समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
अंतिम जन्म में भी ब्रह्मचर्य तो आवश्यक (खं-2-१७)
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हिसक पशुओं ने जो मांसाहार किया हो, तो उन सब की उल्टी हो जाती है! उसी तरह ज्ञानीपुरुष का एक शब्द सुनते ही उल्टी हो जाए, वैसे व्यवहार की आवश्यकता है। यों सिर पर हाथ रखें न, या हाथ लगाएँ तो भी क्या से क्या कर दें, वह कहलाता है व्यवहार! व्यवहार यानी क्या कि कोई उनके हाथ-पैर आदि छू ले, तो भी काम हो जाए, और वह तो ज्ञानी की सिद्धि कहलाती है।
यह तो अपना ज्ञान है इसलिए चल रहा है, वना गाड़ी चले ही नहीं न! रुक ही जाए गाड़ी। यह ज्ञान एकदम जागृति देता है और पापों को भस्मीभूत कर देता है।
निश्चय के साथ में वचनबल का पावर
प्रश्नकर्ता : इन सभी युवकों को दादा ने जो ब्रह्मचर्य की शक्ति प्रदान की है तो भविष्य में उन्हें जब पिछले जन्म के संस्कारों की वजह से काम-विकार जांगेंगे, तब वे लोग उन संयोगों में कैसे अडिग रह सकेंगे? उन्हें क्या करना होगा? यह सब समझिए, सभी को लाभ होगा।
दादाश्री : अपना यह 'ज्ञान' ऐसा है कि सर्व विकारों का नाश हो जाता है। हम जब व्रत की विधि करते हैं, तब हमारा वचनबल काम करता है। उसका निश्चय नहीं डिगना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : इनका जो निश्चयबल है, वह 'व्यवस्थित' के हाथ में है या उनके खुद के हाथ में है?
दादाश्री : 'व्यवस्थित' नहीं देखना है। 'व्यवस्थित' उसी को कहते हैं कि तुम्हारा निश्चयबल और हमारा वचनबल, ये दोनों इकट्ठे हुए कि अपने आप 'व्यवस्थित' चेन्ज हो जाता है। सिर्फ ज्ञानी का वचनबल ही ऐसा है जो 'व्यवस्थित' को चेन्ज कर सकता है। संसार में जाने के लिए वह आड़ी दीवार जैसा है, एक बार आड़ी दीवार बना दी कि फिर संसार में जा ही नहीं सकेगा।
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प्रश्नकर्ता : आपने कहा न कि तेरा निश्चय और हमारा वचनबल। इन दोनों में तेरा निश्चय नहीं टूटेगा, तो हमारा वचनबल काम करता रहेगा लेकिन यदि उन लोगों का निश्चय टूट गया तो?
दादाश्री : ऐसा कुछ टूटता ही नहीं। ऐसा होता ही नहीं और यहाँ से नीचे गिर गए तो मर ही जाएँगे न? उसमें ऐसा सोचते हैं कि ऐसे गिर जाऊँगा तो क्या होगा?
प्रश्नकर्ता : यदि किसी का निश्चयबल टूट गया, तो वह 'व्यवस्थित' कहलाएगा? उसे क्या कहेंगे?
दादाश्री : उसका खुद का पुरुषार्थ मंद है, ऐसा कहलाएगा।
प्रश्नकर्ता : इसमें 'व्यवस्थित' नहीं आता?
दादाश्री : अज्ञानी इंसान के लिए 'व्यवस्थित' है, ऐसा कहलाएगा और ज्ञानी तो खुद पुरुष बना है, अब वह पुरुषार्थ सहित है!
प्रश्नकर्ता : खुद का निश्चय यानी हम यदि ऐसा कहें कि हम ही सबकुछ कर सकें ऐसे हैं, तो फिर वह अहंकार नहीं कहलाएगा? तो फिर यह पुरुषार्थ कहलाएगा या अहंकार सहित कहलाएगा?
दादाश्री : नहीं।
प्रश्नकर्ता : तो वह क्या कहलाएगा?
दादाश्री : कुछ नहीं कहलाएगा। निश्चय यानी निश्चय!! और वह भी हमें खुद को कहाँ करना है, वह आत्मा को नहीं करना है। यह प्रज्ञा कहती है कि 'चंद्रेश, तुम निश्चय स्ट्रोंग रखो।' ऐसा है न, कि जब से इन लोगों ने यह व्रत लिया है, तब से उनकी दृष्टि उस ओर जाती ही नहीं है। वर्ना किसी-किसी उम्र में तो सौ-सौ बार दृष्टि बिगड़ती रहती है।
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प्रश्नकर्ता : यह पिछला जो नुकसान हैं, उसे निश्चय से खत्म कर सकते हैं?
