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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

अध्याय - 6 छट्ठमो संवराधियारो भेदविज्ञान ही संवर का उपाय है - उवओगे उवओगो कोहादिसु णत्थि को वि उवओगो। कोहे कोहो चेव हि उवओगे णत्थि खलु कोहो॥ (6-1-181) अट्ठवियप्पे कम्मे णोकम्मे चावि णत्थि उवओगो। उवओगम्हि य कम्मं णोकम्मं चावि णो अत्थि॥ (6-2-182) एदं तु अविवरीदं णाणं जइया दु होदि जीवस्स। तइया ण किंचि कुव्वदि भावं उवओगसुद्धाप्पा॥ (6-3-183) उपयोग में उपयोग है, क्रोध आदि में कोई भी उपयोग नहीं है। और क्रोध में ही क्रोध है, निश्चय ही उपयोग में क्रोध नहीं है। आठ प्रकार के (ज्ञानावरणादि) कर्मों और (शरीरादि) नोकर्मों में भी उपयोग नहीं है और उपयोग में कर्म ओर नोकर्म भी नहीं है। जिस काल में जीव को ऐसा अविपरीत (सत्यार्थ) ज्ञान हो जाता है, तब उपयोग-स्वरूप शुद्धात्मा उपयोग के अतिरिक्त अन्य किसी भाव को नहीं करता। 88

५. आस्रव अधिकार (कर्म आगमन व निवृत्ति)

अध्याय - 6 discriminative knowledge, free from error, then the true nature of the Self, which is pure consciousness, manifests itself, and the Self then does not entertain any impure psychic dispositions. भावविज्ञान से शुद्धात्मा की प्राप्ति - जह कणयमग्गितवियं पि कणयसहावं ण तं परिच्चयदि। तह कम्मोदयतविदो ण जहदि णाणी दु णाणित्तं॥ (6-4-184) एवं जाणदि णाणी अण्णाणी मुणदि रागमेवादं। अण्णाणतमोच्छण्णं आदसहावं अयाणंतो॥ (6-5-185) जैसे अग्नि में तपाया हुआ सोना अपने सुवर्ण स्वभाव को नहीं छोड़ता, इसी प्रकार (तीव्र परीषह-उपसर्गरूप) कर्मोदय से तप्त होता हुआ ज्ञानी भी अपने ज्ञानीपने के स्वभाव को नहीं छोड़ता। इस प्रकार ज्ञानी जानता है और अज्ञानरूप अन्धकार से आच्छन्न अज्ञानी आत्मस्वभाव को न जानता हुआ राग को ही आत्मा मानता है। Just as gold, on being intensely heated, does not lose its inherent quality, in the same way, the Self with right knowledge does not abandon his nature of true knowledge on being burnt (by way of hardship or torment) as a consequence of the rise of karmas. Thus, the knowledgeable Self realizes the true nature of the Self, while the ignorant, being camouflaged by nescience, gets associated with impure psychic states such as attachment. 89

अध्याय - 6 शुद्धात्मा के अनुभव से संवर होता है - सुद्धं तु वियाणंतो विसुद्धमेवप्पयं लहदि जीवो। जाणंतो दु असुद्धं असुद्धमेवप्पयं लहदि॥ (6-6-186) शुद्ध आत्मा को जानता हुआ जीव शुद्ध आत्मा को ही प्राप्त करता है और अशुद्ध आत्मा को जानता हुआ जीव अशुद्ध आत्मा को ही प्राप्त करता है। The Self who knows the pure nature of the soul, dwells in the pure nature of the soul, but the Self who knows the impure nature of the soul, dwells in the impure nature of the soul. संवर की विधि - अप्पाणमप्पणा रुंधिदूण दोपुण्णपावजोगेसु। दंसणणाणम्हि ठिदो इच्छाविरदो य अण्णम्हि॥ (6-7-187) जो सव्वसंगमुक्को झायदि अप्पाणमप्पणा अप्पा। ण वि कम्मं णोकम्मं चेदा चिंतेदि एयत्तं॥ (6-8-188) अप्पाणं झायंतो दंसणणाणमइओ अणण्णमओ। लहदि अचिरेण अप्पाणमेव सो कम्मपविमुक्कं॥ (6-9-189) आत्मा को अपनी आत्मा के द्वारा पुण्य और पाप इन दोनों शुभाशुभ योगों से रोककर दर्शन और ज्ञान में स्थित हुआ और अन्य देह-रागादि में इच्छा से विरत हुआ तथा 90

