समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
९. मोक्ष अधिकार (परम विशुद्धि व मुक्ति)
अध्याय - 10 अपेक्षा-भेद से आत्मा कर्ता और अकर्ता है - अहवा मण्णसि मज्झं अप्पा अप्पाणमप्पणो कुणदि। एसो मिच्छसहावो तुम्हं एवं भणंतस्स॥ (10-34-341) अप्पा णिच्चासंखेज्जपदेसो देसिदो दु समयम्हि। ण वि सो सक्कदि तत्तो हीणो अहियो व कादुं जे॥ (10-35-342) जीवस्स जीवरूवं वित्थरदो जाण लोगमित्तं हि। तत्तो सो किं हीणो अहियो य कदं भणसि दव्वं॥ (10-36-343) अह जाणगो दु भावो णाणसहावेण अत्थि दे दि मदं। तम्हा ण वि अप्पा अप्पयं तु समयप्पणो कुणदि॥ (10-37-344) अथवा (कर्तृत्व का पक्ष सिद्ध करने के लिए) ऐसा मानो कि मेरा आत्मा अपने द्रव्यरूप आत्मा को करता है। ऐसा कहने वाले तेरा यह मिथ्यात्व भाव है, क्योंकि परमागम में आत्मा को नित्य और असंख्यात प्रदेशी कहा गया है। आत्मा उससे हीन या अधिक नहीं किया जा सकता। विस्तार की अपेक्षा जीव का जीवरूप निश्चय से लोकमात्र जानो। आत्मा उससे क्या हीन अथवा अधिक होता है जो तू कहता है कि आत्मा ने द्रव्यरूप आत्मा को किया; अथवा अगर तेरा ऐसा मत है कि ज्ञायक भाव तो ज्ञानस्वभाव से स्थित है तो इससे भी आत्मा स्वयं अपने आत्मा को नहीं करता (यह सिद्ध होता है)। ••••••••••••••••••••• 162
अध्याय - 10 Or (in order to substantiate your theory that the karmas do everything –) if you hold, “My soul transforms itself by itself,” then this opinion of yours is perverse thinking. Soul has been described in sacred scriptures as eternal and having innumerable points of space. The soul, on its own accord, is incapable of increasing or decreasing its spatial points. Know that, from the point of view of extension, the soul is coextensive with the universe. Since the soul, on its own accord, is incapable of increasing or decreasing its spatial points, how can you say that the soul transforms itself by itself? If you accept that the knowing substance exists with its knowing nature, then also it is established that the soul does not transform itself by itself. वस्तु नित्यानित्यात्मक है - केहिचि दु पज्जयेहिं विणस्सदे णैव चि दु जीवो। जम्हा तम्हा कुव्वदि सो वा अण्णो व णेयंतो॥ (10-38-345) केहिचि दु पज्जयेहिं विणस्सदे णैव केहिचि दु जीवो। जम्हा तम्हा वेददि सो वा अण्णो व णेयंतो॥ (10-39-346) जो चेव कुणदि सो चेव वेदगो जस्स एस सिद्धंतो। सो जीवो णादव्वो मिच्छादिट्ठी अणारिहदो॥ (10-40-347) अण्णो करेदि अण्णो परिभुंजदि जस्स एस सिद्धंतो। सो जीवो णादव्वो मिच्छादिट्ठी अणारिहदो॥ (10-41-348) 163
अध्याय - 10 क्योंकि जीव कितनी ही पर्यायों से नष्ट होता है और कितनी ही पर्यायों से नष्ट नहीं होता इसलिए (जो भोगता है), वही करता है या अन्य करता है, ऐसा एकान्त नहीं है; क्योंकि जीव कितनी ही पर्यायों से नष्ट होता है और कितनी ही पर्यायों से नष्ट नहीं होता; इसलिए (जो करता है), वही भोगता है अथवा अन्य भोगता है, ऐसा एकान्त नहीं है। जो जीव करता है, वही भोगता है, जिसका यह सिद्धान्त है, वह जीव मिथ्यादृष्टि, आर्हत मत का न मानने वाला जानना चाहिये। कोई अन्य करता है, कोई अन्य भोगता है, जिसका ऐसा सिद्धान्त है, वह जीव मिथ्यादृष्टि, आर्हत मत का न मानने वाला जानना चाहिये। Since from the point of view of some modifications, the soul dies, and from the point of view of some other modifications, the soul does not die, therefore, the one-sided view that the soul (that enjoys) is the same as the doer, or else, some other is the doer, is not tenable. Since from the point of view of some modifications, the soul dies, and from the point of view of some other modifications, the soul does not die, therefore, the one-sided view that the soul (that acts) is the same as the enjoyer (of fruits thereof), or else, some other is the enjoyer, is not tenable. The one who believes that the soul that acts is the same as the soul that enjoys is a wrong believer and does not have faith in the teachings of the Omniscient Lord. The one who believes that the soul that acts is absolutely different from the soul that enjoys is a wrong believer and does not have faith in the teachings of the Omniscient Lord. 164
