समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
ब्रह्मचर्य प्राप्त करवाए ब्रह्मांड का आनंद (खं-2-१४)
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थकान लगेगी। इसलिए बस चलते रहो न! तो अपने आप आ जाएगा। तुम्हारे जैसी समाधि बड़े-बड़े संतों को भी नहीं रहती। फिर इससे अधिक और क्या सुख चाहिए?
प्रश्नकर्ता : फिर भी अभी बाकी ही है न?
दादाश्री : भगवान का कानून कैसा है? हमें जो मिला, वही सही है। जो मिला, उसे नहीं भोगता और जो नहीं मिला, उसके लिए झंझट करता है, वह मूर्ख इंसान है। आगे बढ़ने के प्रयत्न तो जारी ही हैं, उसका बोझ रखने की जरूरत नहीं है। हम चल रहे हों और फिर कहें कि, 'गाँव कब पहुँचेंगे? गाँव कब पहुँचेंगे?' तो क्या होगा?! अरे, तू चल तो रहा ही है, अब क्यों बक-बक कर रहा है? चलने में आनंद आए तो देखने का मन होगा कि 'यह आम, यह जामुन' ऐसा आराम से सब देखे, लेकिन अगर 'कब पहुँचेंगे, कब पहुँचेंगे?' करते रहें न, तो फिर आनंद नहीं रहेगा।
प्रश्नकर्ता : व्रत लिए दो साल हो गए, फिर भी बाहर ऐसा कुछ खास परिणाम जैसा नहीं दिखता।
दादाश्री : वे तो तुम्हारे बेहिसाब घाटे हैं न!
प्रश्नकर्ता : लेकिन कितना घाटा?
दादाश्री : बहुत जबरदस्त घाटा! फिर भी अब तो जगत् जीत लेना है। अपना पद तो दिनोंदिन अपने आप आ ही रहा है।
प्रश्नकर्ता : कई बार ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे कब पार उतरेंगे? यह महीना तो गया। इसमें कुछ प्रोग्रेस नहीं हुई।
दादाश्री : तुझे प्रोग्रेस नहीं देखनी है, लेकिन यही देखना है कि जिनसे नुकसान हो, ऐसे कोई साधन तो खड़े नहीं हो गए? फायदा तो निरंतर हो ही रहा है। आत्मा का स्वभाव है,
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फायदा करना! प्रोग्रेस भी आत्मा का स्वभाव है। आपको तो सिर्फ जागृति ही रखनी है कि गिर न जाए। और नीचे गया हो, उसे सुधारने के लिए 'फुल' 'फेज' में मशीनें और लश्कर-वशकर सहित तैयारी करो! अपनी सेफ साइड रहे, उस तरह चलते ही रहना। अपनी ट्रेन मोशन में ही रहे, वैसा करते रहना। सिर्फ विषय के बम ही बहुत जबरदस्त होते हैं, एक मिनट के लिए भी उसका विश्वास नहीं रख सकते।
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[ १५ ]
‘विषय’ के सामने विज्ञान से जागृति
आकर्षण के सामने चाहिए खुद का विरोध
प्रश्नकर्ता : “स्त्री पुरुषना, विषय संगते, करार मुजब देह भटकशे, माटे चेतो मन-बुद्धि।”
यह समझाए क्योंकि आपने कहा था कि हर कोई अपनी-अपनी भाषा में ले जाता है, तो इसमें ‘यथार्थ रूप से’ क्या होना चाहिए ?
दादाश्री : जहाँ आकर्षण हो जाए, उस आकर्षण में यदि तन्मयाकार हो गया तो वह चिपक गया। आकर्षण हो जाए, लेकिन आकर्षण में तन्मयाकार नहीं हो तो नहीं चिपकेगा। फिर अगर आकर्षण हो जाए तो उसमें हर्ज नहीं है।
प्रश्नकर्ता : खुद को यह चीज कैसे समझ में आएगी कि खुद इसमें तन्मयाकार हो गया है ?
दादाश्री : उसमें ‘अपना’ विरोध होना चाहिए, ‘अपना’ विरोध, वही तन्मयाकार नहीं होने की वृत्ति है। ‘हमें’ विषय के संग में चिपकना नहीं है, इसलिए ‘अपना’ विरोध तो रहता ही है न ? विरोध है, वही अलग रहना कहलाता है और गलती से चिपक जाए, गच्चा खाकर चिपक जाए, तो फिर उसका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा।
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प्रश्नकर्ता : निश्चय से तो खुद का विरोध है ही, फिर भी ऐसा होता है कि उदय ऐसे आ जाते हैं कि उसमें तन्मयाकार हो जाते हैं, वह क्या है?
दादाश्री : विरोध है तो तन्मयाकार नहीं हो सकते और तन्मयाकार हुए तो 'गन्धा खा गए' ऐसा कहलाएगा। तो ऐसे गन्धा खाया, उसके लिए प्रतिक्रमण तो है ही लेकिन गन्धा खाने की आदत मत डाल लेना, गन्धा खाने के 'हेबीच्युएटेड' मत हो जाना। क्या कोई जान-बूझकर फिसलता है? यहाँ चिकनी मिट्टी हो, कीचड़ हो, वहाँ लोगों को जान-बूझकर फिसलने की आदत होती है या नहीं? लोग क्यों फिसल जाते होंगे?