अध्याय - 6 समस्त बाह्य-आभ्यन्तर परिग्रह से रहित हुआ जो आत्मा अपनी आत्मा को अपनी आत्मा के द्वारा ध्याता है, (एवं) कर्म और नोकर्म को नहीं ध्याता है, ऐसा गुणविशिष्ट आत्मा एकत्व का चिन्तन (अनुभव) करता है। वह आत्मा अपनी आत्मा का ध्यान करता हुआ दर्शन-ज्ञानमय हुआ और अनन्यमय हुआ थोड़े ही काल में कर्मों से रहित आत्मा को प्राप्त कर लेता है। The Self, by his own enterprise, protecting himself from virtuous as well as wicked activities that cause merit and demerit, and stationing himself in right faith and knowledge, detached from body and desires etc., devoid of external and internal attachments, contemplates on the Self, through his own Self, and does not reflect upon the karmas and the quasi-karmic matter (nokarma); the Self with such distinctive qualities experiences oneness with the Self. Such a Self, contemplating on the Self, becomes of the nature of right faith and knowledge, and being immersed in the Self, attains, in a short span of time, status of the Pure Self that is free from all karmas. संवर का क्रम - तेसिं हेदू भणिदा अज्झवसाणाणि सव्वदरिसीहिं। मिच्छत्तं अण्णाणं अविरदिभावो य जोगो य॥ (6-10-190) हेदुअभावे णियमा जायदि णाणिस्स आसवणिरोहो। आसवभावेण विणा जायदि कम्मस्स दु णिरोहो॥ (6-11-191) 91

अध्याय - 6 कम्मस्साभावेण य णोकम्माणं पि जायदि णिरोहो। णोकम्मणिरोहेण य संसारणिरोहणं होदि॥ (6-12-192) सर्वज्ञदेव ने (रागादि विभाव कर्मरूप) भावास्रवों के कारण मिथ्यात्व, अज्ञान, अविरतिभाव और योग ये चार अध्यवसान कहे हैं। ज्ञानी के हेतुओं के अभाव में नियम से आस्रव का निरोध होता है। आस्रवभाव के बिना कर्म का भी निरोध हो जाता है और कर्म का अभाव होने से नोकर्मों का भी निरोध हो जाता है। नोकर्म का निरोध होने से संसार का निरोध होता है। इदि छट्टमो संवराधियारो समत्तो 92

अध्याय - 7 सत्तमो णिज्जराधिकारो SHEDDING OF KARMAS द्रव्यनिर्जरा का स्वरूप - उवभोगमिंदियेहिं दव्वाणमचेदणाणमिदराणं। जं कुणदि सम्मदिट्ठी तं सव्वं णिज्जरणिमित्तं॥ (7-1-193) सम्यग्दृष्टि जीव इन्द्रियों के द्वारा अचेतन और चेतन द्रव्यों का जो उपभोग करता है, वह सब निर्जरा का निमित्त है। The enjoyment of sense-perceived objects - inanimate or animate - by the right believer leads to the shedding of karmas (nirjarā). भावनिर्जरा का स्वरूप - दव्वे उवभुज्जंते णियमा जायदि सुहं च दुक्खं वा। तं सुहदुक्खमुदिण्णं वेददि अध णिज्जरं जादि॥ (7-2-194) परद्रव्यों का (जीव के द्वारा) उपभोग करने पर नियम से सुख अथवा दुःख होता है। (जीव) उदय में आये हुए उस सुख-दुःख का अनुभव करता है; फिर (वह) निर्जरा को प्राप्त हो जाता है (झड़ जाता है)। 93

