भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

पहलेवाला चंद्रेश और कहाँ अभी का चंद्रेश। क्या ऐसा सब है? कई बार तो प्रतिक्रमण भी नहीं हो पाते।

दादाश्री : कैसे होगा लेकिन? ज्ञान अगर अज्ञान में घुस जाए फिर कैसे होगा? अलग रहोगे तो होगा।

प्रश्नकर्ता : ज्ञान, अज्ञान में घुस जाता है, तो उसका इतना लंबा पीरियड है। तो अब उसके लिए क्या करना चाहिए?

दादाश्री : कुछ भी नहीं करना है।

प्रश्नकर्ता : तो यह जो अज्ञान में घुस गया है, उसे भी देखना है?

दादाश्री : हाँ।

प्रश्नकर्ता : यह बिगड़ गया है, उसे सुधारना तो पड़ेगा ही न!

दादाश्री : तो सत्संग में ज्यादा जाना चाहिए। सत्संग में ज्यादा यानी रेग्युलर।

प्रश्नकर्ता : हाँ, वह तो देखा कि सत्संग में आते हैं, तब बहुत क्लियर हो जाता है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन सत्संग में ज्यादा पड़े रहना पड़ेगा। उतना टाइम निकालकर रखना चाहिए, सत्संग के लिए।

‘देखना’ ‘जानना’ आत्मस्वरूप से

प्रश्नकर्ता : देखने से पुद्गल शुद्ध हो जाता है, वह क्या विषय के लिए भी करेक्ट है?

दादाश्री : विषय में सब को ऐसा रह नहीं सकता न! सिर्फ विषय ही ऐसा है जिसे देख नहीं सकता। चूक जाता है। बाकी सब में देख सकता है तुरंत। विषय के अलावा बाकी सब में

‘विषय’ के सामने विज्ञान से जागृति (खं-2-१५)

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देख सकता है, जलेबी खाता भी है और जलेबी खानेवाले को भी देखता है। जलेबी कैसे चबाता है, उस पर खुद हँसता भी है कि ‘ओहोहो! क्या चंद्रेशभाई, क्या टेस्ट से जलेबी चबाने लगे हो आप तो!’

प्रश्नकर्ता : हम किसी जगह पर बैठे हों और वहीं पास में कोई स्त्री आ जाए, और हमें स्पंदन खड़े होने लगे, तो उन्हें ‘देखेंगे’ तो चलेगा या प्रतिक्रमण करना पड़ेगा?

दादाश्री : प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। ‘देखना’ उसे कहते हैं कि जब वह ‘देख रहा’ हो तो हम चंद्रेश से कहेंगे, ‘ओहोहो चंद्रेशभाई! आप तो स्त्रियों को भी देखते हो, अब तो रौब में आ गए लगते हो।’ उसे ‘देखना’ कहेंगे। आँखों से जो देखते हैं, वह तो इस दुनिया के सभी लोग देखते ही है न! आँखों से देखा हुआ इन्द्रिय ज्ञान कहलाता है।

प्रश्नकर्ता : यह तो अंदर स्पंदन उत्पन्न होते हैं, उन्हें देखना है कि ये स्पंदन उत्पन्न हुए। ऐसा देखने से जाएगा!

दादाश्री : ‘देखना’। ‘देखने में’, हम जो कहते हैं, वह अलग कह रहे हैं। हम तो, ‘यह क्या कर रहा है,’ उसे हम ‘जानते’ हैं। मैं तो कहता हूँ कि ‘अंबालालभाई, आप तो मजे से खाना खाने लगे न!’

प्रश्नकर्ता : इस तरह कहने को ‘देखना’ कहते हैं, आप ऐसा कहना चाहते हैं? यानी पूरी ‘देखने’ की जो प्रक्रिया है, वह इस तरह बातचीत के द्वारा स्पष्ट रूप से रह सकती है।

दादाश्री : हाँ। यानी तुम सब यह जो ‘देखते’ हो, उसे ‘देखना’ नहीं कह सकते। वह तुम्हारी भाषा में तुम्हारी होशियारी से करने जाओगे न, तो बल्कि मार खा जाओगे। हम से पूछना कि हमारी होशियारी ऐसी है, क्या वह ठीक है?

प्रश्नकर्ता : इसमें ऐसा होता है कि विषय का विचार आता

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है और इस ओर छेदन हो जाता है, वापस आता है, वापस छेदन कर देते हैं। मतलब यह खुद की पकड़ नहीं छोड़ता लेकिन वे विचार भी चलते रहते हैं, दोनों आम्ने-सामने चलते रहते हैं।

दादाश्री : वह छोड़ेगा नहीं न! इसलिए पहले विचार को ही निकालकर फेंक देना। बाद में कोई जाप करने बैठ जाना, 'दादा भगवान को नमस्कार करता हूँ', ऐसा-वैसा करना, भजन गाने लगना, ये जाप ही है सारे। अंदर से कहना कि, 'चंद्रेशभाई, गाओ'। ज्ञान तो बोलता ही रहेगा, बेचारा। वह ज्ञान तो जागृत ही करता रहता है कि जागो, जागो, जागो! अंदर से ऐसा नहीं करता?

प्रश्नकर्ता : हाँ, बहुत करता है, उसके प्रताप से ही तो सब टिका हुआ है।

दादाश्री : अब बाहर के लोग कैसे टिक सकेंगे बेचारे? ज्ञान नहीं हो तो कैसे टिकेंगे? नहीं टिक सकेंगे। उन्हें तो प्रकृति जैसे ले जाए, वैसे घिसटते जाते हैं।

जहाँ जागृति में झोंका, वहाँ विषय की फटकार

प्रश्नकर्ता : इस ज्ञान की जागृति से प्रकृति के सामने बहुत बड़ा फोर्स खड़ा हो गया है।

दादाश्री : हाँ। यह ज्ञान है इसलिए प्रकृति के सामने जीत जरूर जाता है, लेकिन साथ ही साथ अपना जो अस्तित्व है, वह ज्ञान के साथ होना चाहिए। अस्तित्व अगर पुद्गल के साथ रहेगा तो खत्म कर देगा। यानी स्वपरिणामी होना चाहिए।

उन विचारों में मिठास लगे तो हो गया, वे फिर खत्म कर देंगे। क्योंकि उस ओर परपरिणाम हुए। अब वे विचार ऐसे होते हैं न कि मिठास आए? या कड़वाहट आती है?