दादाश्री : हाँ, सारा नुकसान खत्म कर सकते हैं। निश्चय बहुत काम करता है।
जब भारी उदय आए, तब वह सबकुछ हिला देता है। अब भारी उदय का अर्थ क्या है? कि हम स्ट्रोंग रूम में बैठे हों और बाहर कोई चिल्ला रहा हो। फिर भले ही पाँच लाख लोग चिल्ला रहे हों कि ‘हम मार डालेंगे’ ऐसा बाहर से ही चिल्ला रहे हों तो हमारा क्या बिगाड़ सकते हैं? वे भले ही चिल्लाते रहे। उसी तरह यदि इसमें भी स्थिरता रही तो कुछ नहीं होगा, लेकिन स्थिरता डगमगाई कि फिर से वह चिपक जाएगा। अतः भले ही कैसे भी कर्म आ पड़ें, लेकिन उस समय स्थिरतापूर्वक ‘यह मेरा नहीं है, मैं शुद्धात्मा हूँ’ ऐसा करके स्ट्रोंग रहना पड़ेगा। बाद में वापस आएगा भी सही और थोड़ी देर उलझाएगा लेकिन अगर अपनी स्थिरता रहे तो कुछ नहीं होगा।
हमें इन लड़कों की दो-पाँच बार विधि करनी पड़ती है, तब उनका मोह का वातावरण लगभग चला जाता है। वर्ना अगर निरे मोह के वातावरण में जब वह ‘रिज पॉइन्ट’ पर आएगा, तब उसे एकदम से उड़ा देगा इसलिए लगभग पैंतीस साल तक तो उसका रक्षण करना पड़ता है। यह तो लड़को के संस्कार अच्छे हैं और इस ज्ञान के प्रताप से इतना शुद्धिकरण हो गया है, इसीलिए यह ब्रह्मचर्य व्रत देते हैं क्योंकि जितनी पवित्रता रखी जा सके उतना तो उसका सीधा चले!!
प्रश्नकर्ता : ‘रिज पॉइन्ट’ पर यदि उनका खत्म हो जाए तो फिर ज्ञान का बीज रहता है या फिर बीज भी खत्म हो जाता है?
दादाश्री : ज्ञान का बीज भी खत्म हो जाता है लेकिन व्यर्थ
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नहीं जाता, दूसरे जन्म में फिर हेल्प करता है, मतलब हेल्प तो करता ही है। इस जन्म में ही यदि तीन-चार बार फिर से ज्ञान ले और पैंतीस साल की उम्र में फिर से ज्ञान ले तो वापस राह पर आ तो जाएगा। हमारे नाम से और वचनबल से दो-तीन साल तक रहा तो उतना तो साफ रहेगा और जब शादी करनी होगी तब देख लेंगे, लेकिन उससे पहले तो नहीं बिगड़ेगा। आज का जमाना विचित्र है इसलिए हम इन सभी लड़कों को ब्रह्मचर्य व्रत दे देते हैं, और उस दबाव से और हमारे वचनबल से उतना तो साफ रहेगा। बाद में शादी करे तो भी उसका साफ रहेगा न? नहीं तो यह जमाना तो इतना विचित्र है कि ईंसान उलझ जाए। कितने दंपतियों ने तो साथ में ब्रह्मचर्य व्रत लिया है और ज्ञान भी लिया है, तो उनका आनंद कुछ और ही है न?!
हम ब्रह्मचर्य व्रत देते हैं, लेकिन स्टेबिलिटी आने के बाद देते हैं। उसके बाद अगर तुम्हारे कर्म के उदय दूसरी तरफ के आ जाएँ फिर भी हमारा वचनबल काम करता है, लेकिन तुम्हारी सतर्कता में कमी नहीं आनी चाहिए।
प्रश्नकर्ता : यदि उसके कर्म के उदय में भोग हो, तो फिर वह उसमें पड़ेगा या नहीं? बीच में ही कर्म का उदय आ जाए तो क्या करे?
दादाश्री : नहीं। ज्ञानियों का वचनबल किसे कहते हैं कि जो भयंकर कर्मों को भी तोड़ दे। खुद का निश्चय यदि नहीं डिंगे तो भयंकर कर्मों को तोड़ दे। वह वचनसिद्धि कहलाती हैं, ज्ञानियों की लेकिन वे व्रत नहीं देते किसी को। यह कोई लड़ू खाने का खेल नहीं है। हम तो सभी तरह से उसका चारों तरफ से टेस्ट करके बाद में ही देते हैं। ब्रह्मचर्य व्रत यों ही नहीं दे सकते। वह दिया जा सके ऐसा नहीं है, वह देने जैसी चीज़ नहीं है।
लेकिन ये जो लड़के ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, वे मन-वचन-
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काया से पालन करते हैं। बाहर के लोगों द्वारा मन से तो पालन किया ही नहीं जा सकता। वाणी से और देह से सभी पालन कर सकते हैं। अपना यह ज्ञान है न, उसकी वजह से मन से भी पालन कर सकते हैं। मन-वचन-काया से यदि ब्रह्मचर्य पालन करे तो उसके जैसी महान अन्य कोई शक्ति उत्पन्न नहीं हो सकती। उस शक्ति से फिर हमारी आज्ञा का पालन किया जा सकता है। वर्ना ब्रह्मचर्य की वह शक्ति नहीं हो तो आज्ञा का पालन कैसे करेगा? ब्रह्मचर्य की शक्ति की तो बात ही अलग है न?!
ये ब्रह्मचारी तैयार हो रहे हैं और ये ब्रह्मचारिणियाँ भी तैयार हो रही हैं। उनके चेहरे पर नूर आएगा, फिर लिपस्टिक और पाउडर लगाने की भी जरूरत नहीं रहेगी। हेय! सिंह का बच्चा बैठा हो, ऐसा लगेगा। तब समझ जाएँगे या नहीं कि कुछ है! वीतराग विज्ञान कैसा है कि यदि पचा तो शेरनी का दूध पचाने के बराबर है, तब वह सिंह के बच्चे जैसा लगेगा, वर्ना बकरी जैसा दिखेगा! यह तो वीतराग विज्ञान है, इसलिए यों ही सिंह जैसा दिखता है। मुझे तो अभी भी ये लोग कहीं सिंह जैसे नहीं दिखते, लेकिन इन लोगों का पुरुषार्थ जबरदस्त है न! और वास्तविक पुरुषार्थ है, इसलिए वह आ ही जाएगा। सबकुछ प्राप्त हो सकता है और वह भी फिर ज्ञान सहित प्राप्त होगा!
