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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

अध्याय - 1 निश्चयनय भूतार्थ है और व्यवहार नय अभूतार्थ है - ववहारोऽभूतत्थो भूतत्थो देसिदो दु सुद्धणओ। भूतत्थमस्सिदो खलु सम्मादिट्ठी हवदि जीवो॥ (1-11-11) व्यवहार नय अभूतार्थ है और शुद्धनय भूतार्थ है, (ऐसा ऋषियों ने) बताया है। जो जीव भूतार्थ के आश्रित है - भूतार्थ का आश्रय लेता है, निश्चय ही वह सम्यग्दृष्टि है। व्यवहार नय भी प्रयोजनवान है - सुद्धो सुद्धादेसो णादव्वो परमभावदरिसीहिं। ववहारदेसिदा पुण जे दु अपरमे ठिदा भावे॥ (1-12-12) शुद्धात्मभाव के दर्शियों के द्वारा शुद्ध द्रव्य का कथन करने वाला शुद्धनय-निश्चयनय जानने योग्य है। और जो जीव अशुद्ध भाव में (श्रावक की अपेक्षा शुभोपयोग में एवं प्रमत्त-अप्रमत्त की अपेक्षा भेदरत्नत्रय में) स्थित हैं, उनके लिए व्यवहार नय का उपदेश किया गया है। 9

अध्याय - 1 their impure state (like the householder engaged in virtuous activity, and the ascetic, vigilant or non-vigilant, in the ratnatrai

  • three jewels - of right faith, knowledge and conduct), the empirical point of view (vyavahāra naya) is recommended. शुद्धनय से जानना सम्यक्त्व है - भूदत्थेणाभिगदा जीवाजीवा य पुण्णपावं च। आसवसंवरणिज्जरबंधो मॉक्खो य सम्मत्तं॥ (1-13-13) शुद्ध निश्चयनय से जाने हुए जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध और मोक्ष ये नवतत्त्व सम्यक्त्व हैं। (अभेदोपचार से सम्यक्त्व का विषय और कारण होने से सम्यक्त्व हैं अथवा शुद्धनय से नवतत्त्वों को जानने से आत्मा की अनुभूति होती है, अतः सम्यक्त्व हैं।) विशेष - इन्हीं नवतत्त्वों के आधार पर समयसार ग्रंथ की रचना की गई है। Comprehension of these nine substances – soul, non-soul, merit, demerit, influx, stoppage, gradual dissociation, bondage, and liberation – through pure niśchaya naya constitutes right belief. (Being the focal point of belief these nine substances are said to constitute right belief, and from the point of view of pure niśchaya naya, the knowledge of these nine substances results into the realization of the Real Self, hence it is right belief.) Note: These nine substances are the subject matter of this treatise Samayasāra. 10

अध्याय - 1 शुद्धनय का लक्षण - जो पस्सदि अप्पाणं अबद्धपुट्ठं अणण्णयं णियदं। अविसेसमसंजुत्तं तं सुद्धणयं वियाणाहि॥ (1-14-14) जो नय शुद्धात्मा को बन्ध रहित, पर के स्पर्श से रहित, अन्यत्व रहित, नियत (चलाचलतादि रहित), ज्ञान दर्शनादि के भेद से रहित और अन्य के संयोग से रहित ऐसे छह भावरूप (आत्मा में) देखता है, उसे शुद्धनय जानो। जो आत्मा को देखता है वही जिनशासन को जानता है - जो पस्सदि अप्पाणं अबद्धपुट्ठं अणण्णमविसेसं। अपदेस-संत-मज्झं पस्सदि जिणसासणं सव्वं॥ (1-15-15) जो भव्यात्मा आत्मा को अबद्ध, अस्पृष्ट, अनन्य, अविशेष (तथा उपलक्षण से पूर्वोक्त गाथा में कथित नियत और असंयुक्त) निरंश-अखण्ड एवं परम शान्त भावस्थित आत्मा में देखता है, जानता है, अनुभव करता है - वही आत्मा सम्पूर्ण जिनशासन - स्वसमय और परसमय को जानता है। 11

