सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 310 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षमतावान हैं. आप स्वर्गलोक को स्पर्श करते हैं तथा यजमानों के कल्याण के लिए प्रकाशित होते हैं. (१) त्वामग्ने अङ्गिरसो गुहा हितमन्वविन्दञ्छिश्रियाणं वनेवने. स जायसे मथ्यमानः सहो महत्त्वामाहुः सहसस्पुत्रमङ्गिरः.. (२) हे अग्नि! अंगिरस ऋषि ने आप को खोजा. उस से पहले आप छिपे हुए थे. आप वृक्ष और वनस्पति में छिप कर (गुप्त रूप में) रहते हैं. आप को इसीलिए अंगिर (क्षमतावान) कहा जाता है. आप को सामर्थ्य का पुत्र माना जाता है. आप को अरणि मंथन से प्रकट किया जाता है. (२) यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितमग्निं नरसिषधस्थे समिन्धते. इन्द्रेण देवैः सरथं ꣳ स बर्हिषि सीदन्नि होता यजथाय सुक्रतुः.. (३) हे अग्नि! आप देवताओं के साथ रथ पर विराजते हैं. आप के रथ पर यज्ञ की पताका फहराती है. यजमान घर, मन और यज्ञ इन तीन स्थानों पर (विशेष रूप से) आप को प्रकट करते हैं. आप श्रेष्ठ कामों में लगे रहते हैं. यज्ञ करने वाले यजमान के लिए आप यज्ञ स्थान में प्रतिष्ठित होते हैं. (३) अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऋतावृधा. ममेदिह श्रुत ꣳ हवम्.. (४) हे मित्र! हे वरुण! आप यज्ञ की बढ़ोत्तरी करते हैं. विधिवत परिष्कृत किया सोमरस आप दोनों देवों के सेवन के लिए प्रस्तुत है. आप दोनों हमारे इस निवेदन को सुनने की कृपा कीजिए. (४) राजानावनाभिद्रुहा ध्रुवे सदस्युत्तमे. सहस्रस्थूण आशाते.. (५) हे मित्र! हे वरुण! आप कभी भी परस्पर (आपस में) द्रोह नहीं करते. यज्ञ मंडप हजारों खंभों के सहारे बनाया गया है. वह यज्ञ मंडप स्थिर और सशक्त है. आप दोनों उस यज्ञ मंडप में विराजने की कृपा कीजिए. (५) ता सम्राजा घृतासुती आदित्या दानुनस्पती. सचेते अनवह्वरम्.. (६) हे यजमानो! मित्र और वरुण आहुति के रूप में भेंट किए गए घी का ही आहार लेते हैं. दोनों देव सम्राट् हैं, ऐश्वर्य के स्वामी हैं, समान वित्त वाले हैं. वे यजमानों की अनवरत (लगातार) सहायता करते हैं. (६) इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कृतः. जघान नवतीर्नव.. (७) इंद्र वैभववान हैं. सभी देवता उन का आदर करते हैं. उन्होंने दधीचि ऋषि द्वारा दान की गई हड्डियों से बने शस्त्र से निन्यानवे शत्रुओं को मारा. (७) इच्छन्नश्वस्य यच्छिरः पर्वतेष्वपश्रितम्. तद्विदच्छर्यणावति.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*