समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 1 निश्चयनय भूतार्थ है और व्यवहार नय अभूतार्थ है - ववहारोऽभूतत्थो भूतत्थो देसिदो दु सुद्धणओ। भूतत्थमस्सिदो खलु सम्मादिट्ठी हवदि जीवो॥ (1-11-11) व्यवहार नय अभूतार्थ है और शुद्धनय भूतार्थ है, (ऐसा ऋषियों ने) बताया है। जो जीव भूतार्थ के आश्रित है - भूतार्थ का आश्रय लेता है, निश्चय ही वह सम्यग्दृष्टि है। व्यवहार नय भी प्रयोजनवान है - सुद्धो सुद्धादेसो णादव्वो परमभावदरिसीहिं। ववहारदेसिदा पुण जे दु अपरमे ठिदा भावे॥ (1-12-12) शुद्धात्मभाव के दर्शियों के द्वारा शुद्ध द्रव्य का कथन करने वाला शुद्धनय-निश्चयनय जानने योग्य है। और जो जीव अशुद्ध भाव में (श्रावक की अपेक्षा शुभोपयोग में एवं प्रमत्त-अप्रमत्त की अपेक्षा भेदरत्नत्रय में) स्थित हैं, उनके लिए व्यवहार नय का उपदेश किया गया है। 9