अध्याय - 7 The enjoyment (by the Self) of any alien substances inevitably results into pleasure or pain. The Self experiences this rise of pleasure or pain (due to the fruition of karmas) and then these karmas are shed. ज्ञानी को कर्म-बन्ध नहीं होता - जह विसमुवभुज्जंतो वॅज्जो पुरिसो ण मरणमुवयादि। पॉग्गलकम्मस्सुदयं तह भुंजदि णेव बज्झदे णाणी॥ (7-3-195) जिस प्रकार विषवैद्य विष का उपभोग करता हुआ भी मरण को प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष पुद्गल कर्म के उदय को भोगता है, तथापि वह कर्म से नहीं बँधता। Just as the handling of poison by an expert in toxicology does not lead to his death, in the same way, the knowledgeable person enjoys the fruits of rise of karmas, but does not attract bondages. वैराग्य की सामर्थ्य - जह मज्जं पिवमाणो अरदिभावेण ण मज्जदे पुरिसो। दव्वुवभोगे अरदो णाणी वि ण बज्झदे तहेण॥ (7-4-196) जिस प्रकार कोई पुरुष मद्य को पीता हुआ तीव्र अरतिभाव की सामर्थ्य से मतवाला 94

अध्याय - 7 नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी द्रव्यों के उपभोग में विरक्त रहता हुआ (वैराग्य की सामर्थ्य से) कर्मों से नहीं बँधता। ज्ञानी और अज्ञानी में अन्तर - सेवंतो वि ण सेवदि असेवमाणो वि सेवगो को वि। पगरणचेट्ठा कस्स वि ण य पायरणो त्ति सो होदि॥ (7-5-197) कोई सम्यग्दृष्टि (रागादि भाव के अभाव के कारण) विषयों का सेवन करता हुआ भी उनका सेवन नहीं करता, (और अज्ञानी विषयों में रागभाव के कारण) उन्हें सेवन न करता हुआ भी सेवन करने वाला होता है। जैसे - किसी पुरुष की कार्यसम्बन्धी क्रिया होती है, किन्तु वह कार्य करने वाला नहीं होता। विशेष - जैसे कोई मुनीम सेठ की ओर से व्यापार का सब कार्य करता है, किन्तु उस व्यापार तथा उसकी लाभ-हानि का वह स्वामी नहीं होता। इसी प्रकार सम्यग्दृष्टि भोगों का सेवन करता हुआ भी राग न होने के कारण उसका असेवक है और मिथ्यादृष्टि सेवन न करता हुआ भी राग के सद्भाव के कारण उसका सेवक है। 95

अध्याय - 7 even if not involved in sensualities, really indulges in them. This is akin to a person performing certain acts but, in reality, is not responsible for them. Note: Just as an assistant, on behalf of the owner of a business, performs all duties, but is neither the owner of the business, nor shares its profit or loss. In the same way, the right believer, due to the absence of attachment etc., is non-indulgent, and the wrong believer, due to the presence of attachment etc., is indulgent. ―――――― ज्ञानी का स्व-पर विवेक - उदयविवागो विविहो कम्माणं वण्णिदो जिणवरेहिं। ण हु ते मज्झ सहावा जाणगभावो दु अहमेक्को॥ (7-6-198) जिनेन्द्रदेव ने कर्मों के उदय के फल अनेक प्रकार के बताये हैं। वे तो मेरे स्वभाव नहीं हैं। मैं तो एक ज्ञायक भाव हूँ। The Omniscient Lord has enumerated various outcomes of the fruition of karmas. These outcomes are not my nature. I am just one, the knower. ―――――― राग पुद्गल कर्म है - पोग्गलकम्मं रागो तस्स विवागोदओ हवदि एसो। ण हु एस मज्झ भावो जाणगभावो दु अहमेक्को॥ (7-7-199) 96