ये युवा स्त्री, युवा पुरुष ब्रह्मचर्य व्रत लेते हैं, तो उन्हें कैसा सुख बर्तता होगा कि इसमें से छूटने का भाव होता है? इन सभी लड़कों को कैसा सुख बर्तता होगा? ऐसे पाँच ही लड़के तैयार हो जाएँ तो, वे पूरे हिन्दुस्तान में सभी जगह भ्रमण करेंगे, हर एक बड़े शहर में भ्रमण करें तो बहुत काम हो जाएगा। कहीं पर भी भाव ब्रह्मचर्य नहीं होता। बाहर के लोग जिस ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह भी वचन का और काया का, मन का नहीं। आत्मज्ञान के बिना मन का ब्रह्मचर्य नहीं रह सकता। अतः यह तो अपना साइन्टिफिक विज्ञान है, दर असल विज्ञान है। यह
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तो आश्चर्य है! ऐसे ब्रह्मचर्य का यदि कोई पालन करे न तो उनके दर्शन से ही कल्याण हो जाएगा क्योंकि ज्ञानी हैं और साथ ही ब्रह्मचारी भी हैं, दोनों चीजें एक साथ हैं। उन्हें कितना आनंद बर्तता है!! आनंद जरा सा भी कम नहीं होता।
प्रश्नकर्ता : ये लोग शादी करने के लिए मना करते हैं, तो वह अंतराय कर्म नहीं कहलाएगा?
दादाश्री : हम यहाँ से भादरण जाएँ तो क्या इससे इन अन्य गाँवों के साथ हमने अंतराय डाले? उसे जहाँ अनुकूल हो, वहीं वह जाएगा। अंतराय कर्म तो किसे कहते हैं कि आप किसी को कुछ दे रहे हों, और मैं कहूँ कि नहीं, उसे देने जैसा नहीं है, तब मैंने आपको रोका तो मुझे वह चीज नहीं मिलेगी। मुझे उस चीज का अंतराय पड़ा।
इसमें कर्मबंधन के नियम
प्रश्नकर्ता : यदि ब्रह्मचर्य का ही पालन करना हो तो उसे कर्म कह सकते हैं?
दादाश्री : हाँ, उसे कर्म ही कहते हैं! उससे कर्म तो बंधते हैं! जब तक अज्ञान है, तब तक कर्म कहलाता है! वह फिर ब्रह्मचर्य हो या अब्रह्मचर्य हो। ब्रह्मचर्य से पुण्य मिलता है और अब्रह्मचर्य से पाप मिलता है!
प्रश्नकर्ता : कोई ब्रह्मचर्य की अनुमोदना कर रहा हो, ब्रह्मचारियों को पुष्टि दे, सबकुछ उन्हीं के लिए। सभी तरह से उन्हें रास्ता कर दे, तो उसका फल क्या?
दादाश्री : फल का हमें क्या करना है? हमें एक अवतारी होकर मोक्ष में जाना है, अब फलों को कहाँ रखेंगे? उस फल में तो सौ स्त्रियाँ मिलेंगी, ऐसे फल का हम क्या करेंगे? हमें फल नहीं चाहिए। फल खाना ही नहीं है न अब!
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इसलिए मुझे तो उन्होंने पहले से पूछ लिया था, 'यह सब जो कर रहा हूँ, तो मुझे पुण्य बंधन होगा?' मैंने कहा, 'नहीं होगा।' अभी यह सब डिस्चार्ज के रूप में है और बीज तो सभी सिक जाते हैं।
प्रश्नकर्ता : लेकिन यदि वे बीज डलें तो उसका फल अच्छा आएगा न?
दादाश्री : वह अच्छा हो फिर भी हमें उसकी ज़रूरत नहीं है न! वह क्यों चाहिए! उसकी ज़रूरत ही नहीं है न और वह सब विषयों को ही खड़ा करनेवाला होता है।
प्रश्नकर्ता : वह कैसे?
दादाश्री : सभी तरह से, विषय ही खड़ा करनेवाला है। हमें तो कोई भी पुण्य नहीं चाहिए। हमें तो जो दादा की आज्ञा से हुआ वही ठीक और यह तो डिस्चार्ज के रूप में आया है। जितना आता है न, तो उतना रुपये, आने और पाई सहित पूरा हिसाब है। बाद में तो आपकी इच्छा होगी फिर भी नहीं होगा।
प्रश्नकर्ता : नहीं, लेकिन पिछले जन्म में ऐसा कुछ भाव किया होगा, तभी हो सकता है न? या इसी जन्म के भाव से होता है?
दादाश्री : नहीं, वह सारा तो पिछले जन्म का हिसाब है। परिणाम है और अन्य कुछ आपको करना होगा फिर भी नहीं हो पाएगा! वह भी आश्चर्य है न!
त्यागी भावना करते हैं। मन में ऐसा होता है कि पूरी जिंदगी त्याग में ही बीत गई, इसमें तो महादुःख है, इससे तो संसारी रहे होते तो अच्छा रहता। सेवा चाकरी करनेवाले तो मिलते। बूढ़ापे में दुःख आए तब ऐसी भावना करते हैं, इसलिए वापस संसारी बनता है और संसारी बना तब फिर ब्रह्मचर्य जैसा कुछ रहता ही नहीं।
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ब्रह्मचर्य, चार्ज या डिस्चार्ज ?
प्रश्नकर्ता : ये जो सभी ब्रह्मचारी होंगे, वे 'डिस्चार्ज' में ही माने जाएँगे न ?