प्रश्नकर्ता : मिठास आए ऐसे आते हैं।

दादाश्री : इसीलिए वहाँ सावधान रहना है! ऐसा विवेचन

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और कहीं पर तो नहीं कर सकते न! यह तो विज्ञान है इसलिए विवेचन कर सकते हैं। यह रोग कोई निकालता ही नहीं है न! यह रोग कैसे निकले? इसका इलाज अपने यहाँ होता है। यहाँ पर स्त्रियाँ बैठी हों, फिर भी अपने यहाँ दिक्कत नहीं आती। और कहीं पर तो ऐसी बात होती ही नहीं न!

जागृति मंद हुई कि विषय घुस जाता है। जागृति मंद हुई कि फिर उसे धक्का लगता है। विषय एक ऐसी खराब चीज है कि उसमें एक बार फिसल जाए तो फिर जागृति पर गाढ़ आवरण आ जाता है। उसके बाद अगर जागृति रखनी हो, फिर भी नहीं रह पाती। जब तक एक भी बार गिरा नहीं है, तब तक जागृति रहती है। शायद आवरण आ जाए, लेकिन जागृति तुरंत ही आ जाती है। लेकिन एक ही बार फिसला तो जबरदस्त गाढ़ आवरण आ जाता है, फिर सूर्य-चंद्र नहीं दिखते। एक ही बार फिसले तो भी बहुत नुकसान है।

प्रश्नकर्ता : जागृति मंद यानी एकनुअली कैसे होता है?

दादाश्री : एक बार आवरण आ जाता है उसे। उस शक्ति को संभालनेवाली जो शक्ति है न, उस शक्ति पर आवरण आ जाता है, उसका काम करना मंद हो जाता है। फिर उस समय जागृति मंद हो जाती है। उस शक्ति के मंद होने के बाद कुछ नहीं हो सकता, कुछ नहीं होता। बाद में वापस मार खाता है, फिर मार खाता ही रहता है। फिर मन, वृत्तियाँ, वगैरह सब उसे उल्टा ही समझाते हैं कि, ‘हमें तो अब कोई हर्ज नहीं। इतना सब तो है न?’ फिर ऐसा समझानेवाले वकील अंदर होते हैं, उस वकील का जजमेन्ट वापस शुरू हो जाता है। फिर कहेगा कि परहेज करो, मुक्त थे उससे फिर हुए परहेज। ऐसा हो, उससे तो शादी करना अच्छा, बनी ऐसा होना ही नहीं चाहिए।

प्रश्नकर्ता : उस शक्ति की रक्षा करनेवाली शक्ति यानी क्या?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : एक बार स्लिप हुआ, तो अंदर जो स्लिप नहीं होने की शक्ति थी, वह घिस जाती है यानी वह शक्ति ढीली पड़ जाती है। इसलिए फिर बोटल यों टेढ़ी हुई कि दूध अपने आप ही बाहर निकल जाता है, जबकि पहले तो हमें ढक्कन निकालना पड़ता था। यह तुझे समझ में आया?

प्रश्नकर्ता : एक असंयम परिणाम से फिर गुणन से ही (मल्टीप्लाई होकर) पूरा डाउन में चला जाता है और असंयम बढ़ता ही जाता है। ऐसा न?

दादाश्री : हाँ, तो असंयम बढ़ता ही जाता है! इसलिए वापस ढीला ही पड़ता जाता है। एक तो ढीला पड़ा हुआ है और वापस ढीला पड़ गया, तो फिर रहा ही क्या? बाद में तो अंदर मन-बुद्धि सलाह देनेवाले और अंदर जज व बाकी सभी गवाही देनेवाले निकल आते हैं। अरे, गवाही देनेवाले कोई भी नहीं थे, तो फिर कहाँ से आए? तब कहते हैं कि 'हमें पहले से ही कहा था कि आप गवाही देने आना, सो हम गवाही देने आए हैं! कि अब कोई दिक्कत नहीं है। आपकी तो इतनी जागृति है। अब आपको क्या दिक्कत है, अब आपका जरा भी दोष नहीं है।' तेरे कभी ऐसे गवाही देनेवाले नहीं आते?

प्रश्नकर्ता : हाँ, आते हैं न। लेकिन मेरे साथ कैसा होता है कि, पहले यों ग्राफ ऊपर जाता है, फिर जागृति मंद होती हुई दिखाई देती है, फिर पता चल जाता है कि अब डाउन होने लगा है। इसलिए फिर वापस तुरंत जोश आ जाता है कि यह तो गलती हो रही है, कहीं। इसलिए फिर पता लगाते हैं और वापस ऊपर आ जाता है, लेकिन ऐसे डाउन हो जरूर जाता है!

दादाश्री : हाँ, लेकिन अगर वह डाउन हो जाए तो वह कब तक चल सकता है? जब तक हमसे एक बार भी गलती नहीं हो, तब तक चल सकता है, लेकिन एक बार गलती हुई कि ढीला पड़ जाता है। संसारीपने में हज़ार बार भूल खा जाए

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तो उसमें हर्ज नहीं है क्योंकि जब ढीला हो ही गया है तो फिर उसमें हर्ज ही क्या? उसी को ढीला पड़ना कहते हैं न! लेकिन यहाँ तो तुमने टाइट रखा है, उसे टाइट ही रखना है, और यदि वह शक्ति ऊर्ध्वगामी हो गई तो बहुत काम निकाल देगी।

प्रश्नकर्ता : वह किस प्रकार के दोष से ढीला होना शुरू होता है?

