भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

विषय विचार परेशान करें तब... (खंड-2-४)

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ऐसा सब देख सकता है। बाहर क्रमिक मार्ग में मन की परेशानी और (मीठी) गोलियाँ खिलानी पड़ती हैं। फिर भी, हमें भी यदि कभी खिलानी पड़ें तो खिला देना।

इसलिए हम कहते हैं न कि गोलियाँ खिलाकर काम लेना। एक ही चीज नहीं जँचती, उसे ऐसा नहीं है। उसे तो सभी बातें, जिसमें टेस्ट आए, उसमें जँचता है!

❖ ❖ ❖ ❖ ❖

[ ५ ]

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार

ज्ञान से करो स्वच्छ, मन को

दादाश्री : मन बिगड़ता है अभी भी?

प्रश्नकर्ता : बिगड़ता है।

दादाश्री : तेरी दुकान में माल होगा, तब तक बिगड़ेगा लेकिन अब जो माल है, तो फिर उसे धो देना। धोकर साफ करते हो या नहीं करते?

प्रश्नकर्ता : हाँ, करता हूँ।

दादाश्री : यानी स्वच्छ जीवन। मन भी नहीं बिगड़े कभी भी! देह तो बिगड़े ही नहीं लेकिन मन भी नहीं बिगड़े और बिगड़ जाए तो तुरंत ही धोकर साफ करके, इस्त्री करके एक तरफ रख देना।

जहाँ ज्ञान है, वहाँ संसार का एक भी विचार नहीं आना चाहिए। हमें संसार का एक भी विचार नहीं आता। वह भी स्त्री का? ये सभी स्त्रियाँ बैठी हैं, लेकिन हमें स्त्री से संबंधित विचार तक नहीं आते। अर्थात सब खाली हो जाना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : हो जाना चाहिए या कर देना चाहिए?

दादाश्री : हो जाना चाहिए। यह मार्ग ऐसा है कि आपको खाली नहीं करना पड़ेगा। अपने आप खाली होता रहेगा। हमारी आज्ञा में रहोगे तो खाली होता रहेगा।

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)

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वर्ना मन हो जाएं ढीला

प्रश्नकर्ता : हमने नियम लिया हो कि दो ही रोटियाँ खानी हैं। उसके बाद मन के कहे अनुसार चलें तो वह नियम टूट गया, ऐसा हुआ न?

दादाश्री : मन के कहे अनुसार चलना ही नहीं चाहिए। मन का कहा यदि अपने ज्ञान के अनुसार चल रहा हो, तो उतना एडजस्ट कर सकते हैं। अपने ज्ञान के विरुद्ध चले तो बंद कर देना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : अतः मन के कहे अनुसार चले तो नियम टूट जाता है, ऐसा है न?

दादाश्री : रहा ही कहाँ तब नियम? किसी की बात में अपनी होशियारी लगाएँ तो। लेकिन हमें तो ज्ञान के अनुसार चलना है। फिर भी, मन भी नियमवाला है। इसी वजह से तो इस जगत् के लोग बहुत अच्छी तरह से रह सकते हैं।

प्रश्नकर्ता : अज्ञानता हो, तब भी अगर नियम तय करे तो एक्जेक्ट उसी तरह चल सकता है न?

दादाश्री : वह तय करे कि मुझे नियम से ही चलना है, तब फिर नियम से ही चलेगा। फिर बुद्धि दखल करे तो वैसा ही हो जाता है। गाड़ी नियम में नहीं हो तो क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : हाँ। व्यवहार उलझ जाएगा सारा।

दादाश्री : हमारा मन बहुत कहता है कि यह खाओ, यह खाओ, लेकिन नहीं। वर्ना वश में नहीं रहेगा। देर ही नहीं लगेगी न। लेकिन जिसका हावी हो गया उसे पूरे दिन खिंटपिट रहती है। दयनीय स्थिति! 'तू' तो चंद्रेश को रूलानेवाला आदमी है। 'तू' कोई ऐसा-वैसा आदमी है? और फिर यह मन तो चंद्रेश का है, तुझे क्या लेना देना? अब तू है शुद्धात्मा।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : बिल्कुल।

दादाश्री : यह मन, यह तो चंद्रेश का है। तुझे उस मन के कहे अनुसार नहीं चलना है। जो मन के कहे अनुसार चले न, तो उसका ब्रह्मचर्य नहीं टिकेगा, कुछ भी नहीं टिकेगा। बल्कि अब्रह्मचर्य हो जाएगा। मन का और हमारा क्या लेनादेना?

अब किसी के गहने पड़े हुए हों और मन कहे कि कोई नहीं है, ले लो न! लेकिन हमें समझना चाहिए। खुद का चलन नहीं रहे, तो मन चढ़ बैठता है।

प्रश्नकर्ता : खुद को समझ में जरूर आता है कि ये दो घंटे व्यर्थ चले गए।

दादाश्री : चले गए, वह अलग चीज है। वह तो अजागृति के कारण। लेकिन फिर भी मन चढ़ नहीं बैठेगा।

विरोधी के पक्षकार ?