दादाश्री : हाँ, डिस्चार्ज में ही! लेकिन इस डिस्चार्ज के साथ उनका भाव है, भीतर वह चार्ज है। है डिस्चार्ज, लेकिन उसके भीतर का जो भाव है, वह चार्ज है और भाव होगा तभी मजबूती रहेगी न! वना डिस्चार्ज हमेशा ही ढीला पड़ जाता है। और यह जो उसका भाव है कि मुझे ब्रह्मचर्य पालन करना ही है, उससे मजबूती रहती है। इस अक्रममार्ग में कर्ताभाव कितना है, कितने अंश तक है कि हमने जो आज्ञा दी है न, उस आज्ञा का पालन करना, उतना ही कर्ताभाव। किसी न किसी चीज का पालन करना ही पड़ता है, वहीं पर उसका कर्ताभाव है। अतः उसके इस निश्चय में कि 'ब्रह्मचर्य का पालन करना ही है,' तो इसमें 'पालन करना,' वह कर्ताभाव है। बाकी ब्रह्मचर्य, वह तो डिस्चार्ज चीज है।
प्रश्नकर्ता : लेकिन ब्रह्मचर्य पालन करना, वह क्या कर्ताभाव है ?
दादाश्री : हाँ, पालन करना, वह कर्ताभाव है, और इस कर्ताभाव के फल स्वरूप उन्हें अगले जन्म में सम्यक पुण्य मिलेगा। यानी क्या कि जरा सी भी मुश्किल के बिना सभी चीजें सामने से आ मिलेंगी और ऐसा करते-करते मोक्ष में जाएँगे। तीर्थंकरों के दर्शन होंगे और तीर्थंकरों के पास पड़े रहने का अवसर भी मिलेगा। मतलब उसके सभी संयोग बहुत सुंदर होंगे।
यह हमारी साइंटिफिक खोज है, बहुत सुंदर खोज है! लेकिन अनादि की बुरी आदत जाती नहीं, इसलिए हमें यह रखना पड़ता है कि 'ब्रह्मचर्य पालन करो।'
बाकी, अगर शादी करनी हो तो ज्ञानीपुरुष की आज्ञा लेकर
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शादी करना। आशीर्वाद लिए और 'ज्ञानीपुरुष' कहें कि अब तू गृहस्थ जीवन बिताना, फिर 'ज्ञानीपुरुष' से पूछने को रहा ही कहाँ? फिर ज्ञानीपुरुष को भी एतराज नहीं रहेगा। किसी को अंदर ऐसा हो रहा हो कि मुझे इस तरह से तय करना है, तो मैं कह देता हूँ कि 'शादी करना, लेकिन मेरी आज्ञा लेकर शादी करना।' बाद में तेरी जिम्मेदारी नहीं क्योंकि शादी करके स्त्री लाए, उसे तो हम कुछ भी करके ज्ञान में ला सकते हैं, लेकिन अगर हरहाए पशु जैसा हो जाए, तो फिर वह यूजलेस चीज है। वहीं पर सब पाखंड हैं। पूरे जगत् का कपट वहीं पर है। जबकि अगर शादी करके लाएगा तो उसमें पाखंड नहीं है, उसमें कपट नहीं है। जगत् के लोग उसकी निंदा नहीं करेंगे।
प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य के लिए कुदरत की हेल्प और पिछले संस्कार कुछ काम करते हैं?
दादाश्री : हाँ, करते हैं। वह तो बहुत संस्कार लेकर आया होता है, आस-पास के घर के लोग अच्छे संस्कारी होते हैं। पूर्व के संस्कार हों, तभी घर के लोग अच्छे मिलते हैं। उसका मन भीतर से इतना मजबूत होता है और चारों ओर से सभी संयोग मिल जाते हैं। यह कहीं यों ही कोई गप्प थोड़े ही है? एक इंसान करोड़ रुपये कमाकर लाए तो वह भी गप्प नहीं होती, तो यह भी कोई गप्प है?!
विषय टूटे, विरोधी बनने पर
प्रश्नकर्ता : रविवार के उपवास को और ब्रह्मचारियों में क्या कनेक्शन है? उन्हें रविवार का उपवास क्यों करना है?
दादाश्री : वह तो कहने से करते हैं। दादा को सातों ही वारों से कुछ लेना-देना नहीं है, राग-द्वेष नहीं है। वह तो हमारे मुँह से जो निकल जाए वही वार अच्छा और कभी किसी मेजबान के मन में ऐसा हो कि 'मेरे यहाँ अच्छा-अच्छा खाना
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बनाया है और ऐसे संत पुरुष, बिना भोजन लिए जाएँ, भोजन नहीं ले रहे हैं,' तब मुझे इन लोगों से कहना पड़ता है कि आज खा लेना। हम एक टाइम खाने की आज्ञा देते हैं, ताकि उन घरवालों को दुःख नहीं हो। हाँ, अगर दूसरी बार खाओगे तो वह नहीं चलेगा। तुम्हें इस शरीर को बहुत कष्ट नहीं देना है, नॉर्मलिटी में रखना है। उससे देह तेजवान बनता है, प्रभावशाली बनता है।
प्रश्नकर्ता : शरीर जरा पुष्ट बने ऐसा रखना चाहिए क्या?
