भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 310 में से

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पृष्ठ 206

हे सोम! आप मद चुआते हैं. आप यज्ञ गृह में स्थापित किए गए हैं. आप सिंधु स्वरूप हैं. आप सिंधु की लहरों की तरह वाणी को लहरा देते हैं. (३) दिवो नाभा विचक्षणो ऽ व्या वारे महीयते. सोमो यः सुक्रतुः कविः.. (४) हे सोम! आप श्रेष्ठ कर्मों वाले, कवि, स्वर्गलोक की नाभि, विलक्षण और महान हैं. आप जल में मिल कर महिमाशाली होते हैं. (४) यः सोमः कलशेष्वा अन्तः पवित्र आहितः. तमिन्दुः परि षस्वजे.. (५) सोमरस पवित्र है. जो सोमरस कलश में रखा हुआ है, उस में चंद्रमा के श्रेष्ठ गुणों का वास है. (५) प्र वाचमिन्दुरिष्यति समुद्रस्याधि विष्टपि. जिन्वन्कोशं मधुश्चुतम्.. (६) सोमरस मधु चुआता है. यह आवाज करता हुआ कलश को समुद्र की तरह लबालब भर देता है. (६) नित्यस्तोत्रो वनस्पतिर्धनामन्तः सबर्दुघाम्. हिन्वानो मानुषा युजा.. (७) हे सोम! आप के लिए प्रतिदिन स्तोत्र गाए जाते हैं. आप मनुष्यों को आपस में जोड़ने की कृपा कीजिए. आप वन के स्वामी हैं. आप हमारी अंतरतम से गाई गई स्तुतियों को स्वीकार करने की कृपा कीजिए. (७) आ पवमान धारया रयिं सहस्रवर्चसम्. अस्मे इन्दो स्वाभुवम्.. (८) हे सोम! आप पवित्र व सहस्र गुणों से संपन्न हैं. आप हमारे लिए धन धारण कीजिए. आप हमें अपने भवन का अधिकारी बनाने की कृपा कीजिए. (८) अभि प्रिया दिवः कविर्विप्रः स धारया सुतः. सोमो हिन्वे परावति.. (९) हे सोम! आप स्वर्गलोक वासी, कवि और ब्राह्मण हैं. आप हमारे प्रिय स्थान (यज्ञ स्थान) की ओर अपनी प्रिय प्रेरणाओं का संचार करते हैं. (९) चौथा खंड उत्ते शुष्मास ईरते सिन्धोरूर्मेरिव स्वनः. वाणस्य चोदया पविम्.. (१) हे सोम! आप की आवाज समुद्र की तरंगों जैसी है. आप समुद्र की तरह ही गति से बहते हैं. आप पवित्र वाणी को प्रेरित करने की कृपा कीजिए. (१) प्रसवे त उदीरते तिस्रो वाचो मखस्युवः. यदव्य एषि सानवि.. (२) हे सोम! आप के प्रसव (उत्पन्न) होने के बाद यजमान के मुख से तीन वाणियां (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के मंत्रों की) उच्चरित होती हैं. तत्पश्चात आप को ऊंचे स्थान