अध्याय - 7 राग पुद्गलकर्म है। उसके फलस्वरूप उदय से उत्पन्न यह रागरूप भाव है। यह तो मेरा भाव नहीं है। मै तो एक टंकोत्कीर्ण ज्ञायक भाव हूँ। सम्यग्दृष्टि ज्ञानवैराग्य सम्पन्न होता है - एवं सम्मादिट्ठी अप्पाणं मुणदि जाणगसहावं। उदयं कम्मविवागं च मुयदि तच्चं वियाणंतो॥ (7-8-200) पूर्वोक्त प्रकार से सम्यग्दृष्टि अपने-आपको (टंकोत्कीर्ण) ज्ञायक स्वभाव जानता है और आत्मतत्त्व को जानता हुआ कर्मोदय के विपाक से उत्पन्न भावों को छोड़ देता है। रागी जीव सम्यग्दृष्टि नहीं है - परमाणुमेत्तयं पि हु रागादीणं तु विज्जदे जस्स। ण वि सो जाणदि अप्पाणयं तु सव्वागमधरो वि॥ (7-9-201) 97

अध्याय - 7 अप्पाणमयाणंतो अणप्पयं चावि सो अयाणंतो। किह होदि सम्मदिट्ठी जीवाजीवे अयाणंतो॥ (7-10-202) वास्तव में जिस जीव के रागादि (अज्ञान भावों) का परमाणुमात्र (लेशमात्र) भी विद्यमान है, वह जीव सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञाता होने पर भी आत्मा को नहीं जानता और आत्मा को न जानता हुआ वह अनात्मा को भी नहीं जानता। इस प्रकार जीव और अजीव को न जानने वाला किस प्रकार सम्यग्दृष्टि हो सकता है? In reality, the Self who entertains even a very small amount of attachment etc. (wrong dispositions), is not aware of the true nature of the soul, although he may have mastered all scriptures. And since he does not know the soul, he does not know the non-soul too. How can the one who does not know the soul and the non-soul be a right believer? ज्ञान ही आत्मा का पद है - आदम्हि दव्वभावे अपदे मॉत्तूण गिण्ह तह णियदं। थिरमेगमिमं भावं उवलब्भंतं सहावेण॥ (7-11-203) आत्मा में द्रव्य और भावों के मध्य में (अतत्स्वभाव से अनुभव में आने वाले भाव) अपद हैं (क्षणिक होने से आत्मा का स्थान नहीं ले सकते); अतः उन्हें छोड़कर नियत, स्थिर तथा एक स्वभाव से अनुभव करने योग्य इस भाव को (चैतन्यमात्र ज्ञानभाव को) ग्रहण कर। In the midst of material and psychical karmas, the transitory dispositions that arise in the Self cannot take the place of the 98

अध्याय - 7 soul. Therefore, leaving aside all such dispositions, embrace only the knowledge-consciousness that is eternal, unchanging, and indivisible unity. ज्ञान से निर्वाण प्राप्त होता है - आभिणिसुदोहिमणकेवलं च तं होदि ऍक्कमेव पदं। सो एसो परमट्ठो जं लहिदुं णिव्वुदिं जादि॥ (7-12-204) मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान ये पाँचों ज्ञान एक ही पद हैं (एक ज्ञान नाम से जाने जाते हैं)। सो यह (ज्ञान) परमार्थ है (मोक्ष का साक्षात् उपाय है) जिसे प्राप्त करके आत्मा निर्वाण को प्राप्त होता है। Sensory knowledge, scriptural knowledge, clairvoyance, telepathy, and omniscience, all five, are but one - abode of knowledge. This (knowledge) is the ultimate truth, on whose acquisition the Self attains liberation. कर्मकाण्ड से ज्ञान प्राप्त नहीं होता - णाणगुणेहि विहीणा एदं तु पदं बहू वि ण लहंते। तं गिण्ह णियदमेदं जदि इच्छसि कम्मपरिमोक्खं॥ (7-13-205) ज्ञानगुण से रहित अनेक पुरुष (अनेक कर्म करते हुए भी) ज्ञान स्वरूप इस पद को प्राप्त नहीं करते; इसलिए (हे भव्य !) यदि तू कर्मों से मुक्ति चाहता है तो इस नियत पद-ज्ञान को ग्रहण कर। 99