दादाश्री : नहीं, पुष्ट नहीं लेकिन तेजवान होना चाहिए, जो स्टेन्डर्ड वजन है, उतना ही रखना चाहिए।
रविवार का उपवास क्यों करते हैं? विषय का विरोधी बना है। विषय मेरी तरफ आए ही नहीं, इसलिए विषय का विरोधी बना, तभी से निर्विषयी हुआ। इस तरह मैं इन्हें विषय का विरोधी ही बनाता हूँ क्योंकि इनसे यों ही विषय छूट जाए, ऐसा नहीं है, ये तो सारे पके हुए फूट (ककड़ी जैसा फल) जैसे हैं, यह तो दूषमकाल के कुलबुलाते फूट है। इनसे कुछ त्यागा नहीं जा सकता, इसलिए तो दूसरे रास्ते निकालने पड़ते हैं न?
अब तुझे, ऐसा लगता है न कि तू खुद 'विषय का विरोधी है ?'
प्रश्नकर्ता : हाँ।
दादाश्री : विषय के विरोधी बन जाएँ, तो क्या रहेगा अपने पास?
प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य रहेगा।
दादाश्री : संयम धारण करना, वह तो बहुत बड़ी चीज है। यह तो 'ज्ञानी' की आज्ञा से संयम धारण होगा। नहीं तो यह मार्ग व्यवहार संयम का नहीं है, यह तो ज्ञान मार्ग है। यह तो
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हम आज्ञा देकर संयम रखवाते हैं। संयम आज्ञा से आता है। आज्ञा में रहने से संयम आता है।
प्रश्नकर्ता : इन सब का आत्मा का आनंद और उल्लास इतना बढ़ा दीजिए कि अन्य कहीं सुख खोजने जाना ही न पड़े।
दादाश्री : वह तो बहुत बढ़ा दिया है, लेकिन अब भी इन लोगों को अंदर अभिप्राय रहता है कि इस विषय में ठीक है, यह अच्छा है। उन सभी अभिप्रायों को मैं तोड़ रहा हूँ। एक अक्षर जितना भी अभिप्राय नहीं रखना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : सभी को ऐसा अभिप्राय थोड़े ही होता है?
दादाश्री : ऐसे तो कोई ही होता है। वह भी सीधे नहीं मिलते। मन तो बिगड़े हुए होते हैं उनके भी, शरीर बिगड़ा हुआ नहीं होता, फिर भी सीधे तो नहीं कहलाएँगे न?!
प्रश्नकर्ता : हमारे पूरे मन-वचन-काया-चित्त-बुद्धि-अहंकार, सभी में आत्मा का उल्लास क्यों व्याप्त नहीं हो जाता पूरा का पूरा?
दादाश्री : हाँ। व्याप्त हो जाता है, लेकिन भोग कहाँ पाता है? अभी तो वह पिछला घाटा है। पिछला जो पूरण किया है, वह गलन हो रहा है, उसमें एकाकार हो जाता है। जितनी जलेबी तुम्हें खानी हो, उतनी खाना, बाकी जलेबियाँ अगर तुम फेंक दो, तो जलेबी क्या तुम पर दावा करेंगी?
प्रश्नकर्ता : लेकिन विषय कैसे दावा करता है?
दादाश्री : वह तो आपको ऐसा लगता है कि सामनेवाला दावा नहीं कर रहा है। सामनेवाला दावा नहीं करे तो उसमें भी कोई परेशानी नहीं है, लेकिन इसमें तो परमाणु दावा करते हैं और इन परमाणुओं का तो इतना इफेक्ट होता है कि ओहोहो, आश्चर्यजनक इफेक्ट होता है!
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प्रश्नकर्ता : लेकिन उस परमाणुओं का तो आप कहते हैं न, कि पुराना लेकर आए हैं, इसलिए उसी अनुसार तो असर होता होगा न?
दादाश्री : मेरा क्या कहना है कि असर हो रहा हो तो उससे भी आप अलग रहो, उसके दुश्मन बन जाओ ताकि उससे मित्रता न रहे, वरना वे पिला-पिलाकर आपको वापस गिरा देंगे!
जब हमने विषय की बात की, तब इन्होंने सबसे पहले यही कहा कि विषय का सेवन गलत है, ऐसा हमें आज ज्ञान हुआ। लोगों को तो 'यह गलत है' ऐसा भी ज्ञान नहीं है। अरे, भान ही नहीं है न! जानवर में और इनमें फर्क कितना है? कुछ प्रतिशत का ही, ज्यादा फर्क नहीं है। मतलब 'यह गलत है' ऐसा जानना तो पड़ेगा न?!
प्रश्नकर्ता : विषयों का सेवन गलत है, ऐसा तो ज्यादातर हिन्दुस्तान के सभी लोग जानते हैं।
दादाश्री : नहीं, सभी को पता नहीं है। अभी तो आपको भी पता नहीं है न! 'क्या गलत है?' उसका पता नहीं चलता। आप अपनी समझ के अनुसार उसे गलत मानते हो कि 'ओहोहो, मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी' आप ऐसा समझते हो। अरे, मियाँ-बीवी लाख राजी हों, फिर भी उसमें क्या जोखिम है, वह आप नहीं समझोगे। और शादीशुदा और हरहाया में क्या फर्क है? वह आप नहीं समझोगे। शादीशुदा या हरहाया सब जोखिमदारी ही है। इसमें जोखिमदारी का भान है किसी को? जोखिमदारी का भान तो सिर्फ मैं ही अकेला जानता हूँ। अगर ईसान हरहाया शब्द नहीं समझे तो वह फिर कहाँ जाएगा? नर्कगति का अधिकारी बनेगा। शादी करनी ही हो तो करो न, दस के साथ शादी करो। उसके लिए कौन मना करता है! लेकिन हर कहीं दृष्टि बिगाड़ते हैं, वह जोखिम है और वह तो हरहाए पशु जैसी अवस्था कहलाती है। अगर देह हरहाया नहीं होता तो मन हरहाया होता है। अतः अभी
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तक जो गलतियाँ हुई हैं, उनका प्रतिक्रमण कर-करके साफ कर देना है और उसे माफ करवाने का हथियार मेरे पास है। उसके बाद नये सिरे से साफ रहेगा।
आलोचना, आप्तपुरुष से ही
प्रश्नकर्ता : आपके पास ऐसे लोग आते हैं कि जो उनके खुद के पिछले हुए दोषों की आप से आलोचना करते हैं तो आप उन्हें छुड़वा देते हैं?