प्रश्नकर्ता : एक बार जब हम सत्संग में से उठकर बाहर चाय पीने गए थे, तब आपने कहा था कि बाकी सभी चीजों में ऐसे छूट रखना लेकिन सिर्फ ब्रह्मचर्य के बारे में ही मन की मत सुनना।

दादाश्री : और बाकी बातों में सुनोगे? यदि तुम्हें टेस्ट आता हो तो मानो न! मुझे क्या आपत्ति है? यह तो, अगर ब्रह्मचर्य के बारे में सुनोगे, तब भी मुझे आपत्ति नहीं।

यह तो, आप ब्रह्मचर्य में स्ट्रॉंग(टूढ़) रहो, इसलिए कहना चाहता हूँ। ध्येय को नुकसान न पहुँचाए, इस हेतु से ऐसा कहा था। उसे लेकर अगर तुम ऐसा कहो कि 'बाकी सब चीजों में आराम से मन की सुनना।' तो तुम्हारा काम हो गया! क्या पाओगे इससे? कैसी वकालत कर रहे हो?

प्रश्नकर्ता : खुद की लॉ-बुक(कानूनी किताब) में ले जाते हैं।

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)

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दादाश्री : लों-बुक तो वही की वही। ये पक्षकार कैसे इंसान हैं? विरोधी के पक्षकार! अब समझ जाओ। वर्ना चलेगा नहीं इस दुनिया में।

मन चलाए, मंडप तक...

देखो न, चार सौ साल पहले कबीर जी ने कहा है, कितने सयाने इंसान! कहते हैं, 'मन का चलता तन चले, ताका सर्वस्व जाए।' सयाने नहीं थे कबीरजी? और यह तो मन के कहे अनुसार चलते रहते हैं। अगर मन कहे कि 'इससे शादी करो।' तो शादी कर लोगे?

प्रश्नकर्ता : नहीं। ऐसा नहीं होगा।

दादाश्री : अभी तो वह बोलेगा। ऐसा बोलेगा, उस समय क्या करोगे तुम? ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करना हो तो स्ट्रॉंग रहना पड़ेगा। मन तो ऐसा भी कहेगा और तुमसे भी कहलवाएगा। इसीलिए मैं कह रहा था न कि 'कल सुबह शायद तुम भाग भी जाओगे।' उसका क्या कारण है? मन के कहे अनुसार चलनेवाले का भरोसा ही क्या? क्योंकि तुम्हारा खुद का चलन नहीं है। खुद के चलनवाला ऐसा नहीं करेगा।

इसलिए मैं तुम से कह रहा था कि अंदर मन कहेगा, 'अभी तो, यह लड़की अच्छी है, और अब हर्ज नहीं है। दादाश्री का आत्मज्ञान मिल गया है, हमें। अब कुछ बाकी नहीं रहा। उसने भी शादी कर ली है, अब पुरावे(एविडेन्स) में खास कुछ कमी नहीं है। चलो न, अब इसमें कहाँ गलती हो गई वापस?। ऊपर से फादर का आशीर्वाद बरसेगा।' अंदर ऐसा बताएगा और अगर तू बहक गया तो वह फजीहत करेगा। हम तो तुम सब से कहते हैं कि 'भाग जाओगे।' तब तू कहता है, 'भागकर हम जाऊँ कहाँ?' लेकिन किस आधार पर तुम भागे बिना नहीं रहोगे? क्योंकि तुम मन के कहे अनुसार चलते हो।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : अब हम यहाँ से कहीं भी नहीं भागेंगे।

दादाश्री : अरे, लेकिन मन के कहे अनुसार चलनेवाला इंसान यहाँ से नहीं जाएगा, वह किस गारन्टी के आधार पर? अरे, लो, मैं जरा दो दिन तक तेरा पानी हिलाता हूँ। अरे! छपछपाऊँ न, तो परसों ही तू चला जाएगा! यह तो तुझे पता ही नहीं है। तुम लोगों के मन का क्या ठिकाना? बिल्कुल बिना ठिकाने का मन। खुद के सेन्टर में भी नहीं खड़ा है। मन के कहे अनुसार ही तो चल रहे हो अभी भी। यह 'नहीं भागेंगे, नहीं भागेंगे', वह सिर्फ कहने के लिए ही लेकिन अभी तो न जाने क्या करोगे? स्ट्रॉंग इंसान तो कौन कहलाता है कि जो किसी की भी नहीं माने। मन की या बुद्धि की, या अहंकार की या फिर कोई भगवान आ जाएँ, तो उनकी भी नहीं माने। तुम लोगों की तो बिसात ही क्या? तू मुझसे कह रहा था कि, 'स्मशान में जाऊँ फिर भी मन आपत्ति नहीं उठाता।' लेकिन और कहीं मन आपत्ति उठाए कि वहाँ नहीं जाना है, तो नहीं जाता?

प्रश्नकर्ता : मैंने यहाँ दादा के पास आकर जो निश्चय किया है, उस बारे में मन की कभी नहीं सुनी है।

दादाश्री : ऐसा? मन सीधा बोलता भी है?

