समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 10 करता है तथा उस चेष्टा से वह तन्मय हो जाता है। उसी प्रकार जीव भी रागादि भावकर्म करता है और वह उस भावकर्म से तन्मय हो जाता है। जैसे स्वर्णकारादि शिल्पी चेष्टा करता हुआ नित्य दुखी होता है और उस दुःख से अनन्य (तन्मय) होता है, उसी प्रकार जीव हर्ष-विषाद रूप चेष्टा करता हुआ दुखी होता है (और उस दुःख से वह अनन्य है)। जीव के ज्ञान-दर्शन-चारित्र पर्यायों का निश्चय स्वरूप - जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होदि। तह जाणगो दु ण परस्स जाणगो जाणगो सो दु॥ (10-49-356) जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होदि। तह पस्सगो दु ण परस्स पस्सगो पस्सगो सो दु॥ (10-50-357) 168