अध्याय - 10 जीव परिणमन करता हुआ भी अन्य द्रव्यरूप नहीं होता - जह सिप्पिओ दु कम्मं कुव्वदि ण य सो दु तम्मओ होदि। तह जीवो वि य कम्मं कुव्वदि ण य तम्मओ होदि॥ (10-42-349) जह सिप्पिउ करणेहिं कुव्वदि ण य सो दु तम्मओ होदि। तह जीवो करणेहिं कुव्वदि ण य तम्मओ होदि॥ (10-43-350) जह सिप्पिउ करणाणि य गिण्हदि ण य सो दु तम्मओ होदि। तह जीवो करणाणि य गिण्हदि ण य तम्मओ होदि॥ (10-44-351) जह सिप्पिउ कम्मफलं भुंजदि ण य सो दु तम्मओ होदि। तह जीवो कम्मफलं भुंजदि ण य तम्मओ होदि॥ (10-45-352) जैसे स्वर्णकार आदि शिल्पी कुण्डल आदि कर्म करता है, परन्तु वह उनसे तन्मय नहीं होता। उसी प्रकार जीव भी ज्ञानावरणादि पुद्गल कर्म को करता है, किन्तु वह उनसे तन्मय नहीं होता। जैसे शिल्पी (स्वर्णकार आदि) हथौड़ा आदि उपकरणों से कुण्डल आदि बनाता है, किन्तु वह उनसे तन्मय नहीं होता। उसी प्रकार जीव भी मन-वचन-कायरूप करणों के द्वारा ज्ञानावरणादि कर्म करता है; किन्तु वह उनसे तन्मय नहीं होता। 165
अध्याय - 10 जैसे स्वर्णकार आदि शिल्पी उपकरणों को ग्रहण करता है, किन्तु वह उनसे तन्मय नहीं होता; उसी प्रकार जीव भी मन-वचन-कायरूप करणों को ग्रहण करता है; किन्तु वह उनसे तन्मय नहीं होता। जैसे स्वर्णकार आदि शिल्पी कुण्डलादि कर्मों के फल को भोगता है; किन्तु वह उस फल से तन्मय नहीं होता, उसी प्रकार जीव भी कर्म के सुख-दुःख रूप फल को भोगता है, किन्तु वह उस फल से तन्मय नहीं होता। Just as an artisan (a goldsmith, for example), does his work to produce earrings etc. but does not become identical with it, so also the Self produces karmic matter like knowledge-obscuring karma, but does not become identical with it. Just as an artisan (a goldsmith, for example), uses tools like a mallet to produce earrings etc. but does not become identical with them, so also the Self acts through the instruments of mind-, speech- and physical-activity to produce karmic matter like knowledge-obscuring karma, but does not become identical with them. Just as an artisan (a goldsmith, for example), takes up tools but does not become identical with them, so also the Self adopts instruments of mind-, speech- and physical-activity but does not become identical with them. Just as an artisan (a goldsmith, for example) enjoys the fruits of his work (earrings etc.) but does not become identical with the fruits, so also the Self enjoys the fruits of karmas (in the form of pleasure and pain) but does not become identical with them. 166
अध्याय - 10 सूचनिका गाथा - एवं ववहारस्स दु वत्तव्वं दंसणं समासेण। सुणु णिच्छयस्स वयणं परिणामकदं तु जं होदि॥ (10-46-353) इस प्रकार तो व्यवहार नय का मत संक्षेप में कहने योग्य है। आगे निश्चयनय का वचन सुनो, जो अपने परिणामों के द्वारा किया हुआ होता है। जीव अपने भावकर्मों में तन्मय होने से दुखी होता है - जह सिप्पिओ दु चेट्ठं कुव्वदि हवदि य तहा अणण्णो सो। तह जीवो वि य कम्मं कुव्वदि हवदि य अणण्णो सो॥ (10-47-354) जह चेट्ठं कुव्वंतो दु सिप्पिओ णिच्चदुक्खिदो होदि। तत्तो सिया अणण्णो तह चेट्ठंतो दुही जीवो॥ (10-48-355) जैसे स्वर्णकारादि शिल्पी (कुण्डलादि ऐसा बनाऊँगा, इस प्रकार मन में) चेष्टा 167