अध्याय - 1 verse), indivisible whole (incorporeal), and absorbed in its own blessedness, comprehends the whole Jaina doctrine, including the Real Self and non-self. रत्नत्रय ही आत्मा है - दंसणणाणचरित्ताणि सेविदव्वाणि साहुणा णिच्चं। ताणि पुण जाण तिण्णि वि अप्पाणं चेव णिच्छयदो॥ (1-16-16) साधु को (व्यवहार नय से) सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्र की सदा ही उपासना करनी चाहिये; और उन तीनों को निश्चय नय से एक ही आत्मा जानो। From the empirical point of view (vyavahāra naya), right faith, knowledge, and conduct, should always be cherished by the ascetic, but from the point of view of pure niṣchaya naya, these three are identical with the Self. रत्नत्रय के सेवन का क्रम - जह णाम को वि पुरिसो रायाणं जाणिदूण सद्दहदि। तो तं अणुचरदि पुणो अत्थत्थीओ पयत्तेण॥ (1-17-17) एवं हि जीवराया णादव्वो तह य सद्दहेदव्वो। अणुचरिदव्वो य पुणो सो चेव दु मॉक्खकामेण॥ (1-18-18) जैसे कोई धन का इच्छुक पुरुष राजा को (छत्र, चमर आदि राजचिह्नों से) पहचान ......................... 12

अध्याय - 1 कर श्रद्धान-निश्चय करता है और उसके बाद प्रयत्नपूर्वक उसकी सेवा करता है। इसी प्रकार मोक्षार्थी पुरुष को जीव रूपी राजा का ज्ञान करना चाहिये तथा उसी का श्रद्धान करना चाहिये; फिर उसी का अनुचरण-अनुभव करना चाहिये। Just as a man desirous of monetary benefits, after identifying the king by his crown and other insignia of royalty, exerts to serve him faithfully, in the same way, one who desires emancipation should know the soul as a king, put faith in it, and attend to it in right earnest. आत्मा तब तक अज्ञानी रहता है - कम्मे णोकम्मम्हि य अहमिदि अहकं च कम्मणोकम्मं। जा एसा खलु बुद्धी अप्पडिबुद्धो हवदि ताव॥ (1-19-19) जब तक इस आत्मा की द्रव्यकर्म, भावकर्म और शरीरादि नोकर्म में 'यह मैं हूँ' और 'मुझ में कर्म और नोकर्म हैं' ऐसी बुद्धि रहती है, तब तक यह आत्मा अज्ञानी है (रहता है)। So long as the soul believes that it comprises the karmic matter – the subtle karmic matter (dravya karma), the psycho-physical karmic matter (bhāv karma), and the quasi-karmic matter (particles of matter fit for the three kinds of bodies and the six kinds of completion and development) (nokarma) – and that the subtle karmic matter and the body building karmic matter are its constituent parts, it remains lacking in discriminatory knowledge. 13

अध्याय - 1 ज्ञानी और अज्ञानी जीव की पहचान - अहमेदं एदमहं अहमेदस्सेव होमि मम एदं। अण्णं जं परदव्वं सचित्ताचित्तमिस्सं वा॥ (1-20-20) आसि मम पुव्वमेदं अहमेदं चावि पुव्वकालम्हि। होहिदि पुणो वि मज्झं अहमेदं चावि होस्सामि॥ (1-21-21) एवं तु असंभूदं आदवियप्पं करेदि संमूढो। भूदत्थं जाणंतो ण करेदि दु तं असंमूढो॥ (1-22-22) अपने से अन्य जो स्त्री-पुत्रादिक चेतन, धन-धान्यादिक अचेतन और ग्राम-नगरादि चेतनाचेतन परद्रव्य हैं; इनके सम्बन्ध में ऐसा समझे कि 'यह मैं हूँ', 'यह द्रव्य मुझ स्वरूप है', 'मैं इसका ही हूँ', 'यह मेरा है', 'यह पूर्व में मेरा था', 'पूर्वकाल में मैं भी इस रूप था', 'भविष्य में भी यह मेरा होगा', 'भविष्य में मैं भी इस रूप होऊँगा', इस प्रकार का मिथ्या आत्म विकल्प जो करता है, वह अज्ञानी (बहिरात्मा) है; और जो परमार्थ वस्तुस्वरूप को जानता हुआ वैसा झूठा विकल्प नहीं करता, वह ज्ञानी अन्तरात्मा है। One who erroneously considers any alien object such as an animate being (wife, son etc.), an inanimate thing (riches such as gold and silver), and mixed animate-inanimate object (land, cattle etc.) as ‘I am this substance’, or ‘It is me’, or ‘I am its’, or ‘It is mine’, or ‘It was mine in the past’, or ‘I was identical to it in the past’, or ‘It shall be mine in future also’, and ‘I shall also be like it in future’, has only superficial awareness (bahirātmā). But one who understands the real nature of the Self does not entertain such erroneous notions and, therefore, possesses intimate knowledge (antarātmā). 14

