समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य
Samaj Se Prapt Brahmacharya
दादा भगवान द्वारा
स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पृ)
गंदगी ही है, 'दादा भगवान' में गंदगी नहीं है।
इस शरीर में ऐसी सब गंदगी है, ऐसी जागृति रहे तब फिर कोई कितने भी सुंदर दिखे, फिर भी मोह उत्पन्न होगा क्या?
प्रश्नकर्ता : नहीं होगा।
दादाश्री : वह जागृति नहीं है, उसी वजह से यह मोह उत्पन्न होता है और उस मोह में से फिर निरे दुःख ही खड़े होते हैं। वर्ना दुःख तो होता होगा? और कोई कहेगा कि तब शादी क्यों करते हो? तब मैं कहता हूँ कि शादी तो करनी पड़ती है, अवश्य करनी पड़ती है। अपनी इच्छा नहीं हो फिर भी मंडप में बिठा दें तो क्या होगा? बिठाते है या नहीं बिठाते?
प्रश्नकर्ता : बिठाते हैं।
दादाश्री : सभी मिलकर बिठा देते हैं न? 'साइन्टिफिक सरकमस्टेशियल एविडन्स' बिठा देते हैं, उसमें चारा ही नहीं है। वह तो सब भुगतना ही पड़ता है। बाकी, यदि शादी नहीं करनी हो तो कौन लफड़ा खड़ा कर सकता है? शादी करनी हो तो कुदरती चारा ही नहीं। वर्ना बिना वजह राजी-खुशी से कोई लफड़ा खड़ा ही नहीं करेगा न? कोई करेगा? इस बात पर से सभी बहनों को समझ में आता है न?
कोई लड़का अच्छे कपड़े-वपड़े पहनकर, नेकटाई-वेकटाई पहनकर बाहर जा रहा हो और उसे काटे तो क्या निकलेगा? तू बेवजह क्यों नेकटाई पहनता है? मोहवाले लोगों को भान नहीं है इसलिए सुंदरता देखकर उलझ जाते हैं बेचारे! जबकि मुझे तो सबकुछ खुला आरपार दिखता है। ये सभी लोग कपड़े उतारकर घूमें तो तुझे खराब नहीं लगेगा?
प्रश्नकर्ता : बहुत खराब लगेगा।
दादाश्री : यानी कि इन कपड़ों की वजह से अच्छे दिखते
दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)
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हैं। क्या बिना कपड़े के अच्छे दिखते हैं? बिना कपड़े तो ये गाय, भैंस, बकरी, कुत्ते, सभी अच्छे दिखते हैं, लेकिन मनुष्य अच्छे नहीं दिखते। अब ऐसा ज्ञान कोई देता ही नहीं न? ऐसी सविस्तार समझ ही कोई नहीं देता न। फिर मोह ही उत्पन्न होगा न! दादाजी तो कहते थे कि यह सब तो ऐसी गंदगी है, फिर मोह कैसे उत्पन्न हो? कोई स्त्री या पुरुष भले ही, कैसे भी बाल बनाकर घूम रहे हों, तो हमें क्या उसमें? चौरों तब भीतर से क्या निकलेगा उसमें से? जैसे यह लौकी छीलते हैं, वैसे ही जब उसे छीलेंगे तब क्या होगा? भीतर का कचरा दिखेगा न? किसी को यहाँ पीप पड़ गया हो और वह तुझे कहे कि 'लो, यह धो दो।' तो वह तुझे अच्छा लगेगा? उसे तो छूना भी अच्छा नहीं लगेगा न? और कोई मित्र हो और उसे पीप नहीं पड़ा हो तो तुझे हाथ लगाना अच्छा लगेगा न? लेकिन अंदर तो ऐसा कचरा माल ही भरा है। उसे तो हाथ भी नहीं लगा सकते। मोह करने जैसा जगत् है ही कहाँ? लेकिन ऐसा सोचा ही नहीं न! किसी ने बताया ही नहीं! माँ-बाप भी शर्म के मारे नहीं बताते। खुद फँसे हैं, वे सब को फँसाते रहते हैं। ये दादाजी नहीं फँसे इसलिए सभी को खुला कह देते हैं कि 'देखना, इस रास्ते पर फँसोगे। ये रास्ते अच्छे नहीं है। यह तो भयंकर मार्ग है।' दादाजी ऐसे लाल झंडी दिखाते हैं कि 'भाई, यह पुल गिरनेवाला है' फिर गाड़ी को आगे नहीं जाने दोगे न?
अभी कम उम्र है आपकी, उसमें एक ही बार फँस गए, फिर बचना बहुत ही मुश्किल है इसलिए शुरू से ही सावधान रहकर चलना। बाहर तो जगत् देखने जैसा है ही नहीं। जगत् फ्रेन्डशिप करने जैसा है ही नहीं। तुझे ऐसा लगा?
प्रश्नकर्ता : हाँ।
दादाश्री : जगत् शादी करने जैसा भी नहीं है, लेकिन शादी किए बिना चारा ही नहीं। वह अपने हाथ में है ही नहीं न! हमें
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शादी नहीं करनी हो फिर भी मार-पीटकर, रूला-धुलाकर मंडप में बिठा देते हैं। वह तो अनिवार्य है, दंड है एक तरह का। उसे भुगते बिना तो चारा ही नहीं है, वह 'व्यवस्थित' है।
इस बहन को भी अगर मन में भावना हो कि ये सभी व्रत ले रहे हैं तो मैं भी ले लूँ, तो मैं मना करूँगा उसे। छः-बारह महीनों में जब कभी संयोग बैठे तब शादी कर लेना। हम आशीर्वाद देंगे और फिर तुझे लाभ हो ऐसा रास्ता कर दूँगा। और लाभ अच्छा होगा। यह जो उलझन हुई है, वह उलझन कोई नहीं छुड़वाएगा।
मैं तो लड़कियों को मना कर देता हूँ। ज्ञान में रहती हों, फिर भी मना कर देता हूँ।
प्रश्नकर्ता : हाँ, इसमें देखा-देखी करने जैसा नहीं है।
दादाश्री : पुरुष को तो निभा सकते हैं क्योंकि पुरुष को तो अन्य कोई भय नहीं है और इसे तो अन्य भय नहीं हो फिर भी कोई छेड़खानी कर सकता है।
शादी करने का आधार निश्चय पर
प्रश्नकर्ता : हम अगर शादी नहीं करने का निश्चय करें, तो फिर 'व्यवस्थित' वैसा ही आएगा न?
