भारतकोश
संग्रह पर लौटें

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य

Samaj Se Prapt Brahmacharya

दादा भगवान द्वारा

स्रोत: दादा भगवान आराधना ट्रस्ट, 'दादा दर्शन', उस्मानपुरा, अहमदाबाद · दादा भगवान आराधना ट्रस्ट · 2005 (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

शादी करने के परिणाम तो देखो

अब, तुझे संसार में क्या-क्या चाहिए? वह बता न।

प्रश्नकर्ता : मुझे तो शादी ही नहीं करनी है।

दादाश्री : यह देह ही निरी उपाधि (बाहर से आनेवाला दुःख) है न! जब पेट में दर्द होता है, तब इस देह पर कैसा होता है? तो दूसरे की दुकान तक व्यापार बढ़ाएँगे, तो क्या होगा? कितने दुःख देती है? और फिर दो-चार बच्चे हों तो। सिर्फ बीवी हो तो ठीक है, वह सीधी रहेगी लेकिन ये तो चार बच्चे! तो क्या होगा? बेहद परेशानी! निरी 'फाइलें' ही बढ़ जाती हैं। इसलिए भगवान ने ऐसा कहा है कि औपचारिक मत करना। अनुपचार मतलब आपने जिसका उपचार तक नहीं किया, वैसी है यह देह। इसका तो कोई चारा ही नहीं है लेकिन वह तो उपचार करता है। शादी करता है, व्यापार करता है, वह मत करना, जबकि और इसे अब उपचार करने की इच्छा नहीं है, इसलिए कह रहा है कि शादी ही नहीं करनी है।

योनी में से जन्म लेता है। योनी में तो इतने भयंकर दुःखों में रहना पड़ता है और बड़ी उम्र के होने पर वापस योनी पर ही जाता है। इस जगत् का व्यवहार ही ऐसा है। किसी ने सही बात सिखाई ही नहीं है न! माँ-बाप भी कहते हैं कि शादी कर लो अब, और माँ-बाप का फर्ज भी तो है न? लेकिन कोई सही सलाह नहीं देता कि इसमें ऐसा दुःख है। वे तो कहेंगे, 'शादी करवा दो अब। ताकि उसके वहाँ बच्चा हो तो मैं दादा बन जाऊँ।' बस, उन्हें इतनी ही उत्कंठा होती है। 'अरे, लेकिन दादा बनने के लिए मुझे क्यों इस कुएँ में धकेल रहे हो?' पिता जी को दादा बनना होता है, इसलिए हमें कुएँ में धकेल देते हैं। शादी में तो कितने ही ऐक्सिडेंट होते हैं, फिर भी कितनी ही शादियाँ होती हैं न? यह तो, शादी के कुएँ में गिरना पड़ता है। कुछ

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

न हो तो अंत में माँ-बाप भी उठाकर उस कुएँ में डाल देते हैं। वे लोग नहीं डालेंगे तो मामा उठाकर डाल देगा। ऐसा है यह फँसाववाला जगत्!

शादी तो सचमुच में बंधन है। भैंस को डिब्बे में भरने जैसी दशा हो जाती है। उस फँसाव में नहीं फँसें, वही उत्तम है, फँस गए हों तो फिर निकल जाएँ तो और भी उत्तम और न हो तो अंत में फल चखने के बाद निकल जाना चाहिए! शादी से पहले, दस दिन पहले लड़की अगर गाड़ी में मिल जाए तो वह धक्का मारता है। उसी को फिर खुद ने पसंद किया। लो, वह वाइफ बन गई! किसकी बेटी, किसका बेटा, कुछ लेना-देना नहीं है! वाइफ मर जाए तो फिर रोता है। क्यों रोता है? वह कहाँ अपनी रिश्तेदार थी? माँ का रिश्ता सचमुच में रिश्ता कहलाता है, भाई का रिश्ता, रिश्ता कहलाता है, पिता जी का रिश्ता, रिश्ता कहलाता है, लेकिन वाइफ का कौन सा रिश्ता है? पराए घर की बेटी, उसे देखने गया था तब तो यों घूमो, यों घूमो कर रहा था, मर्जी में आए तो सैंकशन करता है। घर पर लाता है। उसके बाद यदि मेल न खाए तो फिर कहेगा कि ‘डाइवोर्स लो।’

एक भाई ने मुझसे कहा कि ‘मेरी वाइफ के बिना मुझे ऑफिस में अच्छा नहीं लगता।’ अरे, एक बार हाथ में पीप हो जाए तो तू चाटेगा? नहीं तो क्या देखकर स्त्री पर मोह कर रहा है? पूरा शरीर पीप से ही भरा है। यह पोटली किसकी है, इसका विचार नहीं आता? भले आचार नहीं छूटे लेकिन क्या ऐसा विचार नहीं आना चाहिए? जितना प्रेम मनुष्य को अपनी स्त्री पर होता है, उससे अधिक प्रेम तो सूअर को सूअरनी पर है। यह क्या कोई प्रेम कहलाता होगा? यह तो पाशवता है निरी! प्रेम तो किसे कहते हैं, कि जो बड़े नहीं, घटे नहीं, उसे प्रेम कहते हैं। यह सब तो आसक्ति है। बढ़ गई तो आसक्ति और कम हो गई, वह विकर्षण शक्ति। यदि अच्छे इयरिंग लाकर दिए, हीरे के टोप्स

समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

लाकर दे दिए तो बीबी आसक्ति में ही खुश और यदि नहीं लाकर दिए तो, 'आप ऐसे हो, आप वैसे हो', फिर झगड़े नहीं होते? मतभेद नहीं होते? इसमें कौन सा सुख है जो पड़े हुए हो? क्या माना है तुमने? अनंत जन्मों से भटक रहे हो, तो अभी भी क्या तुम्हें भटकने का शौक है? क्या हुआ है तुम्हें?

