भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 226 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 59

अध्याय - 3 व्यवहार से आत्मा पुद्गल कर्मों का कर्ता और भोक्ता है - ववहारस्स दु आदा पोग्गलकम्मं करेदि णेयविहं। तं चेव य वेदयदे पोग्गलकम्मं अणेयविहं॥ (3-16-84) व्यवहार नय का मत है कि आत्मा अनेक प्रकार के पुद्गल कर्मों को करता है और उन्हीं अनेक प्रकार के पुद्गल कर्मों को भोगता है। It is only from the empirical point of view (vyavahāra naya) that the Self is the creator of various kinds of karmic matter, and then enjoys the fruits thereof. व्यवहार की मान्यता में दोष - जदि पोग्गलकम्ममिणं कुव्वदि तं चेव वेदयदि आदा। दोकिरियावादिरित्तो पसज्जदे सो जिणावमदं॥ (3-17-85) यदि आत्मा इस पुद्गल कर्म को करता है और उसी को भोगता है तो दो क्रियाओं से अभिन्न होने का प्रसंग आता है। ऐसा मानना जिनेन्द्रदेव के मत के विपरीत है। विशेष - क्रिया वस्तुतः परिणाम है और परिणाम क्रिया के कर्ता परिणामी से अभिन्न होता है। जीव जिस प्रकार अपने परिणाम को करता है और उसी को भोगता है उसी प्रकार यदि वह पुद्गलकर्म को करे और उसी को भोगे तो जीव अपनी और पुद्गल की - दोनों की - क्रियाओं से अभिन्न हो जाएगा। दो द्रव्यों की क्रिया एक द्रव्य करता है, ऐसा मानना जिनेन्द्रदेव के सिद्धान्त के विरुद्ध है। If the Self creates the karmic matter and then enjoys the consequences thereof, it will lead to the hypothesis of a single 42