अध्याय - 10 करता है तथा उस चेष्टा से वह तन्मय हो जाता है। उसी प्रकार जीव भी रागादि भावकर्म करता है और वह उस भावकर्म से तन्मय हो जाता है। जैसे स्वर्णकारादि शिल्पी चेष्टा करता हुआ नित्य दुखी होता है और उस दुःख से अनन्य (तन्मय) होता है, उसी प्रकार जीव हर्ष-विषाद रूप चेष्टा करता हुआ दुखी होता है (और उस दुःख से वह अनन्य है)। जीव के ज्ञान-दर्शन-चारित्र पर्यायों का निश्चय स्वरूप - जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होदि। तह जाणगो दु ण परस्स जाणगो जाणगो सो दु॥ (10-49-356) जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होदि। तह पस्सगो दु ण परस्स पस्सगो पस्सगो सो दु॥ (10-50-357) 168
अध्याय - 10 जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होदि। तह संजदो दु ण परस्स संजदो संजदो सो दु॥ (10-51-358) जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होदि। तह दंसणं दु ण परस्स दंसणं दंसणं तं तु॥ (10-52-359) जैसे सफेदी-खड़िया पर की (दीवाल आदि रूप) नहीं है, सफेदी वह तो सफेदी ही है (वह अपने स्वरूप में ही रहती है); उसी प्रकार ज्ञायक (आत्मा) पर का (ज्ञेयरूप) नहीं है। ज्ञायक वह तो ज्ञायक ही है (पर को जानता हुआ भी अपने स्वरूप में रहता है)। जैसे सफेदी-खड़िया पर की नहीं है, सफेदी वह तो सफेदी ही है; उसी प्रकार दर्शक (आत्मा) पर का नहीं है, दर्शक (दृष्टा) वह तो दर्शक ही है। जैसे सफेदी-खड़िया पर की नहीं है, सफेदी वह तो सफेदी ही है; उसी प्रकार संयत (आत्मा) पर का (परिग्रहादि रूप) नहीं है। संयत वह तो संयत ही है। जैसे सफेदी-खड़िया पर की (दीवाल आदि रूप) नहीं है, सफेदी वह तो सफेदी ही है; उसी प्रकार दर्शन (श्रद्धान) पर का नहीं है। दर्शन वह तो दर्शन ही है। Just as chalk, when applied to a board etc., does not become one with that board etc., but retains its own identity characterized by whiteness, similarly, the knower Self, while knowing an object, does not become one with that known object, but retains his own identity as a knower. Just as chalk does not become one with an alien substance, but retains its own identity characterized by whiteness, similarly, •••••••••••••••••••••••• 169
अध्याय - 10 the perceiver Self, while perceiving an object, does not become one with that perceived object, but retains his own identity as a perceiver. Just as chalk does not become one with an alien substance, but retains its own identity characterized by whiteness, similarly, the Self with restraint, while exercising restraint from an external object, does not become one with that object, but retains his own identity as possessor of restraint. Just as chalk does not become one with an alien substance, but retains its own identity characterized by whiteness, similarly, the Self with right faith, while ascertaining an external object as it is, does not become one with that object, but retains his own identity as possessor of right faith. सूचनिका गाथा - एवं तु णिच्छयणयस्स भासिदं णाणदंसणचरित्ते। सुणु ववहारणयस्स य वत्तव्वं से समासेण॥ (10-53-360) इस प्रकार ज्ञान, दर्शन और चारित्र के विषय में निश्चय नय का कथन हुआ; और अब उसके विषय में संक्षेप में व्यवहार नय का कथन सुनो। Knowledge, faith, and conduct, from the transcendental point of view, have thus been described. Now listen to their brief description from the empirical point of view. 170