वीतराग भगवान के भक्तों को भी चिंता? जब शास्त्र पढ़ता है, उतने समय तक थोड़ी अंदर टंडक रहती है। उसमें भी फिर पढ़ते-पढ़ते याद तो आ ही जाता है कि आज कारखाने में तो बारह सौ का नुकसान हो गया है। वह फिर उसे चुभता (कचोटा) है! पूरे दिन चुभन, चुभन और चुभन। भीतर यह कचोटा है और बाहर मकोड़े, मच्छर जो भी हों, वे काटते हैं। रसोई में बीबी काटती है। मैंने एक जने से पूछा, 'क्यों तंग आ गए हो?' तब उसने कहा कि 'यह पत्नी नागिन की तरह काटती है।' कुछ लोगों को ऐसी भी पत्नियाँ मिलती हैं न? पूरे दिन 'आप ऐसे और आप वैसे' करती रहती है, वह शांति से खाने भी नहीं देती बेचारे को! अब वह औरत कौन सा सुख दे देनेवाली है? वह क्या 'परमानेन्ट' सुख देगी? तो क्यों खुद दबा हुआ बैठा रहता है? विषय-भूखा है इसलिए। वर्ना निर्विषयी को डरानेवाला कौन? सिर्फ विषय के लिए पड़े रहना और खुद की स्वतंत्रता खो देनी? बीबी-बच्चों का जंगल और वह अनंत जन्म बिगाड़ देता है। जो इसमें से कुदरती रूप से छूट गया, उसकी तो बात ही क्या करनी?

पूरी दुनिया की है वह जूठन

बाकी, विषय भोग तो निरी जूठन ही है। पूरी दुनिया की जूठन है। आत्मा का कहीं ऐसा आहार होता होगा? आत्मा को बाहर की किसी भी चीज की जरूरत नहीं है, निरालंब है। किसी भी अवलंबन की उसे जरूरत नहीं है। परमात्मा ही है खुद। निरालंब अनुभव में आ जाए तो परमात्मा ही हो गया! उसे कुछ भी नहीं

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

छू सकता। दीवारों के आरपार निकल जाए, अंदर ऐसा आत्मा है, अनंत सुख का धाम है!

इस पैकिंग का हमें क्या करना है? पैकिंग तो कल को सड़ जाएगा, गिर जाएगा, बिगड़ जाएगा, पैकिंग तो किस चीज से बना है? यह हम नहीं जानते? फिर भी लोग भूल जाते हैं न? भूल नहीं जाते लोग? लेकिन यह पैकिंग आपको भी भ्रम में डाल दे। हमें, ज्ञानीपुरुष को, यों आरपार दिखता है। कपड़े वगैरह हों फिर भी कपड़ों के अंदर, चमड़ी के अंदर जैसा है वैसा यथावत् दिखता है। फिर राग कैसे होगा? खुद सिर्फ आत्मा को ही देखते हैं और बाकी सब तो कचरा है, सड़ा हुआ माल है। उसमें देखने जैसा क्या है? वहीं पर राग होता है। वही आश्चर्य है न! खुद क्या यह नहीं जानता? जानता है सबकुछ, लेकिन उसे ऐसा समझाया नहीं गया है। ज्ञानियों ने पहले से ही माल देखा हुआ है। इसमें नया क्या है? और फिर बीबी के साथ सो जाता है। अरे, इस मांस को ही दबाकर सो जाता है? लेकिन भान नहीं है न। उसी का नाम मोह है न! हमें निरंतर जागृति रहती है, एवरी सेकन्ड जागृति रहती है, इसलिए हम जानते हैं कि निरा मांस ही है यह सब।

अब ऐसी बात कोई करता नहीं है न? क्योंकि लोगों को विषय पसंद है। इसलिए यह बात करता ही नहीं है न कोई। जो निर्विषयी है, वही यह बात कर सकते हैं, वना ऐसा खुल्लम खुल्ला कौन कहेगा? अंत में तो यह सब छोड़े बिना चारा ही नहीं है। आप हम से कहो कि मुझे ब्रह्मचर्यव्रत लेना है। तो हम 'हाँ' कहते हैं। क्यों? कि भई बहुत अच्छा है, खरा सुखी होने का मार्ग यही है, यदि आपका उदय हो तो। वना शादी कर लो। शादी करके अनुभव लो। एक बार अनुभव हो गया तो दूसरे जन्म में मुक्त हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : कोई-कोई मुक्त हो जाता है, नहीं तो छूटना मुश्किल है।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

दादाश्री : उस अनुभव को याद रखे तो छूट सकता है। हम तो हर क्षण याद रखनेवाले।

प्रश्नकर्ता : ऐसा तो शायद ही कोई याद रखनेवाला होगा। नहीं तो कीचड़ में उतरता ही जाता है।

दादाश्री : हाँ, यह तो कीचड़ ही है। गहरा कीचड़ है। उसमें उतरता ही जाता है। रिसर्च तो, जो निर्विषयी हो, वही कर सकता है। विषयी ईमान रिसर्च कर ही नहीं सकता।

सुख के साधन या अशुचिति का संग्रहस्थान?

जहाँ भ्रांतरस में एक होकर जगत् ढूँबा हुआ है। भ्रांतरस यानी वास्तव में रस नहीं है, फिर भी मान बैठा है! न जाने क्या मान बैठा है! इस सुख का विश्लेषण किया जाए तो निरी उल्टियाँ होंगी!

इस शरीर की राख बन जाती है और उस राख के परमाणुओं से वापस शरीर बनता है। अनंत जन्मों की राख के ये परिणाम हैं। निरी जूठन है! यह तो जूठन की भी जूठन और उसकी भी जूठन! वही की वही राख। वही के वही परमाणु सारे। उसी से फिर बनता रहता है! बर्तन को अगले दिन मांजने से वे साफ दिखते हैं, लेकिन मांजे बगैर अगर उसी में रोज खाते रहें तो क्या वह गंदगी नहीं है?

