भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 310 में से

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पृष्ठ 187

और श्रेष्ठ अन्न प्रदान करने की कृपा कीजिए. (१७) तीसरा खंड इम ꣳ स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषा. भद्रा हि नः प्रमतिरस्य स ꣳ सद्याग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (१) हे अग्नि! आप स्तुति के योग्य, सर्वज्ञाता व सर्वद्रष्टा हैं. हम अपनी श्रद्धा आप तक पहुंचाने के लिए अपनी प्रार्थनाओं को रथ की तरह प्रयोग में लाते हैं. आप की उपासना से हमारी बुद्धि तीव्र होती है. आप की मित्रता हमें कष्ट से मुक्ति दिलाने में समर्थ है. (१) भरामेध्मं कृणवामा हवी ꣳ षि ते चितयन्तः पर्वणापर्वणा वयम्. जीवातवे प्रतरा ꣳ साधया धियो ऽ ग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (२) हे अग्नि! हम पवित्र पर्व पर आप को समिधाओं से प्रदीप्त करते हैं. हवि प्रदान करते हैं. आप का चिंतन करते हैं. आप हमारी बुद्धि तीव्र करिए. हम आप की कृपा से अपना यज्ञ सफल बनाएं और कष्टों से मुक्त रहें. (२) शकेम त्वा समिध ꣳ साध्द्या धियस्त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्. त्वमादित्याँ आ वह तान्ह्यू ३ शमस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव.. (३) हे अग्नि! हम समिधाओं से आप को प्रज्वलित करते हैं. हम देवताओं को हवि प्रदान करते हैं. आप उस हवि को ग्रहण करने के लिए देवताओं को बुलाने की कृपा कीजिए. हम उन्हें आमंत्रित करने के इच्छुक हैं. आप अपनी मित्रता से हमारे सारे कष्टों को दूर करने की कृपा कीजिए. (३) प्रति वा ꣳ सूर उदिते मित्रं गृणीषे वरुणम्. अर्यमण ꣳ रिशादसम्.. (४) हे मित्र! हे वरुण! हम सूर्योदय के अवसर पर आप दोनों देवों और दूसरे सभी देवताओं की उपासना करते हैं. आप शत्रुनाशक हैं. (४) राया हिरण्यया मतिरियम्‌वृकाय शवसे. इयं विप्रा मेधसातये.. (५) हे मित्र! हे वरुण! ये ब्राह्मण यजमान श्रेष्ठ बुद्धि के लिए आप की उपासना करते हैं. हम आप से स्वर्ण चाहते हैं. हम कल्याण की कामना से आप की उपासना करते हैं. (५) ते स्याम देव वरुण ते मित्र सूरिभिः सह. इष ꣳ स्वश्च धीमहि.. (६) हे मित्र! हे वरुण! हम विद्वानों (ऋत्विजों) के साथ संपत्तिवान हों. आप की कृपा से हम अन्न और स्वर्ण पा कर ऐश्वर्य युक्त हों. (६) भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः. वसु स्पार्हं तदा भर.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*