अध्याय - 1 आचार्य द्वारा प्रतिबोध - अण्णाणमोहिदमदी मज्झमिणं भणदि पोग्गलं दव्वं। बद्धमबद्धं च तहा जीवो बहुभावसंजुत्तो॥ (1-23-23) सव्वण्हुणाणदिट्ठो जीवो उवओगलक्खणो णिच्चं। किह सो पोग्गलदव्वीभूदो जं भणसि मज्झमिणं॥ (1-24-24) जदि सो पोग्गलदव्वीभूदो जीवत्तमागदं इदरं। तो सक्का वोत्तु जे मज्झमिणं पोग्गलं दव्वं॥ (1-25-25) अज्ञान से मोहित बुद्धि वाला और मिथ्यात्व रागादि अनेक भावों से युक्त जीव कहता है कि यह बद्ध-सम्बद्ध देहादि तथा अबद्ध देह से भिन्न स्त्री-पुत्रादि पुद्गल द्रव्य मेरा है; किन्तु सर्वज्ञ के ज्ञान में देखा गया जो सदा उपयोगलक्षण वाला जीव है, वह पुद्गल द्रव्य रूप कैसे हो सकता है, जो कहता है कि यह पुद्गल द्रव्य मेरा है। यदि जीवद्रव्य पुद्गल द्रव्य रूप हो जाये और पुद्गल द्रव्य जीवत्व को प्राप्त हो जाये तो कहा जा सकता था कि यह पुद्गल द्रव्य मेरा है। The Self, deluded with wrong knowledge and influenced by wrong belief and passions, declares that physical objects like the ones intimately bound to him (the body) and the ones not so bound to him (wife, son etc.), belong to him. The Omniscient Lord has declared that consciousness is soul's distinctive charac- teristic. How can such an entity be regarded as physical matter? How can one say that a particular physical matter belongs to him? If it were possible for the soul to become a physical matter and for the physical matter to become a soul (having conscious- ness), then only it would have been right to say that a particular physical object belongs to the soul. 15

अध्याय - 1 शिष्य पुनः शंका करता है - जदि जीवो ण सरीरं तित्थयरायरियसंथुदी चेव। सव्वा वि हवदि मिच्छा तेण दु आदा हवदि देहो॥ (1-26-26) (कोई अज्ञानी शिष्य कहता है कि-) यदि जीव शरीर नहीं है तो तीर्थंकरों और आचार्यों की स्तुति करना सभी मिथ्या हो जाएगा, इसलिए (हम मानते हैं कि) आत्मा देह ही है। (An ignorant disciple proclaims –) If the soul does not constitute the body, then worshipping the Tīrthaṃkaras and the Āchāryas will all be deceitful and, therefore, the soul must indeed be the body. आचार्य उत्तर देते हैं - ववहारणओ भासदि जीवो देहो य हवदि खलु ऍक्को। ण दु णिच्छयस्स जीवो देहो य कदावि ऍक्कट्ठो॥ (1-27-27) (शिष्य का समाधान करते हुए आचार्य कहते हैं-) व्यवहार नय कहता है कि जीव और देह वस्तुतः एक हैं और निश्चय नय के अभिप्राय के अनुसार तो जीव और देह कभी एक पदार्थ नहीं हैं। (The Āchārya responds–) The empirical point of view (vyavahāra naya) indeed holds that the soul and the body are the same, however, from the transcendental point of view (niṣchaya naya) the soul and the body are never the same (as they are made up of different substances). 16