पुद्गल के जो गुण हैं न, जो स्थूल गुण हैं जो ऐसे हैं कि आँखों से दिखाई दें, कान से सुनाई दें, यों स्पर्श से अनुभव में आएँ, नाक को सुगंध दें, जीभ को स्वाद दें। पुद्गल के गुण और प्राकृतिक गुण दोनों एकत्रित हुए हैं। प्राकृतिक गुण मिश्र चेतन के हैं और पुद्गल के जो गुण हैं, उन सबके एक होने से यह खून-पीप और यह सब खड़ा हो गया और संसार खड़ा हो गया है। इसी से यह पूरा जगत् उलझन में हैं। खुद की अज्ञानता की वजह से उसे इस सारी अशुचिति का भान

विरलेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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नहीं रहता और भान नहीं रहता इसलिए यह संसार खड़ा रहा है।

रात को जलेबी खाता है तो सुबह में जलेबी की क्या दशा होगी? ऐसा भान रहता है क्या लोगों को? क्यों भान नहीं रहता? क्योंकि पुद्गल के गुणों में ही अनुराग है उसे। यह तो पुद्गल है, यह पूर्ण (चार्य होना, भरना) हुआ है और वह जो है, वह गलन (डिस्चार्ज होना, खाली होना) है ऐसा भान ही नहीं है न? जब गलन होता है सुबह-सुबह, तब घिन आती है? अरे, दोनों पुद्गल ही हैं। दोनों पुद्गल के ही गुण हैं, लेकिन उसे अशुचि का भान ही नहीं है, इसलिए जलेबी खाते समय टेस्ट से भोगता है न?!

प्रश्नकर्ता : जब आत्मा और पुद्गल का संयोग होता है तब हर किसी को ऐसा ही होता है न?

दादाश्री : नहीं, लेकिन जब तक उसे भ्रांति है, तभी तक। ‘मैं कौन हूँ’ उसका भान नहीं रहा इसलिए अभानता में ऐसा चलता रहता है। भान होने के बाद खुद अलग हो गया। बाद में उसे विषयसुख फीके लगते हैं। जलेबी खाने के बाद चाय पी है? तो फीकी लगती है न? फिर हम चाय में कितना भी टेस्ट करने जाएँ, लेकिन टेस्ट नहीं आता। उसी तरह यह जगत् भी असरवाला है!

अरे, यों अच्छी खीर खाई हो, उसकी भी उल्टी हो जाए तो कैसी दिखेगी? सुंदर, हाथ में पकड़ सकें, ऐसी दिखेगी? अभी जो अंदर डाला था, वही वापस निकला है, उसे हाथ में क्यों नहीं पकड़ सकते? यानी अंदर अशुचि का संग्रहस्थान है। अंदर डालते ही अशुचि हो जाती है। कटोरी साफ हो, खीर अच्छी हो, लेकिन अंदर डालते ही, वही की वही खीर फिर उल्टी करके दी जाए कि फिर से पी जाओ, तो नहीं पीएगा और कहेगा, ‘जो होना हो, वह हो, लेकिन नहीं पीऊँगा।’ यानी कि ऐसा सब भान रहता नहीं है न!

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

सच्चा आम का भोग, विषय की तुलना में

यह जलेबी नीचे धूल में गिर गई हो। फिर वह खाने के लिए दे तो खाओगे या नहीं? नहीं। क्यों? यों मुँह में तो मीठी लगती है, फिर भी? देखकर ही मना कर देगा न? यों अच्छा आम हो लेकिन खट्टा निकले तो? तब भी कहेगा 'नहीं। नहीं खाना।' मतलब ये लोग इतना सब देखकर खाते हैं। जीभ मना करे तो भी फेंक देता है, सिर्फ आँखें मना करें तो भी मना कर देता है, सिर्फ नाक मना करे तो भी छोड़ देता है। यानी कि इसमें जब पाँचों इन्द्रियाँ खुश हो जाएँ, तभी उस चीज़ को खाता है लेकिन सिर्फ विषय ही ऐसा है कि किसी भी इन्द्रिय को वह अच्छा ही नहीं लगता। फिर भी 'उसे' विषय में मजा आता है, वह भी आश्चर्य है न!

पाँच इन्द्रियों के विषय में सिर्फ जीभ का विषय ही सचमुच का विषय है। बाकी सब तो बनावट है। शुद्ध विषय हो तो सिर्फ यही एक है! फर्स्ट क्लास हाफूस के आम हों, तो कैसा स्वाद आता है? भ्रांति में यदि कोई शुद्ध विषय हो तो वह यही है। शुद्ध आहार मिलता हो और उसका स्वाद, बेस्वाद नहीं हो तो वह विषय स्वीकार करने योग्य है। है तो यह भी कल्पित, लेकिन सबसे ऊँचा कल्पित है। इस के बारे में सोचने से घृणा नहीं होती और विषय में तो सोचते ही घृणा होती है।

विषयों में भोग है ही नहीं, लेकिन मानते हैं कि यह भोग है। भोग में तो पाँचों इन्द्रियाँ खुश रहती है। यह आम, वह भोग कहलाता है। उसकी सुगंध अच्छी होती है, स्पर्श भी अच्छा होता है, स्वाद भी आता है, आँखों को यों अच्छा लगता है। जबकि इस विषय में तो कुछ है ही नहीं। यह तो फूलस पैरडाइस है। विषय में कोई इन्द्रिय खुश नहीं होती। आँखें भी अंधेरा ढूँढ़ती हैं। आम देखने के लिए आखें अंधेरा ढूँढ़ती हैं? नाक कहती है कि (नाक) बंद कर दो? लोग बदबू मारते होंगे क्या? दो दिन

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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नहीं कहाँ तो क्या होता है? आम की तरह महकते हैं? यानी ये विषय तो नाक को जरा भी अच्छे नहीं लगते, आँखों को भी अच्छे नहीं लगते। जीभ की तो बात ही क्या करनी? उल्टी आने जैसा होता है। आम को सड़ जाने के बाद सूँघें तो अच्छा लगता है? सड़े हुए आम को छूना, स्पर्श करना अच्छा लगता है? तो फिर वहाँ भोगने का रहता ही कहाँ है? कोई इन्द्रिय एक्सेप्ट नहीं करती, फिर भी लोग विषय भोगते हैं, वह आश्चर्य है न? यह सब सोचना। आपको साधु बनाने नहीं आया हूँ। ये कितनी सारी गलत मान्यताएँ घुस गई हैं, उन्हें निकालने की जरूरत है। विषय संबंध के बारे में विस्तार से समझ लिया जाए तो विषय रहेगा ही नहीं।

