भारतकोश
समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 226 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 87

अध्याय - 4 चउत्थो पुण्णपावाधियारो MERIT AND DEMERIT शुभ कर्म भी संसार का कारण है - कम्ममसुहं कुसीलं सुहकम्मं चावि जाणह सुसीलं। किह तं होदि सुसीलं जं संसारं पवेसेदि॥ (4-1-145) अशुभ कर्म कुशील (बुरा) है और शुभ कर्म सुशील (अच्छा) है, ऐसा तुम जानते हो; किन्तु जो कर्म जीव को संसार में प्रवेश कराता है, वह किस प्रकार सुशील (अच्छा) हो सकता है? You know that wicked karma is undesirable, and virtuous karma is desirable. But how can the karma, which leads the jīva into the cycle of births and deaths (saṃsāra), be considered desirable? शुभाशुभ कर्मबन्ध के कारण हैं - सोवण्णियं पि णियलं बंधदि कालायसं पि जह पुरिसं। बंधदि एवं जीवं सुहमसुहं वा कदं कम्मं॥ (4-2-146) जैसे सोने की बेड़ी भी पुरुष को बाँधती है और लोहे की बेड़ी भी बाँधती है। इसी प्रकार शुभ या अशुभ किया हुआ कर्म जीव को बाँधता है (दोनों ही बन्धनरूप हैं)। 70