समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - 3 पुद्गल द्रव्य पररूप परिणमन नहीं करता - ण वि परिणमदि ण गिण्हदि उप्पज्जदि ण परदव्वपज्जाए। पोग्गलदव्वं पि तहा परिणमदि सगेहि भावेहिं॥ (3-11-79) पुद्गल द्रव्य भी परद्रव्य की पर्यायों में उस रूप न तो परिणमन करता है, न उन्हें ग्रहण करता है, न उन रूप उत्पन्न होता है, क्योंकि वह तो अपने ही भावों से परिणमन करता है। The physical matter too does not manifest itself in the modes of any foreign substance, or assimilate them, or transmute in their form, because it manifests in its own state or form. ─── जीव और पुद्गल के परिणामों में निमित्त-नैमित्तिक भाव है - जीव परिणामहेदुं कम्मत्तं पोग्गला परिणमंति। पोग्गलकम्मणिमित्तं तहेव जीवो वि परिणमदि॥ (3-12-80) ण वि कुव्वदि कम्मगुणे जीवो कम्मं तहेव जीवगुणे। अण्णोण्णणिमित्तेण दु परिणामं जाण दोण्हं पि॥ (3-13-81) एदेण कारणेण दु कत्ता आदा सगेण भावेण। पोग्गलकम्मकदाणं ण दु कत्ता सव्वभावाणं॥ (3-14-82) पुद्गल जीव के (रागादि) परिणाम के निमित्त से कर्म रूप से परिणमित होते हैं। इसी प्रकार जीव भी (मोहनीय आदि) पुद्गलकर्म निमित्त से (रागादि भाव रूप से) 40