हमारे जैसा तो किसी को भी समझ में नहीं आता और अगर बताएँ भी तो दूसरे दिन भूल जाते हैं। वर्ना विषय, वह सोचे-समझे बगैर की बात है। ये लोग देखा देखी से उसमें पड़े हुए हैं। सिर्फ लोक संज्ञा है वह और ज्ञानी की संज्ञा, यदि कभी ज्ञानी से पूछा जाए तो इसमें कोई पड़ेगा ही नहीं। एक भी इन्द्रिय इसे 'पास' नहीं करती। इसलिए ज्ञानियों ने कहा है कि जहाँ सुख नहीं है, वहाँ कहाँ सुख मान बैठे हो? लेकिन इस विषय में उसे मूर्च्छा बहुत है। इसलिए मूर्च्छा को लेकर उसे भान नहीं रहता।

सभी इन्द्रियों ने निंदा की विषय की

विषय, वह संडास है। नाक-कान में से, मुँह में से, सब जगहों से जो-जो निकलता है, वह सब संडास ही है। डिस्चार्ज, वह भी संडास ही है। जो परिणामिक भाग है, वह संडास है लेकिन तन्मयाकार हुए बिना गलन नहीं हो सकता। संडास होता है वह भी, अंदर जो कॉजेज होते हैं, उनका परिणाम है। खीर-पूड़ी किसे अच्छी नहीं लगती? लेकिन भगवान कहते हैं कि कल सुबह वह संडास बन जाएगा। विषय को संडास क्यों कहा गया है? इसीलिए, क्योंकि वह गलन है।

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

विचारशील इंसान विषय में सुख कैसे मान बैठा है, उसी पर मुझे आश्चर्य होता है? विषय का पृथक्करण करे तो दाद को खुजलाने जैसा है। हमें तो बहुत विचार आते हैं और लगता है कि अरेरे! अनंत जन्मों से यही किया? जितना कुछ हमें पसंद नहीं है, वह सबकुछ विषय में है। निरी दुर्गंध है। आँखों को देखना अच्छा नहीं लगता। नाक को सूंघना अच्छा नहीं लगता। तूने सूंघकर देखा था? सूंघकर देखना था न? तो वैराग तो आ जाता। कान को नहीं रुचता। सिर्फ चमड़ी को रुचता है। लोग तो पैकिंग को देखते हैं, माल को नहीं देखते। जो चीज़ पसंद नहीं है, पैकिंग में तो वही चीज़ें भरी हुई है। निरी दुर्गंध का बोरा है! लेकिन मोह के कारण भान नहीं रहता और इसीलिए तो पूरा जगत् चकरा गया है।

यह बांद्रा स्टेशन की जो खाड़ी आती है, उसकी दुर्गंध पसंद है? उससे भी बुरी दुर्गंध इस पैकिंग में हैं। आँखों को पसंद नहीं आएँ, ऐसे चित्र-विचित्र पार्ट्स अंदर है। इस बोरे में तो बेहद विचित्र गंदगी है। यह अपने अंदर जो हृदय है, उसी लौंदे को निकालकर हाथ में दे दे तो? और कहे कि अपने साथ हाथ में रखकर सो जा, तो? नींद ही नहीं आएगी न? यह तो समुद्र के विचित्र जीव जैसा दिखता है। जो पसंद नहीं है, वह सभी कुछ इस देह में है। ये आखें यों बहुत सुंदर दिखती हों, लेकिन मोतियाबिंद हो जाए और उन सफेद आँखों को देखा हो तो? अच्छा नहीं लगेगा। ओहोहो सबसे ज्यादा दुःख इसी में हैं। यह शराब जो नशा चढ़ाती है, उस शराब की दुर्गंध इंसान को अच्छी नहीं लगती और यह विषय तो सर्व दुर्गंध का कारण है। सभी नापसंद चीज़ें वहाँ पर है। अब क्या होगा यह आश्चर्य? इसमें से छूट गए तो फिर राजा। जिसे भूख ही नहीं लगी हो उसे क्या? जो भूखा होगा वही होटल में जाएगा न? जहाँ-तहाँ झॉकता रहेगा, लेकिन जिसने खाना खाया है, खाकर आराम से टहल रहा है, रस-रोटी खाकर टहल रहा है, वह क्यों होटल में जाएगा? गंदगीवाली

विरलेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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होटलें! विषय के बारे में गहराई से सोचने पर यही लगता है कि यह गटर तो खोलने जैसा है ही नहीं। कितना बंधन! यह जगत् इसीलिए खड़ा है न!

बुद्धि से सोचा है विषय के बारे में कभी?

विषय तो ऐसी चीज है जिसे मूर्ख भी न चाहे। बुद्धि का संपूर्ण प्रकाश हो चुका हो, बुद्धि का विकास हो चुका हो, वह भी विषय से डरता है बेचारा। क्योंकि विषय, वह तो बिल्कुल मूर्खतापूर्ण चीज है। इस काल में, यह तो जलन की वजह से विषय के कीचड़ में गिरता है। नहीं तो कोई कीचड़ में गिरेगा ही नहीं न! बहुत जलन होने लगे, तब ईंसान क्या करे? इसलिए उल्टा उपाय करता है। विषय के बारे में यदि सोचा जाए तो विचारक ईंसान को वह अच्छा ही नहीं लगेगा। यानी कि बुद्धि से भी विषय छूट सकता है। उसमें फिर ज्ञान का और इसका क्या लेना-देना? विषय के बारे में यदि सोचा होता न, तो उसे विषय बिल्कुल अच्छा ही नहीं लगता। निर्मल बुद्धिवाले को विषय का पृथ्यकरण करने को कहें तो, 'विषय थूकने जैसी चीज भी नहीं है।' ऐसे कहेगा। अतः जिसकी बुद्धि निर्मल हो, उसे तो विषय अच्छा ही नहीं लगेगा। वह छूएगा ही नहीं न! लेकिन जिसकी बुद्धि में मल जम गया हो, उसे तो सबकुछ उल्टा ही दिखेगा।

प्रश्नकर्ता : इस मनुष्य जाति में ब्रह्मचर्य रह ही नहीं सकता, इसका क्या कारण है? मोह है? राग है?