अध्याय - 10 सम्यग्दृष्टि स्वभाव से देखता, जानता और त्यागता है - जह परदव्वं सेददि हु सेडिया अप्पणो सहावेण। तह परदव्वं जाणदि णादा वि सएण भावेण॥ (10-54-361) जह परदव्वं सेददि हु सेडिया अप्पणो सहावेण। तह परदव्वं पस्सदि जीवो वि सएण भावेण॥ (10-55-362) जह परदव्वं सेददि हु सेडिया अप्पणो सहावेण। तह परदव्वं विजहदि णादा वि सएण भावेण॥ (10-56-363) जह परदव्वं सेददि हु सेडिया अप्पणो सहावेण। तह परदव्वं सद्दहदि सम्मादिट्ठी सहावेण॥ (10-57-364) जैसे सफेदी-खड़िया अपने स्वभाव से ही परद्रव्य (दीवाल आदि) को सफेद करती है, उसी प्रकार ज्ञाता आत्मा भी अपने स्वभाव से परद्रव्य को जानता है। जैसे सफेदी-खड़िया अपने स्वभाव से ही परद्रव्य (दीवाल आदि) को सफेद करती है, उसी प्रकार जीव भी अपने स्वभाव से परद्रव्य को देखता है। जैसे सफेदी-खड़िया अपने स्वभाव से ही परद्रव्य (दीवाल आदि) को सफेद करती है, उसी प्रकार ज्ञाता आत्मा भी अपने स्वभाव से परद्रव्य को त्यागता है। जैसे सफेदी-खड़िया अपने स्वभाव से ही परद्रव्य (दीवाल आदि) को सफेद करती है, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि अपने स्वभाव से परद्रव्य का श्रद्धान करता है। .................... 171
अध्याय - 10 Just as chalk whitens the alien substance (a board etc.) because of its intrinsic nature (of whiteness), similarly, the knower Self knows the alien substance because of his intrinsic nature of being a knower. Just as chalk whitens the alien substance (a board etc.) because of its intrinsic nature (of whiteness), similarly, the perceiver Self perceives the alien substance because of his intrinsic nature of perception. Just as chalk whitens the alien substance (a board etc.) because of its intrinsic nature (of whiteness), similarly, the Self who knows renounces the alien substance because of his intrinsic nature of non-attachment. Just as chalk whitens the alien substance (a board etc.) because of its intrinsic nature (of whiteness), similarly, the Self with right faith ascertains the alien substance as it is because of his intrinsic nature of right faith. जीव की अन्य पर्यायों का व्यवहार स्वरूप - एवं ववहारस्स दु विणिच्छओ णाणदंसणचरित्ते। भणिदो अण्णेसु वि पज्जयेसु एमेव णादव्वो॥ (10-58-365) इस प्रकार ज्ञान, दर्शन और चारित्र के विषय में व्यवहार नय का निर्णय कहा है। अन्य पर्यायों में भी इसी प्रकार जानना चाहिये। Knowledge, faith, and conduct, from the empirical point of view, have thus been described. The other modes (of consciousness) should be understood similarly. 172
अध्याय - 10 आत्मा के गुण परद्रव्य में नहीं हैं - दंसणणाणचरित्तं किंचि वि णत्थि दु अचेदणे विसए। तम्हा किं घादयदे चेदयिदा तेसु विसएसु॥ (10-59-366) दंसणणाणचरित्तं किंचि वि णत्थि दु अचेदणे कम्मे। तम्हा किं घादयदे चेदयिदा तम्मि कम्मम्मि॥ (10-60-367) दंसणणाणचरित्तं किंचि वि णत्थि दु अचेदणे काये। तम्हा किं घादयदे चेदयिदा तेसु कायेसु॥ (10-61-368) दर्शन, ज्ञान और चारित्र अचेतन विषय में किंचिन्मात्र भी नहीं हैं; इसलिए आत्मा उन विषयों में क्या घात करेगा? दर्शन, ज्ञान और चारित्र अचेतन कर्म में किंचिन्मात्र भी नहीं हैं; इसलिए आत्मा उस कर्म में क्या घात करेगा? दर्शन, ज्ञान और चारित्र अचेतन काय में किंचिन्मात्र भी नहीं हैं; इसलिए आत्मा उन कायों में क्या घात करेगा? There is no faith, knowledge, and conduct whatsoever in the non-conscious sense-objects, therefore, what can the soul destroy in such objects? There is no faith, knowledge, and conduct whatsoever in the non-conscious matter of karmas, therefore, what can the soul destroy in such karmas? There is no faith, knowledge, and conduct whatsoever in the non-conscious body, therefore, what can the soul destroy in such bodies? 173
