चय ही नहीं है। कमी तो निकल जाती है सारी, लेकिन उसमें तो निश्चय ही नहीं है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन नीयत यों थोड़ी-थोड़ी चोर होती है या पूरी चोर होती है, ऐसा फर्क होगा न उसमें?

दादाश्री : चोर हुई मतलब पूरी ही चोर। थोड़ी चोर किसलिए? हमें मकान बनाना हो तो पहले से नक्शे में दरवाजे सुधार लेने चाहिए, दो खिड़कियाँ चाहिए हमें। बाद में चोरी करना, वह क्या अच्छा कहलाएगा? विचार तक भी क्यों आए ज़रा सा? अब्रह्मचर्य का विचार क्यों आना चाहिए? मैंने आपसे क्या कहा है? उगने से पहले उखाड़कर फेंक देना, वर्ना इसके जैसा जोखिम कोई नहीं है।

प्रश्नकर्ता : दादा ने एक-दो बार टोका, चोर नीयत के लिए, लेकिन अभी भी बात ठीक से पकड़ में नहीं आ रही है ऐसा है।

दादाश्री : पकड़कर क्या करना है? जैसे-जैसे लातें पड़ेंगी,

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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अंदर जलन पैदा होगी न, तो अपने आप पकड़ में आ जाएगी। अब तो अनुभव शुरू होगा न। पहले परीक्षा देते हैं और उसके बाद अनुभव शुरू होता है न!

प्रश्नकर्ता : चोर नीयत नहीं होगी, तो फिर विचार आना बिल्कुल बंद हो जाएगा?

दादाश्री : नहीं, भले ही विचार आए। विचार आए, तो उसमें हमें क्या हर्ज है? विचार बंद नहीं होंगे। चोर नीयत नहीं होनी चाहिए, अंदर भले ही कैसा भी लालच हो लेकिन उस पर ध्यान न दे, स्ट्रॉंग! विचार आएँगे ही कैसे?

प्रश्नकर्ता : अभी भी नीयत थोड़ी चोर है।

दादाश्री : चोर नीयत हो, उसे भी खुद जाने।

प्रश्नकर्ता : फिर कभी कभार बहुत विचार फूटते हैं, वह क्या है?

दादाश्री : विचार भले ही लाखों फूटें, फिर भी...

प्रश्नकर्ता : फिर हमें जो अंदर सुख रहता है, वह कम हो जाता है।

दादाश्री : वह सुख कम होता है, तब वह तपता है, लाल-लाल हो जाता है। वह तो, उस घड़ी तप करना पड़ता है न? सुख कम हो जाए तो क्या दुःख मोल लेना है?

प्रश्नकर्ता : इसलिए मैंने पूछा कि वह 'नीयत चोर' है इसलिए होता है।

दादाश्री : नीयत चोर नहीं है। इसमें तो क्षत्रियता चाहिए, क्षत्रियता! चितौड़ के राणा क्या कहते थे? नहीं झुकूँगा, झुकूँगा ही नहीं। उसने राजगद्दी छोड़ दी लेकिन झुका नहीं। भाग गया लेकिन झुका नहीं। नहीं तो बादशाह ने तो कह दिया कि, 'यदि आप

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झुकोगे, तो फिर इस गद्दी पर बैठ जाओ।' तब कहा, 'नहीं। मुझे ऐसी गद्दी नहीं चाहिए। मैं चित्तौड़ का राणा नहीं झुकूँगा।'

प्रश्नकर्ता : अभी भी प्रकृति परेशान करती है। लेकिन जब अंदर असल में लाल-लाल हो जाता है, तभी दादा का असल अनुभव होता है।

दादाश्री : वह तप पूरा करना पड़ेगा। उसके बाद आत्मा का अपार आनंद रहेगा। इस बाड़ को पार किया कि फिर अपार आनंद।

विषय के विष की परख क्यों नहीं होती ?

