सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 180, कुल 310 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरते हैं. (८) पवस्व वाजसातये पवित्रे धारया सुतः. इन्द्राय सोम विष्णवे देवेभ्यो मधुमत्तरः.. (९) हे सोम! आप रसीले हैं. आप अपनी मधुर धारा से इंद्र, विष्णु व सभी देवों को तृप्त कीजिए. आप द्रोणकलश में प्रवाहित होने की कृपा कीजिए. (९) त्वा ॐ रिहन्ति धीतयो हरिं पवित्रे अद्रुहः. वत्सं जातं न मातरः पवमान विधर्मणि.. (१०) हे सोम! आप हरी कांति वाले हैं. यजमान की अंगुलियां आपस में द्वेष नहीं रखती हैं. वे आपस में सहयोग कर के आप का रस निचोड़ती हैं. आप को उसी तरह साफ करती हैं, जैसे गाय नवजात (तुरंत उत्पन्न हुए) बछड़े को चाट कर साफ करती है. (१०) त्वं द्यां च महिव्रत पृथिवीं चाति जभ्रिषे. प्रति द्रापिममुञ्चथाः पवमान महित्वना.. (११) हे सोम! आप पवित्र व महान व्रत वाले हैं. आप अंतरिक्षलोक व पृथ्वीलोक को धारण करते हैं. आप अपनी पवित्र महिमा के अनुकूल कवचधारी हैं. (११) इन्दुुर्वाजी पवते गोन्योधा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय. हन्ति रक्षो बाधते पर्यरातिं वरिवस्कृण्वन्वृजनस्य राजा.. (१२) हे सोम! आप पवित्र व शक्तिशाली हैं. आप अपनी पवित्र और शक्तिशाली धारा से झरते हैं. आप पराक्रमी, आनंददायी व शक्ति के राजा हैं. आप यजमानों की रक्षा करते हैं, आप यजमानों को धन प्रदान करते हैं. (१२) अध धारया मध्वा पृचानस्तिरो रोम पवते अद्रिदुग्धः. इन्दुरिन्द्रस्य सख्यं जुषाणो देवो देवस्य मत्सरो मदाय.. (१३) हे सोम! पत्थरों से कूट कर आप का रस निकाला जाता है. आप की धारा तेज से युक्त सुख देने वाली, मधुर और इंद्र की मित्रता चाहने वाली है. वह देवों के लिए आनंददायी, स्फूर्तिदायी व तृप्तिदायी है. (१३) अभि व्रतानि पवते पुनानो देवो देवान्त्स्वेन रसेन पृञ्चन्. इन्दुर्घर्माण्युतुथा वसानो दश क्षिपो अव्यत सानो अव्ये.. (१४) हे सोम! आप संकल्पशील व प्रकाशमान हैं. आप की धाराएं देवों को प्रसन्न करती हैं. इस समय आप को अंगुलियों से निचोड़ा जा रहा है. आप पवित्र हो कर झर रहे हैं. आप द्रोणकलश में प्रतिष्ठित होने की कृपा कीजिए. (१४) ebook converter DEMO Watermarks*