दादाश्री : मुझ से आलोचना करे तो मेरे साथ अभेद हुआ कहलाएगा। हमें तो छुड़वाना ही पड़ेगा। आलोचना करने का अन्य कोई स्थान ही नहीं है, यदि स्त्री को बताने जाए तो स्त्री चढ़ बैठे, मित्र को बताने जाए तो मित्र चढ़ बैठे, खुद अपने आप से कहने जाए तो खुद ही चढ़ बैठता है उल्टा इसलिए किसी को नहीं बताता और हल्का नहीं हो पाता इसलिए हमने आलोचना का सिस्टम(पद्धति) रखा है।
प्रश्नकर्ता : इस जन्म में हमने जो दोष किए हैं, ज्ञानीपुरुष के समक्ष उनके लिए माफी माँग सकते हैं?
दादाश्री : हाँ। वे दोष फिर कमजोर पड़ जाएँगे। जब ज्ञानीपुरुष से आलोचना करे, तब वह खुद कहे तो उत्तम। हमें रूबरू कहे। सभी की मौजूदगी में हमसे कहे, वह ऑर्किस्ट्रा क्लास फिर आप कहो कि नहीं, मैं अकेले होऊँगा, तब दादा से कहूँगा, वह फर्स्ट क्लास। और फिर आप कहो कि दादा को मुँह से नहीं बताऊँगा, कागज में दूँगा, तो सेकन्ड क्लास। और आप कहो कागज में भी नहीं, मैं मन में ही घर पर कर लूँगा, वह थर्ड क्लास। जिसे जिस क्लास में बैठना हो, उसे छूट है लेकिन सभी को मेरे साथ एकता आ जाती है क्योंकि हार्ट ‘प्योर’ ही है न! मुझे तो अभेद ही लगते हैं सभी और वे खुद का जो एफिडेविट (शपथ पत्र, हलफनामा) लिखते हैं, उसमें एक भी दोष लिखना
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बाकी नहीं रखते। पंद्रह साल की उम्र से लेकर चालीस साल की उम्र तक के सभी दोष लिखकर दे देते हैं, ये लड़के, लड़कियाँ गँवरह सभी जाहिर कर देते हैं।
जिसे दोष निकालने हों, उसे हमारे पास आलोचना करनी चाहिए। जिससे बहुत बड़ा दोष हुआ हो और वह दोष निकालना हो और मेरे पास आलोचना करे तो आलोचना करते ही उसका मन मेरे पास बंध जाता है। फिर हम भगवान की कृपा उतारते हैं और उसे साफ कर देते हैं।
हमारे पास आलोचना लिखकर लाते हैं। जितने-जितने दोष वह खुद जानता हो, वे सभी दोष उसमें लिख लेता है। वह भी एक जन नहीं, हजारों लोग! अब उन दोनों का हम क्या करते हैं? उसका कागज पढ़कर, उस पर विधि करके वापस उसके हाथ में दे देते हैं। उसे कितना विश्वास! वर्ल्ड में कहीं नहीं हुए हों, ऐसे दोष लिखते हैं! दोष पढ़कर ही आपको ऐसा लगे कि अरेरे, ये तो कैसे दोष?!
ऐसे हजारों लोगों ने खुद के दोष लिखकर दिए हैं, स्त्रियों ने भी सभी दोष खुलकर बताए हैं, संपूर्ण दोष। सात पति किए हों तो, सातों के नाम के साथ लिखा होता है, बोलो अब हमें क्या करना चाहिए यहाँ? बात जरा भी किसी को पता चले तो वह आत्महत्या कर ले, तो हमारी बहुत जोखिमदारी आती है।
सही आलोचना की नहीं है लोगों ने। वही मोक्ष में जाने से रोकता हैं। गुनाह हुआ तो हर्ज नहीं है। सही आलोचना हो तो कोई दिक्कत नहीं आएगी। आलोचना तो ग़ज़ब के पुरुष के सामने करनी चाहिए। खुद के दोनों की कहीं पर आलोचना की है जिंदगी में? किसके सामने आलोचना करे? और आलोचना किए बिना चारा नहीं। जब तक आलोचना नहीं करोगे तो उसे माफ़ कौन करवाएगा?
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अब तो उधार चुका दो
जिसे जो कुछ भी चाहिए तो उसे हमारे वचनबल से प्राप्त हो सकता है। अभी तक हुए तमाम दोष में धुलवा देता हूँ। अब उधार चुका देते हों तो अच्छा है या नहीं? फिर नये सिरे से उधार नहीं चढ़ाना, लेकिन अब तक का उधार चुका दिया तो फिर झंझट खत्म हो गया न? नहीं तो एक बार उधार लिया कि फिर वह और भी ज्यादा कर्ज में उतरता जाता है। क्या कहता है कि 'होगा, इतने कंगाल हुए तो इतना और सही!' फिर अंततः क्या आता है? दुकान नीलाम हो जाती है।
वास्तव में तो यह विज्ञान ऐसा है कि 'आप ऐसा करो या वैसा करो' ऐसा कुछ नहीं बोल सकते, लेकिन यह तो काल ही ऐसा है! इसलिए हमें यह कहना पड़ता है। इन जीवों के ठिकाने नहीं हैं न? यह ज्ञान लेकर बल्कि उल्टे रास्ते चल सकता है इसलिए हमें कहना पड़ता है और हमारा वचनबल है तो फिर हर्ज नहीं। हमारे वचन से करे तो उसे कर्तापद की जोखिमदारी नहीं रहेगी न! हम कहें कि 'आप ऐसा करो।' तो आपकी जोखिमदारी नहीं, और मेरी जोखिमदारी इसमें रहती नहीं!