अध्याय - 1 व्यवहार नय से केवली की स्तुति - इणमण्णं जीवादो देहं पोग्गलमयं थुणित्तु मुणी। मण्णदि हु संथुदो वंदिदो मए केवली भयवं। (1-28-28) जीव से भिन्न इस पुद्गलमय देह की स्तुति करके मुनि ऐसा मानता है कि मैंने केवली भगवान की स्तुति की और वंदना की। By making obeisance to the body, which comprises physical matter and is different from the soul, the ascetic presumes that he has adored and worshipped the Omniscient Lord. निश्चयनय से केवली की स्तुति - तं णिच्छये ण जुंजदि ण सरीरगुणा हि होंति केवलिणो। केवलिगुणे थुणदि जो सो तच्चं केवलिं थुणदि॥ (1-29-29) वह स्तुति निश्चय नय में उचित नहीं है क्योंकि शरीर के (शुक्ल कृष्णादि) गुण केवली भगवान के नहीं होते। जो केवली भगवान के गुणों की स्तुति करता है, वह परमार्थ से केवली भगवान की स्तुति करता है। From the transcendental point of view (niṣchaya naya), this adoration is not proper as the attributes of the body (like its colouration) do not exist in the Omniscient Lord. Therefore, one who adores the divine attributes of the Omniscient Lord truly worships Him. 17

अध्याय - 1 देह-स्तुति गुण-स्तुति नहीं है - णयरम्मि वण्णिदे जह ण वि रण्णो वण्णणा कदा होदि। देहगुणे थुव्वंते ण केवलिगुणा थुदा होंति॥ (1-30-30) जैसे नगर का वर्णन करने पर भी राजा का वर्णन किया हुआ नहीं होता, इसी प्रकार देह के गुणों की स्तुति करने पर केवली भगवान के गुणों की स्तुति नहीं होती। Just as the description of a city does not entail the description of its king, in the same way, eulogizing the body of the Omniscient Lord does not entail the adoration of His divine attributes. आत्मज्ञानी ही जितेन्द्रिय है - जो इंदिये जिणित्ता णाणसहावाधियं मुणदि आदं। तं खलु जिदिंदियं ते भणंति जे णिच्छिदा साहू॥ (1-31-31) जो इन्द्रियों को जीतकर ज्ञानस्वभाव से अधिक (शुद्धज्ञानचेतना गुण से परिपूर्ण) आत्मा को जानता है (अनुभव करता है) उस पुरुष को जो निश्चय नय में स्थित साधु हैं, वे निश्चय ही जितेन्द्रिय कहते हैं। The ascetic who, subjugating his senses, realizes his Real Self which is of the nature of pure knowledge-consciousness, is verily called a ‘conqueror of the senses’ by the saints who know the transcendental point of view (niṣchaya naya). 18

अध्याय - 1 मोहविजेता साधु - जो मोहं तु जिणित्ता णाणसहावाधियं मुणदि आदं। तं जिदमोहं साहुं परमट्ठवियाणया विंति॥ (1-32-32) जो (साधु) मोह को जीतकर ज्ञान स्वभाव से अधिक (शुद्धज्ञानचेतना गुण से परिपूर्ण) आत्मा को जानता है (अनुभव करता है), उस साधु को परमार्थ के जानने वाले पूर्वाचार्य मोहविजेता कहते है। The ascetic who, subjugating his delusion, realizes his Real Self which is of the nature of pure knowledge-consciousness, is verily called a ‘conqueror of delusion’ by the saints who know the ultimate truth. क्षीणमोह साधु - जिदमोहस्स दु जइया खीणो मोहो हवेज्ज साहुस्स। तइया हु खीणमोहो भण्णदि सो णिच्छयविदूहिं॥ (1-33-33) जब जिसने मोह जीत लिया है ऐसे साधु का मोह क्षीण हो जाता है, तब निश्चय के जानने वाले उस साधु को निश्चय ही क्षीणमोह कहते हैं। When the deluding karma of the ascetic who has already conquered delusion is eradicated, he attains full knowledge of the ultimate truth, and is to be known as a ‘destroyer of delusion (kṣīṇmoha)’. 19

