समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 1 श्रुतकेवली - जो हि सुदेणहिगच्छदि अप्पाणमिणं तु केवलं सुद्धं। तं सुदकेवलिमिसिणो भणंति लोयप्पदीवयरा॥ (1-9-9) जो सुदणाणं सव्वं जाणदि सुदकेवलिं तमाहु जिणा। सुदणाणमाद सव्वं जम्हा सुदकेवली तम्हा॥ (1-10-10) जो जीव वास्तव में भावश्रुत से अनुभवगोचर केवल एक शुद्ध आत्मा का अनुभव करता है, उसको लोक प्रकाशक ऋषि (निश्चय) श्रुतकेवली कहते हैं। जो जीव समस्त श्रुतज्ञान को (द्वादशाङ्ग द्रव्यश्रुत को) जानता है, उसे जिनदेव (व्यवहार) श्रुतकेवली कहते हैं। क्योंकि सम्पूर्ण श्रुतज्ञान (द्रव्य श्रुतज्ञान के आधार से उत्पन्न भावश्रुत) आत्मा है। इस कारण उसे श्रुतकेवली कहते हैं। 8