प्रश्नकर्ता : तो क्या ऐसा है कि विषय समझ से जाएगा? जैसे-जैसे समझ बढ़ती जाएगी, वैसे विषय चला जाएगा।

दादाश्री : समझ से ही चला जाएगा। यदि ऐसा समझ में आ गया न कि 'यह साँप जहरीला है और अगर काट लेगा तो तुरंत मर जाएँगे,' तो फिर वह जहरीले नाग से दूर ही रहेगा। उसी तरह इसमें भी समझ में आ जाना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : हाँ। लेकिन वह समझ में क्यों नहीं आता?

दादाश्री : अनादिकाल से आराधन किया हुआ है न, उसी को सत्य माना है न।

प्रश्नकर्ता : वह ठीक है, लेकिन वह आराधन किया हुआ और आज का ज्ञान, उसमें अभी भी क्यों युद्ध चल रहा है?

दादाश्री : विस्तार से सोचने की खुद की शक्ति ही नहीं है न।

प्रश्नकर्ता : शक्ति नहीं है या उसकी इच्छा नहीं है?

दादाश्री : नहीं, शक्ति नहीं है। इच्छा तो है पूरी-पूरी।

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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प्रश्नकर्ता : अब मुझे ऐसा लग रहा है कि शक्ति तो है ही।

दादाश्री : और सारी शक्ति होती तो है, लेकिन वह उत्पन्न नहीं हुई है न?!

प्रश्नकर्ता : तो वह शक्ति उत्पन्न कैसे होगी?

दादाश्री : वह तो रात-दिन उसी के विचार हों, उसी पर विचारणा करता रहे और उसमें कितना आराधन करने योग्य है और वह कितना करने योग्य है, तुरंत अंदर जैसे-जैसे हमें विचारणा हो न, वैसे-वैसे खुलता जाएगा।

प्रश्नकर्ता : यानी इसका मीनिंग यही हुआ न कि कुछ भी करके यह व्यवहार खत्म कर देना चाहिए।

दादाश्री : इसलिए वे श्री विज्ञान इस्तेमाल करते हैं न? और सोचा हुआ होगा तो श्री विज्ञान भी इस्तेमाल नहीं करना पड़ेगा।

प्रश्नकर्ता : दिन भर के जो व्यवहार हैं, वे व्यवहार आवश्यक हैं। वही उसकी प्रगति में अंतरायरूप हैं न अभी, क्योंकि उसे सोचने का टाइम ही नहीं मिलता।

दादाश्री : इसलिए इसके बजाय, सबसे अच्छा यह है, कि अपनी दृष्टि कहीं पर भी चिपके, तो उखाड़ देना और प्रतिक्रमण कर लेना, बस।

प्रश्नकर्ता : उसके बाद मन कब तक इस एक ही सिद्धांत पर चलेगा? मन एक सिद्धांत पर कन्टिन्युअस नहीं चलता। बार-बार दृष्टि बिगड़ती है और प्रतिक्रमण करना या यह करना, यह सिद्धांत कन्टिन्युअस नहीं चलता। श्री विज्ञान भी एट-ए-टाइम नहीं चलता। कन्टिन्युअस रहना चाहिए और जब विस्तार से उसे समाधान हो, तब वह आगे बढ़ता है।

दादाश्री : वह विस्तार से सप्लाइ भी करना पड़ता है। अपने

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से हो सके तब तक, पहले तो यह उखाड़ देना चाहिए, तो चला फटाफट। खुद के खेत में यदि सारी कपास बोया है, कपास को पहचानते हैं कि यह कपास है, तब फिर अगर दूसरा कुछ उगे तो सिर्फ उसे निकाल देना है। उसे निराई कहते हैं। ऐसे निराई कर दें तो हो जाएगा। उगते ही सारा दबा दिया। तो हो गया। उससे पहले दबाया जा सके, ऐसा नहीं है। जब तक उगेगा नहीं तब तक बीज का पता नहीं चलेगा, उगते ही पहचान जाओगे कि यह बीज अलग है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन उसका निश्चय होगा तो दूसरा कुछ उगते ही उसे पता चल जाएगा न?