अध्याय - 1 प्रत्याख्यान ज्ञान है - सव्वे भावे जम्हा पच्चक्खादी परे त्ति णादूण। तम्हा पच्चक्खाणं णाणं णियमा मुणेदव्वं॥ (1-34-34) यतः सब भावों को पर हैं यह जानकर त्याग देता है। इस कारण प्रत्याख्यान ज्ञान ही है, ऐसा निश्चय से (मननपूर्वक) जानना चाहिए। ज्ञानी द्वारा परभावों का त्याग - जह णाम को वि पुरिसो परदव्वमिणं ति जाणिदुं मुयदि। तह सव्वे परभावे णादूण विमुंचदे णाणी॥ (1-35-35) जैसे लोक में कोई पुरुष यह पर द्रव्य है ऐसा जानकर उसे त्याग देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त परभावों को, ये परभाव हैं ऐसा जान कर उन्हें छोड़ देता है। 20

अध्याय - 1 मोह से निर्ममत्व - णत्थि मम को वि मोहो बुज्झदि उवओग एव अहमिक्को। तं मोहणिम्ममत्तं समयस्स वियाणया विंति॥ (1-36-36) जो ऐसा जानता है कि मोह मेरा कुछ भी नहीं है, एक ज्ञान-दर्शनोपयोग रूप ही मैं हूँ, इस प्रकार जानने को सिद्धान्त या आत्मस्वरूप के ज्ञाता पूर्वाचार्य मोह से निर्ममत्व कहते हैं। The one who knows that delusion does not in any way belong to him, he is only knowledge- and faith-consciousness, is called ‘free from delusion’ by the saints well-versed in scriptural knowledge or who know the ultimate truth. धर्मद्रव्य से निर्ममत्व - णत्थि हि मम धम्मादी बुज्झदि उवओग एव अहमिक्को। तं धम्मणिम्ममत्तं समयस्स वियाणया विंति॥ (1-37-37) जो ऐसा जानता है कि धर्म आदि द्रव्य निश्चय ही मेरे नहीं हैं, एक ज्ञान- दर्शनोपयोग रूप ही मैं हूँ। इस प्रकार जानने को सिद्धान्त या आत्मतत्त्व के जानने वाले पूर्वाचार्य धर्मद्रव्य से निर्ममत्व कहते हैं। The one who knows that substances such as medium of motion (dharma) do not in any way belong to him, he is only knowledge- and faith-consciousness, is called ‘unconnected to dharma’ by the saints well versed in scriptural knowledge or who know the ultimate truth. 21

अध्याय - 1 उपसंहार - अहमेक्को खलु सुद्धो दंसणणाणमइओ सयारूवी। ण वि अत्थि मज्झ किंचि वि अण्णं परमाणुमेत्तं पि॥ (1-38-38) (ज्ञानी आत्मा यह जानता है कि) मैं एक हूँ, निश्चय ही शुद्ध हूँ, दर्शन ज्ञानमय हूँ, (रूप, रस, गंध, स्पर्श के अभाव के कारण) सदा अरूपी हूँ, कोई भी अन्य परद्रव्य परमाणुमात्र भी मेरा नहीं है। The enlightened Self knows that he is unique, absolutely pure, of the nature of knowledge- and faith-consciousness, eternally non-material (due to the absence of attributes of matter like colour, taste, smell, and touch), and as such not even an atom of alien objects, whatsoever, belongs to him. इदि पढमो जीवाधियारो समत्तो 22

अध्याय - 2 दुदियो जीवाजीवाधियारो THE SOUL AND THE NON-SOUL जीव के सम्बन्ध में विभिन्न मान्यतायें - अप्पाणमयाणंता मूढा दु परप्पवादिणो केई। जीवं अज्झवसाणं कम्मं च तहा परूवंति॥ (2-1-39) अवरे अज्झवसाणेसु तिव्वमंदाणुभावगं जीवं। मण्णंति तहा अवरे णोकम्मं चावि जीवो त्ति॥ (2-2-40) कम्मस्सुदयं जीवं अवरे कम्माणुभागमिच्छंति। तिव्वत्तणमंदत्तण गुणेहि जो सो हवदि जीवो॥ (2-3-41) जीवो कम्मं उभयं दोण्णि वि खलु के वि जीवमिच्छंति। अवरे संजोगेण दु कम्माणं जीवमिच्छंति॥ (2-4-42) एवंविहा बहुविहा परमप्पाणं वदंति दुम्मेहा। ते ण परमट्ठवादी णिच्छयवादीहि णिद्दिट्ठा॥ (2-5-43) आत्मा को न जानते हुए परद्रव्य आत्मा को कहने वाले मूढ़ अज्ञानी तो रागादि अध्यवसान को और कर्म को जीव कहते हैं। अन्य कुछ लोग रागादि अध्यवसानों में तीव्र-मन्द तारतम्य स्वरूप शक्ति-माहात्म्य को जीव मानते हैं; तथा अन्य कोई नोकर्म-शरीरादि को भी जीव है ऐसा मानते हैं। अन्य कुछ लोग कर्म के उदय को जीव मानते हैं। कुछ लोग जो तीव्रता-मन्दता रूप गुणों से भेद को प्राप्त होता है, वह 23