प्रश्नकर्ता : वह मिट्टी का स्वभाव है और खुद मिट्टी पर चला, इसलिए।
दादाश्री : मिट्टी के स्वभाव को तो वह खुद जानता है इसलिए फिर पैर की उंगलियाँ जमाकर चलता है, और भी सभी प्रयत्न करता है। हर तरह के प्रयत्न करने के बावजूद भी अगर गिर जाए, फिसल जाए, तो उसके लिए भगवान उसे अनुमति देते हैं। लेकिन फिर वह ऐसी आदत ही डाल दे, तो क्या होगा?!
प्रश्नकर्ता : आदत नहीं पड़नी चाहिए।
दादाश्री : फिसलना तो अपने हाथ में, क़ाबू में नहीं रहा, इसलिए सबसे अच्छा तो 'अपना' विरोध, जबरदस्त विरोध! फिर जो कुछ हुआ, उसका जिम्मेदार तू नहीं है। तू चोरी करने के बिल्कुल विरोध में हो, फिर तुझ से चोरी हो जाए तो तू गुनाहगार नहीं है। क्योंकि तू उसके विरोध में है।
प्रश्नकर्ता : हम विरोध में हैं ही, फिर भी यह जो चूक जाते हैं, वह क्या चीज़ है?
दादाश्री : बाद में चूक जाते हैं, उसका सवाल नहीं है।
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उसे चूक जाने में भगवान के यहाँ कोई हर्ज नहीं है। जितना चूक गए हैं, भगवान तो उसे याद नहीं रखते। क्योंकि चूक जाने का फल तो उसे तुरंत ही मिल जाता है। उसे दुःख तो होता ही है न? वनां अगर वह शौक की खातिर करता, तो उसे आनंद होता।
प्रश्नकर्ता : इस विषय के बारे में खुद की होशियारी कितनी चल सकती है?
दादाश्री : ज्ञान मिला हो तो पूरी होशियारी चल सकती है।
प्रश्नकर्ता : ज्ञान मिल जाने के बावजूद भी कुछ अंश तक तो प्रकृति भूमिका निभाती ही है न?
दादाश्री : नहीं। ज्ञान से प्रकृति निर्मल हो जाती है। विषय में खुद की सहमति नहीं हो तो निर्मल होती जाती है।
प्रश्नकर्ता : विषय में सहमति नहीं होती फिर भी आकर्षित हो जाता है।
दादाश्री : वह आकर्षित तो हो सकता है। ऐसे आकर्षित हो जाए तो उसे भी जानना चाहिए। लेकिन स्ट्रॉंग निश्चय कभी भी किया ही नहीं।
प्रश्नकर्ता : कभी भी न चूकें ऐसा चाहिए।
दादाश्री : अपना तो निश्चय होना चाहिए कि हमारा यह ऐसा निश्चय है। फिर अगर कुदरत करे, तो वह अपने हाथ का खेल नहीं है। वह साइन्टिफिक सरकारमस्टेशियल एविडेन्स है, उसमें किसी का नहीं चलता।
प्रश्नकर्ता : इसका अर्थ तो यह हुआ कि ऐसे संयोग मुझे मिलने ही नहीं चाहिए। लेकिन यह कैसे होगा?
दादाश्री : ऐसा होगा ही नहीं न! जब तक जगत् है, संसार
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है, तब तक ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा कब होगा? कि जैसे-जैसे आप आगे बढ़ते जाओगे, वैसे ही ऐसे संयोग कम होते जाएंगे, वैसे-वैसे उस जगह पर भूमिका अपने आप ही आएगी। ज्ञानी की भूमिका सेफ साइडवाली होती है! उनके सभी संयोग सुगम होते हैं।
प्रश्नकर्ता : उनका व्यवस्थित उस तरह गढ़ा हुआ होता है?
दादाश्री : हाँ, वैसा गढ़ा हुआ होता है। लेकिन वह एकदम से ऐसे नहीं हो सकता। आपको तो अभी कई मील पार करने के बाद वह रोड आएगी। सभी जगह आकर्षण नहीं होता। तुझे कितनी जगह पर आकर्षण होता है? क्या 'सौ' में से अस्सी जगह आकर्षण होता है?
पूर्व में चूके, उसके ये फल हैं
प्रश्नकर्ता : वह कैसा है कि यों दृष्टि गई कि अंदर खड़ा हो जाता है, और दृष्टि नहीं गई हो तो कुछ भी नहीं। लेकिन एक बार यों देख लिया हो तो फिर अंदर चंचल परिणाम खड़े हो जाते हैं।
दादाश्री : दृष्टि, वह वस्तु 'हम' से अलग है। तो फिर दृष्टि गई, उससे हमें क्या फर्क पड़ा? लेकिन हम अंदर चिपकना चाहें, तब दृष्टि क्या करे बेचारी?! होली की जब पूजा करने जाते हैं, तब वहाँ अपनी आँखें झुलस जाती हैं क्या? यानी होली को देखने से आँखें नहीं झुलसतीं। क्योंकि उसे हम सिर्फ देखते ही हैं। उसी तरह इस दुनिया में किसी भी जगह पर आकर्षण हो, ऐसा है ही नहीं, लेकिन अगर खुद के अंदर ही यदि कुछ टेढ़ा है तो आकर्षण होगा!