दादाश्री : शादी नहीं करने का जबरदस्त निश्चय हो तो शादी नहीं होगी लेकिन निश्चय ऐसा नहीं होना चाहिए कि फिर दूसरे दिन भूल जाए। निश्चय किसे कहेंगे कि निरंतर याद रहे। निश्चय भूल जाए तो फिर शादी होगी, वह बात निश्चित है। निश्चय नहीं भूलोगी, तो शादी नहीं होगी, उसकी मैं गारन्टी लिख देता हूँ। क्योंकि जिस गाँव हमें जाना है, वह तो भूलना नहीं चाहिए न? हमें बोम्बे सेन्ट्रल जाना हो तो फिर अगर उसे भूल जाएँगे तो चलेगा? वह तो याद रहना चाहिए न? उसी तरह शादी नहीं
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करनी है ऐसा जो निश्चय किया है, उस निश्चय को भूलें नहीं, तो फिर उसकी शादी नहीं होगी। वे सभी शादी करवाना चाहें, लड़का दूँढ लाएँ, फिर भी कुदरत मेल नहीं बैठने देगी। बाकी यह संसार तो निरा दुःख का समुद्र ही है, उसका अंत नहीं आ सकता।
दोष, आँखों का या अज्ञानता का ?
अब यह सारा ज्ञान हाजिर रहेगा न? वह तो हमें हाजिर रहना ही चाहिए कि इसे छीलेंगे तो क्या दिखेगा? इन आँखों का स्वभाव है आकृष्ट होना। कोई सुंदर मूर्ति देखे न, तो आँखों को आकर्षण होता है। यह आकर्षण कैसे हुआ? तब कहते हैं कि पूर्व जन्म का हिसाब है, हमें आकर्षण नहीं करना हो फिर भी होता रहता है। आकर्षण, वह डिस्चार्ज हो रही चीज है इसलिए जहाँ आकर्षण हो, वहाँ हमें ज्ञान हाजिर रखना है कि 'दादाजी ने कहा है कि चमड़ी छीलें तो क्या निकलेगा?' ताकि वैराग्य आ जाए और फिर मन टूट जाए, वर्ना आकर्षण के साथ मन एडजस्ट हुआ तो खत्म कर देगा। लफड़े ही चिपक जाएंगे। लफड़े चिपकें तो फिर छूटते नहीं हैं, सात-सात जन्मों तक नहीं छूटते, ऐसा बैर बाँधते हैं, लेकिन हमें तो मोक्ष में जाना है। मोक्ष में जानेवाले को ऐसे लफड़ेवाला व्यापार सहन ही नहीं होगा। जो माल हमें नहीं चाहिए, सभी हलवाई की दुकानें हो, लेकिन हमें कुछ नहीं लेना हो, तो क्या हम उन्हें देखते रहते हैं?
प्रश्नकर्ता : नहीं।
दादाश्री : उसी तरह स्त्री को पुरुषों की ओर नहीं देखना चाहिए और पुरुषों को स्त्रियों की ओर नहीं देखना चाहिए क्योंकि वे अपने काम का नहीं हैं। दादाजी कहते थे कि 'यही कचरा है,' तो फिर उसमें देखने को क्या रहा?
एक बार एक बड़े संत छत पर बैठे-बैठे किताब पढ़ रहे
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थे। सामनेवाले किसी घर की खिड़की में एक स्त्री खड़ी होंगी, उन्होंने उसे देखा कि उनकी आँखें आकृष्ट हुईं और वे तो विचारशील इंसान, इसलिए मन में लगा कि ‘ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसा नहीं होना चाहिए।’ फिर वापस पढ़ने लगे, लेकिन फिर से आँखें आकृष्ट हुईं तब उन्हें लगा कि ‘यह तो बहुत गलत है।’ इसलिए तुरंत वहाँ से उठकर रसोई में गए और रसोई में जाकर पिप्सी हुई लाल मिर्च आँखों में डाल दी। यह क्या उन्होंने अच्छा किया? वह क्या आँखों का दोष है? किसका दोष है?
प्रश्नकर्ता : मन का दोष है।
दादाश्री : नहीं, अज्ञानता का दोष है। अज्ञान है, इसीलिए न! अब आँखों में मिर्च डालना, ऐसा उनके किसी भी शिष्य ने नहीं सीखा। शिष्य जानते थे कि गुरु महाराज इमोशनल हो गए होंगे और मिर्च डाली होगी, हमें नहीं डालनी है भाई! आँखों में मिर्च डालने से क्या फायदा होगा? इसके बजाय मेरी बात याद रहे तो मोह उत्पन्न ही नहीं होगा न? और वास्तव में वैसा ही है। यह क्या कोई गप्प है?
प्रश्नकर्ता : आँखें आकृष्ट हों, लेकिन विकारी भाव नहीं हों तो?
दादाश्री : तो हर्ज नहीं। विकारी भाव अपने में नहीं हों लेकिन अगर सामनेवाले में हों तब क्या होगा? इसलिए आकर्षण में नहीं फँसना है। जहाँ आँखें आकृष्ट हों, वहाँ से दूर रहना। अन्य कहीं, जहाँ आँखें सीधी रहें, वहाँ सब व्यवहार करना। जहाँ आँखें आकृष्ट हों, वहाँ पर जोखिम है, लाल झंडी है। अपने में विकारी भाव न हों, लेकिन सामनेवाले का क्या? सभी जगह आकर्षण नहीं होता न?