अध्याय - २ जीव है, इस प्रकार कर्मों के अनुभाग को जीव है ऐसा इष्ट करते हैं - मानते हैं। कोई जीव और कर्म दोनों मिले हुओं को ही जीव मानते हैं। और दूसरे कर्म के संयोग से जीव मानते हैं। इस प्रकार के तथा अन्य भी बहुत प्रकार के मूढ़ लोग पर को आत्मा कहते हैं। ऐसे एकान्तवादी परमार्थवादी नहीं हैं, ऐसा निश्चयवादियों ने कहा है। Ignorant people, not knowing the true nature of the soul, maintain that the Self is but the non-self, and some uniformed people even say that the soul is identical with passions such as attachment and that it is indistinguishable from the karmic matter. Some others say that the psychic potency which determines the high or low intensity of passions, and their consequent effect on the conscious state, is the soul. Still others regard the soul as the quasi-karmic matter (nokarma). Some consider the fruition of karma as the soul and some consider the sensation resulting from the strength of the fruition – intense or mild – as the soul. Some believe that jīva and karma, taken together, constitute the soul, and some others consider the soul to be the result of the association of karma. In these and many other ways, ignorant people identify the Self with the non-self. Such absolutists are ignorant of the truth; say those who know the ultimate point of view.


अध्यवसानादि जीव नहीं हैं - एदे सव्वे भावा पोग्गलदव्व-परिणामणिप्पण्णा। केवलिजणेहि भणिदा किह ते जीवो त्ति वुच्चंति॥ (2-6-44) ये पूर्वोक्त अध्यवसानादिक समस्त भाव पुद्गल द्रव्यकर्म के परिणाम से उत्पन्न हुए ......................... 24

अध्याय - 2 हैं, इस प्रकार केवली जिनेन्द्र भगवान ने कहा है। वे जीव हैं, ऐसा किस प्रकार कहा जा सकता है। The above mentioned affective states are all result of the manifestation of karmic matter, so says the Omniscient Lord. How can these be called the jīva or Pure Self? आठों कर्म पुद्गलमय हैं - अट्ठविहं पि य कम्मं सव्वं पोग्गलमयं जिणा विंति। जस्स फलं तं वुच्चदि दुक्खं ति विपच्चमाणस्स॥ (2-7-45) आठों प्रकार के समस्त कर्म पुद्गलमय हैं, ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं। पक कर उदय में आने वाले जिस कर्म का फल प्रसिद्ध दुःख है, ऐसा कहा है। As pronounced by the Omniscient Lord, all the eight kinds of karmas are subtle material particles, and that the fruition of these karmas results into suffering that everyone recognizes. व्यवहार नय से रागादि भाव जीव हैं - ववहारस्स दरीसणमुवदेसो वण्णिदो जिणवरेहिं। जीवा एदे सव्वे अज्झवसाणादओ भावा॥ (2-8-46) ये समस्त अध्यवसानादिक भाव जीव हैं ऐसा जिनेन्द्रदेवों ने जो उपदेश दिया है, वह व्यवहार नय का कथन है। 25

२. अजीव अधिकार (पुद्गल व जड़ द्रव्य भेद)