दादाश्री : दूसरा बीज दिखे तो उसे उखाड़कर फेंक देना यानी संक्षेप में कहें तो यहीं सबसे अच्छा है।

प्रश्नकर्ता : लेकिन इस एक सिद्धांत पर ही तो नहीं बैठे रह सकते हैं न, आगे बढ़ना तो पड़ेगा न।

दादाश्री : उस घड़ी फिर से मिल जाएगा रास्ता। उस घड़ी अपने आप सभी संयोग मिल जाएंगे। तुझे काम आएंगी, ये सारी बातें? तुझे क्या काम आएंगी?

प्रश्नकर्ता : आएंगी ही न? अपने ध्येय का ही है न!

‘उदय’ की परिभाषा तो समझो

प्रश्नकर्ता : व्रत का ठीक से पालन हो रहा है या नहीं, वह हम कैसे समझें?

दादाश्री : ये तुम्हारी आँखों में चंचलता (विकारी भाव) आ जाती है या नहीं, उसका पता चलता है न? यदि कभी विषय के विचार तुम्हें अच्छे लगे तो? क्योंकि आत्मा थर्मामीटर जैसा है, तो तुरंत सबकुछ पता चल जाता है कि गलत रास्ते पर चला।

दृढ़ निश्चय पहुँचाए पार (खं-2-३)

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प्रश्नकर्ता : यानी खुद का निश्चय पक्का है। अब बाद में जो होता है, वह तो पूरा उदय का भाग आया न?

दादाश्री : उदय का भाग कौन सा कहलाता है कि संडास नहीं जाना है, वह ऐसे कहता है। यहाँ घर में तो संडास नहीं कर सकते न! इसलिए संडास को ठेठ तक रोककर रखता है और बाद में जाता है, वह उदय भाग कहलाता है। कहीं पर भी संडास करने बैठ जाए तो उसे उदय भाग नहीं कहा जा सकता। इस विषय में क्या होता है कि यह रस अच्छा लगता है, यह पुरानी आदत है। चखने की आदत है, इसलिए वह फिर उदय भाग में हस्तक्षेप करने जाता है। उदय भाग तो, खुद बिल्कुल मना करता हो और ठेठ तक स्ट्रॉग, मुझे फिसलना नहीं है, ऐसा कहता है। फिर फिसल जाए तो, वह बात अलग है। फिसलनेवाला इंसान कितनी सावधानी रखता है? सावधानीपूर्वक रहना, तो हर्ज नहीं हैं।

प्रश्नकर्ता : अर्थात यह डिमाकेशन बहुत सूक्ष्म है।

दादाश्री : बहुत सूक्ष्म है।

प्रश्नकर्ता : और खुद ही सख्त रहकर समझ सकता है। खुद ही सख्त रहे।

दादाश्री : ऐसे सख्त रहना चाहिए, फिर भी फिसल गए तो वह अलग बात है। जैसे तालाब में तैरनेवाला इंसान, डूबने का प्रयत्न ही नहीं होता न उसका।

प्रश्नकर्ता : अभी जो ब्रह्मचर्य से संबंधित निश्चय हो रहे हैं, वे किस आधार पर हो रहे हैं? किस पर आधारित है? स्ट्रॉग निश्चय?

दादाश्री : आपको जो करना है, उस पर। कोई लड़का अगर पानी में कूद जाए, खेलने या तैरने के लिए तो। वह किस आधार पर निश्चय करता है बचने का?

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प्रश्नकर्ता : जीना है इसलिए।

दादाश्री : अगर वह सोचे कि जीएँ तो भी क्या और मरें तो भी क्या, तो उसका क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : डूब ही जाएगा। खुद को यों ब्रह्मचर्य से संबंधित जो विवेक आता है, उसी के आधार पर यह निश्चय होता है?

दादाश्री : वह तो समझता है कि क्या करूँ तो सुखी हो सकूँगा। सुख दूँद रहा है और खुद का स्वभाव ब्रह्मचारी ही है, स्वभाव से!

दूढ़ निश्चय को कैसे अंतराय?

