भारतकोश
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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

दाला देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)

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है या ऐसे लाल-पीली साड़ियाँ पहननी हैं और फिर से संसार में रहना है? ये लाल, पीली, नीली साड़ियाँ नहीं होनी चाहिए, वे सब तो मोहवाली चीजें हैं। कभी न कभी तो मोह छोड़ना ही पड़ेगा न?! क्या सिर्फ साड़ी को ही छोड़ना है? कभी न कभी देह को भी छोड़ना ही पड़ेगा न?

अर्थात् इसमें सच्चा सुख है ही नहीं। यह तो सब कल्पित सुख है। विषयों में भी कल्पित सुख है और अन्य चीजों में भी कल्पित सुख है। सच्चा सुख आत्मा में है। सनातन सुख! वह कभी भी नहीं जाता। हमारा सुख कभी भी जाता ही नहीं है न! यदि तुम्हें ब्रह्मचर्य पालन करना हो तो इतना सावधान रहना है कि परपुरुष का विचार तक नहीं आना चाहिए और विचार आते ही धो देना चाहिए।

प्रश्नकर्ता : आपने कहा था मिश्रचेतन से सावधान रहना।

दादाश्री : बस, इस मिश्रचेतन से जो सावधान रहा, उसका कल्याण हो गया! एक शुद्धचेतन है और एक मिश्रचेतन है। मिश्रचेतन में यदि फँस गए तो अगर आत्मा प्राप्त किया हो, फिर भी उसे भटकना देगा। अतः इसमें अगर विकारी संबंध हो गए तो भटकना पड़ेगा क्योंकि हमें मोक्ष में जाना है और वह व्यक्ति अगर जानवर में जानेवाला हो तो हमें भी वहाँ खींच ले जाएगा। संबंध हुआ तो वहाँ जाना पड़ेगा। इसलिए इतना ही देखना है कि विकारी संबंध खड़ा ही नहीं हो। मन से भी बिगड़ा हुआ नहीं हो, तब वह चारित्र कहलाता है। उसके बाद ये सब तैयार हो जाएँगे। बिगड़े हुए मन होंगे तो फिर वह फ्रैक्चर हो जाएगा, वर्ना एक-एक लड़की में कितनी शक्ति है! वह क्या कुछ ऐसी-वैसी शक्ति है? यह तो, अगर हिन्दुस्तान की बहनें हों और साथ में वीतराग का विज्ञान हो तो फिर बाकी क्या रहा?

माँ-बाप खुद की बेटी से चारित्र संबंधित बातचीत कैसे कर

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

सकते हैं? तो वह कौन बातचीत कर सकता है? सिर्फ एक 'ज्ञानीपुरुष' ही बातचीत कर सकते हैं क्योंकि ज्ञानी किसी लिंग में नहीं होते। वे पुरुष लिंग में नहीं होते, स्त्री लिंग में नहीं होते, न ही नपुंसक लिंग में होते हैं। वे तो आउट ऑफ लिंग होते हैं। बहुत विचित्र जमाना आया है, फिसलता काल है, लड़कियों को कोई ज्ञान है नहीं, आगे का मार्गदर्शन नहीं है। इन लड़कियों को कितनी परेशानियाँ हैं! इसलिए यह मार्गदर्शन दे रहा हूँ।

इसलिए यह ज्ञान निकला। मेरी बहुत समय से इच्छा थी कि ऐसा ज्ञान निकले, लेकिन उसका टाइम आना चाहिए न? यह ज्ञान इतनों को तो मिला। सभी को जरूरत तो है ही न! इस ज्ञान की तो सभी को जरूरत है!

ब्रह्मचर्य व्रत पालन करना कहीं छोटे बच्चों का खेल नहीं है! विषय का विचार ही नहीं आना चाहिए और आ जाए तो उसे तुरंत प्रतिक्रमण करके धो देना। विचार तो आऐंगे ही। इस कलियुग में तो निरं ऐसे विचार आते ही हैं! लेकिन उन्हें धो देना।

प्रश्नकर्ता : विषय में हमने आनंद का आरोपण किया है, इसलिए वह आता है, लेकिन हमें ब्रह्म के आनंद की अनुभूति हो जाए तो वह आनंद ऑटोमैटिक छूट जाएगा?