अध्याय - 7 Bereft of the virtue of knowledge, many people, even though put several efforts, are not able to attain this knowledge. As such (O bhavya – potential aspirant to liberation!) if you wish to be free from karmic bondages, embrace this eternal knowledge. ज्ञान से उत्तम सुख मिलता है - एदम्हि रदो णिच्चं संतुट्ठो होहि णिच्चमेदम्हि। एदेण होहि तित्तो होहिदि तुह उत्तमं सॉक्खं॥ (7-14-206) (हे भव्य!) तू इस ज्ञान में सदा प्रीति कर, इसी में तू सदा सन्तुष्ट रह, इससे ही तू तृप्त रह। (ज्ञान-रति, सन्तुष्टि और तृप्ति से) तुझे उत्तम सुख होगा। (O bhavya – potential aspirant to liberation!) Always adore this knowledge, in this only always remain contented, and fulfilled. You will attain supreme bliss (through knowledge-adoration, knowledge-contentment, and knowledge-fulfillment). ज्ञानी अपनी आत्मा को ही स्व मानता है - को णाम भर्णेज्ज बुहो परदव्वं मम इदं हवदि दव्वं। अप्पाणमप्पणो परिगहं तु णियदं वियाणंतो॥ (7-15-207) अपनी आत्मा को ही निश्चित रूप से अपना परिग्रह जानता हुआ कौन ज्ञानी पुरुष कहेगा कि यह पर द्रव्य मेरा द्रव्य है? After realizing that only the Self, and nothing else, belongs to him, which knowledgeable person will consider any alien substance as his own? 100

अध्याय - 7 परद्रव्य मेरा नहीं है - मज्झं परिग्गहो जदि तदो अहमजीवदं तु गच्छेज्ज। णादेव अहं जम्हा तम्हा ण परिग्गहो मज्झं॥ (7-16-208) यदि परिग्रह (परद्रव्य) मेरा हो तब तो (चैतन्य स्वभाव वाला) मैं अजीवता को प्राप्त हो जाऊँ; क्योंकि मैं ज्ञाता ही हूँ, इस कारण परद्रव्यरूप परिग्रह मेरा नहीं है। If the alien substance is mine, then, I (having the attribute of consciousness) will become inanimate; because I am a knowing Self, therefore, no alien substance can belong to me. ज्ञानी का निश्चय - छिज्जदु वा भिज्जदु वा णिज्जदु वा अहव जादु विप्पलयं। जम्हा तम्हा गच्छदु तहावि ण परिग्गहो मज्झं॥ (7-17-209) चाहे छिद जाए, चाहे भिद जाए, चाहे कोई ले जाए अथवा नष्ट हो जाए, चाहे जिस कारण से चला जाए, तथापि परिग्रह मेरा नहीं है। The alien substance may get cut, or split, or stolen, or destroyed; whatever the reason of its riddance, it is not my possession. 101

