समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)
Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary
आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा
DevanagariHindipublished226 पृष्ठ
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अध्याय - 4 शुभाशुभ दोनों त्याज्य हैं - तम्हा दु कुसीलेहि य रागं मा काहि मा व संसग्गिं। साधीणो हि विणासो कुसील-संसग्गि-रागेण।। (4-3-147) इसलिए शुभ और अशुभ इन दोनों कुशीलों के साथ राग मत करो तथा संसर्ग भी मत करो, क्योंकि कुशील के साथ संसर्ग और राग करने से स्वाधीन सुख का विनाश होता है। पूर्वोक्त का स्पष्टीकरण - जह णाम को वि पुरिसो कुच्छियसीलं जणं वियाणित्ता। वज्जेदि तेण समयं संसग्गिं रागकरणं च॥ (4-4-148) एमेव कम्मपयडी सीलसहावं हि कुच्छिदं णादुं। वज्जंति परिहरंति य तं संसग्गिं सहावरदा॥ (4-5-149)