प्रश्नकर्ता : दो प्रकार की दृष्टि है, उसमें एक दृष्टि ऐसी है कि हम देखते हैं कि चमड़ी के नीचे खून-मांस और हड्डियाँ हैं, उसमें क्या आकर्षण? और दूसरी दृष्टि यह कि उसमें शुद्धात्मा
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है और मुझ में शुद्धात्मा है। इन दोनों में कौन सी दृष्टि उच्च मानी जाएगी?
दादाश्री : उसमें तो दोनों दृष्टियाँ रखनी पड़ेंगी। वह शुद्धात्मा है, ऐसी दृष्टि तो अपने आप है ही। और दूसरी दृष्टि तो अगर जरा सा भी यदि आकर्षण होने लगे तो जैसा है, वैसी ही रखनी चाहिए, वना मोह हो जाएगा।
प्रश्नकर्ता : हाँ, ठीक है। मैं भी शुद्धात्मा और वह भी शुद्धात्मा ऐसा हो, तो जो अन्य प्रकार का आकर्षण है, वह नहीं रहेगा।
दादाश्री : नहीं रहेगा, लेकिन इतनी अधिक जागृति नहीं रह पाती। जब आकर्षण होता है, तब शुद्धात्मा को भूल जाता है। शुद्धात्मा भूले, तभी उसे आकर्षण होता है, वना आकर्षण नहीं हो सकता। इसीलिए तो हमने तुम्हें ऐसा ज्ञान दिया है कि तुम्हें आत्मा दिखे। फिर क्यों मोह होता है?!
तुम्हें आकर्षित नहीं होना हो, फिर भी आँखें आकृष्ट हो जाती है। तुम यों आँखें दबाते रहो, फिर भी उस तरफ चली जाती हैं!
प्रश्नकर्ता : ऐसा क्यों होता है? पुराने परमाणु हैं इसलिए?
दादाश्री : नहीं, पहले भूल की है, पहले तन्मयाकार होने दिया है, उसी का यह फल आया है तो अब उस आकर्षण में वापस तन्मयाकार नहीं होकर उसका प्रतिक्रमण करके वह भूल निकाल देनी है। अगर फिर से तन्मयाकार हो जाए तो फिर नये सिर से भूल हुई, तो उसका फल अगले जन्म में आएगा। अतः तन्मयाकार नहीं हो, ऐसा यह विज्ञान है अपना!! सामनेवाले में शुद्धात्मा ही देखते रहना व और कुछ दिखे और आकर्षण हो जाए तो प्रतिक्रमण करना, अन्यथा भय-सिग्नल ही है। बाकी सबका तुम्हें समभाव से निकाल करना। इसमें तो सामनेवाला जबरदस्त बड़ी
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फरियाद करनेवाला है, इसलिए सावधान रहना। हम चेतावनी देते हैं।
प्रश्नकर्ता : यही गड़बड़ हो जाती है न!
वहाँ पर देखो शुद्धात्मा ही
दादाश्री : तो तू सावधानी नहीं रखता?
प्रश्नकर्ता : सावधानी तो रखता हूँ न, लेकिन यह तो निरंतर सावधान रहना है।
दादाश्री : फिर भी जहाँ पर हमें आकृष्ट नहीं होना हो, उसके बावजूद भी आकर्षण होता रहे तो वह पहले की, पिछले जन्म की गलती है, इतना तय हो गया। नये सिरे से आकर्षण हो, वह चीज हमें समझ में आती है कि यदि हमें नहीं देखना है तो देखें ही नहीं, ऐसा होना चाहिए। लेकिन यह तो पुराना है, इसलिए वहाँ तो हमें नहीं देखना हो फिर भी खिंच जाते हैं।
प्रश्नकर्ता : इस जगह पर पुरुषार्थ करना है। जागृति रखना, वही पुरुषार्थ है?
दादाश्री : हाँ, वैसी जागृति रखना। तू रखता है, इतनी जागृति?
प्रश्नकर्ता : वहाँ पर पुरुषार्थ है पूरा।
दादाश्री : ऐसा? तुझे समझ में आता है कि यह पिछले जन्म की गलती है, ऐसा? क्या आता है समझ में? तुझे ऐसा अनुभव हुआ है?
प्रश्नकर्ता : हाँ, मतलब खुद की जागृति है कि यह दोष हुआ। अब उसे धोकर खुद तैयार हो जाए, खुद उससे मुक्त हो जाए लेकिन फिर से सरकारमस्टेशियल एविडेन्स मिल जाए, निमित्त मिल जाए तो फिर वापस विषय की गाँठ फूटती ही है। खुद की जबरदस्त तैयारी हो कि उपयोग चूकना ही नहीं है, लेकिन
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‘वह’ फूटता है। फिर वापस धो डालते हैं, लेकिन वह वापस खड़ा हो जाता है!
