समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 3 परिणमन करता है। जीव कर्म के गुणों को नहीं करता है। इसी प्रकार कर्म जीव के गुणों को नहीं करता है; परन्तु एक-दुसरे के निमित्त से इन दोनों के परिणाम जानो। इस कारण से आत्मा अपने ही भावों से कर्ता है, परन्तु पुद्गल कर्म के द्वारा किये गये समस्त भावों का कर्ता नहीं है। निश्चयनय से आत्मा अपना ही कर्ता और भोक्ता है - णिच्छयणयस्स एवं आदा अप्पाणमेव हि करेदि। वेदयदि पुणो तं चेव जाण अत्ता दु अत्ताणं।। (3-15-83) (निश्चयनय का इस प्रकार मत है कि) आत्मा अपने को ही करता है और फिर आत्मा अपने को ही भोगता है, ऐसा तू जान।