अध्याय - 10 ज्ञानादि का घात होने पर पुद्गल का घात नहीं होता - णाणस्स दंसणस्स य भणिदो घादो तहा चरित्तस्स। ण वि तम्हि को वि पोग्गलदव्वे घादो दु णिद्दिट्ठो॥ (10-62-369) ज्ञान, दर्शन और चारित्र का घात बताया है, (किन्तु) उस पुद्गल द्रव्य में कोई घात नहीं कहा। Destruction of knowledge, faith, and conduct, has been mentioned; (but) destruction of physical matter has not been indicated. सम्यग्दृष्टि को विषयों में राग नहीं है - जीवस्स जे गुणा केई णत्थि ते खलु परसु दव्वेसु। तम्हा सम्मादिट्ठिस्स णत्थि रागो दु विसएसु॥ (10-63-370) जीव के जो कोई गुण हैं, वे वास्तव में परद्रव्यों में नहीं हैं; इसलिए सम्यग्दृष्टि को विषयों में राग नहीं है। The attributes of the soul do not exist in alien substances; therefore, the right believer has no attachment for the sense- objects. 174
अध्याय - 10 जीव के रागादि परिणाम परद्रव्य में नहीं हैं - रागो दोसो मोहो जीवस्स दु ते अणण्णपरिणामा। एदेण कारणेण दु सद्दादिसु णत्थि रागादी॥ (10-64-371) राग, द्वेष, मोह वे जीव के अनन्य परिणाम हैं। इस कारण राग आदि (परिणाम) शब्द आदि में नहीं हैं। Attachment, aversion, and delusion, are the soul's own immutable modes; for this reason, sound (and other sense- objects) do not possess attachment etc. परद्रव्य जीव में रागादि उत्पन्न नही करता - अण्णदवियेण अण्णदवियस्स णो कीरदे गुणुप्पादो। तम्हा दु सव्वदव्वा उप्पज्जंते सहावेण॥ (10-65-372) अन्य द्रव्य के द्वारा अन्य द्रव्य के गुणों की उत्पत्ति नहीं की जा सकती; इसलिए (यही कारण है कि) सब द्रव्य अपने-अपने स्वभाव से उत्पन्न होते हैं। The qualities of a substance cannot be produced by another substance; therefore, all substances are produced by their own, individual nature. 175
अध्याय - 10 पुद्गल शब्द को सुनकर रोष-तोष करना अज्ञान है - णिंदिदसंथुदवयणाणि पोग्गला परिणमंति बहुगाणि। ताणि सुणिदूण रूसदि तूसदि य पुणो अहं भणिदो॥ (10-66-373) पोग्गलदव्वं सद्दत्तपरिणदं तस्स जदि गुणो अण्णो। तम्हा ण तुमं भणिदो किंचि वि किं रूससि अबुद्धो॥ (10-67-374) पुद्गल अनेक प्रकार के निंदा और स्तुति के वचनों के रूप में परिणमित होते हैं। उन वचनों को सुनकर ‘मुझको कहा है’ यह मानकर तू रुष्ट और तुष्ट होता है। पुद्गलद्रव्य शब्दरूप परिणमित हुआ है। उसका गुण यदि तुझसे अन्य है, तो फिर हे अज्ञानी! तुझको कुछ भी नहीं कहा है; फिर तू क्यों रुष्ट होता है? 176
अध्याय - 10 आत्मा अपने स्वरूप से शब्द को सुनता है - असुहो सुहो व सद्दो ण तं भणदि सुणसु मं ति सो चेव। ण य एदि विविग्गहिदुं सोदविसयमागदं सद्दं॥ (10-68-375) अशुभ या शुभ शब्द तुझे नहीं कहता है कि ‘तू मुझको सुन’। वह आत्मा भी श्रोत्र इन्द्रिय के विषय में आये हुए शब्द को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant spoken word does not beckon you and say, “Hear me.” When the word reaches your organ of hearing, the soul does not move to apprehend the incoming word. आत्मा अपने स्वरूप से रूप को देखता है - असुहं सुहं व रूवं ण तं भणदि पॅच्छ मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं चक्खुविसयमागदं रूवं॥ (10-69-376) अशुभ या शुभ रूप तुझको यह नहीं कहता कि ‘तू मुझको देख’ और आत्मा भी चक्षु इन्द्रिय के विषय में आये हुए रूप को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant visual form does not beckon you and say, “See me.” When the visual form reaches your organ of sight, the soul does not move to apprehend the incoming visual form. 177