दादाश्री : अतः इस इन्द्रिय ज्ञान का स्वभाव ऐसा है कि सामनेवाला बहुत आकर्षक हो और रागी स्वभाववाला हो तो, वह आपकी आँखों में धूल झोंकता है। उस समय बहुत जागृत रहना पड़ेगा। हम जानते हैं कि इसे नहीं देखना है, फिर भी आकर्षण क्यों हो रहा है? वहाँ पर हमें क्या करना चाहिए कि शुद्धात्मा को ही देखते रहना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : उस समय फिर से प्रत्याख्यान करना चाहिए?
दादाश्री : प्रतिक्रमण भी करना है और प्रत्याख्यान भी करना है, दोनों करने हैं। प्रतिक्रमण इसलिए करना है कि पूर्व जन्म में कुछ देखा है, उसी से यह उत्पन्न हुआ है। यह संयोग क्यों मिला? वर्ना हर एक को कोई नहीं देखता। यह तो देखने को मिला सो मिला, लेकिन उसमें से आकर्षण का प्रवाह क्यों बह रहा है? अतः पूर्व जन्म का हिसाब है, इस जन्म में उसके प्रतिक्रमण करने पड़ेंगे। जो-जो विषय-विकारी भाव किए हों, इच्छा, चेष्टा, संकल्प-विकल्प किए हों, उन सबका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा और फिर प्रत्याख्यान करना पड़ेगा और फिर उनके शुद्धात्मा को ही देखते रहना पड़ेगा।
पुद्गल का स्वभाव ज्ञान से...
पुद्गल का स्वभाव यदि ज्ञान से रह पाए तब तो फिर आकर्षण होगा ही नहीं। लेकिन पुद्गल का स्वभाव ज्ञान से रह पाता, ऐसा तो होता ही नहीं है न किसी को! पुद्गल का स्वभाव, हमें तो ज्ञान से रहता है।
प्रश्नकर्ता : पुद्गल का स्वभाव ज्ञान से रहे तो आकर्षण नहीं रहेगा, यह समझ में नहीं आया।
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दादाश्री : मतलब क्या है कि किसी स्त्री ने या पुरुष ने भले ही कैसे भी कपड़े पहने हों, पर वे कपड़े रहित दिखते हैं, वह ज्ञान से पहला दर्शन है। दूसरा, सेकन्ड दर्शन यानी शरीर पर से चमड़ी निकल जाए, वैसा दिखता है और थर्ड दर्शन यानी अंदर का सभी कुछ दिखाए ऐसा दिखाई देता है। फिर आकर्षण रहेगा क्या? ऐसा तुझे रहता है?
प्रश्नकर्ता : ऐसा अभ्यास दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है।
दादाश्री : तो अच्छा है। ऐसा अभ्यास करना अच्छा है।
दृष्टि निर्मल कर सकते हैं ऐसे
कोई स्त्री खड़ी हुई हो, उसे देखा लेकिन तुरंत नजर वापस खींच ली। फिर भी वह दृष्टि तो वापस वहीं के वहीं जाती है, इस तरह दृष्टि वहीं आकृष्ट होती रहे तो वह 'फाइल' कहलाती है। यानी इतनी ही गलती इस काल में समझनी है। पिछली जो फाइल खड़ी हुई हो, भले ही छोटी सी भी, लेकिन 'फाइल' कि जो हमें आकर्षित करे ऐसी हो, ऐसा हमें पता चले कि यह 'फाइल' है तो वहाँ पर सावधान रहना है। अब सावधान रहने के अलावा और क्या करना है? जिसे शुद्धात्मा देखना आ गया है, उसे उसके शुद्धात्मा देखते रहना है। उससे वह पूरी तरह से चला जाएगा।
प्रश्नकर्ता : साथ-साथ प्रतिक्रमण और प्रत्याख्यान भी करना है न?
दादाश्री : हाँ, वह तो करना ही पड़ेगा न!
प्रश्नकर्ता : आकर्षण की फाइल कहीं 'कन्टिन्युअस' नहीं रहती। लेकिन जब यह आकर्षण उत्पन्न होता है, जैसे यहाँ पर लोहचुंबक रखा हो और पिन का यहाँ से गुजरना और खिंच जाना, लेकिन तुरंत पता चल जाता है कि खिंच गया, तो फिर तुरंत ही वापस खींच लेना चाहिए।
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दादाश्री : जितना भी पता चलता है वह इस ‘ज्ञान’ की वजह से पता चलता है, वर्ना दूसरा तो मूर्छित हो जाए। इस ‘ज्ञान’ की वजह से पता चलता है इसलिए फिर हमें उसका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। फिर हमें निर्मल दृष्टि दिखानी चाहिए। अपने में रोग होगा तभी सामनेवाला व्यक्ति अपना रोग पकड़ सकेगा न? और यदि वह अपनी निर्मल दृष्टि देखे तो? दृष्टि निर्मल करना आता है या नहीं आता?
प्रश्नकर्ता : जरा और समझाइए कि दृष्टि कैसे निर्मल करनी है?