दादाश्री : संयम, असंयम हुआ कि ढीला हो ही जाता है। संयम जब तक संयम भाव में रहता है, तब तक ढीला नहीं पड़ता। यों कम-ज्यादा होता रहे तो उसमें हर्ज नहीं है। लेकिन वह संयम टूटा कि फिर हो चुका। वह संयम कब टूटता है? कि ‘व्यवस्थित’ के पिछले संधान हों, तब टूटता है। और टूटने के बाद फिर उसे मटियामेट कर देता है।

मूर्च्छा चली जाए तो फिर हर्ज नहीं। मूर्च्छा ही निकालनी है। ‘मेरी मूर्च्छा चली गई’ ऐसा कहने से कुछ नहीं होगा, मूर्च्छा तो एक्जेक्ट रूप से जानी ही चाहिए। और वह भी ज्ञानीपुरुष से टेस्ट करवा लेना चाहिए कि ‘साहब, मेरी मूर्च्छा गई या नहीं, वह टेस्ट करके दीजिए।’ वनां अंदर तो ऐसी ऐसी वकालत चलती है कि, ‘बस, अब सारी मूर्च्छा चली गई है, अब कोई हर्ज नहीं है!’ यानी वकालत करनेवाले बहुत हैं न! इसलिए जागृत रहना। जहाँ अपराध होने की संभावना हो, ऐसी जगह पर से खिसक जाना। आत्मा तो दिया है और वह आत्मा असंग स्वभाव का है, निर्लप स्वभाव का है। लेकिन अनंत जन्म से पुद्गल की खेंच है। आप अलग हुए, लेकिन पुद्गल की खेंच छोड़ती नहीं है न! वह खेंच जाती नहीं है न! स्त्री-पुरुष के आकर्षण में वह जागृति नहीं रखी तो पुद्गल की खेंच उसे अंधेरे में डाल देगी।

अंत में तो आत्मरूप ही होना है

प्रश्नकर्ता : जब से ब्रह्मचर्य की विचारणा शुरू हुई है, तब

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से उस तरफ मजबूत होने लगा है। तो साथ ही साथ अंदर यह अहंकार भी खड़ा होने लगा है, यह भी परेशान करता है कई बार।

दादाश्री : कैसा अहंकार खड़ा होता है?

प्रश्नकर्ता : ‘मैं कुछ हूँ, मैं कितना अच्छा ब्रह्मचर्य पालन करता हूँ’ ऐसा।

दादाश्री : वह तो निर्जीव अहंकार है।

प्रश्नकर्ता : अंदर इसकी खुमारी भर गई हो, ऐसा हो जाता है।

दादाश्री : हाँ, लेकिन फिर भी वह सारा तो निर्जीव अहंकार है। मरा हुआ ईसान उठ बैठे तो क्या हमें वहाँ से भाग जाना चाहिए? वना ब्रह्मचर्य का सही अर्थ क्या है कि ब्रह्म में चर्या। शुद्धात्मा में ही रहना, वही ब्रह्मचर्य कहलाता है। लेकिन ये लोग तो ब्रह्मचर्य का क्या मतलब निकालते हैं? नल को डाट लगा दो। लेकिन दूध पीया, उसका क्या होगा? पूरे जगत् ने विषय को विष कह दिया है। लेकिन हम कहते हैं, ‘विषय विष नहीं हैं, लेकिन विषय में निडरता, वह विष है।’ वना महावीर भगवान को बेटी कैसे होती? जगत् बात को समझा ही नहीं। रिलेटिव में ब्रह्मचर्य होना चाहिए, लेकिन यह तो वापस एक ही कोने में पड़े रहते हैं और ब्रह्मचर्य का ही आग्रह रखते हैं और उसी का दुराग्रह रखते हैं। ब्रह्मचर्य के आग्रही होने में हर्ज नहीं है, लेकिन अगर दुराग्रही हो गए तो उसमें हर्ज है। आग्रह, वह अहंकार है और दुराग्रह, वह जबरदस्त अहंकार है। ब्रह्मचर्य का दुराग्रह किया तो भगवान कहते हैं, ‘बेकार है’ फिर भले ही ब्रह्मचर्य पालन कर रहा हो।

प्रश्नकर्ता : सभी चीजों में मुझे किसी के दोष नहीं दिखते, लेकिन ब्रह्मचर्य के बारे में मुझे कोई कुछ उल्टा कहे तो मेरा दिमाग घूम जाता है, तुरंत ही उसके दोष दिखने लगते हैं।

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दादाश्री : ऐसा क्यों? कि आत्मा पर प्रीति नहीं है, ब्रह्मचर्य पर प्रीति है। लेकिन ब्रह्मचर्य तो पुद्गल है। आत्मा खुद तो ब्रह्मचारी ही है, निरंतर ब्रह्मचारी है! यह तो हम बाहर का उपाय करते हैं और वह भी कुदरती तरीके से अगर डिस्चार्ज के रूप में आया हो, तभी हो पाएगा। इसलिए ब्रह्मचर्य कोई मुख्य चीज नहीं है। उसे मुख्य मानेंगे तो आत्मा का मुख्यत्व चला जाएगा। मुख्य वस्तु तो आत्मा है, बाकी कुछ भी मुख्य है ही नहीं। बाकी के ये सब तो संयोग हैं और फिर संयोग वियोगी स्वभाव के हैं। आत्मा और संयोग दो ही हैं, और कुछ है ही नहीं जगत् में। अतः मुख्यत्व एक मात्र आत्मा में आ गया, बाकी सब को संयोग कह दिया। संयोग को अच्छा-बुरा करने जाओगे तो बुद्धि इस्तेमाल की और बुद्धि इस्तेमाल की तो आत्मा दूर चला जाएगा। अपना साइन्स कितना अच्छा है!

ब्रह्मचर्य व्यवहार के अधीन है। निश्चय तो ब्रह्मचारी ही है न! आत्मा तो ब्रह्मचारी ही है न!

