समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 10 णाणं सम्मादिट्ठिं दु संजमं सुत्तमंगपुव्वगदं। धम्माधम्मं च तहा पव्वज्जं अब्भुवेत्ति बुहा॥ (10-97-404) क्योंकि जीव सदा जानता है, इसलिए ज्ञायक जीव ज्ञानी है और ज्ञान ज्ञायक से अभिन्न है, ऐसा जानना चाहिये। ज्ञानीजन (गणधरदेव) ज्ञान को ही सम्यग्दृष्टि, संयम, अंगपूर्वगत सूत्र, धर्म और अधर्म तथा दीक्षा मानते हैं। आत्मा अनाहारक है - अत्ता जस्स अमुत्तो ण हु सो आहारगो हवदि एवं। आहारो खलु मुत्तो जम्हा सो पोग्गलमओ दु॥ (10-98-405) ण वि सक्कदि घेंत्तुं जं ण वि मोत्तुं चेव जं परं दव्वं। सो को वि य तस्स गुणो पाओग्गिय विस्ससो वा वि॥ (10-99-406) 191