दादाश्री : बुद्धिपूर्वक का सुख नहीं है यह। बिना सोचे-समझे माना गया सुख है। लोगों ने जो माना, वही हमने मान लिया। वह सिर्फ मान्यता का ही सुख है और जलेबी सुखदायी है, वह बुद्धिपूर्वक का सुख है।

विषय का खेल तो बुद्धिपूर्वक नहीं है, यह तो सिर्फ मन की एंठन ही है। कोई भी बुद्धिमान ईंसान यदि बुद्धि से विषय

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

के बारे में समझने जाए तो बुद्धि विषय को लेट गो नहीं करेगी। ये बुद्धिमान लोग लेट गो करते हैं, इसका क्या कारण है? लोकसंज्ञा के अनुसार चलते हैं, इसलिए उस तरफ का आवरण नहीं टूटा।

एक जन ने कहा कि बुद्धिपूर्वक में क्या हर्ज है? तब मैंने कहा, बुद्धिपूर्वक की चीजें उजाले में करनी होती है। सीक्रेसी(गुप्त) नहीं होती। हजार लोगों की मौजूदगी में बैठकर जलेबी खा सकते हैं? जलेबी में हर्ज नहीं है न? उसे शर्म नहीं आती?

प्रश्नकर्ता : नहीं। शर्म नहीं आती, रौब से खाई जा सकती है!

दादाश्री : यानी विषय के बारे में यदि कोई सोचे न, यदि सोचना आए, तो वह विषय की ओर कभी जाएगा ही नहीं। लेकिन सोचना भी नहीं आता न? विषय, वह अजागृति है। विषय पुसाए ही कैसे? जो चीजें सोचने पर अच्छी नहीं लेंगे, उसी चीज का संबंध कैसे पुसाए?

निरि गंदगी दिखे विषय में

अब कितने ही लोग चारित्र (दीक्षा) लेने लगे हैं। क्योंकि विषय में इतनी गंदगी है कि जिस पर अगर निबंध लिखना हो तो निबंध लिखने में भी घिन आ जाए। यह तो ठीक है, एक तरह की हैबिट हो गई है। मूलतः अज्ञानता और मूर्च्छा की वजह से गंदगी में हाथ डाला। अब भान में आने के बाद क्या घिन नहीं आएगी? इस बिल्कुल ही गंदगीवाले सुख को छोड़ देना है। इसे तो गंदगी देखकर ही छोड़ देना है। यदि इस विषय का सुख छोड़ दे तो पूरी दुनिया का मालिक बन जाएगा। वास्तव में तो वह सुख है ही नहीं। इस जलेबी में सुख है, श्रीखंड में सुख है, ऐसा कह सकते हैं, उसके लिए मना नहीं कर सकते लेकिन इस विषय में तो सुख है ही नहीं।

मुझे तो इस विषय में इतनी गंदगी दिखती है कि मुझे यों

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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ही सहज ही उस ओर का विचार तक नहीं आता। मुझे विषय का कभी भी विचार ही नहीं आता। मैंने इतना कुछ देख लिया है, इतना कुछ देखा है कि मुझे इंसान आरपार दिखाई दे, ऐसा देखा है। विषय का यदि पृथक्करण किया जाए, ज्ञान से नहीं लेकिन बुद्धि से, तो भी इंसान पागल हो जाए।

यह सब तो नासमझी से खड़ा है। प्याज की गंध किसे आती है? जो प्याज खाता है, उसे गंध नहीं आती। जो प्याज नहीं खाता है, उसे तुरंत ही गंध आती है। विषयों में पड़ा है इसलिए विषयों में रही गंदगी को नहीं समझ पाता। इसलिए विषय नहीं छूट पाता और राग करता रहता है। वह भी अभानता का राग है। सिर्फ आत्मा ही मांसरूपी नहीं है। बाकी सब निरा मांस ही है न? !

जिस तरह आहारी आहार करता है, उसी तरह विषयी विषय करता है लेकिन बात समझ में आनी चाहिए न? और वह लक्ष्य में रहना चाहिए न? आहार तो हर रोज अच्छा खाता है, लेकिन चार दिन का भूखा हो तो बासी गंदी रोटी भी खा जाता है। यह आहार तो अच्छा होता है, लेकिन यह विषय तो उससे भी ज्यादा गंदगीवाला है। भूख की जलन की वजह से गंदी रोटी खाता है। उसी तरह जलन की वजह से वह विषय भोगता है। लेकिन गंदी रोटी खाते समय कहता है, 'चलेगा'। लेकिन क्या फिर से वैसा खाने की इच्छा होती है? नहीं। दोबारा वैसा खाने की इच्छा तो किसी को भी नहीं होती लेकिन विषय में ऐसा नहीं रहता न? विषय में भी ऐसा ही रहना चाहिए।

कई लोग मांसाहार करते हैं, वे राजीखुशी से करते हैं न? और आपको मांसाहार करने को कहा हो तो? धिन आपणी न? इसका क्या कारण है? क्योंकि मांसाहार करनेवाले का डेवेलपमेन्ट अलग है और आपका डेवेलपमेन्ट अलग है। जैसे-जैसे डेवेलपमेन्ट बढ़ता जाता है, वैसे वैसे संसार की चीजों पर धिन आती जाती

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

है। इस विषय पर चिन्त नहीं आती न? लेकिन वह तो अन्य सभी गंदी चीजों से भी ज्यादा बुरा है। फिर भी लोगों को इसका पता नहीं चलता। डेवेलपमेन्ट की कितनी कमी है। पकौड़ों में पसीना गिर रहा है, ऐसा देखते हैं फिर भी खाते हैं, तो यह डेवेलपमेन्ट कितना कच्चा है? क्योंकि इस गंदगी को समझा ही नहीं। यह शरीर यों सुंदर दिखता है लेकिन यदि बनियान को निकालकर मुँह में डालो तब पता चलेगा कि वह कैसा है! वह कैसा लगता है? खारा लगता है न? बदबूदार! जिसके पास खड़े रहने पर भी बदबू आती है, वहाँ उसके प्रति विषय कैसे खड़ा हो सकता है? यह कितनी बड़ी भ्रांति है!!!

खरा सुख किस में?

