समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 9 जो पुरुष चोरी आदि अपराधों को करता है, वह पुरुष सशंकित रहता है कि मनुष्यों के बीच घूमते हुए ‘चोर है’ ऐसा जानकर किसी के द्वारा मैं बाँध न लिया जाऊँ। जो पुरुष अपराध नहीं करता, वह तो देश में निःशंक घूमता है क्योंकि उसके मन में बँधने की चिन्ता कभी उत्पन्न नहीं होती। इसी प्रकार अपराधी आत्मा शंकित रहता है कि मैं (ज्ञानावरणादि कर्मों से) बन्ध को प्राप्त होऊँगा। यदि वह निरपराध हो तो निःशंक रहता है कि मैं नहीं बँधूँगा। निरपराध आत्मा निःशंक होता है - संसिद्धिराधसिद्धं साधिदमाराधिदं च एयट्ठं। अवगदराधो जो खलु चेदा सो होदि अवराधो॥ (9-17-304) जो पुण णिरावराधो चेदा णिस्संकिदो दु सो होदि। आराहणाइ णिच्चं वट्टदि अहमिदि वियाणंतो॥ (9-18-305) संसिद्धि, राध, सिद्ध, साधित और आराधित ये सब एकार्थक हैं। जो आत्मा राधरहित है (निज शुद्धात्मा की आराधना से रहित है), वह आत्मा अपराध होता है; और जो 145