भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 6 छट्ठमो संवराधियारो भेदविज्ञान ही संवर का उपाय है - उवओगे उवओगो कोहादिसु णत्थि को वि उवओगो। कोहे कोहो चेव हि उवओगे णत्थि खलु कोहो॥ (6-1-181) अट्ठवियप्पे कम्मे णोकम्मे चावि णत्थि उवओगो। उवओगम्हि य कम्मं णोकम्मं चावि णो अत्थि॥ (6-2-182) एदं तु अविवरीदं णाणं जइया दु होदि जीवस्स। तइया ण किंचि कुव्वदि भावं उवओगसुद्धाप्पा॥ (6-3-183) उपयोग में उपयोग है, क्रोध आदि में कोई भी उपयोग नहीं है। और क्रोध में ही क्रोध है, निश्चय ही उपयोग में क्रोध नहीं है। आठ प्रकार के (ज्ञानावरणादि) कर्मों और (शरीरादि) नोकर्मों में भी उपयोग नहीं है और उपयोग में कर्म ओर नोकर्म भी नहीं है। जिस काल में जीव को ऐसा अविपरीत (सत्यार्थ) ज्ञान हो जाता है, तब उपयोग-स्वरूप शुद्धात्मा उपयोग के अतिरिक्त अन्य किसी भाव को नहीं करता। 88