इंसान को रोंग बिलीफ है कि विषय में सुख है। अब अगर विषय से भी ऊँचा सुख मिल जाए तो विषय में सुख नहीं लगेगा! विषय में सुख नहीं है लेकिन देहधारी को व्यवहार में चारा ही नहीं। बाकी जान-बूझकर गटर का ढक्कन कौन खोलेगा? विषय में सुख होता तो चक्रवर्ती इतनी सारी रानियाँ होने के बावजूद सुख की खोज में नहीं निकलते! इस ज्ञान से ऐसा ऊँचा सुख मिलता है। फिर भी इस ज्ञान के बाद तुरंत विषय चले नहीं जाते, लेकिन धीरे धीरे चले जाते हैं। फिर भी खुद को सोचना तो चाहिए कि यह विषय कितना गंदगीवाला है!

पुरुष को ऐसा दिखे कि स्त्री है, तो यदि पुरुष में रोग होगा तभी उसे ऐसा दिखेगा कि 'स्त्री है'। पुरुष में रोग नहीं होगा तो स्त्री नहीं दिखेगी।

ज्ञानियों की दृष्टि आरपार होती है। जैसा है वैसा दिखता है। वैसा दिखे तो फिर विषय रहेगा? उसे कहते हैं, ज्ञान। ज्ञान मतलब आरपार, जैसा है वैसा दिखना। यह हाफूस का आम हो तो उस विषय के लिए हम मना नहीं करते। उसे यदि काटे तो खून

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नहीं दिखेगा, तो उसे आराम से खा। इसे तो काटने से खून निकलता है, लेकिन उसकी जागृति नहीं रहती न? इसलिए मार खाता है। इसलिए यह संसार खड़ा रहा है। इस ज्ञान से जागृति धीरे धीरे बढ़ती जाती है, विषय खत्म होता जाता है। मुझे बंद करने के लिए कहना नहीं पड़ता। अपने आप ही आपका बंद होता जाता है।

दूषमकाल में हमेशा इंसान का मन कैसा होता है कि, 'कल से शक्कर नहीं मिलेगी' ऐसा कहा कि सभी भाग-दौड़ करके शक्कर ले आएँगे। यानी मन ऐसे हैं कि टेढ़े चलें। इसीलिए हमने सभी तरह की छूट दी है। दूषमकाल में मन पर बंधन लगाएँ कि 'ऐसा करो' तो मन उल्टा चले बिना नहीं रहेगा। इस दूषमकाल का स्वभाव है कि यदि रोका जाए तो बल्कि पूरे जोश के साथ उसी में पड़ेगा। इसलिए इस काल में हमारे निमित्त से अक्रम प्रकट हुआ है, जहाँ किसी भी तरह की रोकटोक नहीं है। इसलिए फिर मन जवान होता ही नहीं, मन बूढ़ा हो जाता है।' बूढ़ा हुआ कि निर्बल हो जाता है, फिर खत्म हो जाता है। जवान तो कब होता है कि जब उसे रोकें, तब। तृप्त इंसान विषय की गंदगी में हाथ ही नहीं डालेगा। यह तो भीतर तृप्ति नहीं है, इसलिए इस गंदगी में फँस गए हैं। वीतरागों का विज्ञान, वही तृप्ति लाता है।

कितने ही जन्मों का गिनें तो पुरुषों ने इतनी-इतनी स्त्रियों से शादी की और स्त्रियों ने पुरुषों से शादी की, फिर भी अभी तक उन्हें विषय का मोह नहीं टूटता। तब फिर इसका अंत कब आएगा? इससे अच्छा तो हो जाओ अकेले, ताकि झंझट ही खत्म हो जाए न? !

चल रहे हैं कहाँ? दिशा कौन सी?

यह इन्जिन होता है, तो कोई इंसान इन्जिन में तेल डालता रहे, उस इन्जिन को चलाता रहे, ऐसा एकाध साल तक करता रहे तो आसपास के लोग क्या कहेंगे उसे? 'अरे, इन्जिन को कोई पट्टा जोड़कर काम करवा ले न।' उसी तरह लोग जीवन जीने

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

के लिए अच्छा खाना खाते हैं, लेकिन फिर पट्टा ही नहीं जोड़ते! यानी कि इस मशीन से दूसरा काम करवा लेना चाहिए या नहीं करवाना चाहिए? क्या आपने करवाने का तय किया है? कुछ सदगति हो, मोक्ष हो, उसके लिए पट्टा जोड़ना है, जीवन जीकर काम निकाल (निपटारा) लेना है।

हम अगर लोगों से पूछें कि आप क्यों खाते हो? तो कहेंगे कि जीवन जीने के लिए और पूछेंगे कि जीवन क्यों जी रहे हो? तो कहेंगे, मुझे पता नहीं! अरे, यह कैसा? जीवन किसलिए जीना है? वह भी पता नहीं और बच्चों के कारखाने निकाले हैं! यह जीवन क्या बच्चों के कारखाने के लिए होगा? बच्चों के कारखाने, वह तो स्वभाविक है, लेकिन इससे क्या फायदा हुआ? शादी हुई तो बच्चे तो होते ही रहेंगे न? कुत्तों को भी बच्चे होते रहते हैं। वह तो अनपढ़ है, फिर भी बच्चे होते हैं। ये कुत्ते क्या पढ़े लिखे हैं? तो क्या उन्हें बच्चे नहीं होते होंगे? उन्होंने भी शादी की होती है। उनकी भी वाइफ होती है न? अतः कुछ समझना तो पड़ेगा न? तूने इंजिनियरिंग पास की है, इसलिए अब तेरे पास क्या हुआ? मेन्टेनन्स की तेरी व्यवस्था हो गई। अब तेरा इंजन चलता रहेगा। पेट्रोल और ऑइल के लिए सारी व्यवस्था हो गई। अब तुझे इस इंजन से क्या काम करवा लेना है? अपना कुछ हेतु तो होना चाहिए न? यह नौकरी-व्यापार करते हैं, पैसा कमाते हैं, फिर भी यह पैसा तो दिन-रात चिंता ही करवाता है और बुरे विचार ही आते रहते हैं। किसका भोग लूँ, किसका ले लूँ, सब अणहक्क (बिना हक्क का, अवैध) का भोगता रहता है और फिर नर्क में जाना पड़ता है। वहाँ भयंकर दुःख भुगतने पड़ते हैं। ये सुख तो उधार पर लिए हुए सुख कहलाते हैं और उधार के सुख लें, तो वे कितने दिन चलेंगे? नर्क गति में सूद के साथ लौटाने पड़ेंगे। उससे अच्छा उधार के सुख भी नहीं चाहिए और हमें वह दुःख भी नहीं चाहिए। बाकी तो सब खाओ आराम से। जलेबी खाओ, चाय पीओ!