प्रश्नकर्ता : नहीं।
दादाश्री : इसलिए आकर्षण के नियम हैं कि कुछ जगहों
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पर ही आकर्षण होता है, हर कहीं नहीं होता। अब यह आकर्षण किस तरह होता है, वह आपको बता दूँ।
इस जन्म में आकर्षण नहीं हो, फिर भी किसी पुरुष को देखा, तब आपके मन में ऐसा हो जाए कि, 'ओहोहो, यह पुरुष कितना सुंदर है, खूबसूरत है।' ऐसा आपको हुआ कि तभी अगले जन्म की गाँठ पड़ गई। उससे अगले जन्म में आकर्षण होगा। कैसा रूप? इसे छीलें तो क्या निकलेगा? रूप किसे कहते हैं कि छीलने पर भी खराब नहीं निकले। इस रूप को तो देखने जैसा नहीं है। हीरे का रूप ठीक है। उसे अगर छीलें तो कुछ भी नहीं होगा, उसमें गंदगी नहीं है न? सोने का, चाँदी का रूप ठीक है। इन मनुष्यों के गुण होते हैं, लेकिन वे कैसे गुण होते हैं? संसारी गुण। संसारी गुणों की प्रशंसा करने जायें, तब आकर्षण होता है। धार्मिक गुणों, ज्ञान के गुणों की प्रशंसा करे, वह बात अलग है। बाकी जगत् प्रशंसा करने जैसा नहीं है, सिर्फ एक शुद्धात्मा ही समझने जैसा है।
निश्चय उसे कहते हैं कि भूले नहीं। हमने शुद्धात्मा का निश्चय किया है, उसे भूलते नहीं न? थोड़ी देर भूल जाते हैं, लेकिन लक्ष्य में ही रहता है फिर, उसे निश्चय कहते हैं। किसी के साथ हम फ्रेन्डशिप भी न करें, बहुत घाल मेल नहीं रखें। एक बार यह लफड़ा चिपकने के बाद तो फिर अलग नहीं हो पाता।
‘जेनूं निदिध्यासन करे, तेवो आत्मा थाय जे जे अवस्थे स्थित थए, व्यवस्थित चितराय’
निदिध्यासन यानी कि 'यह स्त्री सुंदर है या यह पुरुष सुंदर है।' ऐसा सोचे, तो उतनी देर वह निदिध्यासन हो गया। सोचा कि तुरंत ही निदिध्यासन हो जाता है। फिर खुद वैसा ही बन जाता है। अतः अगर हम देखेंगे तभी झंझट होगा न? उससे अच्छा तो आँखें नीचे कर देनी चाहिए। आँखें गड़ानी ही नहीं चाहिए।
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पूरा जगत् फँसाव है। फँसने के बाद तो चारा ही नहीं है। कितने ही जन्म खत्म हो जाएँ, लेकिन फिर भी उसका 'एन्ड' ही नहीं है! शादी किए बिना तो चलेगा नहीं और शादी करना तो समझे कि मिलेगा, लेकिन ये दूसरे लफड़े तो खड़े न करें। लफड़े में बहुत दुःख है। शादी करने में इतना दुःख नहीं है। शादी तो एक तरह का व्यापार शुरू किया कहलाएगा। कुछ स्त्रियाँ नहीं कहतीं कि व्यापार शुरू किया? वह व्यापार फिर पूरा हो जाता है। यानी एक जगह तो शादी करनी ही होती है, हिसाब लिखा हुआ ही होता है, लेकिन दूसरे लफड़ों का अंत नहीं आता।
यह जो दादाजी ने बात बताई, वह तुम भूल जाओगी क्या? घर जाकर भूल नहीं जाओगी न?
प्रश्नकर्ता : अंदर टेप करने का निश्चय किया है।
दादाश्री : हाँ, ठीक है। हम तो वहाँ तक का सब दिखा देते हैं कि तुम्हें भीतर ठोकर नहीं लगे। फिर अगर तुम जान-बूझकर हमारे शब्दों को लांघो तो ठोकर लगेगी, फिर तो यह ज्ञान भी चला जाएगा। यह ज्ञान ठेठ मोक्ष में ले जाए, ऐसा है। इस संसार में कहीं सुख तो होता होगा? सुख तो यह जो आत्मा की बात करते हैं, उसमें आता है न? उसमें सुख है।
शादी किए बिना तो चारा ही नहीं है न? ऐसा तुम समझती हो या नहीं? तुम्हारे माँ-बाप और सभी मिलकर शादी करवा ही देते हैं। तुम्हारी इच्छा नहीं हो फिर भी शादी करवा देते हैं। तुम्हारी इच्छा क्यों नहीं होती? क्योंकि आपने एक सेम्पल देखा हो, वह सेम्पल इससे ज्यादा सुंदर दिखता हो इसलिए वह अच्छा लगता और यह अच्छा नहीं लगता। अरे, वह भी सेम्पल है और यह भी सेम्पल है। दोनों को छीलेंगे तो अंदर से क्या निकलेगा? लेकिन उसका तो उस सेम्पल में ही जीव रहता है कि 'वह कितना सुंदर था और मेरे फादर यह लाए, वह कितना बदसूरत!'
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प्रश्नकर्ता : शरीर की बात जाने दें। यदि इंसान का मन अच्छी तरह से गढ़ा हुआ हो तो क्या उससे फर्क नहीं पड़ेगा?