प्रश्नकर्ता : हाँ, सीधा बोलता है।

दादाश्री : उल्टा नहीं बोला है, इसलिए। थोड़ा-बहुत उल्टा बोलेगा, उसे तुम नहीं सुनोगे, लेकिन अगर सात दिन तक तुम्हें छोड़े नहीं और वापस अंदर कहे, 'यह ज्ञान वगैरह मिल गया है, अब कोई हर्ज नहीं है। लोगों में अपनी बहुत वैल्यू है। ऐसा है।' सब समझा-बुझाकर चलाएगा तुम्हें!

प्रश्नकर्ता : ऐसा नहीं होगा अब।

दादाश्री : बाद में तुम्हें नुकसान नहीं हो, इसलिए हम सावधान

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करके कहते हैं कि इसमें 'मन का चलता' छोड़ दो चुपचाप, अपने स्वतंत्र निश्चय से जीओ। मन की जरूरत हो तो लेना और जरूरत नहीं हो तो छोड़ दो। एक ओर रख दो उसे। लेकिन यह मन तो पंद्रह-पंद्रह दिनों तक घुमाकर फिर शादी करवा देता है। बड़े-बड़े संत भी घबरा चुके हैं, तो तुम लोगों की क्या बिसात?

ध्येय का ही निश्चय

ब्रह्मचारी बनने का यह निश्चय तो तेरा है! लेकिन यह तो तू मन के कहे अनुसार तो सबकुछ कर रहा है तो फिर यह सब तेरा है ही कहाँ? वह तो तेरे 'मन' ने कहा था, उस हिसाब से शादी करने में मजा नहीं है। तो ऐसा सब तेरे 'मन' ने तुझे कहा था और तूने एक्सेप्ट कर लिया?

प्रश्नकर्ता : अब निश्चय हो गया है न लेकिन?

दादाश्री : अब निश्चय तेरा है। यदि उसे तू तय करे कि अब यह है मेरा निश्चय। बाद में मन से कह देना कि, 'अब अगर तू उल्टा करेगा, तो तेरी बात तू जाने!' अब तो इसे अपने सिद्धांत के रूप में स्वीकार करते हैं, तो अपना ही कहलाएगा, वह निश्चय।

प्रश्नकर्ता : सिद्धांत के रूप में स्वीकार करने के बाद 'अपना', वना 'मन' का?

दादाश्री : तो और किसका? उसी का है। 'अपना' कहाँ है यहाँ इस जायदाद में? जो अपनी जायदाद थी, उसे दबोच लिया है, और उसमें भी अपने किराए के मकान में रहता है। उसमें भी वह चोरी करता है न ऊपर से?

किसी के छत पर से खपरेल का टुकड़ा गिरे और लग जाए, फिर भी कुछ नहीं बोलते हो। क्योंकि वहाँ मन कहेगा कि 'कैसे कई अब?' वह तो जैसा उसका मन सिखाता है, उसी

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अनुसार वह बोलता है। अपने पास अभी जो सिद्धांत है, मन उसी के अनुसार चलना चाहिए। मन का कहा नहीं मानना है।

सामायिक में चलन, मन का

प्रश्नकर्ता : सामायिक में बैठना अच्छा नहीं लगता। गुल्ली मारने का मन करता है।

दादाश्री : मन भले ही चिल्लाता रहे लेकिन तुझे क्या लेना देना? तरे सिद्धांत से विरुद्ध चल रहा है? चल रहा है, तो चलन उसी का है अभी भी। वह मना करे तो तुम्हें क्या? वह तो सामायिक ही नहीं करने देगा।

प्रश्नकर्ता : पहले शुरुआत में मैं एक-दो साल रेग्युलर सामायिक करता था। वह मुझे अच्छा लगता था, तब।

दादाश्री : तो तू, 'पसंद-नापसंद' वही मार्ग पर है न? ऊपर से कह रहा है कि मुझे अच्छा लगता था! मन की सुने वह ईमान ही नहीं कहलाएगा, वह मशीनरी नहीं कहलाएगा तो और क्या कहलाएगा? खुद का चलन नहीं है? तुम लोग पुरुष बने हो न?

मन अगर सत्संग में आने के लिए मना करे तो क्या करोगे? वहाँ मन की मानते हो? ऐसे मानोगे तो फिर भटक जाओगे न! रहा ही क्या फिर? जानवर भी उसकी सुनते हैं और तुम भी उसकी सुनते हो। कई बार मन के विरुद्ध करते हो या नहीं?

प्रश्नकर्ता : कई बार।

दादाश्री : अच्छा है। जो मन के चलाने से चले, वह तो मिकेनिकल कहलाता है। अंदर पेट्रोल भर दे तो मशीन चलती रहती है। क्या तुझे भी ऐसा होता है? तब तो तुझे शादी नहीं करनी होगी, फिर भी शादी करवा देगा!

प्रश्नकर्ता : इसमें ऐसा नहीं होगा।

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दादाश्री : कैसे इंसान हो? अपनी इच्छा अनुसार नहीं चलने दे। तो फिर खुद का चलन ही नहीं है।

प्रश्नकर्ता : सामायिक करने की इच्छा इतनी स्ट्रोंग नहीं है।

दादाश्री : ओहो, तब तो यह सारा धर्म करने की इच्छा भी नहीं है। इसमें भी स्ट्रोंग नहीं है न फिर!