अध्याय - 10 आत्मा अपने स्वरूप से गन्ध को सूंघता है - असुहो सुहो व गंधो ण तं भणदि जिग्घ मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं घाणविसयमागदं गंधं॥ (10-70-377) अशुभ या शुभ गन्ध तुझको यह नहीं कहता कि 'तू मुझे सूँघ' और आत्मा भी घ्राणेन्द्रिय के विषय में आये हुए गन्ध को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant odour does not beckon you and say, “Smell me.” When the odour reaches your organ of smell, the soul does not move to apprehend the incoming odour. आत्मा अपने स्वरूप से रस को चखता है - असुहो सुहो व रसो ण तं भणदि रसय मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं रसणविसयमागदं तु रसं॥ (10-71-378) अशुभ या शुभ रस तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे चख' और आत्मा भी रसना इन्द्रिय के विषय में आये हुए रस को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant flavour does not beckon you and say, “Taste me.” When the flavour reaches your organ of taste, the soul does not move to apprehend the incoming flavour. 178
१०. सर्वविशुद्ध ज्ञान अधिकार व उपसंहार
अध्याय - 10 आत्मा अपने स्वरूप से स्पर्श करता है - असुहो सुहो व फासो ण तं भणदि फास मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं कायविसयमागदं फासं॥ (10-72-379) अशुभ या शुभ स्पर्श तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे स्पर्श कर' और आत्मा भी स्पर्शन इन्द्रिय के विषय में आये हुए स्पर्श को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। आत्मा अपने स्वरूप से गुण को जानता है - असुहो सुहो व गुणो ण तं भणदि बुज्झ मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं बुद्धिविसयमागदं तु गुणं॥ (10-73-380) अशुभ या शुभ गुण तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे जान' और आत्मा भी बुद्धि के विषय में आये हुए गुण को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। 179
अध्याय - 10 आत्मा अपने स्वरूप से द्रव्य को जानता है - असुहो सुहो व दव्वं ण तं भणदि बुज्झ मं ति सो चेव। ण य एदि विणिग्गहिदुं बुद्धिविसयमागदं दव्वं॥ (10-74-381) अशुभ या शुभ द्रव्य तुझे यह नहीं कहता कि 'तू मुझे जान' और आत्मा भी बुद्धि के विषय में आये हुए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए नहीं जाता। Unpleasant or pleasant substance does not beckon you and say, “Know me.” When the substance reaches your mind, the soul does not move to apprehend the incoming substance. पर में स्व बुद्धि का परिणाम - एवं तु जाणिदूण य उवसमं णोव गच्छदे मूढो। णिग्गहमणा परस्स य सयं च बुद्धिं सिवमपत्तो॥ (10-75-382) इस प्रकार (शब्द, रूप, गन्ध, रस, स्पर्श, परगुण और द्रव्य को) जानकर भी मूढ़जीव उपशम (शान्ति) को प्राप्त नहीं होता। वह पर के ग्रहण करने का मन करता है और स्वयं उसे कल्याणकारी बुद्धि (सम्यग्ज्ञान) की प्राप्ति नहीं हुई। Thus, even after knowing the true nature (of spoken word, visual form, odour, flavour, physical contact, quality of a substance, and substance itself) the ignorant person does not achieve tranquility. He makes up his mind to acquire the non- Self and, as such, remains devoid of propitious comprehension (right knowledge). 180
अध्याय - 10 निश्चय प्रतिक्रमण का स्वरूप - कम्मं जं पुव्वकयं सुहासुहमणेयवित्थरविसेसं। तत्तो णियत्तदे अप्पयं तु जो सो पडिक्कमणं॥ (10-76-383) पूर्व में किये हुए (मूलोत्तर प्रकृति रूप से) अनेक विस्तार वाले जो शुभ और अशुभ कर्म हैं, उनसे जो जीव अपने को दूर कर लेता है, वह जीव ही प्रतिक्रमण है। The Self who drives himself away from the multitude of karmas, virtuous or wicked, done in the past, is certainly the real repentance. निश्चय प्रत्याख्यान का स्वरूप - कम्मं जं सुहमसुहं जम्हि य भावम्हि बज्झदि भविस्सं। तत्तो णियत्तदे जो सो पच्चक्खाणं हवदि चेदा॥ (10-77-384) और भविष्यकाल में जो शुभाशुभ कर्म जिस भाव के होने पर बँधता है, उस भाव से जो आत्मा निवृत्त होता है, वह आत्मा प्रत्याख्यान होता है। And the Self who drives himself away from the future thought- activities that may cause bondage of karmas, virtuous or wicked, is certainly the real renunciation. 181