दादाश्री : वैसे गढ़े हुए मन तो कुछ ही लोगों के होते हैं। सभी लोगों के मन गढ़े हुए नहीं होते न? ये जो सारे लोग घूमते हैं, उनके मन कोई गढ़े हुए नहीं हैं, वे तो दगाखोर मन। इसलिए हम यह गढ़ाई करते हैं। उसके बाद वे नहीं फँसते वरना अगर गढ़ाई नहीं की गई हो तो फिर फँस जाएँगे। यह जगत् तो शिकारी है, शिकार ढूँढ़ते हैं। पूरा जगत् शिकार करने को निकला है। लक्ष्मी के, विषय वगैरह के जहाँ-तहाँ शिकार ही ढूँढ़ते रहते हैं।
इन लड़कियों की उम्र छोटी है और अगर यह ज्ञान नहीं मिले तो कितना जोखिम है! एक बार फँसने के बाद इसमें से निकलना महामुशिकल है। फिर तो लफड़ा चिपक जाता है। अब यह फँसाव है, लफड़ा है ऐसा समझ गई न 'लफरू जो जानी कहयूँ, तो छूटुं पडतुं जाय' आपको इसका क्या मतलब समझ में आया?
एक लड़का कॉलेज में पढ़ रहा था। वह पारसी लेडी के साथ घूमने लगा। वह जैन था इसलिए उसके पिताजी ने क्या कहा, 'यह लफड़ा तू कहाँ से लाया है?' तब लड़का कहता है कि, 'मेरी फ्रेन्ड को आप लफड़ा कहते हो? आप कैसे इंसान हो?' लड़के ने ऐसा कहा, उसका कारण? जब तक उसे यह समझ नहीं आता कि 'यह लफड़ा है', 'यह फ्रेन्ड ही है' ऐसा समझता है तब तक लफड़ा मिलता रहेगा। लेकिन एक दिन जब उसने देखा कि वह पारसी लेडी किसी और के साथ घूम रही थी, तब उसके मन में शंका हुई कि 'यह तो लफड़ा है।' मेरे पिताजी कह रहे थे, वह बात सही है। जब से उसने जाना कि 'यह लफड़ा है', तब से वह अपने आप छूट गया। यह ज्ञान कैसा होगा? कि उसे लफड़ा समझे तब से अलग होता जाता है। कॉलेज में ऐसे लोग होते हैं न जो लफड़ा मोल लेते हैं?
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प्रश्नकर्ता : हाँ।
दादाश्री : ऐसा तुझे पता चलता है न कि यहाँ उसका लफड़ा है? सबकुछ पता चलता है इसलिए हमें इस तरफ इतना सीख जाना चाहिए कि अपनी सेफ साइड किस में है? दादा ने जो यह बताया, वही सेफ साइड। ये सभी लौकिकों काटो तो अंदर से निरा कचरा निकलेगा।
इन जानवरों में बुद्धि लिमिटेड है और मन भी लिमिटेड है इसलिए जानवरों को हमें सिखाने नहीं जाना पड़ता कि आप ऐसे लफड़े मत करना। क्योंकि जानवरों में तो आसक्ति होती ही नहीं। आसक्ति तो बुद्धिवाले में होती है। सभी जानवर कुदरती जीवन जीते हैं, नोर्मल जीवन जीते हैं जबकि ये मनुष्य तो बुद्धिवाले इसलिए आसक्ति खड़ी करते हैं कि कितनी अच्छी दिख रही है! अरे, घनचककर, उसे छील तो सही। छीलने पर अंदर से क्या निकलेगा?
इस सत्संग में ही रहने जैसा है। अन्य कहीं मित्रता करने जैसी नहीं है। सत्युग में मित्रता थी, ठेठ तक की, जिंदगी भर मित्रता निभाते थे। अभी तो दगा देते हैं।
वैराग्य लाने के लिए लोग किताबें लिखते रहे। अस्सी प्रतिशत किताबें वैराग्य लाने के लिए लिखी गई हैं, फिर भी किसी में वैराग्य नहीं दिखा। वैराग्य तो, अगर ज्ञानीपुरुष एक घंटा बोले न तो जन्मोंजन्म तक वैराग्य याद रह जाता है। इस ज्ञान से वैराग्य रहता है या नहीं रहता?
प्रश्नकर्ता : हाँ, रहता है। आज के सत्संग से बहुत ही फर्क पड़ गया।
दादाश्री : यह सत्संग नहीं हो, तब तक मनुष्य उलझता रहता है। ऐसी पजल खड़ा हो तब क्या करना चाहिए, वह पता नहीं होता। यह तो जब पजल खड़ा होता है, तब दादाजी के शब्द याद आते हैं।
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कॉलेज में तो कई रोग उत्पन्न हो जाते हैं। कॉलेज में निरे रोग ही खड़े होते हैं। सबकुछ जोखिम है। हमें अपने आप ही पढ़ना-करना है, लेकिन अपनी सेफ साइड रखना। हमें सेफ साइड रखकर काम लेना है, वना हर कहीं फिसलने के साधन हैं। एक बार फिसलने के बाद फिर ठिकाना नहीं पड़ेगा, समुद्र में गहरा उतर जाए तो फिर कब पार आएगा? सभी स्त्रियों तो कमल जैसी हैं और फिर अगर उन्हें दुःख हो तो वह दुःख दादाजी के नाम पर हुआ कहलाएगा तो क्या दादाजी आपको सावधान न करें? और दादाजी पर इतना भरोसा हुआ फिर भी दुःख आया?! इसलिए दादाजी तो सावधान करते हैं। दादाजी बोर्ड लगाते हैं कि ‘बिवेयर’। ऐसे बोर्ड लगाते हैं न, ‘बिवेयर ऑफ थीप्स’, ‘चोरो पासून सावध रहा?’ उसी तरह ये ‘बीवेयर’ का बोर्ड लगाते हैं।
हमने सभी आप्तपुत्रों से कहा है कि आपको शादी करनी हो तो हम आपको लड़की दिखाएँगे, फर्स्ट क्लास लड़की। फिर भी मना करते हैं। वना लड़कों के माँ-बाप मुझे कहेंगे नहीं कि ‘आपकी वजह से ये लड़के कुँआरे रहते हैं।’ मैं कहता हूँ, ‘ठीक है।’ लेकिन उनकी उपस्थिति में मैं कहता हूँ कि, ‘शादी कर लो’। हम ऐसा नहीं कहते कि ‘ऐसा ही करो’ ऐसा किसी को नहीं कहते। शादी करना या नहीं करना, तेरे कर्म के उदय के अधीन है।
हम भी शादी करके विधुर हुए ही हैं न! जो शादी करेगा वह विधुर होगा। मुझे शादी करते वक्त विचार आया था कि ‘शादी कर रहे हैं लेकिन विधुर होना पड़ेगा एक दिन।’ शादी करते वक्त, मंडप में ही विचार आया था। पंद्रह साल की उम्र में। वह मैंने पुस्तक में जाहिर किया तो लोग हँसते हैं! अगर शादी करेंगे तो विधुर होना ही पड़ेगा न! उन दोनों में से एक को तो विधुर होना पड़ेगा न! तुझे पता नहीं था कि जो शादी करे उसे वैधव्य भुगतना पड़ेगा? शादी करेगा, उसे वैधव्य मिलेगा?