सामायिक मतलब अड़तालीस मिनट की चीज है। अड़तालीस मिनट तक ठिकाने नहीं रह सकते, तो ब्रह्मचर्य का पालन कैसे कर सकेगा? उसके बजाय तो चुपचाप शादी कर ले तो अच्छा।

यह ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, तो उसमें ब्रह्मचर्य यानी खुद का निश्चयबल। कोई डिगा न सके, ऐसा। जो किसी के कहे अनुसार चले, वह ब्रह्मचर्यपालन कैसे कर सकेगा?

ब्रह्मचर्यवाला इंसान तो कैसा होता है? अरे!! स्ट्रोंग पुरुष! उच्च मनोबलवाला! वे कहीं ऐसे होते होंगे? इसीलिए तो मैं बार-बार कहता हूँ कि, 'तुम चले जाओगे, शादी कर लोगे।' तब तुम कहते हो कि 'आप ऐसे आशीर्वाद मत दीजिए।' मैंने कहा, 'मैं आशीर्वाद नहीं दे रहा हूँ। तुम्हारा भेस दिखा रहा हूँ।' अभी से यदि सावधान नहीं हो जाओगे और खुद के हाथ में लगाम नहीं ले लोगे तो खत्म! गाड़ी कहाँ ले जा रहे हो? तब कहता है, 'बैल जहाँ ले जाए वहाँ।' बैल जिस दिशा में जाए, उस दिशा में गाड़ी जाने देगा कोई? बैल इस ओर जा रहा हो तो मार-ठोककर, कैसे भी करके, इस ओर मोड़ लेता है। खुद के तय किए रास्ते पर ही ले जाएगा न?

प्रश्नकर्ता : तय किए रास्ते पर ही ले जाएगा।

दादाश्री : जबकि तुम लोग तो बैल की इच्छानुसार गाड़ी चलाते हो। 'वह इस ओर जा रहा है तो मैं क्या करूँ?' कहते हैं! उससे अच्छा तो शादी कर लो न शांति से! गाड़ी इस ओर

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जा रही हो तो अर्थ ही नहीं है न! निश्चयबल है नहीं। खुद का कुछ है नहीं। खुद की कोई कार्बिलियत है नहीं। तुझे क्या लगता है? गाड़ी जाने देनी चाहिए?

प्रश्नकर्ता : नहीं जाने देनी चाहिए।

दादाश्री : तो क्यों ये गाड़ियाँ जा रही हैं?

प्रश्नकर्ता : आप बताते हैं न तब पता चलता है कि यह मन के कहे अनुसार किया था। वर्ना पता ही नहीं चलता।

दादाश्री : हाँ, लेकिन पता चलने के बाद समझ जाएगा या नहीं?

प्रश्नकर्ता : समझ जाता है।

दादाश्री : अब वापस परसों आप ऐसा कहोगे कि, 'मुझे भीतर से ऐसा लगा, इसलिए उठ गया सामायिक करते करते!'

प्रश्नकर्ता : सामायिक करने बैठते हैं तो मजा नहीं आता।

दादाश्री : मजा नहीं आ रहा हो तो उसमें हर्ज नहीं। लेकिन मन के कहे अनुसार करे तो, वह नहीं चला सकते।

प्रश्नकर्ता : लेकिन मजा नहीं आता, इसलिए ऐसा लगता है कि अब नहीं बैठना है।

दादाश्री : लेकिन यों 'मन के कहे अनुसार चलना है' ऐसी इच्छा नहीं है न तेरी?

प्रश्नकर्ता : ऐसा तो अब पता चला न!

दादाश्री : मजा नहीं आता, वह अलग बात है। मजा तो, हम समझते हैं कि इसे इन्टरेस्ट(रस) कहीं और है, इसमें इन्टरेस्ट कम है। इन्टरेस्ट तो हम ला देंगे।

प्रश्नकर्ता : मजा नहीं आता इसलिए मन बताता है कि 'अब जाना है।'

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दादाश्री : मैं मन की वह बात नहीं कर रहा हूँ। मजे का और मन का कोई लेना देना नहीं है।

प्रश्नकर्ता : मजा नहीं आता तब फिर ऐसा लगता है कि सामायिक में नहीं बैठना है।

दादाश्री : मजा क्यों नहीं आता, वह मैं जानता हूँ।

प्रश्नकर्ता : मुझे सामायिक में कुछ दिखता ही नहीं है।

दादाश्री : कैसे दिखेगा लेकिन, जहाँ ये सारी गड़बड़ चल रही हो?

प्रश्नकर्ता : जब खुद को पता चलेगा कि ये सब गड़बड़ियाँ की हैं, उसके बाद दिखेगा न?

दादाश्री : नहीं, लेकिन पहले तो खुद को वहाँ तक समझ पहुँची ही नहीं है न! जब तक उसे वह समझ में नहीं आएगा, तब तक दिखेगा कैसे? ये क्या कहना चाहते हैं, वही समझ नहीं पहुँची न? उसमें दृष्टांत दे रहा हूँ, गाड़ी का दृष्टांत बताया, मिकेनिकल का दृष्टांत बताया, लेकिन एक भी समझ पहुँच नहीं रही है अंदर। अब कोई क्या करे?

प्रश्नकर्ता : फिल्म की तरह दिखना चाहिए न?