प्रश्नकर्ता : आपने कहा है कि 'अंतराय खड़े किए है और फिर कहता है कि मुझे दिख नहीं रहा।' तो इस संदर्भ में श्री विज्ञान के बारे में कौन से अंतराय हैं और किस प्रकार से अंतराय बाधक हैं?

दादाश्री : जो निश्चय कर ले कि मुझे अब ब्रह्मचर्य पालन करना है, उसे कुछ भी बाधक नहीं हो सकता। ये सारे तो बहाने बनाते हैं। अपने महात्मा कितने निश्चयवाले हैं यों, जरा सा भी डिगते नहीं हैं। श्री विज्ञान तो हेल्पिंग है। लेकिन जिसका निश्चय है, जिसे गिरना नहीं है, वह क्यों कुएँ में गिरे? तेरा निश्चय पक्का है न? एकदम पक्का?

प्रश्नकर्ता : एकदम पक्का।

दादाश्री : हाँ, ऐसा पक्का होना चाहिए।

सभी कितने पक्के। यह तो जिसके निश्चय का ठिकाना नहीं है, वह ऐसा सब दूँदता रहता है और अंतराय डालता है। खुद डूढ़ी तय कर ले कि भई, मुझे गिरना है ही नहीं। तो गिरेगा ही नहीं। फिर कोई धक्का मारेगा क्या! और तब आनंद रहता

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है, यों ऐसे अंतराय-वंतराय दूँढने से कहीं आनंद रहता होगा?

प्रश्नकर्ता : दूसरे उपाय भी साथ में हैं ही न! फिर श्री विज्ञान के अलावा भी उपाय हैं ही न, प्रतिक्रमण है, वह सब...

दादाश्री : प्रतिक्रमण तो मन से गलती हो गई हो तो वर्ना प्रतिक्रमण की भी क्या जरूरत है? निश्चय अर्थात उसे कोई डराता नहीं है। यह सब तो जिसका ठिकाना नहीं हो, उसके लिए यह सब है। ये दूसरे उपाय क्यों दूँढते हैं। निश्चय मतलब निश्चय! जिसे शादी नहीं करनी है, उसे तय कर लेना चाहिए कि मुझे शादी करनी ही नहीं है। फिर कौन शादी करवाएगा? और जिसे शादी करनी है, उसे व्यर्थ में हाय-हाय करने की जरूरत नहीं है, शादी करके बैठ जाना। दही में और दूध में पैर नहीं रखना है किसी को भी।

जिसका ऐसा निश्चय है कि कुएँ में गिरना ही नहीं है, वह यदि चार दिन से सोया नहीं हो और उसे कुएँ की दीवार पर बिठा दिया जाए, फिर भी नहीं सोएगा वहाँ।

प्रश्नकर्ता : वहाँ तो प्रत्यक्ष दिखता है न कि गिर जाऊँगा यहाँ।

दादाश्री : हाँ, तो ऐसे प्रत्यक्ष से भी बुरा है यह तो। यह तो कितनी बड़ी खाई है! अनंत जन्मों के लिए जंगल लिपट जाता है। अर्थात मन मजबूत हुआ होगा तो हो सकता है, वर्ना यों तो नहीं हो पाएगा। यों कच्चे मन से ऐसे, ये धागे सिलाई के लिए नहीं है। कैसा स्ट्रोंग होना चाहिए कि मर जाऊँ लेकिन बूटे नहीं।

तेरा निश्चय मजबूत है न!

प्रश्नकर्ता : एकदम स्ट्रोंग। स्ट्रोंग-स्ट्रोंग कहने से भी स्ट्रोंग हो जाता है!

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दादाश्री : ऐसा?

प्रश्नकर्ता : निश्चय स्ट्रोंग हो जाए तो सबकुछ आता ही जाता है।

दादाश्री : वह सीक्रेसी मिट गई तो 'ओपन टु स्काई' हो गया। उस गुप्त की वजह से यह सारी सीक्रेसी है। उसके बाद हमारी तरह बोला जा सकेगा, 'नो सीक्रेसी'।

जो निरंतर सुख भोग रहे हैं, उनके चेहरे तो देखो?! अरंडी का तेल पीया हो, वैसा दिखता है? और जो नहीं भोगते उनके?