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[ १६ ]

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं

सिर-माथे पर रखना ज्ञानी को, अंत तक

पंद्रह साल के लिए जेल में डाल दिया हो तो क्या करोगे? 'दादा की जेल में ही हूँ', कहना। कुछ तो शूरवीरता रखो न! शूरवीरता! एक ही जन्म। मोक्ष में जाना है यह तो। अन्य सभी जगह यही झंझट चल रही है न। 'इसमें क्या सुख है?' और अगर एक बाड़ तुम पार कर लोगे मेरे कहे अनुसार, तो फिर मुक्त हो जाओगे। एक ही बाड़ को पार करने की जरूरत है। तुझे दादा हाज़िर रहते हैं या नहीं रहते? तुझे दादा हाज़िर रहते हैं तो फिर क्या दुःख है? अरे, इसमें ऐसे तो कौन से सुख हैं कि इतनी पकड़ में आ गया है! दादा तो ऐसे है कि हर तरह से रक्षा करें, मूलतः इसका यह आड़ाई (अहंकार का टेढ़ापन) का स्वभाव है न, वह नहीं छूटता न! सपने में आ जाऊँ, तब से कल्याण हो गया। सपने में ऐसे ही कोई चीज़ आती है क्या?! इसलिए इस दुनिया का जो होना हो वह हो, लेकिन इन दादा को नहीं छोड़ना है और दादा की इस एक आज्ञा का पालन कर लेना तो वश हो जाएगा सबकुछ। और वनाँ अगर तुझे शादी करनी हो तो बता न, हर्ज नहीं है। कर देंगे फिर रास्ता।

आज्ञा में नहीं रह सके तो क्या किसी को जेल में थोड़े ही डालते हैं? वनाँ ऐसे यदि जेल में डालना पड़े तो हमें कितनों को जेल में डालना पड़े? सभी को डाल देना पड़ेगा।

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं (खं-2-१६)

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तुम्हें तो ऐसा तय करना है कि 'फिसल नहीं जाना है' और यदि फिसल गए तो फिर मुझे माफ कर देना है। आपका कभी अगर अंदर बिगड़ने लगे तो तुरंत मुझे बताना। ताकि फिर उसका कुछ हल निकले! थोड़े ही कहीं एकदम से सुधरनेवाला है? बिगड़ने की संभावना है! ये नए मकान बनाते हैं, तो उनमें डिफेक्ट निकलता है या नहीं? मेरे जैसे को कुछ काम करना रहा नहीं, तो गलती निकलेगी ही नहीं न? जो लोग काम करते हैं, उन्हीं से गलती होती है। खराब से खराब काम हो गया हो तो 'दादाजी' को बता देना। तो मन समझेगा कि, 'यह तो भोला है, यह सबकुछ बता देता है। इसलिए अब हमें फिर से ऐसा नहीं करना है। इसके साथ अपनी नहीं बनेगी।' इसलिए फिर मन बचाव का रास्ता नहीं ढूँढेगा। मैं तो पहले जो भी होता था वह 'ओपन' कर देता था। तो मन को कैसा लगेगा अंदर? उलझता रहेगा, और तय करेगा कि फिर से हमें ऐसा नहीं करना है।

प्रश्नकर्ता : 'यह तो अपनी ही आबरू खत्म कर रहा है' ऐसा कहकर फिर मन चुप हो जाएगा।

दादाश्री : हाँ, मन समझ जाएगा कि 'यह तो अपनी आबरू खत्म कर रहा है।' बाहर के लोग तो ऐसा समझते हैं कि खुद की आबरू जा रही है। जबकि हम तो जानते हैं कि यह तो मन की आबरू जा रही है! जो करता है, उसकी आबरू जाती है। 'अपनी' आबरू क्यों जाएगी? ऐसा कहने से मन शांत हो जाएगा या नहीं? हमेशा हमारी दी गई आज्ञा में रहना ही अच्छा है। जिसने खुद के लेवल पर लिया, वह स्वच्छंद पर ले जाता है। इस स्वच्छंद ने ही लोगों को गिरा दिया है न! इसीलिए हम ये आज्ञा देते हैं न?! स्वच्छंद सबसे बड़ा रोग कहलाता है कि, 'अब मुझे कुछ भी बाधक नहीं है।' वही विष है।

जानो गुनाह के फल को पहले

प्रश्नकर्ता : 'यह कार्य गलत है, यह करने जैसा नहीं है।'

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यह हमें पता है, फिर भी वह हो जाता है। तो उसे रोकने के लिए क्या प्रयत्न करना चाहिए? कौन सा पुरुषार्थ करना चाहिए?

दादाश्री : ऐसा है न। जब तक जिस गुनाह का फल नहीं जानते, तब तक वह गुनाह होता रहता है। कुएँ में कोई क्यों नहीं गिरता? ये वकील कम गुनाह करते हैं। ऐसा क्यों? इस गुनाह का यह फल मिलेगा, ऐसा वे जानते हैं। इसलिए गुनाह का फल जानना चाहिए। पहले जाँच कर लेनी चाहिए कि गुनाह का क्या फल मिलेगा? 'यह गलत कर रहा हूँ, इसका क्या फल मिलेगा?' यह जाँच कर लेनी चाहिए।

इस दुनिया का ऐसा नियम है कि जो गुनाह के फल को पूरी तरह से जानते हैं, वे गुनाह करेंगे ही नहीं! कोई गुनाह कर रहा है मतलब वह गुनाह के फल को पूरी तरह से जानता ही नहीं! हम नर्क का फल जानते हैं, इसीलिए तो हम कभी भी नर्क का फल आए, ऐसी बात हो तो, यह शरीर टूट जाए फिर भी नहीं करते। तूने नर्क का स्वरूप सुना तो तुझे कैसा लग रहा है अब? इसलिए यह जान लेना कि कर्म का फल क्या? क्योंकि अगर गुनाह हो रहा है तो अभी तक यह समझ ही नहीं कि 'इसका फल क्या है?' इसलिए प्रकृति कौन सी बात में गलत कर रही है, यह किसी से पूछना चाहिए। ज्ञानीपुरुष हों तो उन्हें पूछना चाहिए कि, 'अब मुझे यहाँ पर क्या करना चाहिए?' और उसके बावजूद प्रकृति से वह हो जाए तो माफी माँगनी चाहिए! जो प्रकृति हमें पछतावा करवाए, उस प्रकृति का विश्वास ही कैसे कर सकते हैं?