दादाश्री : कैसे देखेगा लेकिन? आप देखनेवाले नहीं हो, गाड़ी के मालिक नहीं हो न? मालिक बनोगे तो दिखेगा। अभी तो आप बैल के कहे अनुसार चल रहे हो। इसलिए उसे कोई फिल्म नहीं दिखती। खुद के निश्चय से चले, उसे दिखता है सबकुछ।

प्रश्नकर्ता : सामायिक करने में इन्टरेस्ट नहीं है, इसलिए ऐसा होता है न?

दादाश्री : इन्टरेस्ट नहीं हो, उसे चला लेंगे, इसे नहीं चला सकते। इसके जैसी मूर्खता कोई करता होगा? तो वह क्या देखकर करता होगा?

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प्रश्नकर्ता : ‘मैं ऐसा कर रहा हूँ’ ऐसा अभी भी पता नहीं चल रहा है, समझ में नहीं आ रहा।

दादाश्री : समझ में ही नहीं आ रहा? कब आएगा समझ में? दो-तीन जन्मों के बाद समझेगा? शादी कर लेगा तो वह समझा देगी। ‘समझ में नहीं आ रहा है,’ कह रहा है?

यह बैल गाड़ी का दृष्टांत बताया, फिर निश्चयबल की बात की। जो अपना तय किया हुआ, नहीं करने दे, क्या उसकी सुननी चाहिए? माँ-बाप की नहीं सुनते और मन की कीमत ज्यादा मानते हैं, ऐसा?

प्रश्नकर्ता : लेकिन मुझे सामाजिक में कुछ दिखता ही नहीं है।

दादाश्री : क्या देखना होता है, जो दिखेगा?

प्रश्नकर्ता : आप कहते हैं न कि ‘चार साल तक का दिखता है सारा।’

दादाश्री : वह ऐसे नहीं दिखता। वह तो, गहरा उतरने को कहते हैं, तब दिखता है।

जो मन के कहे अनुसार चले, वे सब बैलगाड़ी जैसे ही हैं न?! फिर दिखेगा कैसे? ‘देखनेवाला’ अलग होना चाहिए, खुद के निश्चयबलवाला!

अभी तक मन का कहा ही किया है। उसी की वजह से यह सारा आवरण आया है।

प्रश्नकर्ता : सामाजिक कर रहे हों और मन सामाजिक करने के लिए मना करे, तब क्या वह उदयकर्म है?

दादाश्री : उदयकर्म कब कहलाता है कि निश्चय होने के बावजूद निश्चय को टिकने नहीं दे, तब उदयकर्म कहलाता है।

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प्रश्नकर्ता : विचार उदयकर्म के अधीन तो नहीं फूटते हैं न?

दादाश्री : लेकिन अगर अपना निश्चय हो तो सामायिक करना। निश्चय नहीं हो, भीतर प्रकृति को अनुकूल नहीं हो तो मत करना।

बाकी विचार, वे तो उदयकर्म के अधीन आते हैं। 'उन्हें हमें देखना है', वह अपने पुरुषार्थ की बात है। विचारों को देखें तो, वहीं पर वह उदयकर्म खत्म हो जाता है। देखते ही खत्म! उनमें परिणमन हो जाए, (उस रूप हो जाएँ) तब तो उदयकर्म शुरू हो जाएगा!

ध्येय अनुसार चलाओ...

अभी तो छोटी बातों में, एक तय कर लिया है कि मन का नहीं सुनना मतलब जितना काम का हो उतना सुनना है और काम का नहीं हो उसे नहीं। गाड़ी अपने तय किए रास्ते पर चल रही हो तो हमें चलने देना है और बाद में यदि यों घूम जाए तो हमें ध्येय अनुसार चलाना है। हर एक चीज में ऐसा करना होता है। यह तो कहेगा, 'यह इस ओर दौड़ रही है। अब मैं क्या करूँ?' अब उस बैलगाड़ी को कोई घर में घुसने देगा?

प्रश्नकर्ता : नहीं। लेकिन अंदर जो अच्छी लगती हो, वह चीज नहीं करनी है?

दादाश्री : ऐसा करना किसे अच्छा लगता होगा? मैं क्या नाश्ता नहीं करता? लेकिन उसे ऐसा रखना है कि नापसंद है।

प्रश्नकर्ता : हम तो ऐसा रखते हैं कि सुबह उठकर आपके पास आना है। अन्य कोई निश्चय नहीं। कुछ बातों में मन का कहा सुनते हैं। जो व्यवहार मान्य हो, वैसा।

दादाश्री : अपने कहे अनुसार चलना। अपनी जरूरत हो, अपना ध्येय हो, उस अनुसार चलना। हम बोरसद जाने निकले, फिर आधा

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मील चले, फिर मन कहे, कि 'आज रहने दो न!' तब वापस चला जाता है यह तो। तो वहाँ पर वापस नहीं जाना है। लोग भी क्या कहेंगे? यह बेअक्ल है या क्या है? जाकर वापस आ गए। तुम्हारा ठिकाना नहीं है क्या? लोग ऐसा कहेंगे या नहीं कहेंगे?

मोक्ष में जाने का निश्चय है क्या तेरा? उसमें कुछ बीच में आए तो? मन अंदर शोर मचा दे तो?