दादाश्री : ‘मैं शुद्धात्मा हूँ’ इस जागृति में आ जाने के बाद, फिर दृष्टि निर्मल हो जाती है। अगर नहीं हुई हो तो शब्दों में पाँच-दस बार बोलना कि ‘मैं शुद्धात्मा हूँ, मैं शुद्धात्मा हूँ, मैं शुद्धात्मा हूँ’ तब भी वापस आ जाएगा और ‘दादा भगवान जैसा निर्विकारी हूँ, निर्विकारी हूँ’ ऐसा बोलेंगे तब भी वापस आ जाएगा। इसका उपयोग करना पड़ेगा, बाकी कुछ नहीं। यह तो विज्ञान है, तुरंत फल देता है और यदि जरा सा भी गाफिल रहा तो दूसरी तरफ फेंक दे ऐसा है!
अन्य कोई चीज बाधक हो, ऐसी नहीं है। स्त्री का स्पर्श हो जाए और फिर भीतर भाव बदल जाए तो वहाँ जागृति रखनी है। क्योंकि स्त्री जाति के परमाणु ही ऐसे हैं कि सामनेवाले के भाव बदल ही जाते हैं। यह तो, जब हम (दादाश्री) हाथ रखते हैं तो उसे अगर विचार आया हो तो बल्कि वह भी बदल जाता है, उसके ऐसे खराब विचार ही गायब हो जाते हैं!
विषय की योजना के अलावा बाकी सभी योजनाएँ, शायद अगर तोड़-फोड़ करे तो चला लेंगे। क्योंकि बाकी सभी मिश्रचेतन के साथ की योजनाएँ नहीं है, जबकि यह विषय की योजना तो मिश्रचेतन के साथ की योजना है। हम छोड़ दें, फिर भी सामनेवाला
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दावा करे तो क्या होगा? इसलिए इसमें सावधान रहने को कहा है। बाकी चीजों में अगर गाफिल रहे तो चलेगा। गाफिल रहने का फल यह कि जागृति जरा कम रहेगी। लेकिन यह विषय तो सबसे बड़ा जोखिम है, सामनेवाला जिस स्थान पर जानेवाला हो उसी स्थान पर अपने को ले जाएगा! अपने ज्ञान के साथ अब उस स्थान पर हम कैसे रह पाएँगे? एक तरफ जागृति और दूसरी तरफ यह पाश, वह कैसे चलेगा? लेकिन फिर भी हिसाब चुकाना पड़ता है।
प्रश्नकर्ता : वह रूपक में तो आएका न?
दादाश्री : हाँ, वह कैसा रूपक में आएका कि वह स्त्री दूसरे जन्म में अपनी मदर बनेगी, वाइफ बनेगी, यदि विषय संबंधित उसके बारे में सिर्फ एक ही घंटे का ध्यान करे तो! ऐसा है यह! सिर्फ इसी में हमें सावधान रहने जैसा है! बाकी किसी में सावधान रहने को नहीं कहते।
विचार ध्यान में तो परिवर्तित नहीं होते न?
अंदर विषय का विचार उगे तो क्या करना चाहिए? इन किसानों का ऐसा रिवाज है कि जमीन में इतनी-इतनी कपास वगैरह उग जाए, उसके बाद अंदर साथ में अन्य चीजें घास या बेल उग आए हों तो उन्हें वे निकाल देते हैं। उसे निराई कहते हैं। कपास के अलावा अन्य किसी भी तरह का पौधा दिखाई दे कि तुरंत उसे उखाड़कर फेंक देते हैं। उसी तरह हमें सिर्फ विषय के विचारों को उगने के साथ ही तुरंत उखाड़कर फेंक देना चाहिए, वर्ना पौधे के बड़े हो जाने के बाद उसमें फिर फल आएँगे, उन फलों में से वापस बीज आएँगे। इसलिए इसे तो उगते ही उखाड़ देना, फल आने से पहले ही उखाड़ देना।
प्रश्नकर्ता : वह कैसे?
दादाश्री : हमारे अंदर विचार बदले तो पता नहीं चलेगा
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कि अभी किस का विचार शुरू हुआ? वह विचार आने के बाद उसे ज्यादा नहीं चलने देना चाहिए। वह विचार ध्यान में परिवर्तित नहीं हो जाना चाहिए। विचार भले ही आए। विचार तो अंदर हैं इसलिए आए बिना रहेंगे नहीं। लेकिन वह ध्यान में परिवर्तित नहीं होना चाहिए। ध्यान में परिवर्तित होने से पहले ही विचार को उखाड़कर फेंक देना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : ध्यान में परिवर्तित नहीं होना यानी कैसे?
दादाश्री : उसी विचार में रमणता करते रहना, उसे ध्यान में परिवर्तित होना कहते हैं। अगर आप एक ही विचार में रमणता करते रहो, तो वह उस विचार का ध्यान कहलाता है। उससे फिर बाहर बेध्यानपना रहता है, क्या ऐसे बेध्यानवाले नहीं होते लोग? तेरा ध्यान कहाँ है, लोग ऐसा नहीं पूछते? तब हमें पता चलता है कि ध्यान यहाँ पर है। जहाँ ‘दादा’ ने मना किया था, वहाँ है। उन्हीं विचारों में रमणता चलती रहे तो वह ध्यान कहलाता है। वह ध्यान फिर उसके ध्येय स्वरूप बन जाता है। उन विचारों का ध्यान हुआ, फिर अपना चलता ही नहीं। ध्यान नहीं हुआ तो कोई हर्ज नहीं।
प्रश्नकर्ता : ध्यान में परिवर्तित नहीं हुआ और वह उखड़ गया है, ऐसा कैसे पता चलेगा?