प्रश्नकर्ता : निश्चय स्ट्रोंग है और मैंने कोई सीक्रेसी नहीं रखी है। आलोचना में आपके सामने सभी बातें ओपन की हुई हैं।

दादाश्री : वह सब ठीक है, लेकिन यह ऐसा सब तूफान दूँढना ही नहीं होता। निश्चय मतलब कुछ भी दूँढना नहीं होता। अपने आप ही आकर खड़ा रहे। अन्य किसी चीज की ज़रूरत ही नहीं है न! आए तो भी क्या और नहीं आए तो भी क्या। तो तू तेरे घर रह, कहना। वह स्थिति नहीं आ जाए, तब तक यहाँ आते रहना है।

प्रश्नकर्ता : मुझे ऐसा रहा करता है कि मेरा निश्चय इतना स्ट्रोंग है। ज्ञानीपुरुष के साथ का प्रत्यक्ष संयोग है, आप्तपुत्रों के साथ मैं रहता हूँ। मुझे इसमें बिल्कुल इन्टरेस्ट नहीं है, फिर भी आकर्षण क्यों रहा करता है?

दादाश्री : यह जो आकर्षण होता है न, वह पूर्व का हिसाब है इसलिए आकर्षण होता है। उसे तुरंत ही बो (निर्मूल) कर डालना।

प्रश्नकर्ता : प्रतिक्रमण।

दादाश्री : हाँ। वह कहीं अपने निश्चय को तोड़ता नहीं है।

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आँखों को कुछ ठीक लगे तो आकृष्ट होती है, इससे कोई गुनाह नहीं लगता। वह तो प्रतिक्रमण कर लेने से धुल जाता है। वह पिछले जन्म की गलती है और जहाँ वैसा हिसाब होगा तभी वहाँ जाएगा, वर्ना जाएगा ही नहीं कभी भी। वह मिल जाए तभी आकर्षण होता है। वह तो प्रतिक्रमण से धुल जाएगा। उसका और क्या हिसाब है? वह तो, श्री विज्ञान रखने के बावजूद भी दिखता है कि आकर्षण हो रहा है। समझ में आए ऐसी बात है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : समझ में आ रहा है न! मुझे ऐसा था कि इतना सुंदर ज्ञान मिला है और छूटने के ऐसे सब सुंदर संयोग मिले हैं, तो यदि प्योर हो जाएँ इस एक ही चीज़ में, तो बहुत अच्छा रहेगा, ऐसा।

दादाश्री : हाँ, लेकिन प्योर ही है। निश्चय है तब तक प्योर है और ऐसे इम्प्योरिटी माना, वह भी गलती है अपनी। निश्चय अपना था इसलिए प्योर रहता है। फिर जो आकर्षण होता है, उसके उपाय हैं! आकर्षण भी कैसा, फिसल गए तो क्या कोई गुनाह है? फिर से खड़े होकर चलने लगना। कपड़े बिगड़ गए हों तो धो लेना। हम फिसल पड़ें तो गुनाह है, फिसल गए तो गुनाह नहीं।

प्रश्नकर्ता : मुझे अंदर यों ऐसा खेद रहा करता है कि ऐसा सुंदर ज्ञान मिला है, फिर भी अभी तक ऐसी स्थिति क्यों अनुभव कर रहा हूँ?

दादाश्री : नहीं, वह तो सभी को ऐसा होता है। वह तो बल्कि यदि हम प्रतिक्रमण से धो डालें तो दिन बदलेंगे। वर्ना बाकी रहा, ऐसा कहा जाएगा। पिछले जन्म में जो हस्ताक्षर किए थे, वे छोड़ेंगे नहीं न!

[ ४ ]

विषय विचार परेशान करें तब...