प्रश्नकर्ता : फिर भी निश्चय नहीं डिंगेगा।

दादाश्री : वह ईसान कहलाएगा। इन सब का क्या करना है? तुझे ये सभी बातें समझ में आती है?

प्रश्नकर्ता : थोड़ा थोड़ा समझ में आ रहा है। मुझे तो ऐसा ही लगता है कि मेरा निश्चय है।

दादाश्री : कैसा निश्चय? मन के कहे अनुसार तो चलता है! निश्चयवाले का मन ऐसा होता होगा? मन होता है, लेकिन हेल्पिंग होता है, सिर्फ खुद की जरूरत जितना ही। जैसे कि जो बैल होता है, वह खुद के मालिक के कहे अनुसार चलता है न! लेकिन हमें इधर जाना हो और वे उधर जा रहा हों तो?

भले ही शोर मचाएँ

प्रश्नकर्ता : मन को इन्टेरेस्ट नहीं आए, तो वह शोर मचाएगा न?

दादाश्री : भले ही शोर मचाए! सभी के मन ऐसे ही शोर मचाते हैं। मन तो शोर मचाएगा। वह तो टाइम हो जाए तब शोर मचाता है। शोर मचाए, उसमें क्या दावा करेगा? थोड़ी देर बाद फिर कुछ भी नहीं, जब उसकी मुह्त पूरी हो जाए तब। फिर पूरे दिन शोर नहीं मचाएगा। यदि उसमें तू फँस गया तो फँसा। बर्ना अगर नहीं फँसा तो कुछ भी नहीं, तू स्ट्रेंग रह न!

प्रश्नकर्ता : कभी-कभी स्ट्रेंग रह सकते हैं।

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दादाश्री : तेरा मन तो क्या कहेगा, 'यह पढ़ाई भी पूरी नहीं करनी है।' ऐसा कहे तो क्या वैसा करेगा?

प्रश्नकर्ता : दादा कहेंगे, वैसा करूँगा।

दादाश्री : क्या हम तेरा अहित करेंगे? तुम लोग अपना अहित कर सकते हो लेकिन हम से ऐसा नहीं होगा न! हमारे टच में आए इसलिए आपका हित करने के लिए ही हम सभी दवाई दे देते हैं। फिर भी अगर मन नहीं सुधरे तो फिर वह उसका हिसाब। सभी तरह की दवाईयाँ देते हैं और दवाईयाँ तो ऐसी देते हैं कि सबकुछ ठीक हो जाए। फिर भी यदि खुद टेढ़ा हो तो पीएगा ही नहीं न!

प्रश्नकर्ता : नाक दबाकर मुँह में डाल देना।

दादाश्री : नाक कौन दबाएगा? यह नाक दबाने से हो जाए, ऐसा नहीं है।

तू नहीं कह रहा था कि मुझे स्कूल जाना अच्छा नहीं लगता? निश्चय तो होना ही चाहिए न कि मुझे स्कूल पूरा करना है। फिर ऐसा करना है, वैसा करना है। फिर हमेशा के लिए सब के साथ संग में रहना है। ब्रह्मचर्य पालन करना है। ऐसी अपनी योजना होनी चाहिए। यह तो, बिना योजना के जीवन जीने का क्या अर्थ है?

प्रश्नकर्ता : कॉलेज में जाना तो मुझे भी अच्छा नहीं लगता।

दादाश्री : कॉलेज में जाना ही पड़ेगा न! सभी के मन का समाधान करना ही चाहिए न? फादर-मदर, उनके मन का समाधान करके मोक्ष में जाना है। वर्ना तू कैसे मोक्ष जा पाएगा? यों बलवा करके घर में से भाग जाओगे तो क्या पूरा हो जाएगा?! तो क्या मोक्ष हो जाएगा? यानी तरछोड़ (तिरस्कार सहित दुष्कारना) नहीं लगनी चाहिए।

प्रश्नकर्ता : इस ब्रह्मचर्य के बारे में कर्म का सिद्धांत लागू होता है?

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दादाश्री : सिर्फ ब्रह्मचर्य ही ऐसा है कि आप निभा सकते हो। किसी ने तय किया हो कि शादी नहीं करनी है, तो निभा सकोगे। अपना ज्ञान ऐसा है, इसलिए निभा सकते हैं। अन्य कर्म तो छोड़ेंगे ही नहीं न?

प्रश्नकर्ता : यह शादीवाला कर्म हमारे पीछे नहीं पड़ेगा?

दादाश्री : बहुत गाढ़ होगा तो पीछे पड़ेगा। और यदि वह गाढ़ होगा तो पहले से ही पता चल जाएगा। उसकी गंध आ जाएगी। लेकिन वह ज्ञान से राह पर आ जाता है। अपना यह ज्ञान ऐसा है कि इस कर्म को खत्म कर सकता है। लेकिन ये दूसरे कर्म तो खत्म नहीं हो सकते न!