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प्रश्नकर्ता : उस घड़ी, शादी करते वक्त तो ऐसा ही लगता है कि जन्म-जन्म का साथ हो।
दादाश्री : हाँ। लेकिन मन के वैरागी हो जाने के बाद ऐसा पता चलता है न! हिसाब निकालता है न! एक दिन हिसाब निकालना आएगा या नहीं!
प्रश्नकर्ता : आएगा।
दादाश्री : इस जगत् का हिसाब निकालना। हिसाब निकालना आ जाए तो निरा घाटा ही निकालेंगे न! लेकिन लोग निकालते नहीं हैं न कभी भी। हिसाब निकालना नहीं आता, वे तो फायदा ही देखते हैं इसमें। ‘बेहद फायदा है’, कहेंगे।
प्रश्नकर्ता : आपकी मौजूदगी में एडजस्टमेंट कर लेना है।
दादाश्री : हाँ। ये आप्तपुत्र तो ज्ञान की वजह से ब्रह्मचर्य रख सके, वर्ना ब्रह्मचर्य पालन करना वह तो महामुश्किल चीज है। ज्ञान और ज्ञानी की आज्ञा, क्या नहीं कर सकते? इसलिए मन में उल्टा विचार तक नहीं आता।
मेरे पास सभी लड़के आते हैं न हिन्दुस्तान में। ‘अरे, भाई, शादी कर लो न’ कहा। ‘इतनी सारी लड़कियाँ, लोगों की लड़कियाँ कहाँ जाएँगी?’ ‘नहीं, हमने तो सारा सुख देखा, हमारे माँ-बाप का, लड़ते हैं वे तो। हम देखते हैं न सुख, इसलिए हमने जान लिया है कि भाई, इसमें सुख नहीं है। हमने इन माँ-बाप का अनुभव देखा, इसलिए अब हमें शादी नहीं करनी है।’ कहते हैं। मेरे पास सौ-एक लड़के हैं। हाँ, ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, जबरदस्त। कड़ा ब्रह्मचर्य पालन करते हैं। स्त्री पर दृष्टि तक नहीं डालते, दृष्टि गई तो तुरंत प्रतिक्रमण।
ब्रह्मचर्य व्रत पालन करनेवाली लड़कियाँ भी हैं, ऐसी मजबूत। कुछ पालन नहीं कर सकतीं, कुछ ही लोग। स्त्रियों में मोह ज्यादा
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होता है, लड़कियों को, इसलिए पालन नहीं कर सकतीं। जिसे मोह कम हो उसे फिर अगर हम दवाई दे दें तो वे ऑलराइट हो जाती हैं।
इस विवाह-संबंध के स्वरूप को तो देखो
सभी लोग कहें, तब एक बार तुम्हें ठीक लगे तो शादी कर लेना। यह कहीं हजार-दो हजार साल का विवाह नहीं है। यह तो पच्चीस साल या पचास साल का क्ररार है। लंबे क्ररार नहीं हैं न? लंबे क्ररार हों तो शादी नहीं करनी चाहिए। ये तो छोटे क्ररार, शोर्ट क्ररार हैं। ये क्या लंबे क्ररार है? और उसमें भी अलग होने की सरकार ने छूट दी है न? छूट नहीं दी?
प्रश्नकर्ता : हाँ, दी है।
दादाश्री : यानी शादी कर लेना अच्छा है। कैसा भी नहीं! आपको पसंद आए उसके साथ। शादी हमेशा सुख देगी, ऐसा नक्की नहीं होता। शादी दुःख भी देती है। अभी जब तक संसार का मोह है, तब तक दुःख भुगतना पड़ेगा न? वनां जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना हो उसे कोई दुःख ही नहीं है, झंझट ही नहीं है न! लेकिन यदि निर्बलता खड़ी हो रही हो, तो उसके बजाय शादी कर लेना अच्छा है, वनां ऐसा करते-करते चालीस साल हो जाएँगे और बाद में एक भी लड़का नहीं मिलेगा। अभी तुम्हें तीस-बत्तीस साल हुए हैं, तो बत्तीस-पैंतीस साल का लड़का मिल जाएगा।
प्रश्नकर्ता : लेकिन अगर मुझे ब्रह्मचर्य ही पालन करना हो तो क्या करना चाहिए?
दादाश्री : तो फिर मन में विषय का विचार आए, उस समय उस विचार को, हम जो साबुन देते हैं उससे धो देना और किसी की आँखों के साथ आँखें मत मिलाना और यदि दृष्टि मिल जाए तो उसे धो देना। हम सभी तरह का साबुन देते हैं ताकि
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
ब्रह्मचर्य पालन किया जा सके। विचार तो उत्पन्न होते हैं। 'अट्टेक्षण' उत्पन्न होता है, वह कुदरती है, लेकिन अट्टेक्षण होने के बाद साबुन से थो दें तो वापस अट्टेक्षण नहीं होगा।
आकर्षण कुछ के प्रति ही क्यों?
प्रश्नकर्ता : मन में तय किया हो कि किसी भी लड़के के लिए खराब विचार नहीं करने हैं और मुझे खराब विचार नहीं आते लेकिन उसका चेहरा दिखता रहता है, प्रतिक्रमण करती हूँ फिर भी वापस वह तो दिखता ही रहता है तो क्या करना चाहिए?