दादाश्री : हाँ, क्योंकि जलेबी खाने के बाद चाय पीओगे, तो अपने आप ही न्याय हो जाएगा न! उसी प्रकार आत्मा का आनंद चखने के बाद विषय अपने आप ही फीके पड़ जाते हैं। इन लड़कियों को फीका ही पड़ गया है न! तभी तो राह पर आ गया न! इन लड़कियों को ब्रह्म का आनंद उत्पन्न हुआ और आरोपित आनंद फ्रैक्चर हो गया! इसीलिए खुद के दोनों पर रोना आया न? और लड़कियाँ तो यहाँ आकर मुझसे कहती हैं कि 'बहुत ही शक्ति बढ़ गई, जबरदस्त शक्ति बढ़ गई!' खुद का

दादा देते पुष्टि, आप्तपुत्रियों को (खं-2-१८)

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सुख खुद के पास है, लोग ऐसा समझे ही नहीं हैं न? और सुख को ढूँढने बाहर जाते हैं।

प्रश्नकर्ता : लेकिन सुख को किसी न किसी का आधार है ही, मन का, वचन का.....

दादाश्री : परावलंबी सुख को सुख कहेंगे ही कैसे?

प्रश्नकर्ता : सिर्फ बहनों की शिविर करवाइए।

दादाश्री : तब तो बहुत प्रभाव पड़ेगा। वे जब सच्चा ब्रह्मचर्य पालन करेंगी, तो वह लाइट अलग ही तरह की होगी। यह तो जन्म लिया और मर गए यहीं पर, जानवर की तरह, वह किस काम का? बहनों सुन रही हो न, मेरी बात कड़वी लगे फिर भी अंदर उतारना। भले ही कड़वी लगे, लेकिन अंत में मीठी निकलेगी। मीठी निकलेगी या नहीं?

प्रश्नकर्ता : निकलेगी।

दादाश्री : अभी तो कड़वी लगेगी। मैंने कहा है सिर्फ यही एक सेफ साइड है, बाकी सब फँसाव है।

कल्याण करना है या कल्याण स्वरूप बनना है?

प्रश्नकर्ता : ये दीक्षा लेनेवाली जो बहने हैं, उन्हें धर्म का ऐसा कुछ रहस्य समझाइए कि जिससे उनका कल्याण हो और समाज को और लोगों को भी फायदा हो।

दादाश्री : कल्याण करने में एक ही चीज़ है कि जो खुद का कल्याण कर ले, वह बिना बोले दूसरों का कल्याण कर सकता है! अतः करना कितना है? 'ज्ञानीपुरुष' के पास खुद का कल्याण कर लेना है। फिर खुद कल्याण स्वरूप हुआ कि बिना बोले लोगों का कल्याण हो जाएगा और जो लोग बोलते रहते हैं, उससे कुछ नहीं होता। सिर्फ भाषण करने से, बोलते रहने से कुछ नहीं होता।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्)

बोलने से तो बुद्धि इमोशनल हो जाती है। यों ही उनका चारित्र देखने से, उस मूर्ति को देखने से ही सभी भावों का शमन हो जाता है यानी कि उन्हें तो केवल खुद ही उस रूप हो जाने जैसा है। 'ज्ञानीपुरुष' के पास रहकर उस रूप होना है। ऐसी पाँच ही लड़कियाँ तैयार हो जाएँ तो कितने ही लोगों का वे कल्याण कर सकेंगी! बिल्कुल निर्मल बन जाना चाहिए और 'ज्ञानीपुरुष' के पास निर्मल हो सकते हैं और निर्मल होनेवाले हैं।

