सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 92, कुल 310 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे यजमानो! हम यजमान प्रसन्नता और उत्साह की कामना से इंद्र की कीर्ति की बढ़ोतरी करते हैं. छोटेबड़े हर प्रकार के युद्ध में वे हमारी रक्षा करते हैं. रक्षा के लिए उन का आह्वान करते हैं. वे युद्ध में हमारी रक्षा करें. (३) इन्द्र तुभ्यमिदद्रिवो ऽ नुत्तं वज्रिन्वीर्यम्. यद्ध त्यं मायिनं मृगं तव त्न्माययावधीरर्चन्ननु स्वराज्यम्.. (४) हे इंद्र! आप वज्रधारण करते हैं. आप गिरि (पर्वत) पर निवास करते हैं. आप स्वराज की इच्छा से अर्चना करने वालों की सहायता करते हैं. युद्धों में आप मायावी हिरण की तरह छलीकपटी के नाश के लिए कूटनीति का सहारा लेते हैं. (४) प्रेह्यभीहि धृष्णुहि न ते वज्रो नि य ꣳ सते. इन्द्र नृम्णं ꣳ हि ते शवो हनो वृत्रं जया अपो ऽ र्चन्ननु स्वराज्यम्.. (५) हे इंद्र! आप सब ओर से दुश्मनों पर हमला कीजिए. आप दुश्मनों का नाश कीजिए. आप का वज्र शक्तिशाली व आप की शक्ति अतुलनीय है. आप ने अपने राज्य की इच्छा से वृत्रासुर का वध किया, विजय प्राप्त की व जल प्राप्त किया. (५) यदुदीरत आजयो धृष्णवे धीयते धनम्. युङ्क्ष्वा मदच्युता हरी क ꣳ हनः कं वसो दधो ऽ स्मां इन्द्र वसो दधः.. (६) हे इंद्र! आप मद चुआने वाले अपने घोड़ों को रथ में जोतिए. आप किस का नाश करेंगे यह आप पर निर्भर है. आप किस को धन प्रदान करेंगे यह भी आप पर निर्भर करता है. आप हमें धन प्रदान कीजिए. युद्ध में शत्रुओं को जीतने वाले ही धन प्राप्त करते हैं. (६) अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत. अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी.. (७) हे इंद्र! यजमान आप के दिए हुए अन्न से तृप्त हुए. यजमान सिर हिला कर प्रसन्नता प्रकट करते हैं. तेजस्वी ब्राह्मण नई प्रार्थना पढ़ते हैं. आप यज्ञ में पधारने के लिए घोड़ों को रथ में जोतने की कृपा कीजिए. (७) उपो षु शृणुही गिरो मघवन्मातथा इव. कदा नः सूनृतावतः कर इदर्थयास इद्योजा न्विन्द्र ते हरी.. (८) हे इंद्र! आप धनवान हैं. आप हमारी प्रार्थना को सुनने की कृपा कीजिए. आप हमें कब अच्छी वाणी वाला बनाएंगे? आप हमारी स्तुतियों को अच्छी तरह सुनने के लिए पधारिए. आप पधारने के लिए अपने घोड़ों को रथ में जोतने की कृपा कीजिए. (८) चन्द्रमा अप्स्वा ऽ ३ न्तरा सुपर्णो धावते दिवि. न वो हिरण्यनेमयः पदं विन्दन्ति विद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी.. (९) ebook converter DEMO Watermarks*