भारतकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 88, कुल 310 में से

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पृष्ठ 88

इन्द्र सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीष उक्थ्यम्. विदे वृधस्य दक्षस्य महा ॐ हि षः.. (१) हे इंद्र! आप के पुत्रों (यजमानों) ने आप के लिए सोमरस परिष्कृत किया है. आप यजमान और उपासक दोनों की बढ़ोतरी व उन्हें पवित्र कीजिए. आप दक्ष व महान हैं. (१) तमु अभि प्र गायत पुरुहूतं पुरुष्टुतम्. इन्द्रं गीर्भिस्तविषमा विवासत.. (२) हे उपासको! आप इंद्र का आह्वान कीजिए. आप उन की प्रशंसा कीजिए. आप उन के गुण गाइए एवं उन का चिंतन कीजिए. (२) तं ते मदं गृणीमसि वृषणं पृक्षु सासहिम्. उ लोककृत्नुमद्रिवो हरिश्रियम्.. (३) हे इंद्र! आप के हाथ में वज्र है. आप बलवान व शत्रुजित् हैं. आप के घोड़े मनुष्यों का हित साधते हैं. सोमपान से आप में ऊर्जा आती है. हम उस ओज की प्रशंसा करते हैं. (३) यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये. यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः.. (४) हे इंद्र! यज्ञ में विष्णु पधारे. आप ने उस के बाद सोमरस पिया. आप आप्त्य त्रित (ऋषि) और मरुद्गणों के साथ सोमरस पी कर प्रसन्न हुए. आप कई अन्य यज्ञों में सोमरस पी कर प्रसन्न हुए (उसी प्रकार) आप हमारे इस यज्ञ में भी सोमरस पी कर प्रसन्न होइए. (४) एदु मधोर्मदिन्तर ॐ सिञ्चाध्वर्यो अन्धसः. एवा हि वीरस्तवते सदावृधः.. (५) हे यजमानो! मधुर सोमरस से प्रसन्न होने वाले इंद्र को सोमरस दीजिए. वे वीर, स्तुति के योग्य हैं. वे सदा बढ़ोतरी पाते हैं. (५) एन्दुमिन्द्राय सिञ्चत पिबति सोम्यं मधु. प्र राधा ॐ सि चोदयते महित्वना.. (६) हे यजमानो! सोमरस इंद्र को अर्पित कीजिए. मीठा रसीला सोमरस पीने के बाद अपनी महिमा से वे यजमानों को भरपूर धन देते हैं. (६) एतो न्विन्द्र ॐ स्तवाम सखायः स्तोम्यं नरम्. कृष्टीर्यो विश्वा अभ्यस्त्येक इत्.. (७) हे सखाओ! जल्दी आइए. हम इंद्र की स्तुति करें. वे सर्वश्रेष्ठ हैं और अकेले ही शत्रुओं को हरा सकते हैं. (७) इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत्. ब्रह्मकृते विपश्चिते पनस्यवे.. (८) हे ब्राह्मणो! आप इंद्र के लिए बृहत्साम के मंत्र उचारिए. वे ब्रह्मज्ञानी, विवेकी, महान एवं उपासना के योग्य हैं. (८) य एक इद्विदयते वसु मर्ताय दाशुषे. ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग.. (९) हे यजमानो! इंद्र ईश्वर, दानशील व धनदाता हैं. वे प्रतिकार नहीं करते हैं. अकेले होने ebook converter DEMO Watermarks*

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