दादाश्री : दिखता रहे तो उससे क्या? हमें देखते रहना है, प्रतिक्रमण करके उखाड़ देना है बस!
प्रश्नकर्ता : उसकी ओर आकर्षण होता है, वह अच्छा नहीं लगता इसलिए उसका प्रतिक्रमण करती है, लेकिन फिर भी वह और भी ज्यादा दिखता रहता है।
दादाश्री : वह दिखे तब प्रतिक्रमण होगा और प्रतिक्रमण करने से फिर धीरे-धीरे कम होता जाएगा। गाँठ बड़ी हो तो एकदम से कम नहीं होगा।
प्रश्नकर्ता : मुझे उसका चेहरा दिखे और उसके बारे में उल्टे विचार आएँ तो क्या वह खराब नहीं कहलाएगा?
दादाश्री : तुम स्ट्रोंग (दृढ़) हो तब फिर अगर उल्टे विचार आएँ, तो उन्हें देखो कि इसके लिए अभी भी बुरे विचार आ रहे हैं। तुम स्ट्रोंग हो तो कोई नाम नहीं लेगा। यह तो भरा हुआ माल है, वह आता है, वना अगर नहीं भरा हो तो दूसरे किसी लड़के के बारे में नहीं आएँगे। इतने सारे लड़के हैं, क्या सभी के लिए आते हैं? जो माल भरा है, वही आ रहा है। तुम पहचानती हो या नहीं, इस भरे हुए माल को? कुछ को देखा हो और उन पर दृष्टि पड़ गई हो तभी आएँगे।
दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)
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हम तो सभी से कहते हैं कि शादी कर लो। फिर तुम अगर शादी नहीं करतीं तो वह तुम्हारी मर्जी। शादी नहीं करके फिर चारित्र बिगड़े उससे तो शादी कर लेना अच्छा। लोकनिंद्य हो तो, वह सब व्यर्थ है। उससे तो मेरिज कर लेना अच्छा, वनां फिर हरहाए पशु जैसा कहलाएगा।
प्रश्नकर्ता : लोकनिंद्य होना, वह तो बाहर की बात हुई, लेकिन खुद का बिगड़ता है न?
दादाश्री : यानी खुद का तो बिगड़ता ही है, लेकिन फिर लोकनिंद्य हो जाए, वहाँ तक का बिगाड़ता है। वह फिर थोड़ा-बहुत नहीं बिगाड़ता। फिसला कि फिर देर ही नहीं लगती न? यदि ब्रह्मचर्य सँभाले तो भगवान बनने की तरकीब है उसमें! ज्ञानी तो सारी कलाई बताते हैं, सभी रास्ते बताते हैं, लेकिन उसे खुद को स्ट्रोंग रहना चाहिए।
प्रश्नकर्ता : खुद स्ट्रोंग रहे, लेकिन फिर क्या आगे जाकर दिक्कत नहीं आएगी?
दादाश्री : नहीं, कुछ नहीं होगा। ज्ञानीपुरुष की कृपा साथ में रहेगी न! खुद स्ट्रोंग रहा तो ज्ञानीपुरुष की कृपा रहा करेगी, वचनबल रहा करेगा, उससे सभी काम होते रहेंगे। खुद कमजोर पड़े तो सबकुछ बिगड़ जाएगा। 'क्या होगा, अब क्या होगा' ऐसा हुआ तो बिगड़ा। 'कुछ भी नहीं होगा' कहा कि सबकुछ चला जाएगा। शंका हुई कि फिसला।
हमारी विधि तो आपको बाहर से नुकसान नहीं होने देगी लेकिन जिसे खुद को ही बिगाड़ना हो तो उसका क्या हो सकता है? अतः अगर निश्चय कर लो तो सही राह पर चलेगा सारा।
प्रश्नकर्ता : निश्चय तो ठीक से किया है लेकिन कमी कहाँ रह जाती है कि आज्ञा है, ज्ञान है लेकिन पुरुषार्थ में कमी रह जाती है।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
दादाश्री : वह सब तो कर देंगे हम। वे सारे कनेक्शन हम करवा देंगे। तेरी इच्छा हो तो हम सारे कनेक्शन करवा देंगे। इन लड़कों को सभी कनेक्शन करवा दिए, तो जरा भी विचार नहीं आता। वैसा करके देते हैं हम लेकिन अगर तेरा तय हो जाए, उसके बाद मुझसे कहना। देखो न, वह लड़की कह रही थी, शादी की न आखिर में!
प्रश्नकर्ता : मुझे आप्तपुत्री बनना है, लेकिन ये सारे जो मेरे भाव पहले हो चुके हैं, शादी करने के, नौकरी करने के। वे सभी मुझे पूरे करने पड़ेगे या धुल जाएँगे?
दादाश्री : जो हो चुके हैं, उसमें हर्ज नहीं। जो हो चुका है, उसका रास्ता हम निकाल देंगे। लेकिन अब नहीं होने चाहिए और जाँब करने में भी हर्ज नहीं है लेकिन आप्तपुत्री के लिए सिर्फ ब्रह्मचर्य ही जरूरी है।
तुम ने अगर शादी नहीं की तो कोई तुम से पूछेगा कि तुम्हारे कितने बच्चे हैं?
प्रश्नकर्ता : नहीं।
दादाश्री : क्यों? क्योंकि शादी नहीं की इसलिए। मूल में पति ही नहीं है तो बीज कहाँ से डालेंगे? और बीज नहीं डाले तो पौधा उगेगा ही कैसे?