अध्याय - 7 ज्ञानी के धर्म का परिग्रह नहीं है - अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो णाणी य णॅच्छदे धम्मं। अपरिग्गहो दु धम्मस्स जाणगो तेण सो होदि॥ (7-18-210) जिसके इच्छा नहीं है, वह अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी धर्म को - पुण्य को नहीं चाहता, इसलिए वह धर्म का परिग्रही नहीं है, (किन्तु वह) धर्म का ज्ञायक है। The one who is devoid of desire is said to be free from attachment, and the knower does not desire virtue or merit, therefore, he is not a possessor of virtue; he is just its knower. ज्ञानी के अधर्म का परिग्रह नहीं है - अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो णाणी य णॅच्छदि अधम्मं। अपरिग्गहो अधम्मस्स जाणगो तेण सो होदि॥ (7-19-211) जिसके इच्छा नहीं है, वह अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी अधर्म को - पाप को नहीं चाहता, इसलिए वह अधर्म का परिग्रही नहीं है, किन्तु ज्ञायक है। The one who is devoid of desire is said to be free from attachment, and the knower does not desire vice or demerit, therefore, he is not a possessor of vice; he is just its knower. 102

अध्याय - 7 ज्ञानी के भोजन का परिग्रह नहीं है - अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो असणं च णॅच्छदे णाणी। अपरिग्गहो दु असणस्स जाणगो तेण सो होदि॥ (7-20-212) जिसके इच्छा नहीं है, वह अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी भोजन को नहीं चाहता, इसलिए वह भोजन का परिग्रही नहीं है, (किन्तु वह) ज्ञायक है। The one who is devoid of desire is said to be free from attachment, and the knower does not desire food, therefore, he is not a possessor of food; he is just its knower. ज्ञानी के पान का परिग्रह नहीं है - अपरिग्गहो अणिच्छो भणिदो पाणं च णॅच्छदे णाणी। अपरिग्गहो दु पाणस्स जाणगो तेण सो होदि॥ (7-21-213) जिसके इच्छा नहीं है, वह अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी पान को नहीं चाहता, इसलिए वह पान का परिग्रही नहीं है, (किन्तु वह) ज्ञायक है। The one who is devoid of desire is said to be free from attachment, and the knower does not desire drink (or beverage), therefore, he is not a possessor of drink; he is just its knower. 103

अध्याय - 7 ज्ञानी के परभावों का परिग्रह नहीं है - एमादिए दु विविहे सव्वे भावे य णेच्छदे णाणी। जाणगभावो णियदो णीरालंबो दु सव्वत्थ॥ (7-22-214) इत्यादिक नाना प्रकार के समस्त भावों को ज्ञानी नहीं चाहता। सर्वत्र निरालम्ब वह प्रतिनियत (टंकोत्कीर्ण) ज्ञायक भाव ही है। The knower has no psychic dispositions that desire these and other external objects. Independent all over, he is solely of the nature of the knower. ज्ञानी को त्रिकाल के भोगों की आकांक्षा नहीं है - उप्पण्णोदयभोगो वियोगबुद्धिए तस्स सो णिच्चं। कंखामणागदस्स य उदयस्स ण कुव्वदे णाणी॥ (7-23-215) वह वर्तमान काल के कर्मोदय का भोग ज्ञानी के सदा ही वियोग बुद्धि से होता है और ज्ञानी आगामी काल के उदय की आकांक्षा नहीं करता। (ज्ञानी तो मोक्ष की भी इच्छा नहीं करता, तब वह अन्य पदार्थों की इच्छा क्यों करेगा?) The knower always enjoys the consequences of the rise of existing karmas with detached temperament, and does not long for the enjoyment of karmas that would rise in future. (The knower does not long even for liberation, therefore, the question of his having desire for alien substances does not arise.) 104