दादाश्री : उगते ही हमें वह चीज़ फेंक देनी चाहिए और फिर आगे उस विचारधारा को बदल देना पड़ेगा, दूसरी रख देनी पड़ेगी। नहीं तो फिर जाप शुरू करना पड़ेगा। वह टाइम बीत जाए तो फिर उसकी मुद्दत निकल जाएगी। हमेशा हर एक चीज़ का टाइम होता है कि साढ़े सात से आठ तक ऐसे विचार आएँ और अगर उतना टाइम गुजार दें तो फिर हमें परशानी नहीं है।
देखने से पिघलें, गाँठें विषय की
प्रश्नकर्ता : लेकिन गाँठें तो देखने से पिघलेंगी न? तो
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यदि हम दूसरी ओर देखें तो उन गाँठों को देखना रह जाएगा न?
दादाश्री : वह तो अगर तुम में शक्ति हो तो नया उपयोग दूसरी ओर नहीं रखकर उसी को देखो। शक्ति नहीं हो तो उपयोग बदलकर दूसरी ओर नया उपयोग रख दो।
प्रश्नकर्ता : तो दोनों संभव हैं?
दादाश्री : संभव ही है न! इस ओर नया उपयोग रख दे। तो तू ऐसा करता है न? वह ठीक है।
प्रश्नकर्ता : विषय के बहुत जोरदार विचार आएँ तो दूसरी ओर देख लेना है ताकि वे निकल जाएँ।
दादाश्री : बस। वे अपने आप चले जाएँगे। सबसे आखिरी रास्ता यही है कि उन्हें एक्जेक्ट देखकर जाने देना। लेकिन वह नहीं हो पाए तो इस रास्ते से करोगे तो भी तुम्हें चलेगा।
प्रश्नकर्ता : तो फिर यह बीच का रास्ता हुआ न!
दादाश्री : यह नजदीकी रास्ता।
प्रश्नकर्ता : यानी सबसे आखिरी तो देखकर जाने देना, वह है।
दादाश्री : फिर ज्यादा नहीं रहेगा, थोड़ा सा ही हिसाब बचेगा। लेकिन अभी तुम उलझ जाते हो, उसके बजाय भले ही नजदीकी रास्ता लो।
प्रश्नकर्ता : मुझे ऐसा विचार आया था कि मैं त्रिमंत्र पढ़ रहा हूँ। नमस्कार विधि वगैरह सब पढ़ रहा हूँ और जब आपने इस तरह देखने को कहा तब ऐसे कुछ छू नहीं रहा था। तब बिल्कुल सीधा चल रहा था। लेकिन जब यह विधि करना चूक गए, तब वापस यह सब ऐसे ही आने लगा अंदर। इसलिए वापस मुझे थोड़ा इफेक्ट हो जाता था।
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दादाश्री : नहीं, उसमें तो दूसरा शुरू कर दो वापस। देखने बैठो, भले ही कुछ भी करो। उपयोग कहीं और रखो, किसी काम में लगा दो।
प्रश्नकर्ता : आखिर में ये गॉठें तो देखनी ही पड़ेगी या फिर ऐसा ज़रूरी नहीं है?
दादाश्री : ऐसा है न, अभी तो सेकन्डरी स्टेज से काम लेना, तुम से सहन नहीं हो रहा हो तो। यानी कि तुम दूसरा उपयोग रखना ताकि वह स्टेज अपने आप गुजर जाए। जब कभी वह वापस आएगी, तब देखना तो पड़ेगा एक दिन, तब उस दिन अभी के बजाय काफी आसान रहेगा बिल्कुल सहज रूप से। कि हाथ लगाते ही चले जाऐंगे सारे।
प्रश्नकर्ता : मतलब उस समय ज़ाता-दृष्ट आसानी से रह पाऐंगे!!
दादाश्री : हाँ, सरलता से। बल्कि तुझे देखना अच्छा लगेगा। हल्का हो जाएगा बिल्कुल और तुझ में शक्ति बढ़ गई होगी, उस समय। अभी तो तू निर्बल हो गया है।
प्रश्नकर्ता : यानी जब तक देखने की शक्ति नहीं है, तब तक ऐसा करना पड़ेगा।
दादाश्री : यानी अभी किसी भी उपाय से, उसमें से अलग हो जाओ।
प्रश्नकर्ता : विषय से संबंधित दोष हो रहे हों तो इसका स्लिप होने का मुख्य कॉज तो मन है। तो इस मन से जो विषय हो रहे हों और उन्हें दूर करना हो तो कैसे कर सकते हैं?
दादाश्री : मन की ओर ध्यान नहीं देना है। ‘मन’ को ‘देखते’ रहना है।
प्रश्नकर्ता : क्योंकि अभी तो चंद्रेश का पूरा कंट्रोल ‘मन’
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ने ही ले लिया है। इसलिए मन के कहे अनुसार ही चल रहा है। दादा का सत्संग हो तब भी मन बताता है न, उसी तरफ वह खिंच जाता है। लेकिन कुछ बातों में मन की नहीं सुनता हूँ, जब सत्संग में आना हो तब मन वह सब बताता है, लेकिन उस ओर ध्यान नहीं देता। सत्संग में आ जाता हूँ।
तो इस मन से जो दोष हो रहे हों, उन्हें कैसे खत्म करना चाहिए?