पति, पति जैसा हो, कि वह कहीं पर भी जाए फिर भी एक क्षण भी तुम्हें नहीं भूले, ऐसा हो तो काम का, लेकिन ऐसा किसी काल में हो नहीं सकता तो फिर ऐसे बेकार पति का क्या करना है? खरा पति मिले तब(उसके लिए) कोई एकांत शैयासन छोड़े। क्योंकि अगर उसकी चित्तवृत्तियाँ आपके साथ रहें, तो दूसरे के साथ बाचतीच करते हुए भी आपकी चित्तवृत्तियाँ जहाँ पति हो, वहीं जाएँगी। तो हो गया न एक का एक! एकांत! अभी ऐसा नहीं मिलता न? तो बाकी का सारा माल तो सड़ा हुआ कहलाता
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है। ऐसी सड़ी हुई सब्जी खाने से तो नहीं खाना अच्छा। यह सड़ा हुआ खाने जाएँगे तो उलटियाँ होंगी। यह प्रेम रहित संसार है, सिर्फ आसक्ति ही है। पहले तो प्रेमवाली आसक्ति थी। प्रेम यानी लगन लगी रहती थी। अब तो लगन ही नहीं लगती न? टिकट को भले ही कितना भी गोंद लगाया जाए फिर भी टिकट चिपकती ही नहीं। कागज़ ही ऐसा है, फिर इंसान तंग आ ही जाएगा न!
यानी इस काल में लोग प्रेम भूखे नहीं हैं, विषय भूखे हैं। जो प्रेम भूखे हों, उन्हें तो अगर विषय नहीं मिले फिर भी चलेगा। ऐसे प्रेम भूखे मिलें तो उनके दर्शन करेंगे। ये तो विषय भूखे हैं। विषय भूखे यानी क्या कि संडास। यह संडास, वह विषय भूख है। वहाँ जाने को नहीं मिलता तो क्यू नहीं लगती? आपने देखी है कहीं क्यू? कहाँ देखी है?
प्रश्नकर्ता : हमारी चाली में तो लाइन में ही खड़ा रहना पड़ता है।
दादाश्री : चाली में भी क्यू लगती हैं! हमने अहमदाबाद में पहले क्यू देखी थी। मुझे एक बार क्यू में खड़ा रहना हुआ। मैंने कहा, 'मुझे इस वक्त संडास नहीं जाना।' उससे बेहतर हम यों ही बैठे रहेंगे। हमें इस तरह क्यू में संडास नहीं जाना। जहाँ संडास की इतनी कीमत बढ़ गई! कीमत तो लॉज की बढ़ गई है, लेकिन यहाँ संडास की भी कीमत बढ़ गई! मुझे क्यू में खड़े रहना पड़ा! वह व्यक्ति कहने लगे कि, 'अभी थोड़ी देर, पाँच मिनट खड़ा रहना पड़ेगा।' मैंने कहा, 'नहीं, एक मिनट भी नहीं, चलो वापस आता हूँ। कब्ज़ होगा तो चूरण ले लेंगे लेकिन यह नहीं चलेगा। यह कैसे चलेगा? वहाँ खड़े रहकर किसका इंतज़ार कर रहे हो?! इसकी भी कीमत?' मुझे तो शर्म आई। मैं तो अगर भोजन के लिए भी क्यू हो तो खड़ा नहीं रहता। उसके बजाय तेरी रोटी तेरे घर रहने दे। थोड़े चने खा लेंगे।
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
हाँ, मोक्ष दे रहा हो तो चलो न, हम दिन-रात क्यू में खड़े रहेंगे।
यानी आज के विषय संडास जैसे हो गए हैं। जैसे संडास के लिए खड़ा रहता है न! वैसे ही इन विषयों के लिए लाइन में खड़ा रहता है। संडास लगी कि भागा।
इसे प्रेम कहेंगे ही कैसे? प्रेम तो वह है कि विषय नहीं मिले फिर भी चिढ़ न मचे। यह तो जंगलीपन है। इसके बजाय तो साधु बनकर मोक्ष में चले जाने का विचार करना अच्छा। हम अपने गाँव ही अच्छे! अपने गाँव स्वतंत्र तो रह सकते हैं। ऐसा तो कहीं अच्छा लगता होगा?
अहमदाबाद के सेटों को मैंने देखा है। ऑफिस में लोग हाथ जोड़ते हैं और घर पर वह क्यू में खड़ा रहता है। इसमें तो स्वमान जैसा कुछ रहा नहीं न? इसे तो सामान्य जनता कहा जाएगा। हमें तो कुदरती रूप से क्यू मिली ही नहीं। क्या क्यू हमें शोभा देती है? जहाँ अंदर त्रिलोक के नाथ हैं, वहाँ?
यदि कभी लगनवाला प्रेम हो तो संसार है, बर्ना फिर विषय तो संडास है। वह फिर कुदरती हाजत में गया। उसे हाजतमंद कहते हैं न? जैसे सीताजी और रामचंद्रजी विवाहित ही थे न? सीताजी को ले गए फिर भी राम का चित्त सिर्फ सीता में ही था और सीता का चित्त सिर्फ राम में ही था। विषय तो चौदह साल तक देखा तक नहीं था, फिर भी चित्त उन्हीं में था। उसे विवाह कहते हैं। बाकी, ये तो हाजतवाले कहलाते हैं। कुदरती हाजत!