प्रश्नकर्ता : प्रगति को रूधनेवाले अंतरायों में से कैसे निकलें?

दादाश्री : वह सब निकल जाएगा, कृपा से सबकुछ निकल जाएगा। कृपा यानी दादाजी को राजी रखना वह। दादा अपने लिए जो माथापच्ची कर रहे हैं, उसका फल अच्छा आएगा, अच्छे प्रतिशत आए तो दादा राजी! दादा को और क्या चाहिए? दादा कहीं पेड़ा

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खाने नहीं आए हैं। फिर भी पेड़ा प्रसाद के तौर पर रखना। वह भी व्यवहार है न?!

व्यापार में खो गए कि खोए खुदा

यह तो अपने आप झूठ-मूठ का समाधान लेकर दिन निकाल रहा है! और उसका रिजल्ट भी आए बिना नहीं रहता न। भले ही कितना भी कहे, ‘मैं पढ़ रहा हूँ, मैं पढ़ रहा हूँ।’ लेकिन छः महीने के बाद उसका रिजल्ट तो आएगा ही न? तब पोल पता चल जाएगी न! तुझे समझ में आ रहा है यह सब? कॉलेज में जाने के बाद पास तो होना पड़ेगा न? जो व्यापार शुरू किया है, वह पूरी तरह से तो करना चाहिए न? ‘शादी करनी है’ तो ऐसा तय करके रखना और ‘ब्रह्मचर्य पालन करना है’ तो वह तय करके रखना। ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो फिर पूरा-पूरा निश्चय तो होना चाहिए न? ये तो व्यापार में दुकान का करने जाते हैं और वापस फुटबॉल भी खेलने जाते हैं, बोल-बेट भी खेलने जाते हैं, तो उससे कहीं भला होता होगा? भला करना है, तो रास्ता तो निकालना पड़ेगा न? या ऐसा चलेगा? पोलम्पोल चलेगी?!

प्रश्नकर्ता : नहीं चलेगी।

दादाश्री : बाकी लोगों की टोली जा रही है, उस तरह टोली में रहते हैं, इस हिसाब से अच्छा है! उसमें फिर हमें कहाँ लक्ष्य रखना पड़ेगा कि, ‘कौन आगे जा रहा है? वह क्यों आगे जा रहा है? मैं क्यों इतना पीछे रह गया?’ बाकी मोक्षमार्ग में तो निरंतर जागृत रहना पड़ता है कि ‘मेरी क्या गलती रह जाती है?’ ऐसा पता तो लगाना ही पड़ेगा न! बाकी संसार की इच्छा तो करने जैसी है ही नहीं। संसार तो सहज स्वभाव से चलता रहे ऐसा है। अब इतने समय से मेहनत की है, उसमें मेरा भी इतना सारा टाइम गया है। तेरा भी कितना टाइम गया है। इसलिए मुझे कुछ संतोष हो, ऐसा कुछ कर। यहाँ ये सारे लड़के हैं, उन सभी को पूरा दिन कितना अच्छा बरतता है! यहाँ तो जो चिपक गया और लिपट गया,

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उसी का चलता रहेगा। जब तक वह चिपका हुआ उखड़े नहीं तब तक तेरा अच्छा चलता रहेगा। अब वापस कब उखड़ जाएगा?

प्रश्नकर्ता : अब नहीं उखड़ूँगा।

दादाश्री : तब ठीक है! ऐसे चिपके रहोगे तभी चल पाएगा। क्योंकि यहाँ जो चिपका रहा, कृपा उस पर काम किए बिना रहेगी नहीं, यह मार्ग ऐसा करूणामय है। कैसा मार्ग है? खुद का बिगाड़कर भी करूणामय मार्ग है। खुद की कमाई भले ही कम हो जाए, लेकिन उसे संभालकर, उसकी कमाई शुरू करवाकर, दुकान फिर से शुरू करवा देते हैं। इस संसार में भी कोई दोस्त हो, जान-पहचानवाला हो, तो उसका नहीं चल रहा हो तो भी कुछ भी करके शुरू करवा देते हैं। व्यवहार में भी रास्ते पर ला देते हैं। ऐसा करवा देते हैं न?

अभी तो तू पढ़ रहा है, कॉलेज पूरा नहीं हुआ है। इसलिए अभी पूरा हिसाब निकालेगा तो चलेगा अगर अभी कर लिया तो उस समय काम आएगा। बाद में कोलेज खत्म हो जाने के बाद तो ऑफिस लेकर बैठेगा और ऑफिस में एक मिनट की भी फुरसत नहीं मिलेगी। हम समझते हैं कि अभी तो बहुत टाइम है और बाद में यह पूरा कर लेंगे! लेकिन इस काल में सभी व्यापार ऐसे हैं कि एक मिनट की भी फुरसत नहीं मिलती और पूरे दिन मगजमारी, भले ही पैसे कमाएगा लेकिन यहाँ का कोई काम नहीं हो पाएगा। अभी किया होगा तो उस समय वहाँ बैठे-बैठे सब ध्यान में रहेगा, तो थोड़ा कुछ हो पाएगा। ये तो सारे ऐसे कामकाज हैं कि दादा भी वापस नहीं मिल पाएँ! अभी यह सब तुम्हारे लक्ष्य में नहीं है न? इसमें से किसी चीज का ध्यान भी नहीं रहता न? यह तो कुदरत चलाए, उसी तरह चल रहा है। खुद की जागृति का एक अंश भी नहीं है। अपने यहाँ कई अफसर दर्शन करके गए हैं। कहते भी हैं कि यही करने जैसा है। लेकिन करें कैसे? व्यापार तो एक प्रकार की जेल है। उस