वह तो है भरा हुआ माल

प्रश्नकर्ता : मुझे व्यापार के कारण बाहर बहुत घूमना पड़ता है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन उन संयोगों में हमें सावधान रहना है, वह चढ़ बैठे तो चढ़ने मत देना। वह न्यूट्रल है और हम तो पुरुष हैं। न्यूट्रल कभी भी पुरुष को नहीं जीत सकता।

मांसाहार की दुकान में जाने पर भी विचार नहीं आते, ऐसा क्यों? क्योंकि वह माल नहीं भरा है न! तब फिर हमें समझ नहीं जाना चाहिए कि 'भाई, जो भरा हुआ है वही कूद रहा है। नहीं भरा होगा तो नहीं कूदगा।' इतना समझ सकते हैं या नहीं?

प्रश्नकर्ता : वह ठीक है। लेकिन बहुत विचार आते हैं, इसलिए फिर ऐसा लगता है कि अरे! ऐसा सब?!

दादाश्री : बाहर लोग शोर मचा रहे हों और हम दरवाजा बंद करके बैठे हों एक तरफ, तो कोई झंझट है? अगर हमें उसके साथ व्यवहार ही नहीं करना है तो फिर हम रह सकेंगे। यानी कि वह तूफान आकर फिर पार निकल जाएगा, और तूफान शांत हो जाएगा। बवंडर क्या रोज आते हैं? बस दो दिन। पूरे दिन चलता रहे तो भी उसका रास्ता निकालेंगे। ये सब बताते हैं न। इन्हें क्या बवंडर नहीं आते होंगे? अब इसे कितने बवंडर आते हैं, लेकिन क्या करे?

विषय विचार परेशान करें तब... (खंड-2-४)

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प्रश्नकर्ता : चंद्रेश विषय भोग रहा हो ऐसे विचार आते हैं। ऐसा सब दिखता है, फोटो दिखते हैं, अंदर। फिर अंदर कुछ भी अच्छा नहीं लगता।

दादाश्री : भले ही अच्छा न लगे। अच्छा नहीं लगता वह भी चंद्रेश को ही न? तुझे तो नहीं न? तू तो अलग है न इसमें! विषय नहीं होना चाहिए, अन्य कोई गलती हो जाए तो चला सकते हैं।

प्रश्नकर्ता : ऐसा विचार आता है कि मुझे इन्टरेस्ट है, अतः चोर नीयत होगी तभी इन्टरेस्ट आता है। नहीं तो इन्टरेस्ट आना ही नहीं चाहिए।

दादाश्री : इन्टरेस्ट आए ऐसा माल लेकर आए हो तुम। तुम्हें पता चलता है कि ओहो! इन्टरेस्ट आए ऐसा है। अतः तब कहना, 'इन्टरेस्ट का इस्तेमाल करो तुम। शादी भी कर लो, कौन मना कर रहा है?'

आत्मा को इसमें इन्टरेस्ट है ही नहीं। यह इन्टरेस्ट है, आहारी को। आहारी देखे हैं तूने? ज्यादा खा जाए तो भी दुःखी होते हैं और वापस वही आहारी उपवास भी करने बैठते हैं!

प्रश्नकर्ता : फिर ऐसे विचार आते हैं कि यह निश्चय में कमी है या चोर नीयत है या फिर ऐसा क्यों हो रहा है?

दादाश्री : नहीं, वह तो भरा हुआ माल है और टाइम आ गया है। आसपास के संयोग वैसे हैं, इसलिए फूट रहे हैं।

प्रश्नकर्ता : एक तो अज्ञाने में विषय में खिंच गए और दूसरा जागृतिपूर्वक खिंच गए, कुछ चला ही नहीं वहाँ पर। तब फिर क्या करें? और इसका कितना दोष लगता है?

दादाश्री : दोष तो है न! वैद्य ने कहा हो कि मिर्च मत खाना और हम मिर्च खाएँ, तो क्या होगा?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : आज्ञा का पालन नहीं हो सका तो क्या करना चाहिए फिर?

