समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 10 सूचनिका गाथा - एवं ववहारस्स दु वत्तव्वं दंसणं समासेण। सुणु णिच्छयस्स वयणं परिणामकदं तु जं होदि॥ (10-46-353) इस प्रकार तो व्यवहार नय का मत संक्षेप में कहने योग्य है। आगे निश्चयनय का वचन सुनो, जो अपने परिणामों के द्वारा किया हुआ होता है। जीव अपने भावकर्मों में तन्मय होने से दुखी होता है - जह सिप्पिओ दु चेट्ठं कुव्वदि हवदि य तहा अणण्णो सो। तह जीवो वि य कम्मं कुव्वदि हवदि य अणण्णो सो॥ (10-47-354) जह चेट्ठं कुव्वंतो दु सिप्पिओ णिच्चदुक्खिदो होदि। तत्तो सिया अणण्णो तह चेट्ठंतो दुही जीवो॥ (10-48-355) जैसे स्वर्णकारादि शिल्पी (कुण्डलादि ऐसा बनाऊँगा, इस प्रकार मन में) चेष्टा 167