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जेल में बैठकर पैसा कमाना। तो अब तुझे क्या करना चाहिए? व्यापार शुरू होने के बाद तुझे एक मिनट का भी टाइम नहीं मिलेगा।

प्रश्नकर्ता : पहले काम निकाल लेना चाहिए।

दादाश्री : हाँ, पहले काम निकाल लेना चाहिए, इसलिए यह याद रखना। इसलिए तुझे यह सार निकालकर दिया है। बाद में हम बार-बार कहने नहीं आएँगे। हम तो पूरी तरह से समझा देते हैं ताकि तुम्हारा अहित न हो। यह तो आज मिला और इच्छा भी है, ऐसा हम जानते हैं, लेकिन मोह का मारा वह निश्चय हो ही नहीं पाता न? निश्चय टिकता नहीं है। हमने एक-एक ऐसे निश्चय देखे हैं कि परसेन्ट टु परसेन्ट करेक्ट। जब देखो तब करेक्ट। अतः जितना हो सके उतना कर लेना चाहिए! तुझे पता है न, यह ऑफिस का काम ऐसा है?

प्रश्नकर्ता : काम के बारे में ऐसा कुछ बहुत बड़ा नहीं सोचा है।

दादाश्री : लेकिन वह तो हो ही जाएगा और बड़े ऑफिसों में बड़ा कामकाज नहीं करें तो खर्चा भी नहीं निकलेगा। नौकरी करेगा तो ठीक है, तो भी तुझे कुछ खाली समय मिलेगा। कई तो ऐसे पुण्यशाली होते हैं कि व्यापार से संबंधित कोई बोदेरेशन ही नहीं। अरे! पूरे दिन व्यापार अपने आप ही चलता रहता है, उसे पुण्य कहते हैं। अब तेरा सबकुछ ठीक हो जाएगा न?

प्रश्नकर्ता : हाँ।

दादाश्री : बहुत सीढ़ियाँ लुढ़क जाएं तो फिर कौन पकड़कर रखेगा? पहले तो एक सीढ़ी गिरता है, फिर दो हो जाते हैं, चार हो जाते हैं, बारह हो जाते हैं, ऐसे बढ़ते जाते हैं! अब यह गाड़ी कहाँ रुकेगी? फिर उसे कौन खड़ा रखेगा और कौन पकड़ेगा? इतनी ऊँचाई पर था, ऊँची दशा में था तब सीधा नहीं रहा, तो अब गिरने के बाद क्या रहेगा? फिसला वह फिसला! अंदर भरपूर

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सुख पड़ा है। याद करते ही मिले अंदर ऐसा निरा सुख ही है! जहाँ चैन खींचोगे वहाँ गाड़ी खड़ी रहेगी, खुद की इतनी शक्तियाँ हैं! लेकिन जहाँ ढीला पड़ जाए वहाँ क्या हो सकता है? तुझे दादा का निदिध्यासन रहता है क्या?

प्रश्नकर्ता : इन दो दिनों से तो रह रहा है।

दादाश्री : जिसे दादा का निदिध्यासन रहता है, उसके तो सभी ताले खुल जाते हैं। दादा के साथ अभेदता, वही निदिध्यासन है! बहुत पुण्य होता है, तब ऐसा उदय आता है और 'ज्ञानी' के निदिध्यासन का साक्षात् फल मिलता है। वह निदिध्यासन, खुद की शक्ति को भी वैसी ही बना देता है, उसी रूप बना देता है। क्योंकि 'ज्ञानी' का स्वरूप अचिंत्य चिंतामणी है, इसलिए उसी रूप बना देता है। 'ज्ञानी' का निदिध्यासन निरालंब बनाता है। फिर 'आज सत्संग नहीं हुआ, आज दर्शन नहीं हुआ।' उसे ऐसा कुछ भी नहीं रहता। ज्ञान स्वयं निरालंब है, वैसा स्वयं निरालंब हो जाना पड़ेगा, 'ज्ञानी' के निदिध्यासन से।

एक ध्येय, एक ही भाव

हमने आंगन में पेड़ लगाया हो, हर रोज खाद-पानी डालें और अब कन्स्ट्रक्शनवाले का ऑर्डर मिले कि इस पेड़ को काट दो और वहाँ नींव खोदना शुरू कर दो, तो? अरे, तो फिर यह पेड़ लगाया ही क्यों था? यदि पेड़ लगाना हो तो काटना मत, तो उनसे कह दे कि कन्स्ट्रक्शनवाले को मकान की जगह बदलनी चाहिए। जिसकी हमने खुदने परवरिश की हो और उसे फिर हम काट दें तो क्या हुआ कहलाएगा? खुद के बच्चे की हिंसा करने के बराबर है। लेकिन लोग कुछ समझते नहीं और कहेंगे, 'काट दो न!' मैंने कभी भी यह गलती नहीं की। हमें तो तुरंत विचार आ जाता है कि यदि लगाया है तो काटना मत और काटना हो तो लगाना मत।

जिसने जगत् कल्याण का निमित्त बनने का बीड़ा उठाया है,

फिसलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं (खं-2-१६)

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उसे दुनिया में कौन रोक सकता है? कोई भी शक्ति नहीं है कि जो उसे रोक सके। पूरे ब्रह्मांड के सभी देव लोग उस पर फूल बरसा रहे हैं। अतः एक ध्येय तय करो न! जब से यह तय करोगे, तभी से इस शरीर के ज़रूरतों की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। जब तक संसारी भाव है, तब तक ज़रूरतों की चिंता करनी पड़ती है। देखो न, 'दादा' का कैसा ऐश्वर्य है! यह एक ही प्रकार की इच्छा रहेगी तो फिर उसका हल आ गया। और देवसत्ता आपके साथ है। ये देव तो सत्ताधारी हैं, वे निरंतर हेल्प करें! ऐसी उनकी सत्ता है। एक ही ध्येयवाले ऐसे पाँच लोगों की ही ज़रूरत है! अन्य कोई ध्येय नहीं, डांवाडोल नहीं। अडुचन में भी एक ही ध्येय और नौंद में भी एक ही ध्येय!