मूल गुजराती शब्दों के समानार्थी शब्द

हूँफ़ : अवलंबन, सलामती

निर्जरा : आत्म प्रदेश में से कर्मों का अलग होना

गलन : डिस्चार्ज होना, खाली होना

पुद्गल : जो पूर्ण और गलन होता है

गलगलिया : वृत्तियों को गुदगुदी होना, मन में मीठा लगना

निकाल : निपटारा

अटकण : जो बंधनरूप हो जाए, आगे नहीं बढ़ने दे

अरीसा : दर्पण

पूर्णण : चार्ज होना, भरना

उणोदरी : जितनी भूख लगे उससे आधा भोजन खाना

तरंगें : शेखचिल्ली जैसी कल्पनाएँ

उपाधि : बाहर से आनेवाला दुःख

निकाल : निपटारा

अणहक्क : बिना हक का, अवैध

भोगवटा : सुख या दुःख का असर

ऊपरी : बाँस, वरिष्ठ मालिक

तरछोड़ : तिरस्कार सहित दुत्कारना

राजीपा : गुरुजनों की कृपा और प्रसन्नता

चोविहार : सूर्यास्त से पहले भोजन करना

आश्रव : कर्म में उदय की शुरुआत, उदय कर्म में तन्मयाकार होना

आर्याबिल : जैनों में किया जानेवाला व्रत, जब भोजन में एक ही प्रकार का धान खाया जाता है

आड़ाई : अहंकार का टेढ़ापन

क्षपक : कर्मों का क्षय करनेवाला

दादा भगवान फाउन्डेशन के द्वारा प्रकाशित पुस्तकें

१. ज्ञानी पुरुष की पहचान २. सर्व दुःखों से मुक्ति ३. कर्म का सिद्धांत ४. आत्मबोध ५. मैं कौन हूँ ? ६. वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी ७. भुगते उसी की भूल ८. एडजस्ट एवरीव्हेयर ९. टकराव टालिए १०. हुआ सो न्याय ११. चिंता १२. क्रोध १३. प्रतिक्रमण १४. दादा भगवान कौन ? १५. पैसों का व्यवहार १६. अंतःकरण का स्वरूप १७. जगत कर्ता कौन ? १८. त्रिमंत्र १९. भावना से सुधरे जन्मोंजन्म २०. माता-पिता और बच्चों का व्यवहार २१. प्रेम २२. समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य | २३. दान २४. मानव धर्म २५. सेवा-परोपकार २६. मृत्यु समय, पहले और पश्चात २७. निजदोष दर्शन से... निर्दोष २८. पति-पत्नी का दिव्य व्यवहार २९. क्लेश रहित जीवन ३०. गुरु-शिष्य ३१. अहिंसा ३२. सत्य-असत्य के रहस्य ३३. चमत्कार ३४. पाप-पुण्य ३५. वाणी, व्यवहार में... ३६. कर्म का विज्ञान ३७. आप्तवाणी - १ ३८. आप्तवाणी - २ ३९. आप्तवाणी - ३ ४०. आप्तवाणी - ४ ४१. आप्तवाणी - ५ ४२. आप्तवाणी - ६ ४३. आप्तवाणी - ८ ४४. समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पूर्वार्ध-उत्तरार्ध) ---|---

★ दादा भगवान फाउन्डेशन के द्वारा गुजराती भाषा में भी ५५ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। वेबसाइट www.dadabhagwan.org पर से भी आप ये सभी पुस्तकें प्राप्त कर सकते हैं।

★ दादा भगवान फाउन्डेशन के द्वारा हर महीने हिन्दी, गुजराती तथा अंग्रेजी भाषा में “दादावाणी” मैगैज़ीन प्रकाशित होता है।

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उसने जीत लिया जगत्!

अब्रह्मचर्य के विचार आएँ लेकिन अगर ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगता रहे, तो वह बहुत बड़ी बात है। ब्रह्मचर्य की शक्तियाँ माँगते रहने से किसी को दो साल में, किसी को पाँच साल में, लेकिन बैसा उदय आ जाता है। जिसने अब्रह्मचर्य जीत लिया, उसने पूरा जगत् जीत लिया। ब्रह्मचर्यवाले पर तो शासन देवी-देवता बहुत खुश रहते हैं!

-दादाश्री

dadabagwan.org

ISBN 978-81-81128-46-3

9 788158 128663 >

Printed in India

Price ₹ 100