दादाश्री : अपना ज्ञान लेने के बाद दोष होते ही नहीं हैं न।
प्रश्नकर्ता : हाँ, दोष तो नहीं होते। इसके बावजूद दूसरी ओर दृष्टि आकृष्ट हो जाती है, तो इसमें पूरा काम मन का ही है न?
दादाश्री : हाँ, मन तो होता ही है। लेकिन अपना 'ज्ञान' ज्ञान में रहता है न! 'ज्ञान' को ज्ञान में रखना चाहिए। 'ज्ञान' को अज्ञान में दखिल नहीं होने देना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : मतलब अगर ऐसा हुआ तो जो हो रहा है, उसे 'देखते रहे' ऐसा?
दादाश्री : और कुछ भी नहीं।
प्रश्नकर्ता : लेकिन जो विषय है, उसमें तो देखना भी जोखिमवाला है न! कब स्लिप हो जाए, वह तो कह ही नहीं सकते न!
दादाश्री : कुछ नहीं होगा। खुद ज्ञाता-द्रष्टा रहे तो कुछ नहीं होगा। स्लिप हो जाएँगे, ऐसा कह ही नहीं सकते।
प्रश्नकर्ता : लेकिन वह डिसाइड कैसे कर सकते हैं, कि खुद ज्ञाता-द्रष्टा में है?
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दादाश्री : जिसे शंका है, उसी को ऐसा सब हो जाता है। जिसे शंका नहीं है, उसे कुछ नहीं होता।
प्रश्नकर्ता : तभी तो यह सब जो हुआ है, वह शंका के आधार पर ही हुआ है? अभी इस चंद्रेश की जो अवस्था है, पूरी शंका के आधार पर ही है?
दादाश्री : तो और किसके आधार पर?
प्रश्नकर्ता : इसीलिए खुद पर शंका हुई है उसे।
दादाश्री : ऐसा है न, ‘चंद्रेश क्या कर रहा है’ उसे देखते रहना है। उसे कह सकते हैं कि ‘तू नालायक है’ ऐसा वैसा सब कह सकते हैं। तन्मयाकार नहीं हो जाना, तो शक्ति उत्पन्न हो जाएगी बाद में। ‘ज्ञान’ अज्ञान में नहीं घुस जाना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : कई बार तो यह भी डिसाइड नहीं हो पाता कि यह ज्ञान है या अज्ञान है?
दादाश्री : डिसाइड हुए बिना रहेगा ही नहीं न!
प्रश्नकर्ता : बार-बार अगर उस तरफ खिंच रहा हो तो खुद को शंका रहती है कि यह ज्ञान में है या अज्ञान में है।
दादाश्री : जो खिंच रहा है उसे भी, जिसे खींच रहा है, ‘जो’ वह सब ‘जानता’ है, वह ‘ज्ञान’ है। अगर जाने नहीं तो फिर ज्ञान हट गया है, ऐसा कहा जाएगा, अज्ञान में घुस गया।
प्रश्नकर्ता : कैसे?
दादाश्री : ऐसे तू अज्ञान में घुस जाता है फिर?
प्रश्नकर्ता : यही होता है, खुद के प्रति भी ऐसा हो जाता है कि यह चंद्रेश बिगड़ गया। खुद को ऐसा लगता है कि मैं बिगड़ गया। यों खुद के प्रति तिरस्कार होता है, कि ऐसा? कहाँ
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पहलेवाला चंद्रेश और कहाँ अभी का चंद्रेश। क्या ऐसा सब है? कई बार तो प्रतिक्रमण भी नहीं हो पाते।
दादाश्री : कैसे होगा लेकिन? ज्ञान अगर अज्ञान में घुस जाए फिर कैसे होगा? अलग रहोगे तो होगा।
प्रश्नकर्ता : ज्ञान, अज्ञान में घुस जाता है, तो उसका इतना लंबा पीरियड है। तो अब उसके लिए क्या करना चाहिए?
दादाश्री : कुछ भी नहीं करना है।
प्रश्नकर्ता : तो यह जो अज्ञान में घुस गया है, उसे भी देखना है?
दादाश्री : हाँ।
प्रश्नकर्ता : यह बिगड़ गया है, उसे सुधारना तो पड़ेगा ही न!
दादाश्री : तो सत्संग में ज्यादा जाना चाहिए। सत्संग में ज्यादा यानी रेग्युलर।
प्रश्नकर्ता : हाँ, वह तो देखा कि सत्संग में आते हैं, तब बहुत क्लियर हो जाता है।
दादाश्री : हाँ, लेकिन सत्संग में ज्यादा पड़े रहना पड़ेगा। उतना टाइम निकालकर रखना चाहिए, सत्संग के लिए।
‘देखना’ ‘जानना’ आत्मस्वरूप से
प्रश्नकर्ता : देखने से पुद्गल शुद्ध हो जाता है, वह क्या विषय के लिए भी करेक्ट है?