जिस राह पर चले, बताई वही राह

'दादा' जिस रास्ते से गए है, वही रास्ता आपको बताया है। उसी रास्ते पर 'दादा' आपसे आगे हैं। रास्ता मिलेगा या नहीं मिलेगा?

प्रश्नकर्ता : मिलेगा।

दादाश्री : शत प्रतिशत? पक्का?

प्रश्नकर्ता : हाँ, शत प्रतिशत पक्का!

दादाश्री : 'दादा' तो सभी रोग निकालने आए हैं। क्योंकि 'दादा' संपूर्ण निरोगी पुरुष हैं। उनकी मदद से जो रोग निकालने हों, वे निकल जाएँगे। उनमें कोई भी रोग नहीं है, संसार का एक भी रोग उनमें नहीं है। इसलिए तुम्हें जो जो रोग निकालने हों, वे निकल जाएँगे।

इसलिए हम तुम्हें कहते हैं कि फिर अपने आप तुम पोल मारोगे तो तुम्हें मार पड़ेगी। हम तुम्हें चेतावनी दे देते हैं। अभी रोग निकल सकेगा, बाद में नहीं निकल सकेगा। यदि मुझ में जरा सी भी पोल होती तो तुम्हारा रोग नहीं निकल सकता। हिम्मत आ रही है थोड़ी?

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

प्रश्नकर्ता : हाँ, पूरी तरह से हिम्मत आ रही है।

दादाश्री : 'दादा' की आज्ञा का पालन तुम से ठीक से नहीं हो पाता? अपना धर्म आज्ञा पालन करने का है। फिर जो माल निकले, उससे हमें क्या लेनादेना? कॉलेज के आखिरी साल में पढ़ रहा हो और किसी मौज-शौक में पड़ गया और फेल हो गया तो उसके बाद पूरे साल उदास रहे तो क्या फायदा होगा? अगले साल क्या होगा? पहले नंबर से पास होगा? ऐसा डिप्रेशन आ जाए तो सात साल तक भी पास नहीं हो सकेगा। इसलिए यह भूल जाना कि मैं फेल हो गया और नये सिरे से और नई तरह से दोबारा तैयारी करना। जो कर्म हो चुके हैं, उन्हें छोड़ो न! एकलौता बेटा मर जाए तो क्या हमेशा रोएगा? भले ईसान, दो दिन रोना हो तो रो और फिर बाज़ार में कुल्फी खा। यानी कि अगर फेल हो गए तो नये सिरे से पढ़ना शुरू कर देना, पुराना सब भूल जाना। मतलब नये सिरे से आज्ञा में रहो ठीक से! हमें कहना है, 'चंद्रेश, यह तो बहुत गलत किया।' इतना हमें कह देना है, बस। बाद में फिर से हमें आज्ञा में ही रहना है। उसके बाद हम क्यों चूकें? और 'चंद्रेश' तो अपना पड़ोसी है न? फर्स्ट नेबर, फाइल नंबर वन है न? और दिवाला भी चंद्रेश का निकला न? 'तेरा' दिवाला तो नहीं निकला न? या दोनों ने साथ में दिवाला निकाला है? चंद्रेश दिवालिया हो जाए, तो उससे तुम्हें क्या लेना देना? लेकिन हम यह जो कह रहे हैं, वह तुम्हारे वापस पलटने के लिए। फिर उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए कि दादाजी ऐसा कह रहे थे कि दिवाला निकले तो हर्ज नहीं है। यह तो, यहाँ से बचाने जाईं तो वहाँ फिसल पड़ता है, तो इसका कब अंत आएगा? तुम कह देना कि 'चंद्रेश दिवालिया हो गया है, अब फिर से दिवालिया मत होना!' तुम लोगों से कहा है न, फाइल नंबर वन, फर्स्ट नेबर है। तो आज्ञा में रहना वही अपना धर्म है।

फ़िफ़सलनेवालों को उठाकर दौड़ाते हैं (खं-2-१६)

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‘दादा’ बोलते ही दादा हाज़िर

प्रश्नकर्ता : आपकी मौजूदगी में यह सब बिल्कुल साफ हो जाए, सभी को ऐसे आशीर्वाद दीजिएगा।

दादाश्री : हम तो ऐसे आशीर्वाद देते हैं। लेकिन यह तो साफ करोगे तब न !

प्रश्नकर्ता : साफ कर देंगे।

दादाश्री : तुम्हें तो अपना काम निकाल लेना है। इसी की पूर्णाहुति के लिए शरीर घिस देना है। यदि ये कर्म खपा दिए होते और उसके बाद यह ज्ञान मिला होता तो एक घंटे में ही उसका काम पूर्ण हो जाता लेकिन ये कर्म तो खपाए नहीं हैं और राह चलते को ज्ञान दे दिया है इसलिए अंदर जब कर्म के उदय बदलते हैं, तब बुद्धि के प्रकाश को पलट देते हैं, उस समय उलझ जाता है। अब उलझ जाए, तब ‘दादा’ ‘दादा’ करते रहना और कहना, ‘यह लश्कर उलझाने आया है।’ क्योंकि अभी भी ऐसे उलझानेवाले अंदर बैठे हैं, इसलिए सावधान रहना। और उस समय ‘ज्ञानीपुरुष’ का जबरदस्त आसरा रखना। मुश्किलें तो न जाने कब आ जाएँ, वह कहा नहीं जा सकता। लेकिन उस समय ‘दादा’ से सहायता माँगना। जजीर खींचोगे तो ‘दादा’ हाज़िर हो जाएँगे।