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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समझो ब्रह्मचर्य की कमाई

प्रश्नकर्ता : ब्रह्मचर्य से क्या फायदे होते हैं?

दादाश्री : इस अब्रह्मचर्य से क्या फायदा हुआ आपको, यह बताओ पहले। बेटा-बेटी हुए। वह क्या कोई कम फायदा है? निरा व्यापार ही है न, फायदा ही हुआ न! हिन्दुस्तान में कई लोग रोते हैं। 'क्यों, क्या हुआ भाई? आपको क्या तकलीफ आ गई?' मैं जैन बनिया, मेरी बेटी भागकर सुथार के यहाँ चली गई और उससे शादी कर ली। तो देखो, स्वाद आया न! कैसा मीठा स्वाद आया?। फिर घर में सभी के मन में ऐसा होता है कि इससे तो यह लड़की नहीं होती तो अच्छा था!

प्रश्नकर्ता : लेकिन किस फायदे के लिए ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए?

दादाश्री : यदि यहाँ पर हमें कुछ लगा हो और खून निकल रहा हो तो फिर बंद क्यों करते हैं? क्या फायदा?

प्रश्नकर्ता : ज्यादा खून न बह जाए।

दादाश्री : खून बह जाए तो क्या होगा?

प्रश्नकर्ता : शरीर में बहुत वीकनेस आ जाएगी।

दादाश्री : तो यह अधिक अब्रह्मचर्य से ही वीकनेस आ जाती है। ये सभी रोग अब्रह्मचर्य की वजह से ही है। क्योंकि जो कुछ खाना खाते हो, पीते हो, सांस लेते हो, इन सभी का परिणाम होते, होते, होते उसका... जिस तरह इस दूध से दही बनाते हैं तो दही, वह अंतिम परिणाम नहीं है। दही से फिर, वह होते होते फिर मक्खन बनता है, मक्खन से घी बनता है। घी वह अंतिम परिणाम है। उसी तरह इसमें ब्रह्मचर्य पुद्गलसार है पूरा!

यह खून बह जाए तो हर्ज नहीं, लेकिन पुद्गलसार निकल जाए तो मुश्किल है, बहुत हानिकारक। अभी तक पूर्ण किया,

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

उसका सार क्या है? तब कहते हैं, उसे नहीं संभालोगे तो मनुष्यपन चला जाएगा। सार का सार है वह। तत्त्व का तत्त्वार्क है, अर्क कम इस्तेमाल होगा तो अच्छा है या ज्यादा इस्तेमाल होगा तो?

प्रश्नकर्ता : कम इस्तेमाल होगा तो अच्छा है।

किंफायत करो वीर्य और लक्ष्मी की

दादाश्री : इसलिए इस जगत् में दो चीजों का अपव्यय नहीं करना चाहिए। एक तो लक्ष्मी और दूसरा वीर्य। जगत् की लक्ष्मी गटर में ही जा रही है। अतः लक्ष्मी खुद के लिए इस्तेमाल नहीं होनी चाहिए। बेकार में दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और हो सके तब तक ब्रह्मचर्य पालन करना चाहिए। जो आहार खाते हैं, उसका अर्क बनकर अंत में वह अब्रह्मचर्य से खत्म हो जाता है। इस शरीर में कुछ नसें ऐसी होती है जो वीर्य संभालती हैं और वह वीर्य इस शरीर को संभालता है। इसलिए हो सके तब तक ब्रह्मचर्य संभालना चाहिए।

ब्रह्मचर्य का रिवाज तो सिर्फ मनुष्य जाति में ही हैं न! मजबूरन उपदेश देकर ब्रह्मचारी बनाते हैं। फिर भी वह फलदायी है, इसलिए इसे चलने दिया। वास्तव में तो ब्रह्मचर्य पालन समझकर करना चाहिए। ब्रह्मचर्य के फल स्वरूप यदि मोक्ष नहीं मिल रहा हो तो वह ब्रह्मचर्य नसबंदी के बराबर ही है। फिर भी उससे शरीर अच्छा रहता है, मजबूत रहता है, रूपवान बनते हैं, ज्यादा जीते हैं! बैल भी हृष्टपुष्ट रहता है न? बैल में भी ताकत बहुत रहती है, तभी तो वह खेत जोतने के काम आता है न? हम किसी की निंदा नहीं करते लेकिन बात का सार समझ लेना है! हजार का विदेशी नोट हो तो यहाँ इन्डिया में उसकी एक्सचेन्ज कीमत डेढ़ सौ रुपये ही होती है। इसलिए हजार के बदले हजार रुपया गिनकर नहीं दे सकते। अतः हमें ऐसी जाँच कर लेनी चाहिए कि इस चीज की एक्सचेन्ज कीमत क्या है? यह ब्रह्मचर्य कैसा है? और खरा ब्रह्मचर्य कैसा होता है? जिस ब्रह्मचर्य से मोक्ष हो, वह ब्रह्मचर्य काम का!

विरलेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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अक्रम विज्ञान प्राप्ति करवाए मोक्ष की

फिर भी यह विज्ञान किसी को भी, विवाहितों को भी मोक्ष में ले जाएगा लेकिन ज्ञानी की आज्ञानुसार चलना चाहिए। अगर कोई तेज दिमागवाला हो और वह कहे, 'साहब, मैं दूसरी शादी करना चाहता हूँ।' तेरा जोर होना चाहिए। पहले क्या शादियाँ नहीं करते थे? भरत राजा की तरह सौ रानियाँ थीं, फिर भी मोक्ष में गए! यदि रानियाँ बाधक होतीं तो मोक्ष में जा सकते थे क्या? तो बाधक क्या है? अज्ञान बाधक है। इतने सारे लोग हैं, उन्हें कहा होता कि स्त्री को छोड़ दो, तो वे सब कब स्त्रियों को छोड़ते? और कब उनका हल आता? इसलिए कहा, स्त्रियाँ भले रही और दूसरी शादी करनी हो तो मुझसे पूछकर शादी करना, पूछे बगैर मत करना। देखो छूट दी है न सारी?