ये तो, जैसे छोटे-छोटे बच्चों ने तय किया हो न कि 'हमें शादी नहीं करनी है,' उस तरह की बातें हैं। कितना तो समझे बगैर हाँकते रहते हैं। शादी नहीं करोगे, उसमें हर्ज नहीं। 'व्यवस्थित' में हो और शादी नहीं करोगे तो हमें हर्ज नहीं है। लेकिन 'व्यवस्थित' में नहीं हो और बाद में बड़ी उम्र में शोर मचाए कि मैं शादी किए बिना रह गया, तो कौन कन्या देगा? जिसके व्यवस्थित में ब्रह्मचर्य है वह ब्रह्मचर्य पालन कर सकता है, क्योंकि वह मन की मानता ही नहीं है। बिल्कुल भी नहीं न! मन की कोई भी बात नहीं माननी चाहिए। अपने अभिप्राय की ही मानना अगर मन का ज़रा सा भी सुनें तो फिर अगली बार वापस चढ़ बैठेगा।

प्रश्नकर्ता : मन बताए कि 'सत्संग में बैठना है,' तो?

दादाश्री : अपना अभिप्राय वही रहे तो वैसा करना। अपने अभिप्राय में हो तो करना। अभिप्राय नहीं हो तो नहीं।

प्रश्नकर्ता : मेरा मन ऐसा सब बताता है कि सत्संग में बैठना है, दादा के पास जाना है।

दादाश्री : मेरा कहना है कि यदि मन अपने अभिप्राय के अनुसार चल रहा हो तो हमें एक्सेप्ट है।

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प्रश्नकर्ता : मुझे अंदर ऐसा तो है ही कि ज्ञानीपुरुष के सत्संग में ही पड़े रहना है।

दादाश्री : वह सब ठीक है। मन ऐसे अभिप्रायवाला हो जाए तो अच्छा है, लेकिन मन जब विरोध करेगा, उस समय तुझे दूबा देगा।

नहीं चलेगा वेवरिंग माइन्ड इसमें...

अपना आज का ज्ञान ब्रह्मचर्य पालन करने का हो और पिछला ज्ञान ब्रह्मचर्य पालन में सहमत रहता है। छः महीने बाद वापस नई ही तरह का बोलता है कि 'शादी करनी चाहिए'। इस प्रकार, मन की स्थिति कभी भी एक समान नहीं रहती, डाँवाडोल होती है, विरोधाभासवाली होती है।

प्रश्नकर्ता : छः महीने बाद मन शादी का बताता है, अलग-अलग बताता है। तो यदि ऐसा कुछ वक्त ज्ञान में बीत जाए तो फिर मन एक जैसा बताने लगेगा न? फिर उल्टा-सीधा बताना बंद नहीं हो जाएगा?

दादाश्री : नहीं, ऐसा नहीं होता। बूढ़ा हो जाए फिर भी शादी करने का कह सकता है! खुद मन से कहता भी है कि 'अब उम्र हो गई, चुप बैठ!' अतः मन का ठिकाना नहीं है। ऐसा समझकर मन में तन्मयाकार होना ही नहीं है। अपने अभिप्राय को माफिक आए, उतना मन एक्सेप्टेड।

जहाँ सिद्धांत है ब्रह्मचर्य का...

प्रश्नकर्ता : इसमें हम सिद्धांत किसे कहेंगे?

दादाश्री : हमने जो तय किया हो कि भई, हमें ब्रह्मचर्य पालन करना है। तो फिर क्या मन की सुननी चाहिए?

प्रश्नकर्ता : फिर उस बारे में सुननी ही नहीं है।

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दादाश्री : 'सुननी ही नहीं है,' यह तो बहुत समझदारी की बात कर रहा है लेकिन अगर छः महीने तक लगातार ऐसा कहे, तब तू क्या करेगा वहाँ? जहाँ छोड़े ही नहीं, वहाँ? अब, वह जब ऐसी बातें रखेगा, तब देह भी नहीं छोड़ेगी। देह भी उसकी ओर मुड़ जाएगी। मतलब सभी एक ओर हो जाएँगे। वे सब तुझे फेंक देंगे। इसलिए कह ही देना, 'इतनी चीजें हमारे नियम से बाहर है, उनमें तुझे कुछ भी नहीं करना है।'

प्रश्नकर्ता : तो फिर वहाँ क्या स्टेप कैसे लें?

दादाश्री : स्ट्रोंग रहना। मैं कहता हूँ कि यदि ऐसा निकले तो आप छोटी से छोटी बात के लिए भी स्ट्रोंग रहना। जरा सी भी उसकी मान लोगे तो वह आपको फेंक देगा, इसलिए उसे कह देना कि 'इतनी बात में तुझे हमारे नियम से बाहर बिल्कुल भी अलग नहीं चलना है। छोटी से छोटी बात में भी जागृति रखो वरना फिर वह ढीला पड़ जाएगा।

प्रश्नकर्ता : फिर अपने दूसरे सिद्धांत?

दादाश्री : इतना करो तो बहुत हो गया! देखो वापस दूसरे पूछ रहा है! बाकी का फिर चला लेंगे। तुझे करेले की सज्जी पसंद हो और मन कहे कि, 'ज्यादा खाओ' और ध्येय को नुकसान नहीं करता हो और थोड़ा ज्यादा खा लिया तो चला लेंगे! ऐसा नहीं कहा है तुम लोगों को?