वह पाए परमात्म पद
प्रश्नकर्ता : जब कसौटी हो, तब जो संयम का पालन करे, उसे संयम कहते हैं। जब विषय के वातावरण में आए और उसमें से निकल गया तो कह सकते हैं कि इसे संयम है।
दादाश्री : लेकिन विषय तरफ के विचार कभी भी नहीं आते हों तो उसकी तो बात ही अलग है न! क्योंकि पिछले जन्म में भावना की हो तो विचार नहीं आते। हमें बाईस-बाईस साल से विषय का विचार ही नहीं आया, ज्ञान होने से पहले के दो सालों में तो विषय का विचार तक नहीं आया था। हमसे विषय-विकारी संबंध नहीं हुए थे। विकारी संबंध में हमें मिथ्याभिमान
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था कि हमसे यह नहीं हो सकेगा। हमारे कुल के अभिमान की वजह से इसकी रक्षा हो गई। ब्रह्मचर्य, वह तो सबसे ऊँची चीज़ है। उसके जैसी बड़ी चीज़ कोई है ही नहीं न!
अब अनुपम पद छोड़कर उपमावाला पद कौन ले? ज्ञान है तो पूरे जगत् की जूठन कौन छूएगा? जगत् को जो प्रिय हैं ऐसे विषय, ज्ञानीपुरुष को जूठन लगते हैं। इस जगत् का न्याय कैसा है कि जिसे लक्ष्मी से संबंधित विचार नहीं आते, विषय से संबंधित विचार नहीं आते, जो देह से निरंतर अलग ही रहता हो, उसे जगत् भगवान कहे बगैर रहेगा नहीं!
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दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को
मोह ढक देता है जागृति को
जगत् जानता ही नहीं न कि यह रेशमी चादर से लपेटा हुआ है सारा? खुद को जो पसंद नहीं है, वही कचरा इस रेशमी चादर में लपेटा हुआ है। ऐसा तुम्हें लगता है या नहीं लगता? इतना समझे तो निरा वैराग्य ही आ जाए न? इतना भान नहीं रहता, इसीलिए तो यह जगत् ऐसा चल रहा है न? ऐसी जागृति किसी को होगी इन बहनों में से? कोई इंसान सुंदर दिख रहा हो, उसे छीला जाए तो क्या निकलेगा?
प्रश्नकर्ता : खून-मांस वगैरह सब निकलेगा।
दादाश्री : मांस-पीप ऐसा सब ही न? और रूप कहाँ गया फिर? ऐसा सब सोचा नहीं है, इसीलिए यह मोह है न?!
प्रश्नकर्ता : हाँ, ऐसा ही लगता है।
दादाश्री : हाँ, देखो न कैसा फँसाव! सोचो तो फँसाव जैसा नहीं लगता, बहन?! बुद्धि से बात सही लगती है न, कि भीतर यह सारी गंदगी है? हर एक में गंदगी होगी या कुछ साफ भी होंगे, मोम जैसे?
प्रश्नकर्ता : हर एक में गंदगी है।
दादाश्री : इन दादाजी में भी गंदगी है। दादाजी यानी 'दादा भगवान' वे अलग हैं और ये 'ए.एम.पटेल' अलग हैं। पटेल में
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पृ)
गंदगी ही है, 'दादा भगवान' में गंदगी नहीं है।
इस शरीर में ऐसी सब गंदगी है, ऐसी जागृति रहे तब फिर कोई कितने भी सुंदर दिखे, फिर भी मोह उत्पन्न होगा क्या?
प्रश्नकर्ता : नहीं होगा।
दादाश्री : वह जागृति नहीं है, उसी वजह से यह मोह उत्पन्न होता है और उस मोह में से फिर निरे दुःख ही खड़े होते हैं। वर्ना दुःख तो होता होगा? और कोई कहेगा कि तब शादी क्यों करते हो? तब मैं कहता हूँ कि शादी तो करनी पड़ती है, अवश्य करनी पड़ती है। अपनी इच्छा नहीं हो फिर भी मंडप में बिठा दें तो क्या होगा? बिठाते है या नहीं बिठाते?
प्रश्नकर्ता : बिठाते हैं।
दादाश्री : सभी मिलकर बिठा देते हैं न? 'साइन्टिफिक सरकमस्टेशियल एविडन्स' बिठा देते हैं, उसमें चारा ही नहीं है। वह तो सब भुगतना ही पड़ता है। बाकी, यदि शादी नहीं करनी हो तो कौन लफड़ा खड़ा कर सकता है? शादी करनी हो तो कुदरती चारा ही नहीं। वर्ना बिना वजह राजी-खुशी से कोई लफड़ा खड़ा ही नहीं करेगा न? कोई करेगा? इस बात पर से सभी बहनों को समझ में आता है न?