अब तो एक क्षण भी गँवाने जैसा नहीं है। ऐसा अवसर बार-बार नहीं आएगा, इसलिए काम निकाल लेना चाहिए। इसलिए यदि यहाँ पर जागृति रखी तो सभी कर्म भस्मीभूत हो जाएँगे और एक अवतारी होकर मोक्ष में चले जाओगे। मोक्ष तो सरल है, सहज है, सुगम है।

ध्येयी का हाथ थामें, दादा हमेशा

मैं आपकी हेल्प करता हूँ, बाकी डिसीजन आपको लेना है। आप सभी को, फादर-मदर और बच्चों को समाधान सहित डिसीजन

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

लेना है। आप ऐसा डिसीजन लेते हो कि आप सभी को समाधान रहे। उसके बाद हम हेल्प करते हैं। आप जिस लाइन में हो, उस लाइन में हेल्प करते हैं। एक से शादी की होगी, फिर भी हमें हर्ज नहीं और शादी नहीं करोगे फिर भी हर्ज नहीं है। लेकिन आप सभी का डिसीजन समाधानपूर्वक होना चाहिए। नहीं तो फिर हमारे लिए सभी की शिकायत आएगी, और हमारे लिए जिस इंसान की शिकायत आएगी, तो उस इंसान को हमारे लिए अभाव हो जाएगा तो उसका बिगड़ेगा। इसलिए मैं इन सब चीजों में नहीं पड़ता। सामनेवाले का बिगड़ेगा तो उसकी जिम्मेदारी मेरी है। लेकिन अगर मुझ पर जरा भी अभाव आए तो उसका क्या होगा? इसलिए हम कुछ नियमसहित ही रहते हैं। हम नियम से बाहर नहीं जाते। नियम से बाहर हम नहीं चलते। उसके जो लॉ हैं, वही लॉ हैं, उसी में रहना पड़ता है।

मन-वचन-काया, भावकर्म-द्रव्यकर्म-नोकर्म, सबकुछ दादा को अर्पण करके, 'मैं अनंत शक्तिवाला हूँ, मैं अनंत ब्रह्मचर्य शक्तिवाला हूँ' ऐसा सब बोल सकते हो। क्योंकि इस विषय में से पार निकलना, यह उग्र गुजारना, यह सब बहुत मुश्किल है। दादा तो, अगर तुम्हें इस तरफ जाना हो तो उसमें मदद करेंगे और शादी करनी हो तो शादी में मदद करेंगे। दादा को इसमें कुछ लेना देना नहीं है। तुम अपना तय करो! तुम में क्या माल भरा हुआ है? मैं कहाँ गहराई में उतरूँ और मेरे पास इतना टाइम भी नहीं है। इसलिए तेरी दुकान का माल तुझे पहचानना है। यानी कि सभी को अपने आप समझ लेना है। मैं क्या कहता हूँ कि शादी करने पर भी तुम्हारा मोक्ष चला नहीं जाएगा। शादी नहीं करनी हो तो यह निश्चय मजबूत करो और इसमें स्ट्रॉंग रहो। दो में से एक ओर की एक्जेक्टनेस पर आ जाना चाहिए। वर्ना बाकी सब में तो टकराव होगा।

जो भी विचार आएँ, उन सभी विचारों को देखना। अच्छे-बुरे विचार तो आते ही हैं! जो भरे हैं, वही आते हैं, और जितने

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आते हैं उतने चले जाते हैं, साफ करके जाते हैं। इसलिए अगर खराब विचार आएँ तो घबराना मत। पहले तो ब्रह्मचर्य नहीं था, ज्ञान नहीं था तब हर एक बुरे विचार के साथ तन्मयाकार होकर उसी तरह करता था न? अब तन्मयाकार नहीं होते और बस इतना ही है कि बुरे विचार आते हैं। लेकिन उन्हें देखना और जानना है। खराब और अच्छा-गलत भगवान के वहाँ नहीं है। वह सब डिस्चार्ज होता रहता है। वह सारा मन का स्वभाव है। तुम सभी को तो रोज़ इकट्ठे होकर एकाध घंटा ब्रह्मचर्य संबंधित सत्संग रखना चाहिए। हमें तो मोक्ष से काम है न? और तुम्हें हम ऐसी जबरदस्ती भी नहीं करते कि शादी करनी है। हमारा किसी तरह का आग्रह नहीं होता। क्योंकि तुम्हारा पिछले जन्म का ब्रह्मचर्य का भाव भरा होगा तो 'शादी करो' हम ऐसा दबाव भी नहीं डाल सकते न! इसलिए हम तो ऐसा कुछ नहीं कह सकते कि 'ऐसा ही करो'। आपकी मजबूती चाहिए। हम बार-बार आपको विधि कर देंगे और हमारा वचनबल काम करेगा, हेल्प करेगा! इसलिए इस तरफ जाना हो तो इस तरफ, वह तुम्हीं को तय करना है।

प्रश्नकर्ता : वह तय तो कर ही लिया है।

दादाश्री : हाँ, तय किया है और व्रत भी लिया है। लेकिन व्रत में भंग हुआ हो तो पश्चाताप लेना पड़ेगा। अपने यहाँ एक-एक घंटा प्रतिक्रमण करते हैं। मन में जरा भी बदलाव हुआ हो, मुँह पर नहीं लेकिन विचार से, और दूसरा कुछ भी नहीं किया हो लेकिन वर्तन में जरा सा भी 'टच' हो गया हो, और यों 'टच' होने से आनंद हुआ हो, यों हाथ लगाने से वैसा हो जाए, तो आपको एक घंटा उसका प्रतिक्रमण करना पड़ेगा। यानी ऐसा सब करोगे तो आगे जमेगा और यदि इसमें से पार उतर गए और ३५-३७ साल के हो गए तो तुम्हारा काम हो जाएगा। मतलब अकाल के ये दस-पंद्रह साल निकालने हैं! और अपना यह ज्ञान है, इसीलिए यह सब कह रहा हूँ न! वर्ना ब्रह्मचर्य पालन के