दादाश्री : विषय में सब को ऐसा रह नहीं सकता न! सिर्फ विषय ही ऐसा है जिसे देख नहीं सकता। चूक जाता है। बाकी सब में देख सकता है तुरंत। विषय के अलावा बाकी सब में
‘विषय’ के सामने विज्ञान से जागृति (खं-2-१५)
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देख सकता है, जलेबी खाता भी है और जलेबी खानेवाले को भी देखता है। जलेबी कैसे चबाता है, उस पर खुद हँसता भी है कि ‘ओहोहो! क्या चंद्रेशभाई, क्या टेस्ट से जलेबी चबाने लगे हो आप तो!’
प्रश्नकर्ता : हम किसी जगह पर बैठे हों और वहीं पास में कोई स्त्री आ जाए, और हमें स्पंदन खड़े होने लगे, तो उन्हें ‘देखेंगे’ तो चलेगा या प्रतिक्रमण करना पड़ेगा?
दादाश्री : प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। ‘देखना’ उसे कहते हैं कि जब वह ‘देख रहा’ हो तो हम चंद्रेश से कहेंगे, ‘ओहोहो चंद्रेशभाई! आप तो स्त्रियों को भी देखते हो, अब तो रौब में आ गए लगते हो।’ उसे ‘देखना’ कहेंगे। आँखों से जो देखते हैं, वह तो इस दुनिया के सभी लोग देखते ही है न! आँखों से देखा हुआ इन्द्रिय ज्ञान कहलाता है।
प्रश्नकर्ता : यह तो अंदर स्पंदन उत्पन्न होते हैं, उन्हें देखना है कि ये स्पंदन उत्पन्न हुए। ऐसा देखने से जाएगा!
दादाश्री : ‘देखना’। ‘देखने में’, हम जो कहते हैं, वह अलग कह रहे हैं। हम तो, ‘यह क्या कर रहा है,’ उसे हम ‘जानते’ हैं। मैं तो कहता हूँ कि ‘अंबालालभाई, आप तो मजे से खाना खाने लगे न!’
प्रश्नकर्ता : इस तरह कहने को ‘देखना’ कहते हैं, आप ऐसा कहना चाहते हैं? यानी पूरी ‘देखने’ की जो प्रक्रिया है, वह इस तरह बातचीत के द्वारा स्पष्ट रूप से रह सकती है।
दादाश्री : हाँ। यानी तुम सब यह जो ‘देखते’ हो, उसे ‘देखना’ नहीं कह सकते। वह तुम्हारी भाषा में तुम्हारी होशियारी से करने जाओगे न, तो बल्कि मार खा जाओगे। हम से पूछना कि हमारी होशियारी ऐसी है, क्या वह ठीक है?
प्रश्नकर्ता : इसमें ऐसा होता है कि विषय का विचार आता
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
है और इस ओर छेदन हो जाता है, वापस आता है, वापस छेदन कर देते हैं। मतलब यह खुद की पकड़ नहीं छोड़ता लेकिन वे विचार भी चलते रहते हैं, दोनों आम्ने-सामने चलते रहते हैं।
दादाश्री : वह छोड़ेगा नहीं न! इसलिए पहले विचार को ही निकालकर फेंक देना। बाद में कोई जाप करने बैठ जाना, 'दादा भगवान को नमस्कार करता हूँ', ऐसा-वैसा करना, भजन गाने लगना, ये जाप ही है सारे। अंदर से कहना कि, 'चंद्रेशभाई, गाओ'। ज्ञान तो बोलता ही रहेगा, बेचारा। वह ज्ञान तो जागृत ही करता रहता है कि जागो, जागो, जागो! अंदर से ऐसा नहीं करता?
प्रश्नकर्ता : हाँ, बहुत करता है, उसके प्रताप से ही तो सब टिका हुआ है।
दादाश्री : अब बाहर के लोग कैसे टिक सकेंगे बेचारे? ज्ञान नहीं हो तो कैसे टिकेंगे? नहीं टिक सकेंगे। उन्हें तो प्रकृति जैसे ले जाए, वैसे घिसटते जाते हैं।
जहाँ जागृति में झोंका, वहाँ विषय की फटकार
प्रश्नकर्ता : इस ज्ञान की जागृति से प्रकृति के सामने बहुत बड़ा फोर्स खड़ा हो गया है।
दादाश्री : हाँ। यह ज्ञान है इसलिए प्रकृति के सामने जीत जरूर जाता है, लेकिन साथ ही साथ अपना जो अस्तित्व है, वह ज्ञान के साथ होना चाहिए। अस्तित्व अगर पुद्गल के साथ रहेगा तो खत्म कर देगा। यानी स्वपरिणामी होना चाहिए।
उन विचारों में मिठास लगे तो हो गया, वे फिर खत्म कर देंगे। क्योंकि उस ओर परपरिणाम हुए। अब वे विचार ऐसे होते हैं न कि मिठास आए? या कड़वाहट आती है?
प्रश्नकर्ता : मिठास आए ऐसे आते हैं।
दादाश्री : इसीलिए वहाँ सावधान रहना है! ऐसा विवेचन