भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 9 आत्मा निरपराध होता है, वह निःशंक होता है। ऐसा आत्मा 'मैं (उपयोग-स्वरूप एक शुद्ध आत्मा) हूँ' इस प्रकार जानता हुआ (शुद्धात्मसिद्धिरूप) आराधना से सदा ही वर्तता है। विषकुम्भ और अमृतकुम्भ - पडिकमणं पडिसरणं पडिहरणं धारणा णियत्ती य। णिंदा गरुहा सोही अट्ठविहो होदि विसकुंभो॥ (9-19-306) अपडिकमणमपडिसरणमप्पडिहारो अधारणा चेव। अणियत्ती य अणिंदागरुहासोही अमयकुंभो॥ (9-20-307) प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, परिहार, धारणा, निवृत्ति, निन्दा, गर्हा और शुद्धि - यह आठ प्रकार का विषकुम्भ है (क्योंकि इसमें कर्तृत्व बुद्धि होती है)। अप्रतिक्रमण, अप्रतिसरण, अपरिहार, अधारणा, अनिवृत्ति, अनिन्दा, अगर्हा और अशुद्धि - ये आठ अमृतकुम्भ हैं (क्योंकि इसमें कर्तृत्व का निषेध है)। 146