समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 10 पुद्गल शब्द को सुनकर रोष-तोष करना अज्ञान है - णिंदिदसंथुदवयणाणि पोग्गला परिणमंति बहुगाणि। ताणि सुणिदूण रूसदि तूसदि य पुणो अहं भणिदो॥ (10-66-373) पोग्गलदव्वं सद्दत्तपरिणदं तस्स जदि गुणो अण्णो। तम्हा ण तुमं भणिदो किंचि वि किं रूससि अबुद्धो॥ (10-67-374) पुद्गल अनेक प्रकार के निंदा और स्तुति के वचनों के रूप में परिणमित होते हैं। उन वचनों को सुनकर ‘मुझको कहा है’ यह मानकर तू रुष्ट और तुष्ट होता है। पुद्गलद्रव्य शब्दरूप परिणमित हुआ है। उसका गुण यदि तुझसे अन्य है, तो फिर हे अज्ञानी! तुझको कुछ भी नहीं कहा है; फिर तू क्यों रुष्ट होता है? 176