प्रश्नकर्ता : हाँ, ब्रह्मचर्य का सिद्धांत, वह अपना इन्डीविज्युअल (व्यक्तिगत) हुआ। लेकिन जब दो ईसानों का व्यवहार आता है, तब मन सबकुछ बताता है, लेकिन अगर ज्ञान से देखने जाईं तो सबकुछ ऑन द स्पोट खत्म हो जाएगा सब। लेकिन व्यवहार पूरा करना पड़े, ऐसा है, जिम्मेदारी है और उसके रिज़ल्ट्स (परिणाम) दूसरे को स्पर्श करते हैं। वहाँ मन कुछ बताए तो क्या करना चाहिए?

नहीं चलना चाहिए, मन के कहे अनुसार (खं-2-५)

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दादाश्री : अपना मुख्य सिद्धांत नहीं टूटना चाहिए। 'ब्रह्मचर्य पालन करना है,' यह सिद्धांत नहीं टूटना चाहिए। बाकी सब तो खुद का व्यवहार सँभालने के लिए थोड़ा बहुत करना पड़ता है। तू वहाँ सो मत जाना। यहाँ घर पर सोना। वहाँ ऐसा सब कर सकते हो तुम। लेकिन बाकी सब में तो ब्रह्मचर्य पालन करना और अब्रह्मचर्य का सौदा करना, ये दोनों साथ में नहीं चलेगा। उससे अच्छा तो शादी कर लेना। दही में और दूध में दोनों में नहीं रहा जा सकता। फिर तो भगवान आएँ तब भी ऐसा कह देना कि 'नहीं मानूँगा'। बाकी सब चला लेंगे। यदि तुम्हें सिद्धांत का पालन करना हो तो।

प्रश्नकर्ता : मन घेर ले, देह घेर ले, ऐसी स्थिति खड़ी न हो जाए, उसके लिए उसके स्टार्टिंग पॉइंट से ही (शुरूआत में) सावधानी से चलना है?

दादाश्री : चारों ओर से सभी संयोग घेर लेते हैं, देह भी बहुत पुष्टि बताएगी, मन भी पुष्टि बताएगा, बुद्धि उसे हेल्प करेगी और आपको अकेले को फेंक देगी।

प्रश्नकर्ता : मन का सुनना शुरू किया, तभी से खुद का वर्चस्व चला ही गया न?

दादाश्री : मन का सुनना ही नहीं चाहिए। खुद आत्मा है, चेतन। मन जो है वह निश्चेतन चेतन है, जिसमें बिल्कुल भी चेतन नहीं है। मात्र कहने के लिए, व्यवहार के लिए ही चेतन कहलाता है।

वह तो तीन दिन तक मन पीछे पड़ा रहे तो उस समय आप 'चलो, चलते हैं फिर' कहोगे न! तैरे पीछे कभी मन पड़ा है? ऐसे करना पड़ा है कभी कुछ? पहले मना किया, मना किया, फिर मन बहुत पीछे पड़े तो कर देता है तू?

प्रश्नकर्ता : हाँ, ऐसा हुआ है।

दादाश्री : इसका क्या कारण है? मन बहुत कहता रहे

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

तो फिर उस रूप हो जाते हो। इसलिए सावधान रहना। मन तुम्हारे अभिप्राय को खा नहीं जाना चाहिए। अभिप्राय में रहकर वह जो-जो काम करता है, वे हमें एक्सेट हैं। तुम्हारे सिद्धांत को तोड़नेवाला होना ही नहीं चाहिए। क्योंकि 'तुम' स्वतंत्र हो गए हो, ज्ञान लेकर। पहले तो मन के ही अधीन थे 'तुम'। 'मन का चलता तन चले!' ही था न!

प्रश्नकर्ता : अर्थात् ब्रह्मचर्य का सिद्धांत यह बहुत बड़ी और अनिवार्य चीज है।

दादाश्री : इतनी ही चीज है न! सबसे बड़ी चीज यही है न! यही चीज पुरुषार्थ करने योग्य है।

चलो, सिद्धांत के अनुसार

अभी तो तुम्हारा मन तुम्हारी ऐसे हेल्प करता है कि 'शादी करने जैसा नहीं है, शादी में बहुत दुःख है।' सबसे पहले यह सिद्धांत बतानेवाला तुम्हारा मन था। यह सिद्धांत तुम ने ज्ञान से तय नहीं किया था, यह तुम्हारे मन से तय किया है। 'मन' ने तुम्हें सिद्धांत बताया कि 'ऐसे करो'।

प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य पालन करने का सिद्धांत मन बताता है, उसी प्रकार यह विषय से संबंधित बातें भी मन ही बताता है?

दादाश्री : उसका टाइम आएगा, तब छः छः महीने, बारह-बारह महीने तक वह बताता ही रहेगा।

प्रश्नकर्ता : वह भी मन ही?

दादाश्री : हाँ। सभी साइन्टिफिक सरकारमस्टेशियल एविडेन्स इकट्ठे हो जाते हैं, तब। मैं इन सब से कहता हूँ कि 'मन के कहे अनुसार क्यों चलते हो? मन मार डालेगा।'

तुम ने जो ब्रह्मचर्य का नियम लिया, वह भी मन के कहे