अध्याय - 2 It is only from the empirical point of view (vyavahāra naya) that the Omniscient Lord has declared all these affective states to be of the nature of the Self. व्यवहार और निश्चय से जीव का कथन- राया खु णिग्गदो त्ति य एसो बलसमुदयस्स आदेसो। ववहारेण दु वुच्चदि तत्थैक्को णिग्गदो राया॥ (2-9-47) एमेव य ववहारो अज्झवसाणादि अण्णभावाणं। जीवो त्ति कदो सुत्ते तत्थैक्को णिच्छिदो जीवो॥ (2-10-48) सेना के समूह को (निकलते देखकर) 'राजा ही निकला है' इस प्रकार का जो कथन है, वह व्यवहार नय से किया जाता है। वास्तव में तो वहाँ एक ही राजा निकला है। इसी प्रकार जीव से भिन्न अध्यवसानादि भाव जीव हैं, परमागम में यह व्यवहार किया गया है (व्यवहार नय से कहा गया है), किन्तु निश्चय नय से उन रागादि परिणामों में जीव तो एक ही है। On seeing the royal entourage, if one says, “The king has come out,” this statement is made from the empirical point of view (vyavahāra naya). In reality, only one person in the whole entourage is the king. In the same way, scriptures declare, from the empirical point of view (vyavahāra naya), that these affective states pertain to the Self, although they truly are different from the Self. From the transcendental point of view (niścaya naya), the Self is one, different from these passions (attachment etc.). 26

अध्याय - 2 परमार्थ जीव का स्वरूप - अरसमरूवमगंधं अव्वत्तं चेदणागुणमसद्दं। जाण अलिंगग्गहणं जीवमणिद्दिट्ठसंठाणं॥ (2-11-49) जो रसरहित है, रूपरहित है, गंधरहित है, इन्द्रियों के अगोचर है, चेतना गुण से युक्त है, शब्दरहित है, किसी चिह्न या इन्द्रिय द्वारा ग्रहण नहीं होता और जिसका आकार बताया नहीं जा सकता, उसे जीव जानो। वर्णादि भाव जीव के परिणाम नहीं हैं - जीवस्स णत्थि वण्णो ण वि गंधो ण वि रसो ण वि य फासो। ण वि रूवं ण सरीरं ण वि संठाणं ण संहणणं॥ (2-12-50) जीवस्स णत्थि रागो ण वि दोसो णेव विज्जदे मोहो। णो पच्चया ण कम्मं णोकम्मं चावि से णत्थि॥ (2-13-51) जीवस्स णत्थि वग्गो ण वग्गणा णेव फड्डया केई। णो अज्झप्पट्ठाणा णेव य अणुभागठाणा वा॥ (2-14-52) 27

अध्याय - 2 जीवस्स णत्थि केई जोगट्ठाणा ण बंधठाणा वा। णोव य उदयट्ठाणा ण मग्गणट्ठाणया केई॥ (2-15-53) णो ठिदिबंधट्ठाणा जीवस्स ण संकिलेसठाणा वा। णोव विसोहिट्ठाणा णो संजमलद्धिट्ठाणा वा॥ (2-16-54) णोव य जीवट्ठाणा ण गुणट्ठाणा य अत्थि जीवस्स। जेण दु एदे सव्वे पोग्गलदव्वस्स परिणामा॥ (2-17-55) जीव के वर्ण नहीं है, गंध भी नहीं है, रस भी नहीं है, स्पर्श भी नहीं है, रूप भी नहीं है, शरीर भी नहीं है, संस्थान (आकार) भी नहीं है, संहनन भी नहीं है। जीव के राग नहीं है, द्वेष भी नहीं है, मोह भी नहीं हैं, आस्रव भी नहीं है, कर्म भी नहीं है, उसके नोकर्म भी नहीं है। जीव के वर्ग नहीं है, वर्गणा नहीं है, कोई स्पर्धक भी नहीं है, अध्यात्मस्थान भी नहीं है और अनुभागस्थान भी नहीं है। जीव के कोई योगस्थान नहीं है, बंधस्थान भी नहीं है और उदयस्थान भी नहीं है, कोई मार्गणास्थान भी नहीं है। जीव के स्थितिबंधस्थान भी नहीं है, संक्लेशस्थान भी नहीं है, विशुद्धिस्थान भी नहीं है, संयमलब्धिस्थान भी नहीं है और जीवस्थान भी नहीं है और जीव के गुणस्थान नहीं है, क्योंकि ये सब पुद्गल के परिणमन हैं।