कोई लड़का अच्छे कपड़े-वपड़े पहनकर, नेकटाई-वेकटाई पहनकर बाहर जा रहा हो और उसे काटे तो क्या निकलेगा? तू बेवजह क्यों नेकटाई पहनता है? मोहवाले लोगों को भान नहीं है इसलिए सुंदरता देखकर उलझ जाते हैं बेचारे! जबकि मुझे तो सबकुछ खुला आरपार दिखता है। ये सभी लोग कपड़े उतारकर घूमें तो तुझे खराब नहीं लगेगा?
प्रश्नकर्ता : बहुत खराब लगेगा।
दादाश्री : यानी कि इन कपड़ों की वजह से अच्छे दिखते
दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)
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हैं। क्या बिना कपड़े के अच्छे दिखते हैं? बिना कपड़े तो ये गाय, भैंस, बकरी, कुत्ते, सभी अच्छे दिखते हैं, लेकिन मनुष्य अच्छे नहीं दिखते। अब ऐसा ज्ञान कोई देता ही नहीं न? ऐसी सविस्तार समझ ही कोई नहीं देता न। फिर मोह ही उत्पन्न होगा न! दादाजी तो कहते थे कि यह सब तो ऐसी गंदगी है, फिर मोह कैसे उत्पन्न हो? कोई स्त्री या पुरुष भले ही, कैसे भी बाल बनाकर घूम रहे हों, तो हमें क्या उसमें? चौरों तब भीतर से क्या निकलेगा उसमें से? जैसे यह लौकी छीलते हैं, वैसे ही जब उसे छीलेंगे तब क्या होगा? भीतर का कचरा दिखेगा न? किसी को यहाँ पीप पड़ गया हो और वह तुझे कहे कि 'लो, यह धो दो।' तो वह तुझे अच्छा लगेगा? उसे तो छूना भी अच्छा नहीं लगेगा न? और कोई मित्र हो और उसे पीप नहीं पड़ा हो तो तुझे हाथ लगाना अच्छा लगेगा न? लेकिन अंदर तो ऐसा कचरा माल ही भरा है। उसे तो हाथ भी नहीं लगा सकते। मोह करने जैसा जगत् है ही कहाँ? लेकिन ऐसा सोचा ही नहीं न! किसी ने बताया ही नहीं! माँ-बाप भी शर्म के मारे नहीं बताते। खुद फँसे हैं, वे सब को फँसाते रहते हैं। ये दादाजी नहीं फँसे इसलिए सभी को खुला कह देते हैं कि 'देखना, इस रास्ते पर फँसोगे। ये रास्ते अच्छे नहीं है। यह तो भयंकर मार्ग है।' दादाजी ऐसे लाल झंडी दिखाते हैं कि 'भाई, यह पुल गिरनेवाला है' फिर गाड़ी को आगे नहीं जाने दोगे न?
अभी कम उम्र है आपकी, उसमें एक ही बार फँस गए, फिर बचना बहुत ही मुश्किल है इसलिए शुरू से ही सावधान रहकर चलना। बाहर तो जगत् देखने जैसा है ही नहीं। जगत् फ्रेन्डशिप करने जैसा है ही नहीं। तुझे ऐसा लगा?
प्रश्नकर्ता : हाँ।
दादाश्री : जगत् शादी करने जैसा भी नहीं है, लेकिन शादी किए बिना चारा ही नहीं। वह अपने हाथ में है ही नहीं न! हमें
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
शादी नहीं करनी हो फिर भी मार-पीटकर, रूला-धुलाकर मंडप में बिठा देते हैं। वह तो अनिवार्य है, दंड है एक तरह का। उसे भुगते बिना तो चारा ही नहीं है, वह 'व्यवस्थित' है।
इस बहन को भी अगर मन में भावना हो कि ये सभी व्रत ले रहे हैं तो मैं भी ले लूँ, तो मैं मना करूँगा उसे। छः-बारह महीनों में जब कभी संयोग बैठे तब शादी कर लेना। हम आशीर्वाद देंगे और फिर तुझे लाभ हो ऐसा रास्ता कर दूँगा। और लाभ अच्छा होगा। यह जो उलझन हुई है, वह उलझन कोई नहीं छुड़वाएगा।
मैं तो लड़कियों को मना कर देता हूँ। ज्ञान में रहती हों, फिर भी मना कर देता हूँ।
प्रश्नकर्ता : हाँ, इसमें देखा-देखी करने जैसा नहीं है।
दादाश्री : पुरुष को तो निभा सकते हैं क्योंकि पुरुष को तो अन्य कोई भय नहीं है और इसे तो अन्य भय नहीं हो फिर भी कोई छेड़खानी कर सकता है।
शादी करने का आधार निश्चय पर
प्रश्नकर्ता : हम अगर शादी नहीं करने का निश्चय करें, तो फिर 'व्यवस्थित' वैसा ही आएगा न?
दादाश्री : शादी नहीं करने का जबरदस्त निश्चय हो तो शादी नहीं होगी लेकिन निश्चय ऐसा नहीं होना चाहिए कि फिर दूसरे दिन भूल जाए। निश्चय किसे कहेंगे कि निरंतर याद रहे। निश्चय भूल जाए तो फिर शादी होगी, वह बात निश्चित है। निश्चय नहीं भूलोगी, तो शादी नहीं होगी, उसकी मैं गारन्टी लिख देता हूँ। क्योंकि जिस गाँव हमें जाना है, वह तो भूलना नहीं चाहिए न? हमें बोम्बे सेन्ट्रल जाना हो तो फिर अगर उसे भूल जाएँगे तो चलेगा? वह तो याद रहना चाहिए न? उसी तरह शादी नहीं