कर्म के अधीन स्त्री-पुरुष बने हैं। एक पेड़ पर क्या सभी पंछी तय करके बैठते हैं? नहीं! उसी तरह ये सभी एक परिवार में जन्म लेते हैं। किसी के तय किए बिना ही कर्म के उदयानुसार ही घर के लोग इकट्ठे होते हैं और फिर बिखर भी जाते हैं। उसमें लोगों ने एडजेस्टमेंट लेकर, व्यवस्थित किया। यानी यह लड़का है तो उस पर पुत्रभाव रहता है। दूसरा, बहन के भाव रहते हैं, स्त्री के भाव रहते हैं। अभी लोगों में वे भाव विकृत हो गए हैं। बाकी, पहले किसी पर बहन का भाव आ जाए तो दूसरा भाव होता ही नहीं था। बहन कहा यानी सिर्फ बहन ही। माँ यानी माँ। दूसरा विचार ही नहीं आता था लेकिन अभी तो सभी जगह बिगड़ ही गया है।

इतना आवश्यक है, ब्रह्मचर्य के कैन्डिडेट के लिए

यह तो 'जैसा है वैसा' नहीं दिखने से मूर्च्छा रहती है। जब तक स्त्री को 'जैसा है वैसा' आरपार नहीं देख सके, तब तक विज्ञन नहीं खुलता। जब मन विषय में खुला होगा (जब विषय

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समझ से प्राप्त ब्रह्मचर्य (पू)

का स्वरूप पूरी तरह से समझ में आ जाएगा) तब विज्ञान खुलेगा या फिर साल भर ब्रह्मचर्य पालन करे और विषय का विचार तक भी नहीं आए, तब विज्ञान खुलेगा। फर्स्ट विज्ञान में नेकेड दिखेगा, सेकन्ड विज्ञान में चमड़ी उतार दी हो ऐसा दिखेगा और अंत में आरपार दिखेगा तब जाकर विज्ञान खिलेगा।

अन्य कहीं दृष्टि बिगड़े, तब तो वह अधोगति की बहुत बड़ी निशानी कहलाती है। शादी हो गई है या नहीं?

प्रश्नकर्ता : नहीं हुई।

दादाश्री : तो शादी कर लो न?

प्रश्नकर्ता : शादी करने की इच्छा ही नहीं होती मुझे।

दादाश्री : ऐसा? तो शादी किए बिना चलेगा?

प्रश्नकर्ता : हाँ, मेरी तो ब्रह्मचर्य की ही भावना है। उसके लिए कुछ शक्ति दीजिए, समझ दीजिए।

दादाश्री : उसके लिए भावना करनी पड़ेगी। तू रोज बोलना कि, 'हे दादा भगवान! मुझे ब्रह्मचर्य पालन करने की शक्ति दीजिए।' और विषय का विचार आते ही निकाल देना। नहीं तो उसका बीज डल जाएगा। वह बीज यदि दो दिन तक रहे, तब तो मार ही डालेगा। फिर से उगेगा। इसलिए विचार आते ही उखाड़कर फेंक देना और किसी भी स्त्री पर दृष्टि नहीं गड़ाना। दृष्टि आकृष्ट हो जाए तो हटा देना और दादा को याद करके माफी माँग लेना। यह विषय आराधन करने जैसा है ही नहीं, ऐसा भाव निरंतर रहे तो फिर खेत साफ हो जाएगा। और अभी भी हमारी निश्रा में रहे तो उसका सबकुछ पूरा हो जाएगा।

प्रश्नकर्ता : हाँ, ठीक है।

दादाश्री : उसके कितने ही जन्म कम हो जाएँगे, कितने ही जन्मों के खड़े किए गए लफड़े भी खत्म हो जाएँगे।

विश्लेषण, विषय के स्वरूप का (खं-1-1)

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हरहाया विचार, वह तो पाशवता कहलाती है। जहाँ देखे वहाँ विचार आता है, वह हरहाया पशु जैसा कहलाता है। उससे तो एक कीले से बाँध देना अच्छा है। स्त्री, वह पुरुष का संडास है और पुरुष, वह स्त्री का संडास है। तो जब संडास जाते हो तब क्या शौचालय में बैठे रहने का मन होता है? उसी तरह यह भी संडास ही है। उसमें क्या मोह रखना?! विषय विषय को भोगता है, वह तो परमाणु का हिसाब है।

जिसे ब्रह्मचर्य पालन करना ही है, उसे तो संयम की खूब परीक्षा करके देख लेना चाहिए। कसौटी पर कस कर देख लेना चाहिए और यदि ऐसा लगे कि फिसल पड़ेगा तो शादी कर लेना अच्छा है। फिर भी वह कंट्रोलपूर्वक होना चाहिए। शादी करनेवाली से कह देना पड़ेगा कि मेरा ऐसा कंट्रोलपूर्वक का है।

ज्ञान किसे अधिक रहता है, दोनों में से?

प्रश्नकर्ता : जो विवाहित हैं, उन्हें ज्ञान देरी से आता है न? और जो ब्रह्मचर्य पालन करते हैं, उन लोगों को ज्ञान जल्दी आता है न?

दादाश्री : नहीं। ऐसा कुछ नहीं है। विवाहित हो और यदि ब्रह्मचर्यव्रत ले तो आत्मा का सुख कैसा है, वह उसे पूर्णतः समझ में आ जाता है। वनाँ तब तक, सुख विषय में से आ रहा है या आत्मा में से आ रहा है, वह समझ में नहीं आता और ब्रह्मचर्यव्रत हो तो, भीतर उसे आत्मा का अपार सुख बर्तता है, मन अच्छा रहता है, शरीर स्वस्थ रहता है!

प्रश्नकर्ता : और जिसने शादी किए बिना ही ब्रह्मचर्यव्रत लिया हो, उसे कैसा अनुभव होता है?

दादाश्री : इसे पूछकर देखो न! बहुत सुख बर्तता है और इसीलिए बहुत बदलाव आ गया है।