दादाश्री : वह तो उसने मिर्च खाई, इसलिए फिर रोग बढ़ा।

प्रश्नकर्ता : लेकिन उसका उपाय तो होना चाहिए न?

दादाश्री : प्रतिक्रमण करना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : लेकिन जिन्होंने आज्ञा दी है, उन्हें कहना तो पड़ेगा न?

दादाश्री : हाँ। कह दो फिर भी वे प्रतिक्रमण करने को कहेंगे। और क्या कहें? रूबरू प्रतिक्रमण कर।

कभी अगर अंदर कोई खराब विचार उग आए और निकाल देने में देर हो जाए तो उसका बड़ा प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। वह तो जब विचार उगे कि तुरंत निकाल देना है, फेंक देना है।

प्रश्नकर्ता : पहले ऐसी स्थिति थी कि मैं इन सबसे अलग हो जाऊँ न, तो ब्रह्मचर्य रह ही नहीं पाता था, ऐसी स्थिति हो गई थी। जरा सा भी इस समूह से जुदा रहूँ या अकेला घर पर रहूँ न तो सभी विचार घेर लेते थे।

दादाश्री : विचार घेर लेते हैं, उसमें अपना क्या जाता है? हम देखनेवाले हैं उसे! होली में क्यों हाथ नहीं डालते? होली का दोष निकाले, वह गलत है न! दोष तो, अगर तुम हाथ डाल दो, उसे कहते हैं।

विचार तो सभी तरह के आ सकते हैं। मच्छर घेर लेते हो, उन्हें हम यों-यों करे तो नहीं रहेंगे। इसमें तो हाथ दर्द करता है, लेकिन कुदरत का हाथ तो दुःख ही नहीं सकता। हम कहें कि मच्छर छूने नहीं देना है, तो अंदर वैसा ही हो जाएगा। ऐसा निश्चय करो तब कैसा सुंदर ब्रह्मचर्य पालन किया जा सकेगा!!

विषय विचार परेशान करें तब... (खं-2-४)

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जुदापन से जीत सकते हैं

दादाश्री : तुझे कैसा रहता है? तेरा ठीक हो जाएगा न?

प्रश्नकर्ता : हो जाएगा।

दादाश्री : हं। तू तो ऐसा ही कहता है न, 'गिर जाएगा, गिर जाएगा', उसी जगह से उगता है और उसी जगह पर ढलता है। वह गिरता नहीं न, वह कहता है, गिर जाएगा सूर्यनारायण!

प्रश्नकर्ता : ये अंदर का ठीक हो जाएगा, चंद्रेश का।

दादाश्री : ऐसा। लेकिन शादी करने का कहता है?

प्रश्नकर्ता : वैसी गाँठें फूट रही हैं।

दादाश्री : उसे कहना कि 'यदि गाँठें फूटेंगी न, तो जब तक हम एक्सेप्ट नहीं करेंगे तब तक तुम्हारा कुछ नहीं चलनेवाला। बेकार में तेरे दिन ही बिगड़ेंगे, चुपचाप बैठ रह न।' बेकार में शादी करना और विधुर होना। शादी करना और विधुर होना, ऐसे करते रहते थे। बैठे रहो न, शादी भी मत करना और विधुर भी मत होना। हम कोई सहायोग नहीं देंगे।

प्रश्नकर्ता : यानी कि जब तक मैं दस्तखत नहीं करता, तब तक गाड़ी फर्स्ट क्लास चलती है।

दादाश्री : तुम्हें खुद को ही डाँटना पड़ेगा कि कुछ नहीं होगा। इसलिए चुप बैठो न! ऐसे दो-चार प्रकार के प्रयोग सेट कर देना ताकि जुदा रह सको।

दादाश्री : तुझे पछतावा नहीं होता, शादी नहीं की उसका?

प्रश्नकर्ता : नहीं, ऐसा नहीं है।

दादाश्री : तो शादी नहीं की, वह अच्छा लगा तुझे?

प्रश्नकर्ता : हाँ, दूसरे लोग जो शादीशुदा हैं, उनका सारा