शादी की, मतलब समझना कि एक शौचालय आ गया अपने पास! यह जो शादी है, वह तो पूरा संडास है। स्त्री ने एक ही बार परपुरुष के साथ दोष किया हो तो उसे पाँच सौ-हज़ार जन्मों तक स्त्री बनना पड़ता है। विषय में फिसले तो नर्क की वेदना
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भुगतनी पड़ेगी इसलिए आँखें गड़ाना ही नहीं। अन्य दोष चला सकते हैं, लेकिन यह अत्यंत दुःखदाई है। नर्क में पड़ने जैसा दुःख लगता है। अरे, इसकी बजाय नर्क में पड़ना अच्छा। अपने आप शादी सामने से आए तो उस समय शादी करना। जगत् के लोग निंद्य माने, उससे तो भयंकर दुःख पड़ते हैं वैसा होना ही नहीं चाहिए इसलिए तुरंत प्रतिक्रमण कर लेना चाहिए। लेकिन यदि शक्ति हो तो संयम लो और शक्ति नहीं हो तो शादी कर लेना। शादी करने से दोष नहीं लगता। बाकी विषय जैसी मार जगत् में अन्य कोई है ही नहीं। विषय का विचार आया कि तभी से वेदना उत्पन्न हुई, जलन होती रहती है। विषय को जीत लिया मतलब सबकुछ जीत लिया।
अगर पति होगा तभी झंझट रहेगा न? लेकिन यदि ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया हो तो विषय से संबंधित झंझट ही नहीं रहेगा न! और ऐसा ज्ञान हो तो वह काम ही निकाल दे! लेकिन स्त्री को स्त्री-जाति का जबरदस्त अवरोध है, इसलिए श्रेणी बहुत ऊपर चढ़ती है लेकिन स्त्री-जाति है, इसलिए रुक जाती है न! स्त्री-जाति कितनी बाधक है! स्त्री-जाति को बाधकता उत्पन्न होती है, कि कब उसका लेवल खिसक जाए, वह कह नहीं सकते। जबकि पुरुष को तो खुद 'एक्जेक्टनेस' में आ चुका हो तो फिर वह खिसकेगा नहीं, उसकी गारन्टी!
तुझे अच्छा रहता है न?
प्रश्नकर्ता : यों तो अच्छा है, लेकिन दादा स्त्री-प्रकृति है न! आगे नहीं बढ़ने देगी, ऐसा होता है।
दादाश्री : लेकिन वह तो यदि बहुत प्रतिक्रमण करे और स्ट्रोंग रहे तो कुछ नहीं होगा। स्ट्रोंग रहना चाहिए। एक बार फिसलने के बाद मार खा खाकर मर जाएगी। एक ही बार फिसली तो खत्म हो गया। यानी विषय वह भोगने की चीज नहीं है, ऐसा मान ले तो चलेगा! भोगने की कई चीजें हैं बाहर। यह तो निरी
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)
जूटन, गंदगी सारी। आँखों को अच्छा नहीं लगता, कान को अच्छा नहीं लगता, जीभ को अच्छा नहीं लगता।
वह पढ़ती हो?
प्रश्नकर्ता : पढ़ नहीं पाती खास।
दादाश्री : उसे पढ़ने से तो पूरी प्रकृति अलग हो जाती है, वर्ना फिर शादी कर लेना अच्छा। तुझे तो चलेगा न?
प्रश्नकर्ता : प्रकृति टेन्शनवाली है न, इसलिए ज्ञान का परिणाम जैसा आना चाहिए वैसा नहीं आता।
दादाश्री : ज्ञान का परिणाम तो अगर सत्संग हो न, तभी आता है। वह तो सत्संग नहीं है, इसलिए। वह तो अपने यहाँ पर जब बन जाएगा सभी के साथ रहने से विचार भी नहीं आएगा, बल्कि आनंद होगा। वह मकान जब बनेगा वहाँ पर ब्रह्मचारीणियाँ रहेंगी, नहीं तो फिर शादी करवाने को कह देना।
अच्छे सत्संग में आए तो वह टेन्शनवाली प्रकृति हमेशा नहीं रहेगी, वह तो सबकुछ बदल जाएगा। वह तो कुसंग में जाए तभी बाधक रहता है सब।
उसमें भी अगर यह विषय पसंद ही नहीं हो तो छुटकारा होगा। फिर भी किसी पर दृष्टि आकृष्ट हो तो प्रतिक्रमण से खत्म हो जाएगा। लेकिन अगर अंदर से विषय पसंद हो तो शादी कर लेना अच्छा।
प्रश्नकर्ता : खुद के हित का नहीं सोचती।
दादाश्री : हित तो है ही नहीं न, भान ही नहीं है। मिटास में जो इंसान फँस जाए, उसका तो हित का ठिकाना ही नहीं रहता न!
प्रश्नकर्ता : उस समय खुद ने जो निश्चय किया है, वह कहाँ चला जाता है?
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दादाश्री : जैसा खुद हो जाए, निश्चय भी वैसा ही हो जाता है। खुद कमजोर हो जाए, तो हो गया अनिश्चय।
प्रश्नकर्ता : लेकिन इस तरफ का निश्चय करने में इतनी देर लगती है जबकि शादी का निश्चय तुरंत ही हो जाता है। ऐसा क्यों?
दादाश्री : नहीं, यहाँ पर देर लगती ही नहीं। यहाँ पर, वह बिना देरीवाला ही है।
प्रश्नकर्ता : यहाँ पर भी बिना देरी का ही?
दादाश्री : हाँ, जैसा वह तुरंत, वैसा ही यह भी तुरंत। यहाँ पर अगर देर लगाकर किया हो तो उसका निश्चय बदलेगा ही नहीं न! कभी भी नहीं बदलेगा, मार डाले फिर भी नहीं बदलेगा।
प्रश्नकर्ता : हम सभी को अगर ठीक से समझकर यह निश्चय स्ट्रॉंग करना हो, तो समझ तो हम पूरी-पूरी लाए ही नहीं हैं न! तो फिर वह स्ट्रॉंगनेस कैसे आएगी?
दादाश्री : तेरा ध्येय होगा तो सबकुछ आएगा।
प्रश्नकर्ता : यानी जिसे स्ट्रॉंग करना है, उसका होगा ही?
दादाश्री : नहीं। ध्येय तय किया होगा न तो स्ट्रॉंग रहेगा तो फिर हो जाएगा। यह ध्येय नहीं है, उसका ध्येय नहीं है कुछ भी।
प्रश्नकर्ता : आपने दादा एक बार कहा था कि निश्चय मजबूत करना हो तो निश्चय के विरुद्ध का एक भी विचार नहीं आना चाहिए।
दादाश्री : हाँ। और अगर उस ध्येय को नुकसान पहुँचनेवाला कुछ भी आए तो उसे हटा देना चाहिए।