अध्याय - 7 ज्ञानी वेद्य-वेदक भाव की आकांक्षा नहीं करता - जो वेददि वेदिज्जदि समये समये विणस्सदे उहयं। तं जाणगो दु णाणी उहयं पि ण कंखदि कयावि॥ (7-24-216) जो अनुभव करता है (ऐसा वेदक भाव), जो अनुभव किया जाता है (ऐसा वेद्यभाव), ये दोनों भाव (अर्थपर्याय की अपेक्षा) समय-समय में नष्ट हो जाते हैं। ऐसा जानने वाला ज्ञानी उन दोनों भावों की कदापि आकांक्षा नहीं करता। संसार, शरीर, भोग से विरक्त - बंधुवभोगणिमित्ते अज्झवसाणोदयेसु णाणिस्स। संसारदेहविसयेसु णैव उप्पज्जदे रागो॥ (7-25-217) बन्ध और उपभोग के निमित्तभूत संसार-सम्बन्धी और देह-सम्बन्धी रागादि अध्यवसानों के उदय में ज्ञानी के राग उत्पन्न नहीं होता।

अध्याय - 7 ज्ञानी और अज्ञानी में अन्तर - णाणी रागप्पजहो हि सव्वदव्वेसु कम्ममज्झगदो। णो लिप्पदि रजएण दु कद्दममज्झे जहा कणयं॥ (7-26-218) अण्णाणी पुण रत्तो हि सव्वदव्वेसु कम्ममज्झगदो। लिप्पदि कम्मरयेण दु कद्दममज्झे जहा लोहं॥ (7-27-219) ज्ञानी सब द्रव्यों में निश्चय ही राग का त्यागी (वीतराग) होता है, कर्मों के मध्य पड़ा हुआ भी कर्मरूपी रज से लिप्त नहीं होता है, जिस प्रकार कीचड़ के मध्य पड़ा हुआ सोना (कीचड़ में लिप्त नहीं होता)। पुनः अज्ञानी सब परद्रव्यों में निश्चय ही रागी होता है, (अतः वह) कर्मों के मध्य पड़ा हुआ कर्मरूपी रज से लिप्त होता है, जिस प्रकार कीचड़ के मध्य पड़ा हुआ लोहा (कीचड़-जंग से लिप्त होता है)। The knower surely renounces attachment for all substances; while stationed in the midst of karmas, he is not soiled by the karma-dirt – just like gold in the midst of mire (gold remains uncontaminated). On the other hand, the ignorant surely remains attached to all alien substances; therefore, while stationed in the midst of karmas, he gets soiled by the karma- dirt – just like iron in the midst of mire (iron gets contaminated). शंख के दृष्टान्त द्वारा पूर्वोक्त का समर्थन - भुंजंतस्स वि विविहे सचित्ताचित्तमिस्सिए दव्वे। संखस्स सेदभावो ण वि सक्कदि किण्हगो कादुं॥ (7-28-220) 106

अध्याय - 7 तह णाणिस्स दु विविहे सचित्ताचित्तमिस्सिए दव्वे। भुंजंतस्स वि णाणं ण सक्कमण्णाणदं णेदुं॥ (7-29-221) जइया स एव संखो सेदसहावं सयं पजहिदूण। गच्छेज्ज किण्हभावं तइया सुक्कत्तणं पजहे॥ (7-30-222) तह णाणी वि हु जइया णाणसहावं सयं पजहिदूण। अण्णाणेण परिणदो तइया अण्णाणदं गच्छे॥ (7-31-223) अनेक प्रकार के सचित्त, अचित्त और मिश्रित द्रव्यों का उपभोग करने वाले शंख का श्वेतभाव कृष्ण नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार अनेक प्रकार के सचित्त, अचित्त और मिश्रित द्रव्यों का उपयोग करते हुए ज्ञानी के ज्ञान को अज्ञानरूप नहीं किया जा सकता। जब वही शंख अपने श्वेत स्वभाव को स्वयं छोड़कर कृष्णभाव को प्राप्त होता है, तभी वह शुक्लत्व को छोड़ देता है। इसी प्रकार ज्ञानी भी जब अपने ज्ञानस्वभाव को स्वयं छोड़कर अज्ञानरूप परिणमित होता है, तब वह अज्ञानभाव को प्राप्त हो जाता है।